विज्ञान और अध्यात्म को साथ-साथ चलना होगा
विज्ञान और अध्यात्म अन्योन्याश्रित हैं। एकदूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे की गति नहीं। विज्ञान हमारे साधनों को बढ़ाता है और अध्यात्म आत्मा को। आत्मा को खोकर साधनों की मात्रा कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, उनसे मनुष्य भोगी, व्यसनी, अहंकारी और स्वार्थी ही बनेगा। महत्त्वाकांक्षाएँ मनुष्य को नीति तक सीमित नहीं रहने देतीं। आकुल-व्याकुल व्यक्ति कुछ भी कर गुजरता है। उसे अनीति अपनाने और कुकर्म करने में भी कोई झिझक नहीं होती। अध्यात्म चिंतन को— आकांक्षाओं को— क्रिया को— उन मर्यादाओं की परिधि में बाँधकर रखता है, जिसमें व्यक्ति का चरित्र और समाज का व्यवस्थाक्रम अक्षुण्ण बना रह सके। अस्तु, दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में समान रूप से उपयोगी हैं।
ईसा कहते थे— “मनुष्य केवल रोटी के सहारे नहीं जी सकता। साथ ही यह भी सही है कि मनुष्य रोटी के बिना नहीं जी सकता। इसलिए रोटी की व्यवस्था भी होनी चाहिए और उन तत्त्वों की भी, जिनके बिना मात्र रोटी की वह उपयोगिता नहीं रह जाती, जिसके सहारे मनुष्य की आत्मा को जीवित रखा जा सके। रोटी केवल शरीर को जिंदा रख सकती है। जैसा कि खुराक के सहारे मक्खी, मच्छर आदि अन्य प्राणी जीवित रहते हैं।”
भौतिक पदार्थों की विवेचना एवं उपलब्धि प्रस्तुत करने वाला विज्ञान मिथ्या नहीं हो सकता। वह सत्य है। सत्य के नियम होते हैं— झूठ के नहीं। विज्ञान नियमों पर आधारित है। स्वप्न का— मिथ्या का कोई नियम नहीं। यदि यह संसार मिथ्या होता तो उसमें कोई नियमक्रम दिखाई न पड़ता।
वैज्ञानिक दृष्टि का अर्थ है— मान्यताओं, आग्रहों, आस्थाओं की गुलामी से छुटकारा पाकर यथार्थता को समझ सकने योग्य विवेक का अवलंबन। उसमें अंधविश्वासों और परंपराओं के लिए कोई स्थान नहीं। तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर जो खरा उतरे, उसी को अपनाना वस्तुतः सत्य की खोज है। इसे हटा देने पर अध्यात्म निष्प्राण ही नहीं, भ्रमोत्पादक और भय-संवर्द्धक बन जाता है। हम निष्ठावान बनें, श्रद्धालु रहें, पर वह सब विवेकयुक्त होना चाहिए। बुद्धि बेचकर मात्र परंपरावादी आग्रह अपनाएँ रहने से अध्यात्म का उद्देश्य और लाभ प्राप्त न हो सकेगा।
विज्ञान एवं धर्म— अध्यात्म को एकदूसरे का विरोधी तक कहा जाता है, जब यथार्थ चिंतन की अवज्ञा करके किन्हीं पूर्वाग्रहों के साथ ही चिपटे रहने पर बल दिया जा रहा हो। हम यह भूल जाते हैं कि प्रगति की ओर हम क्रमशः ही बढ़े हैं और यह अनादिकाल से चला आ रहा क्रम अनंतकाल तक चलता रहेगा। जो पिछले लोगों ने सोचा या किया था, वह अंतिम था। उसमें सुधार की गुंजाइश नहीं, यह मान बैठने से प्रगतिपथ अवरुद्ध हो जाता है और सत्य की खोज के लिए बढ़ते चलने वाले हमारे कदम रुक जाते हैं। विज्ञान ने अपने को भूतपूजा से मुक्त रखा है और पिछली जानकारियों से लाभ उठाकर आगे की उपलब्धियों के लिए प्रयास जारी रखा है। अस्तु, वह क्रमशः अधिकाधिक सफल-समुन्नत होता चला गया। अध्यात्म ने ऐसा नहीं किया। उसने ‘बाबा वाक्यं प्रमाणम्’ की नीति अपनाई। समय आगे बढ़ गया, पर आग्रहशीलता की बेड़ियों ने मनुष्य को उन्हीं मान्यताओं के साथ जकड़े रखा, जो भूतकाल की तरह अब उपयोगी नहीं समझी जातीं। पूर्वजों से आगे की बात सोचना उनका अपमान करना है। ऐसा सोचना क्रमशः आगे बढ़ते चले आने के सार्वभौम नियम को झुठला देना है।
