विशिष्ट सामायिक चिंतन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) एवं शिक्षा
आज जीवन के हर क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात ए०आई० (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का बोलबाला है। ए०आई० समाचार की सुर्खियों से आगे जीवन के हर पक्ष का हिस्सा बनती जा रही है। स्वास्थ्य, कृषि, बैंकिंग, यातायात, सुरक्षा, अनुवाद, भविष्यकथन, सर्च इंजन, हर क्षेत्र में इसकी सशक्त उपस्थिति दर्ज हो रही है। शिक्षा-क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है। भारतीय शिक्षा-क्षेत्र में ए०आई० का समावेश दिन-प्रतिदिन गति पकड़ रहा है।
एनईपी-2000 में तकनीकी समावेश के अंतर्गत ए०आई० को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से जोड़ने की बात कही गई है, जिसके परिणामस्वरूप कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में ए०आई० को शामिल किया जा रहा है। इंडिया ए०आई० मिशन के अंतर्गत शिक्षा में ए०आई० सेंटर फॉर एक्सिलेंस खोलने की महत्त्वाकांक्षी योजना प्रारंभ हो चुकी है, जिसका उद्देश्य वर्ष-2047 तक भारत को ए०आई० के क्षेत्र में शीर्षस्थान पर स्थापित करना है।
सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) में 9वीं से 12वीं तक इलेक्टिव कोर्स के रूप में ए०आई० को शामिल किया जा चुका है। कई प्रांतों के स्कूली-बोर्ड में इस तरह की पहल हो चुकी है। इसी तरह सीआईएससीएस बोर्ड में ए०आई० और रोबोटिक्स को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
'ए०आई० फॉर ऑल' नीति के अंतर्गत नीति आयोग ए०आई० की आधारभूत साक्षरता को प्रोत्साहित एवं सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रसर है। आई० आई० टी० जैसे संस्थानों में तो ए० आई० पहले से ही विशेषज्ञता के स्तर पर पढ़ाया जा रहा है।
कई आई०आई०टी० केंद्रों में ए०आई० पर विशिष्ट बीटेक एवं एमटेक प्रोग्राम चल रहे हैं और कई तरह के अन्य ए०आई० पाठ्यक्रम भी प्रारंभ हुए हैं, जो स्वयं (SWAYAM) प्लेटफॉर्म पर आम विद्यार्थियों व जिज्ञासुओं की ए०आई० संबंधी आधारभूत दक्षता की दृष्टि से निःशुल्क उपलब्ध हैं।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भी वर्ष-2025 से एनईपी-2020 के अंतर्गत विभिन्न विभागों द्वारा ए०आई० को अपने पाठ्यक्रमों में समाविष्ट किया गया है। यहाँ का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शोधकेंद्र तो पूर्व से ही ए०आई० के मल्टीडिस्पिलनरी-क्षेत्र की उच्चस्तरीय शोध में संलग्न है। पाठ्यक्रम में ए०आई० के समावेश से पहले ही विद्यार्थी, शोधार्थी एवं शिक्षक ए०आई० के उपकरणों का उपयोग प्रारंभ कर चुके हैं।
इसके आधार पर अब कई घंटों में होने वाले कार्य कुछ मिनटों, सेकंडों में संपन्न हो रहे हैं। भारतीय विद्यार्थियों द्वारा ए०आई० टूल्ज का उपयोग शोध एवं सूचना एकत्रीकरण, लेखन एवं सामग्री सृजन (कंटेंट क्रिएशन) आदि में किया जा रहा है। अब ए०आई० टूल्ज के माध्यम से नोट्स बनाने से लेकर प्रजेंटेशन तैयार करने, वीडियो संपादन आदि कार्य बहुत सरल हो गए हैं।
शिक्षक भी ए०आई० टूल्ज का भरपूर उपयोग कर रहे हैं। पुनरावृत्ति वाले कार्यों में ए०आई० बहुत उपयोगी साबित हो रहा है। ग्रेडिंग से लेकर पाठ योजना (लेसन प्लानिंग) एवं मूल्यांकन आदि में ए०आई० का उपयोग हो रहा है, जिससे शिक्षकों पर प्रशासनिक कार्य का दबाव कम हो रहा है।
शोध को प्रभावी ढंग से निष्पादित करने के लिए ए०आई० में कई उपयोगी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। हालांकि प्रशिक्षण के अभाव में अभी इसके सही उपयोग से अधिकांश विद्यार्थी एवं शिक्षक अनभिज्ञ हैं और इससे जुड़े खतरों से भी परिचित नहीं हैं; तथापि यह सत्य है कि ए०आई० के लाभों के साथ इससे जुड़े खतरे भी कम नहीं हैं।
