विज्ञान की अपूर्णता और स्थिरता
भौतिक तथ्यों की जानकारी देना और पदार्थ की शक्ति का सुविधाजनक उपयोग सिखाना— विज्ञान का क्षेत्र इतना ही है। हर बात की एक सीमा होती है। विज्ञान की सीमा भी इतनी ही है। इस परिधि को किसी प्रकार कम महत्त्व का नहीं माना जा सकता। अन्य सभी प्राणी अपनी शारीरिक क्षमता भार से निर्वाह के साधन जुटाते रहने भर में सक्षम होते हैं, पर मनुष्य अगणित सुख-सुविधाओं का उपभोग करता है। उसे विज्ञान की उपलब्धि ही कहनी चाहिए। अग्नि का जलाना और उसका उपयोग करना जिस दिन मनुष्य ने जाना, उस दिन उसने प्रगति के एक नए लोक में प्रवेश किया। शक्ति का बहुत बड़ा द्वार उसके लिए यहीं से खुला। नोंकदार औजार, पहिया, कृषि, पशुपालन, आच्छादन जैसी वैज्ञानिक उपलब्धियों ने उसे नर-वानर के वर्ग से निकालकर प्राणियों का मुकटमणि ही बना दिया। चेतनात्मक प्रगति के अगले चरण उसके लिए भाषा और लिपि के अद्भुत आयाम प्रस्तुत करते हैं। इस वैज्ञानिक प्रगतिक्रम में बढ़ते हुए आज हम अणुशक्ति और अंतर्ग्रही क्षेत्र में परिभ्रमण कर रहे हैं। प्रकृति के रहस्यों पर से एक के बाद एक परत उठाते चलने में जो सफलता मिल रही है, उसके लिए मानवी प्रतिभा की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है। बुद्धि, श्रम और साधनों के समन्वय से चल रही वैज्ञानिक प्रगति ने हमें असीम सुख-साधन दिए हैं और भविष्य में इससे भी अधिक देने-दिलाने का आश्वासन दिया है।
इतने पर भी एक बात पूरी तरह समझ ली जानी चाहिए कि विज्ञान का क्षेत्र भौतिक है। उसका पूरा नाम भी भौतिक विज्ञान एवं पदार्थ विज्ञान ही है। अपने कार्यक्षेत्र में वह सफलता प्राप्त कर रहा है और करेगा। यहाँ एक बात की ही भूल हो जाती है कि चेतना का क्षेत्र भी विज्ञान ने अपनी परिधि में सम्मिलित करना आरंभ कर दिया है और चेतन को भी जड़ सिद्ध करने का दुस्साहस किया है। यह भूल है। चेतना पदार्थ नहीं है। उस पर पदार्थ-स्तर के नियम- सिद्धांत भी लागू नहीं होते। फिर उसे प्रयोगशाला में देखा भी नहीं जा सकता। ऐसे उपकरण बन सकने कठिन हैं, जो आत्मा का स्वरूप समझने और उसे अभीष्ट प्रयोजनों के लिए पदार्थ की तरह प्रयुक्त करने में सफल हो सकें।
शरीर और मस्तिष्क की हलचलों के बारे में विज्ञान ने बहुत कुछ कहा और बताया है। पर यह बताना उसके लिए संभव न हो सका कि इन दोनों संस्थानों के सही रहने पर भी मरण क्यों हो जाता है? चेतना न रहने पर शरीर और मस्तिष्क अपना काम करना क्यों बंद कर देते हैं? जिसके रहने से शरीर जीवित रहता और न रहने पर मर जाता है, उस चेतना की उत्पत्ति, प्रगति और स्थिरता के लिए क्या किया जा सकता है? इसके संबंध में कोई समाधान खोजा नहीं जा सका।
पदार्थों के पीछे एक स्थिर नियम काम करता है। उसी के आधार पर भौतिक जगत की समस्त हलचलें चलती हैं। फिर चेतना पर एक नियम क्यों लागू नहीं होता? वृक्ष-वनस्पतियों की तरह मनुष्यों की प्रकृति एक जैसी क्यों नहीं होती? शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों की प्रतिक्रिया होना समझ में आता है, पर भावनाएँ क्या हैं? विशिष्ट आकांक्षाएँ क्यों उत्पन्न होती हैं? मान-अपमान क्या है? दया, धर्म की उत्पत्ति तथा त्याग-बलिदान की प्रवृत्ति का भौतिक आधार क्या हो सकता है? इस तथ्य तक पहुँचना विज्ञान के लिए संभव नहीं हो सका है और न भविष्य में भी वैसा हो सकने की संभावना है। तो भौतिक उपकरणों से भौतिक पदार्थ की स्थिति की ही खोज हो सकती है। चेतना के पर्यवेक्षण के लिए चेतनात्मक उपकरण चाहिए। यह उपकरण अंतःकरण के रूप में विद्यमान है। चेतनात्मक प्रयोगों के अन्वेषण का यही क्षेत्र है। अंतःकरण और प्रयोगशाला को एक मानने या बनाने का प्रयत्न करना न बुद्धिसंगत है और न व्यवहारसम्मत। वह विज्ञान के क्षेत्र से बाहर है। चेतना के नियम और भौतिक नियमों के बीच समानता तो पाई जाती है, पर उन्हें एक नहीं माना जा सकता।
