हमारी वसीयत और विरासत (भाग 157):आत्मीयजनों से अनुरोध एवं उन्हें आश्वासन
कहने को गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार आदि नाम रखे गए हैं और उनकी सदस्यता का रजिस्टर तथा समयदान-अंशदान का अनुबंध भी है, पर वास्तविकता दूसरी ही है, जिसे हम सब भली भाँति अनुभव भी करते हैं। वह है— जन्म-जन्मांतरों से संग्रहीत आत्मीयता। जिसके पीछे जुड़ी हुई अनेकानेक गुदगुदी उत्पन्न करने वाली घटनाएँ हमें स्मरण हैं। परिजन उन्हें स्मरण न रख सके होंगे। फिर भी वे विश्वास करते हैं कि परस्पर आत्मीयता की कोई ऐसी मजबूत डोरी बँधी है, जो कई बार तो हिलाकर रख देती है। एकदूसरे के अधिक निकट आने, परस्पर कुछ अधिक कर गुजरने के लिए आतुर होते हैं। यह कल्पना नहीं, वास्तविकता है, जिसकी दोनों पक्षों को निरंतर अथवा समय-समय पर अनुभूति होती रहती है।
यही तीसरा वर्ग है— बालकों का। इनकी सहायता से मिशन का कुछ काम भी चला है, पर वह बात गौण है। प्रमुख प्रश्न एक ही है कि इन्हें हँसता-हँसाता, खिलता-खिलाता देखने का आनंद कैसे मिले? अब तक भेंट, परामर्श, सत्संग, सान्निध्य से भी इस भाव-संवेदना की तुष्टि होती थी। पर अब तो नियति ने वह सुविधा भी हाथ से छीन ली है। अब परस्पर भेंट-मिलन का अध्याय समाप्त होता है। इसमें समय की कमी या कोई व्यवस्था संबंधी कठिनाई कारण नहीं है। बात इतनी भर है कि इससे सूक्ष्मीकरण में बाधा पड़ती है; चित्त भटकता है और जिस स्तर का दबाव अंतराल पर पड़ना चाहिए, वह बिखर जाता है। फलतः उस लक्ष्य की पूर्ति में बाधा पड़ती है, जिसके साथ समस्त मनुष्य समुदाय का भाग्य-भविष्य जुड़ा हुआ है। अपनी निज की मुक्ति, सिद्धि या स्वर्ग-उत्कर्ष जैसा कारण रहा होता, तो उसे आगे कभी के लिए टहलाया जा सकता था। पर समय तो ऐसा विकट है, जो एक क्षण की भी छूट नहीं देता। ईमानदार सिपाही की तरह मोर्चा सँभालने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं। इसलिए सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में परिजनों को हमें अपनी साधना हेतु एकाकी छोड़ देना चाहिए।
बच्चों के— प्रज्ञापरिजनों के संबंध में चलते-चलाते हमारा इतना ही आश्वासन है कि वे यदि अपने भाव-संवेदना-क्षेत्र को थोड़ा और परिष्कृत कर लें तो निकटता अब की अपेक्षा भी अधिक गहरी अनुभव करने लगेंगे। कारण कि हमारा सूक्ष्मशरीर सन् 2000 तक और भी अधिक प्रखर होकर जिएगा। जहाँ उसकी आवश्यकता होगी, बिना विलंब लगाए पहुँचेगा। इतना ही नहीं, स्नेह-सहयोग, परामर्श-मार्गदर्शन जैसे प्रयोजनों की पूर्ति भी करता रहेगा। कठिनाइयों में सहायता करने और बालकों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की हमारी प्रकृति में राई-रत्ती भी अंतर नहीं होने जा रहा है। वह लाभ पहले की अपेक्षा और भी अधिक मिलता रह सकता है।
हमारे गुरुदेव सूक्ष्मशरीर से हिमालय में रहते हैं। विगत 61 वर्षों में हमने निरंतर उनका सान्निध्य अनुभव किया है। यों आँखों से देखने की बात मात्र जीवन भर में तीन बार ही, तीन-तीन दिन के लिए संभव हुई है। भाव-सान्निध्य में श्रद्धा की उत्कृष्टता रहने से उसकी परिणति एकलव्य के द्रोणाचार्य, मीरा के कृष्ण, रामकृष्ण परमहंस के कालीदर्शन जैसी होती है। हमें भी यह लाभ निरंतर मिलता रहा है। जो अपनी भाव-संवेदना बढ़ा सकेंगे, वे भविष्य में हमारी निकटता अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह अनुभव करते रहेंगे।
