विज्ञान की अपूर्णताएँ
विज्ञान की अधिकांश उपलब्धियाँ जड़ प्रकृति के क्षेत्र में हैं। पृथ्वी में पाए जाने वाले सभी कार्बनिक (आर्गेनिक) और अकार्बनिक (इन आर्गेनिक) धातुओं, खनिजों, गैसों और इन सबके द्वारा बनने वाले यंत्रों, प्रकाश, विद्युत्, ताप, चुंबक आदि से संबंधित अनेक महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ विज्ञान देता है, उसमें कामवासना की तरह का क्षणिक आकर्षण भी है; क्योंकि हम उससे कुछ शक्ति-सुविधा पाते और प्रसन्नता अनुभव करते हैं, किंतु जब हम जीव विज्ञान की ओर चलते हैं, तो पता चलता है कि यह जानकारियाँ नितांत एकांगी और भ्रमपूर्ण हैं। वह जीव चेतना के मूल उद्देश्य के बारे में कुछ नहीं बता पातीं।
उदाहरण के लिए जीवाणु (लिविंग आर्गनिज्म) को विज्ञान पूर्ण मानता है, चेतना सूक्ष्म से सूक्ष्मकण में भी विद्यमान है, यह एक महत्त्वपूर्ण जानकारी हुई, किंतु विज्ञान उसे शाश्वत नहीं मानता। जीवाणु के प्राकृतिक अंश (नेचुरल पार्ट्स, साइटोप्लाज्मा के बारे में जीव विज्ञान (बायोलॉजी) की जानकारियाँ बहुत कुछ सत्य और उपयोगी होती हैं, किंतु जब यह पूछा जाता है कि इसमे रह रही चेतना का मूलभूत स्वरूप क्या है? तो विज्ञान चुप हो जाता है, जबकि उसके अस्तित्व और मूल महत्त्व को वह स्वीकार भी करता है। जीव विज्ञान अधिक-से-अधिक यह कल्पना कर सकता है कि चेतना प्राकृतिक पदार्थों की रासायनिक चेतना मात्र है। प्रो० व्हाइट हेड स्वयं एक महान वैज्ञानिक थे। उन्होंने विज्ञान के इस तर्क का खंडन करते हुए पूछा — "एक अमीबा (प्रकृति का सबसे छोटा जीव), जिसमें साइटोप्लाज्मा ही उसका शरीर और एक नाभिक (न्यूक्लियस) ही उसकी चेतना होती है; क्योंकि ऐसा होता है कि नाभिक के निकल जाते ही शेष भाग मृत हो जाता है, जबकि नाभिक पुनः एक स्वतंत्र अमीबा का रूप ले लेता है। इससे मालूम पड़ता है कि चेतना प्राकृतिक संरचना से स्वतंत्र है, वह स्वयं प्रकृति को उत्पन्न करने की सामर्थ्य रखता है। विज्ञान इस संबंध में पूर्णतया डाँवाडोल है।”
विज्ञान की सीमितता (लिमिटेशन ऑफ साइंस) नामक पुस्तक के लेखक डॉ० जे० डब्ल्यू० एन० सुलीवान ने एक स्थान पर लिखा है— "मानव जीवन की उत्पत्ति के बारे में प्रचलित डारविन का विकासवाद (इस मत के अनुसार मनुष्य अमीबा, अमीबा से दूसरे सर्पणशील जीवों से विकसित होता हुआ बंदर बना, बंदर से मनुष्य बन गया) और रेंडम के सिद्धांत (इस मत के अनुसार मनुष्य उसी प्रकार परिपूर्ण जन्मा, जिस प्रकार अन्य जीव) में से कौन सत्य है, कौन असत्य है। इस संबंध में विज्ञान कुछ भी स्पष्ट कर सकने में असमर्थ है। यहाँ बड़े से बड़े वैज्ञानिकों को भी भ्रम हो जाता है कि वस्तुतः कोई ऐसी महान सत्ता संसार में काम कर रही हो सकती है, जिसकी इच्छा से बलवान और कोई शक्ति संसार में न हो।