मानवी विशिष्टताओं को पदार्थ से तो क्या, दूसरे प्राणियों तक से समतुल्य नहीं माना जा सकता है। क्षुद्र प्राणियों में यौन सदाचार नाम की कोई मर्यादा नहीं है। वे माता, पुत्री, भगिनी और पत्नी में कोई अंतर नहीं करते। मनुष्यों के पिछड़े वर्गों में भी इस संबंध में भेद-बुद्धि पाई जाती है। शरीर के पूर्ण नग्न रखने में वनवासी मनुष्य भी संकोच करते हैं। नीति और परंपराओं की कितनी ही मान्यताएँ उन लोगों में भी पाई जाती हैं, जिन्हें सभ्यता से सर्वथा अपरिचित कहा जाता है। यह मानवी अंतःकरण है, जिसकी क्षमताएँ, विशेषताएँ असीम हैं। संभावनाओं पर विचार करते हैं, तब तो आश्चर्य से चकित ही रह जाना पड़ता है। उच्च स्तर तक पहुँचे हुए अतिमानवों की विशेषताएँ उनके अंतःकरण की उत्कृष्टता पर ही निर्भर नहीं है। उस भावनात्मक विशिष्टता का कोई कारण एवं आधार प्रतीत नहीं हो सका है। चेतना के क्षेत्र में प्रवेश करने पर उसके अनधिकारी प्रयास न केवल उपहासास्पद बनेंगे, वरन अनेक ऐसी विकृतियाँ उत्पन्न करेंगे, जिन्हें अनावश्यक एवं अवांछनीय ही माना जाएगा।
विज्ञान ने चेतना का पृथक् अस्तित्व प्रयोगशालाओं में परीक्षण करके प्रत्यक्ष नहीं पाया। इतने भर से उसके लिए यह कहना अनुचित था कि चेतना का अस्तित्व ही नहीं है अथवा उसके साथ अंतःकरण के रूप में जुड़े हुए धर्म की कोई सत्ता ही नहीं है। इस आतुर प्रतिपादन से अनास्था फैली और उन आदर्शों को क्षति पहुँची, जिनके सहारे मानवी प्रगति का क्रम आरंभ हुआ और अब तक बढ़ता चला आया है। ईश्वर, आत्मा, धर्म, कर्मफल, परमार्थ, संयम जैसी सभी मान्यताएँ आस्तिकता के साथ जुड़ी हुई हैं। धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता के सिद्धांत कट जाने पर उस स्वार्थांधता पर अंकुश न हो सकेगा, जिसके दबाव में न रहने के कारण अन्य प्राणी न पारस्परिक स्नेह, सहयोग का अभ्यास कर सके और न आत्म-निर्माण की दिशा में कुछ सोचने अथवा करने में ही समर्थ हो सके। विज्ञान यदि धर्म को काटता है, तो तर्क की दृष्टि से उसकी विजय मान लेने पर भी एक नया संकट यह खड़ा हो जाएगा कि मानवी गरिमा को बनाने और बढ़ाने वाली शालीनता से पूरी तरह हाथ धोना पड़ेगा। तब हम क्रमशः पीछे की ओर लौटना आरंभ करेंगे और प्रकृति पुत्र मानुष के अपने उद्गम केंद्र पर जा पहुँचेंगे। प्रगति जहाँ से आरंभ हुई थी अगति हमें वहीं लौटाकर वापस पहुँचा देगी। प्रगति क्रम में मनुष्य को अन्य प्राणियों से जूझना और उन पर वर्चस्व स्थापित करना पड़ता है। अगति एवं दुर्गति की ओर लौटते समय हमें अपने ही वर्ग पर आक्रमण करना पड़ेगा। अन्य प्राणियों के पास मांस, दूध, श्रम के अतिरिक्त और कुछ बचा नहीं है, पर मनुष्य की तृष्णा इससे कहीं अधिक बढ़ गई है। मत्स्य न्याय के अनुसार बड़े, छोटे का शोषण करते हैं। बड़े अपनों से बड़ों के आहार बनेंगे। फिर अंततः वे सबसे बड़े भी आपस में उसी नीति को अपनाकर, परस्पर मर-खपकर समाप्त होकर रहेंगे। यह आदिमकाल से भी बुरी स्थिति होगी। आदिम मनुष्य मूर्ख था। उसकी दुष्टता भी थोड़े क्षेत्र में थोड़ी ही हानि पहुँचा सकती थी। पर आज बुद्धिमान् और साधनसंपन्न मनुष्य तो वापस लौटते-लौटते भी सभ्यता और प्रगति का सर्वनाश ही करता चलेगा। ऐसी-ऐसी विभीषिकाएँ उस प्रतिपादन के पीछे स्पष्ट झाँकती देखी जा सकती हैं, जो विज्ञान ने धर्म के अस्तित्व को अस्वीकार करने के रूप में आरंभ की हैं। मौलिक सुख-सुविधा की दृष्टि से विज्ञान ने मनुष्य जाति को जो अनुदान प्रस्तुत किए हैं, अपनी मर्यादाओं का अतिक्रमण करके वह उस श्रेय को नष्ट ही कर देगा, जो अब तक की उपलब्धियों के कारण उसने प्राप्त किया है। अनुपयुक्त अतिक्रमण के दुष्परिणाम सदा भयावह ही होते रहे हैं, विज्ञान ने यथार्थ की शोध करके अपनी प्रामाणिकता की छाप छोड़ी है। अतिक्रमण के कारण उसकी ख्याति और प्रतिष्ठा को तो आघात पहुँचेगा ही, उपयोगिता भी संदिग्ध बन जाएगी।