भारत व विदेश में जहाँ शिक्षा में ए०आई० का उपयोग पूर्व से प्रारंभ हो चुका है, वहाँ ये खतरे अधिक मुखर रूप से सामने आए हैं, जिनके अनुभव से हम सीख सकते हैं। दि सेंटर फॉर टीचर एक्रीडिटेशन में पाँच हजार से अधिक शिक्षकों व हितधारकों के सर्वेक्षण के आधार पर कुछ तथ्य उभरकर सामने आए हैं, जो भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में ए०आई० के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 70 प्रतिशत से अधिक शिक्षक किसी-न-किसी रूप में ए०आई० टूल्ज का उपयोग कर रहे हैं। इनमें 48 प्रतिशत शिक्षक लेसन प्लानिंग में ए०आई० का उपयोग कर रहे हैं। मात्र 26 प्रतिशत शिक्षक कक्षा-आधारित गतिविधियों में विचार-मंथन एवं विचार-सृजन (आइडियाज जनरेट) करने के लिए इसका उपयोग कर रहे हैं।
इस तरह अभी ए०आई० का उपयोग परदे के पीछे अधिक हो रहा है और सीधे विद्यार्थियों से अंतर्क्रिया में इसका उपयोग न के बराबर है। हालांकि शैक्षणिक जगत् में ए०आई० के प्रति उत्साह का वातावरण है, लेकिन इसके उपयोग के संदर्भ में अभी उचित प्रशिक्षण का अभाव दिखता है।
शिक्षकों के साथ विद्यार्थी, अभिभावक व अकादमिक प्रशासन के सर्वेक्षण के आधार पर स्पष्ट हुआ कि उनमें 84 प्रतिशत ए०आई० के संदर्भ में चिंतित हैं। 34 प्रतिशत को भय है कि ए०आई० शिक्षा-क्षेत्र में नौकरियों को छीन सकता है। 23 प्रतिशत ए०आई० से तैयार पाठ्यसामग्री की शुद्धता के संदर्भ में आश्वस्त नहीं हैं।
कुछ की चिंता है कि ए०आई० सृजनात्मकता को प्रभावित कर रही है और इसके दुरुपयोग की संभावना शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटका सकती है। इसके साथ संवेदना, प्रोत्साहन, मार्गदर्शन एवं संबल के संदर्भ में भी ए०आई० की अपनी सीमा है। यह मानवीय संवेदना एवं मार्गदर्शन का विकल्प नहीं हो सकती। फिर उपयोगकर्ता की डाटा निजता की सुरक्षा का मुद्दा भी विचारणीय है। तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता के अपने खतरे भी हैं।
ए०आई० उपकरणों से एसाइन्मेंट व ऑनलाइन परीक्षा आदि में नकल चिंता का विषय है, जो कई जगह नियंत्रण से बाहर होती पाई गई है। साथ ही ए०आई० पर अत्यधिक निर्भरता से विद्यार्थियों का मस्तिष्कीय विकास प्रभावित हो रहा है तथा विद्यार्थियों की विश्लेषणात्मक सोच एवं सृजनात्मक क्षमता बाधित हो रही है। आश्चर्य नहीं कि भारत के कुछ आई०आई०टी० एवं विदेश के विश्वविद्यालयों में ए०आई० के इन खतरों को देखते हुए पुनः बैक टू क्लासरूम, पेपर-पेन-एसाइन्मेंट व टेस्ट को अपनाया जाना प्रारंभ हो गया है।
इस तरह शिक्षा में ए०आई० के श्रेष्ठतम उपयोग के लिए आवश्यकता ए०आई० के उचित प्रशिक्षण एवं जिम्मेदार उपयोग की है और इस तथ्य को हृदयंगम करना महत्त्वपूर्ण है कि ए०आई० विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों का एक सहायक भर है। इसी रूप में इसका उपयोग किया जाना है, न कि उस पर अत्यधिक निर्भर होते हुए इसका गुलाम बनकर उपयोग करना है।
अपनी मौलिकता, सृजनात्मकता को खोए बिना ए०आई० के उपयोग में समझदारी है। इन सावधानियों को रखते हुए ए०आई० का शिक्षा में समावेश किया जाना समय की माँग है। आखिर विद्यार्थियों को उस पेशेवर जगत् के लिए तैयार किया जाना है, जहाँ ए०आई० पहले से ही व्यवसाय का हिस्सा बन चुका है।
अखण्ड ज्योति, मार्च 2026, ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता(ए.आई.) एवं शिक्षा’, पृष्ठ 5-6
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