यदि हम जानवरों के अंगों की कार्य-प्रणाली का ही भौतिक और रासायनिक अध्ययन करें, तब भी निष्कर्ष वहीं के वहीं रह जाते हैं। शरीर में इच्छाओं का रासायनिक क्रम विज्ञान बता सकता है, किंतु विज्ञान यह नहीं बता पाता कि इच्छाएँ क्यों उत्पन्न होती हैं? पशु भी अपनी इच्छाएँ रोक नहीं पाते। मार खाते हैं, तो भी खेतों में चोरी से घुसकर फसल खाने की अपनी इच्छा को रोक सकना, उनके लिए भी असंभव ही होता है। रासायनिक परिवर्तनों के कारण इच्छाओं के स्वरूप परिवर्तन के बारे में विज्ञान बता सकता है, पर परिवर्तनों के उद्देश्य के बारे में वह कुछ भी व्यक्त करने में असमर्थ ही रहा है।
भौतिक विज्ञान (फिजिक्स) और मनोविज्ञान (साइकोलॉजी) दोनों में पृथ्वी और आकाश का अंतर है। मनोविज्ञान के विश्लेषण से मिला व्यवहारवाद और भौतिक विज्ञान से मिले यंत्रों की कार्य-प्रणाली में बड़ा फर्क है। भौतिक विज्ञान की धारणाएँ स्पष्ट होती है। हमें पता रहता है कि अमुक यंत्र काम न करेगा, तो मशीन बंद हो जाएगी। मशीन में फिर यह शक्ति नहीं होगी कि वह अपनी इच्छा से थोड़ी देर आराम करने के बाद फिर चलने लगे। जीवन के बारे में यह धारणाएँ बहुत अस्पष्ट होती हैं। हम अपने ही संबंध में नहीं कह सकते कि आधे घंटे पीछे हमारी मनःस्थिति क्या होगी, हम कहाँ और क्या होंगे? विज्ञान द्वारा मानवीय व्यवहार को स्पष्ट किया जाना बिलकुल असंभव है। इसलिए यह मानना स्वाभाविक है कि आत्मचेतना विज्ञान की सीमा से पृथक् वस्तु है।
डॉक्टर भी एक वैज्ञानिक ही है। उसे शरीर रचना और उसके रासायनिक परिवर्तनों की जानकारी होती है, इसलिए उसे पूरी बीमारी का पता बिना रोगी से पूछे लगा लेना चाहिए था। उसे यह भी बता देना चाहिए था कि शरीर के अमुक भाग में इस तरह की पीड़ा होती है, पर वह ऐसा करने में असमर्थ होता है। वहम (मीनिया) और बिना किसी भौतिक संपर्क के किरकिराना या सिहरन (एलर्जी) का आभास क्यों होता है? डॉक्टर इसका पता लगाने में असमर्थ हैं।
मनुष्य के मर जाने का चिह्न (इंडीकेशन) भी विज्ञान नहीं समझा सका। कभी वह हृदय की धड़कन (पल्पिटेशन) रुक जाने को मृत्यु कहा जाता है, कभी श्वांस क्रिया रुक जाने को। कभी वह मस्तिष्क की मृत्यु से जीवन की मृत्यु घोषित करता है, पर अंतिम रूप से मृत्यु और जीवन के अंतर को विज्ञान समझा नहीं सका।
अब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि विज्ञान के द्वारा निर्जीव पदार्थों की बहुत-सी जानकारियाँ देने के बाद भी अनेक जानकारियों का पता लगाना शेष रह जाता है। सापेक्षवाद के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी) और क्वांटम सिद्धांत की बहुत-सी बातें लोगों की समझ में इसीलिए नहीं आतीं; क्योंकि उनका संबंध आत्मचेतनता से है; धर्म और अध्यात्म से है, जो विज्ञान से परे की सत्ता है। इसलिए यदि धर्म को विज्ञान का विकल्प कहा जाए अथवा यह माना जाए कि जहाँ विज्ञान रुक जाता है, वहाँ से आगे का लक्ष्य 'धर्म' पूरा कर सकता है, तो किसी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं मानना चाहिए।