बच्चे बड़ों से कुछ चाहते हैं, सो ठीक है। पर बड़े बदले में कुछ न चाहते हों, ऐसी बात भी नहीं। नियत स्थान पर मल-मूत्र त्यागने, शिष्टाचार समझने, हँसने-हँसाने, वस्तुएँ न बिखेरने, पढ़ने जाने जैसी अपेक्षाएँ वे भी करते हैं। जितना संभव है, उतना तो उन्हें भी करना चाहिए। हमारी अपेक्षाएँ भी ऐसी ही हैं। गोवर्द्धन उठाने वाले ने अपने अनगढ़ ग्वाल-बालों के सहारे ही गोवर्द्धन उठाकर दिखाया था। हनुमान की बात किसी ने नहीं सुनी, तो अपने सहचर रीछ-वानरों को ही समेट लाए। नवनिर्माण के कंधे पर लदे उत्तरदायित्व को वहन करने में हम अकेले ही समर्थ नहीं हो सकते थे। यह मिल-जुलकर संपन्न हो सकने वाला कार्य था। सो समझदारों में से कोई हाथ न लगा, तो अपने इसी बाल-परिवार को लेकर जुट पड़े और जो कुछ, जितना कुछ संभव हो सका, करते रहे। अब तक की प्रगति का यही सार-संक्षेप है।
बात अगले दिनों की आती है। हमें अपने बच्चों के लिए क्या करना चाहिए। इस कर्त्तव्य-उत्तरदायित्व का सदा ध्यान रहा है और जब तक चेतना का अस्तित्व है, उसका स्मरण बना भी रहेगा। इस संबंध में स्मरण दिलाने योग्य बात एक ही है कि हमारी आकांक्षा और आवश्यकता को भुला न दिया जाए। समय विकट है। इसमें प्रत्येक परिजन का समयदान और अंशदान हमें चाहिए। जितना मिलता रहा है, उससे भी अधिक मात्रा में; क्योंकि जो करना है, उसके लिए तत्काल कदम उठाने हैं। सो भी बड़े कामों के लिए बड़े-बड़े लोग चाहिए; बड़े साधन भी। हमारे परिवार का हर व्यक्ति बड़ा है। छोटेपन का तो उसने मुखौटा भर पहन रखा है। उतारने भर की देर है कि उसका असली चेहरा दृष्टिगोचर होगा। भेड़ों के समूह में पले सिंह-शावक की कथा अपने प्रज्ञापरिजनों में से प्रत्येक के ऊपर लागू होती है या हो सकती है।
हमें हमारे मार्गदर्शक ने एक पल में क्षुद्रता का लबादा झटककर महानता का परिधान पहना दिया था। इस कायाकल्प में मात्र इतना ही हुआ था कि लोभ, मोह की कीचड़ से उबरना पड़ा। जिस-तिस के परामर्शों-आग्रहों की उपेक्षा करनी पड़ी और आत्मा-परमात्मा के संयुक्त निर्णय को शिरोधार्य करने का साहस जुटाना पड़ा है। एकाकी चलने का आत्मविश्वास जागा और आदर्शों को भगवान मानकर कदम बढ़े। इसके बाद एकाकी नहीं रहना पड़ा और न साधनहीन-उपेक्षित स्थिति का कभी आभास हुआ। सत्य का अवलंबन अपनाने भर की देर थी कि असत्य का कुहासा अनायास ही हटता चला गया।
हमारा परिजनों से यही अनुरोध है कि हमारी जीवनचर्या को घटनाक्रम की दृष्टि से नहीं, वरन् इस पर्यवेक्षण की दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए कि उसमें दैवी अनुग्रह के अवतरण होने से ‘साधना से सिद्धि’ वाला प्रसंग जुड़ा या नहीं। इसी प्रकार यह भी द्रष्टव्य है कि दूसरों के अवलंबन योग्य आध्यात्मिकता का प्रस्तुतीकरण करते हुए हमारे कदम ऋषिपरंपरा अपनाने के लिए बढ़े या नहीं? जिसे, जितनी यथार्थता मिले, वह उतनी ही मात्रा में यह अनुमान लगाए कि अध्यात्म विज्ञान का वास्तविक स्वरूप यही है। आंतरिक पवित्रता और बहिरंग की प्रखरता में जो जितना आदर्शवादी समन्वय कर सकेगा, वह उन विभूतियों से लाभान्वित होगा, जो अध्यात्म तत्त्वज्ञान एवं क्रिया विज्ञान के साथ जोड़ी और बताई गई हैं।
अपने अनन्य आत्मीय प्रज्ञापरिजनों में से प्रत्येक के नाम हमारी यही वसीयत और विरासत है कि हमारे जीवन से कुछ सीखें। कदमों की यथार्थता खोजें; सफलता जाँचें और जिससे, जितना बन पड़े, अनुकरण का— अनुगमन का प्रयास करें। यह नफे का सौदा है, घाटे का नहीं।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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