विज्ञान का जन्म तो बहुत पहले हो चुका, किंतु विश्व इतिहास की लंबाई को देखते हुए पिछली शताब्दियों से उनकी अतिउत्साही प्रगति का समय थोड़ा-सा ही गुजरा है। इन दिनों की उपलब्धियों को बाल विकास के समतुल्य ही माना जा सकता है। बच्चे रोज भूल करते और रोज सँभलते हैं। यही इन दिनों वैज्ञानिक शोध-प्रक्रिया के संबंध में भी चल रहा है। आज एक सिद्धांत बनता है, उसे मान्यता मिलती है। कल संदेह उत्पन्न होता है। परसों उसकी काट-छाँट शुरू होती है और अगले दिन उसे अप्रामाणिक ठहराकर अमान्य कर दिया जाता है। जो आज माना जा रहा है, वह कल भी उसी रूप में स्वीकार किया जाएगा, इसका कोई विश्वास नहीं। सत्य की शोध के मार्ग पर प्रयत्न तो भरपूर होने चाहिए, पर साथ ही नम्र रहने और धैर्य रखने की भी आवश्यकता है। विशेषतया ऐसे प्रसंगों पर तो समझ-सोचकर ही कुछ कहा जाना चाहिए, जिनका व्यापक असर मानवी नीति, निष्ठा और समाज-व्यवस्था पर पड़ता है। धर्म ऐसा ही विषय है। उसका सीधा संबंध मनुष्य की चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा से है। यदि उस आदर्श को बनाए रहना है तो उन नींव के पत्थरों को खिसकाना नहीं चाहिए, जिन पर कि स्थिरता और प्रगति का समूचा महल ही खड़ा हुआ है।
पिछली शताब्दियों की वैज्ञानिक प्रगति की यों सराहना ही की जा सकती है, किंतु यह नहीं मान बैठना चाहिए कि पूर्णता की स्थिति आ गई और ऐसी स्थिति बन गई, जिसके आधार पर चेतना के अस्तित्व और उसके चिंतन एवं कर्तृत्व में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले 'धर्म' को ही अवास्तविक एवं अनावश्यक ठहराया जाने लगे। विज्ञान को अपने बालकपन का ध्यान रखना अधिक चाहिए और धर्म की अस्वीकृति जैसे प्रसंग पर समझ-सोचकर ही अपने आप मत व्यक्त करना चाहिए।
प्रगति के नाम पर जो दुर्गति हुई है, उसको भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यंत्र-औजारों के उपकरण की बात अलग है, पर किन्हीं ऐसे प्रयोगों के संबंध में बहुत ही सतर्कता बरतनी चाहिए, जो आरंभ में तो बड़े लाभदायक प्रतीत होते हैं, पर परीक्षण के उपरांत हानिकारक सिद्ध होते हैं। ऐसे प्रयोगों में अतिवादी उतावली से वह अपेक्षित लाभ तो मिलता नहीं, उलटे बेहिसाब हानि उठानी पड़ती है। अच्छा होता यदि धैर्य रखा जाता। छोटे क्षेत्र में प्रयोग किया जाता और लाभ-हानि का भली प्रकार लेखा-जोखा लेने के उपरांत उसका व्यापक प्रयोग आरंभ किया जाता। अनेक क्षेत्रों में अत्युत्साह के कारण जो हानि उठानी पड़ी है, उसे यदि ध्यान में रखा जा सके, तो चेतना के स्वतंत्र अस्तित्व और उसके अविच्छिन्न आधार धर्म को अस्वीकार करने में जो उतावली बरती जा रही है, उसे थोड़े लोगों पर प्रयोग करके और उसके निष्कर्ष देखकर व्यापक प्रतिपादन का कदम बढ़ाया जाए। आज जो विज्ञान अपनी अपरिपक्व भिन्न स्थिति को नजर अंदाजकर अधूरी जानकारी के आधार पर धार्मिकता पर आक्रमण करता है तो उसे अनुचित ही कहा जाएगा।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, विज्ञान की अपूर्णता और अस्थिरता, पृष्ठ 15-20
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