प्रयोग और अध्ययन के प्रारंभिक दिनों में गैलीलियो का कहना था कि, “दिखाई देने वाले प्राकृतिक परिणामों (नेचुरल फेनामेना) को गणितीय सिद्धांतों से (मैथेमेटिकली) जाना जा सकता है। प्रकृति के बारे में यह कहना बिलकुल ठीक है। एक वर्ष बाद ठीक आज के दिन सूर्य किस राशि में होगा, गुणा, भाग के द्वारा इसे जाना जा सकता है। चंद्र, बुध, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, प्लूटो उस दिन कहाँ किस दिशा में होंगे ? यह रेखागणित से हल किया जा सकता है। ब्रह्मांड के और भी अनेक गुह्य-रहस्यों का पता पदार्थों पर पड़ने वाले प्रभावों को देखकर जाना जा सकता है, किंतु कुछ दिन बाद जब कैपलर ने कहा कि वस्तुओं में अगणितीय गुण भी विद्यमान हैं, उदाहरण के लिए इलेक्ट्रॉन का पतन होने पर पदार्थ का पतन हो जाता है। इलेक्ट्रॉन अपनी कक्षा में घूमते हुए आगे वाली या पीछे वाली कक्षा में टूट गिरेगा, इस संबंध में कोई गणितीय नियम काम नहीं करता। मानव व्यवहार भी किसी गणितीय नियम पर आधारित नहीं है।
कुछ दिन बाद गैलीलियो ने भी स्वीकार किया कि अगणितीय गुण अंतर्वर्ती (सब्जेक्टिव) होते हैं, उनका हमारे ज्ञान के अतिरिक्त कहीं भी अस्तित्व नहीं है। मस्तिष्क न हो, ज्ञान न हो, तो न ब्रह्मांड का कोई आकार-प्रकार होगा, न भार समझ में आएगा। रंग, ध्वनि, गंध, स्थान और समय भी हमारे लिए कुछ भी न रह जाएगा; क्योंकि यह सारी बातें मस्तिष्क की उपज हैं। मस्तिष्क न हो तो इन विविधताओं का कोई रूप ही न हो।
मस्तिष्क ही चेतना है; चेतना का इतिहास और उसका भविष्य ही धर्म है, इसलिए जब तक चेतना का अस्तित्व है, तब तक धर्म की अनिवार्यता भी बनी रहेगी। गैलीलियो ने इन अगणितीय नियमों के आधार पर ही यह माना था कि संसार में व्यवस्था और गणित है, वह किसी महाशक्ति के हाथों का विधान है, उसे समझ पाना मनुष्य के लिए तब तक कठिन है, जब तक वह धर्म और दर्शन (रिलीजन एंड फिलासफी) को अपने जीवन में स्थान नहीं देता।
न्यूटन का भी मत था कि विज्ञान वास्तविकता का आंशिक ज्ञान देता है; पूर्णता का विकल्प तो धर्म ही है। एडिंगटन और प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेम्स जीन्स भी एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे कि ब्रह्मांड का अंतिम स्वभाव (अल्टीमेट नेचर) गणितीय नहीं, मानसिक (मेंटल) है। अर्थात् मस्तिष्क की तरह की किसी सूक्ष्म चेतना में ही यह संसार चल रहा है। यदि मानसिक स्थिति का ज्ञान प्राप्त कर, हम कुछ सत्य बात जानने की इच्छा करें तो हमें धर्म को मानने के अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय नहीं रह जाता।
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, विज्ञान की अपूर्णताएँ, पृष्ठ 21-25
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