इस पृथ्वी के जन्म के समय क्या परिस्थितियाँ थीं और आदिमकाल का मनुष्य कैसा था, इसे जानने के उपरांत आज की परिस्थितियों के साथ तुलना करने पर मध्यवर्ती इतिहास देखना पड़ता है। उस निरीक्षण से स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रगति क्रमशः ही संभव हुई है। आगे कदम बढ़ाने के लिए पैर को वह स्थान छोड़ना पड़ता है, जहाँ वह पहले जमा हुआ था। पिछले स्थान से पैर न उठाया जाए, तो वह आगे कैसे बढ़ सकेगा? विज्ञान ने इस तथ्य को स्वीकारा और अपनाया है, किंतु अध्यात्म को न जाने क्यों इस प्रकार का साहस संचय करने में हिचकिचाहट रही है।
पिछले दिनों विज्ञान ने अपनी पूर्व निर्धारित ऐसी मान्यताओं को बहिष्कृत कर दिया, जो किसी समय सर्वमान्य रही हैं, पर नवीनतम खोजों ने उन्हें झुठला दिया है। इन बहिष्कृत मान्यताओं में कुछ इस प्रकार हैं— (1) सौरमंडल का केंद्र पृथ्वी है। (2) तारक का आकार, विस्तार और उनकी एकदूसरे से दूरी संबंधी मान्यताएँ (3) ग्रह-तारक व्यक्तिविशेष पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। (4) पृथ्वी चपटी है। (5) पृथ्वी कुछ हजार वर्ष ही पुरानी है। (6) ऊपर से गिराने पर हल्की की अपेक्षा भारी वस्तु जल्दी नीचे गिरेगी। (7) वस्तुएँ तभी गति करती हैं, जब उनमें बल लगाया जाए (8) पदार्थ को ऊर्जा में नहीं बदला जा सकता। (9) ब्रह्मांड स्थिर है। (10) प्रकृति रिक्तता (बैकुम) से घृणा करती है और कहीं पोल नहीं रखना चाहती। (11) जीव विज्ञान की किस्में अपरिवर्तनीय हैं। (12) जीव उत्पत्ति के लिए अमुक जीवकोष ही उत्तरदायी है। (13) पानी और हवा मूल तत्त्व है। (14) परमाणु पदार्थ की अंतिम, न्यूनतम और अखंडित इकाई है। आदि ऐसी अगणित मान्यताएँ ऐसी हैं, जिन्हें अवास्तविक ठहरा दिया गया है, फिर भी उनके प्रतिपादनकर्त्ताओं का सम्मान यथावत् बनाए रखा गया है। कारण कि जिस समय उन्होंने यह मान्यताएँ प्रचलित की थीं, उस समय की प्रचलित मान्यताएँ और भी अधिक पिछड़ी हुई थीं। उन दिनों उस प्रतिपादनों को भी क्रांतिकारी माना गया है। प्रगति के पथ पर चलते हुए सत्य की दिशा में जो कुछ इस समय जाना-माना गया है, आवश्यक नहीं कि वह भविष्य में भी इसी तरह माना जाता रहे। इस बात की पूरी संभावना है कि अब की अपेक्षा भावी प्रतिपादन और भी अधिक क्रांतिकारी माने जाएँ। ऐसी स्थिति का आज के वैज्ञानिक सहर्ष स्वागत करने के लिए तैयार हैं।
धर्म की व्यावहारिक मान्यताओं में भी क्रमशः परिवर्तन होता आया है। यद्यपि कहा यही जाता है कि धर्म सनातन और शाश्वत है। बारीकी से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्म न तो अनादि है और न अनंत। वह स्थिर भी नहीं है और अपरिवर्तनशील भी नहीं। उसका जाने-अनजाने क्रमिक विकास होता रहा है। इस स्थिति को सुधारवाद कहा जा सकता है। धर्मवेत्ता, मनीषी, अवतारी, देवदूत समय-समय पर इसी प्रयोजन के लिए अवतरित होते रहे हैं कि न केवल परिस्थिति को वरन्, तत्कालीन लोक मनःस्थिति को भी बदलें। उनने अपने से पूर्व के प्रचलनों के स्थान पर ऐसे प्रतिपादन प्रस्तुत किए, जिन्हें उस समय निश्चित रूप से क्रांतिकारी समझा गया है और तत्कालीन पुरातनपंथियों ने उसका घोर विरोध भी किया था।
‘जूलियन हक्सले’ ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि “विज्ञान की तरह ही अध्यात्म का आधार भी तथ्यों को रखा जाना चाहिए; लोभ और भय से उसे मुक्त किया जाना चाहिए; काल्पनिक मान्यताओं का निराकरण होना चाहिए और चेतना को परिष्कृत कराने की उसकी मूल दिशा एवं क्षमता को प्रभावी बनाया जाना चाहिए।”
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, विज्ञान और अध्यात्म को साथ-साथ चलना होगा, पृष्ठ 40-43
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