हमारी वसीयत और विरासत (भाग 153): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
कार्यक्रमों में प्रचारात्मक, रचनात्मक और सुधारात्मक अनेक कार्य हैं, जिन्हें घर से बाहर रहते हुए परिस्थितियों के अनुरूप कार्यान्वित किया जा सकता है। प्रचारात्मक स्तर के कार्य— 1. झोला पुस्तकालय, 2. ज्ञानरथ, 3. स्लाइड प्रोजेक्टर प्रदर्शन, टेपरिकॉर्डर से युगसंगीत एवं युगसंदेश को जन-जन तक पहुँचाना, 4. दीवार पर आदर्शवाक्य लिखना। 5. साइकिलों वाली धर्मप्रचार पदयात्रा योजना में सम्मिलित होना। संगीत, साहित्य, कला के माध्यम से बहुत कुछ हो सकता है। साधनदान से भी अनेक सत्प्रवृत्तियों का पोषण हो सकता है। रचनात्मक कार्यों में— 1. प्रौढ़शिक्षा— पुरुषों की रात्रि पाठशाला, महिलाओं की अपराह्न पाठशाला। 2. बाल संस्कारशाला। 3. व्यायामशाला। 4. स्वच्छता-संवर्द्धन। 5. वृक्षारोपण आदि। सुधारात्मक कार्यों में— अवांछनीयता, अनैतिकता, अंधविश्वास आदि का उन्मूलन प्रमुख है। 1. जातिगत ऊँच-नीच, 2. परदाप्रथा, 3. दहेज, 4. नशेबाजी, 5. फैशन के नाम पर अपव्यय, बाल विवाह, बहुप्रजनन आदि के उन्मूलन में सामर्थ्य भर प्रयत्न करना। इसके अतिरिक्त शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक-क्षेत्रों से संबंधित अनेक कार्यक्रम हैं, जिन्हें कार्यान्वित करने के लिए हर क्षेत्र और हर स्थिति में गुंजाइश है। जिन्हें नवसृजन के लिए समय देना है, उन्हें अपनी योग्यता एवं परिस्थिति के अनुरूप कोई काम चुन या पूछ लेना चाहिए। यह सभी कार्य प्रगति-प्रयास— समयदान से संबंधित हैं।
एक व्यक्ति का एक लाख वर्ष का समय यों सुनने-कहने में बहुत अधिक प्रतीत होता है, किंतु जब सब परिजन मिल-जुलकर इसकी पूर्ति करने पर कटिबद्ध होते हैं, तो हर परिजन के हिस्से में थोड़ा ही आता है।
बड़े अनुदान-बड़े वरदान— फुंसी का मवाद घरेलू सुई चुभोकर भी निकाला जा सकता है, पर मस्तिष्क या हृदय में घुसी गोली को निकालने के लिए कुशल सर्जन और बहुमूल्य उपकरणों की जरूरत पड़ती है। मकड़ी का पेट एक मक्खी से भर जाता है, पर हाथी को मनों गन्ना रोज चाहिए। घोंघे जलाशय की तली में जा बैठते हैं, पर समुद्र सोखने के लिए अगस्त्य ऋषि जैसे चुल्लू चाहिए। कुएँ से घड़ा भरकर पानी कोई भी निकाल सकता है, पर स्वर्ग से गंगा का अवतरण धरती पर करने के लिए भगीरथ जैसा तप और शिव-जटाओं का आधार चाहिए। वृत्तासुर-वध के लिए ऋषि दधीचि की ऊर्जामयी अस्थियों से वज्र बनाना पड़ा था। छोटे काम साधारण मनुष्यों की साधारण हलचलों से स्वल्प साधना से बन पड़ते हैं, पर महान कार्यों के लिए महान व्यवस्था बनानी पड़ती है। धरती की प्यास बादल बुझाते और समुद्र की सतह यथावत् बनाए रहने के लिए सहस्रों नदियों की असीम जलराशि का निरंतर समर्पित होते रहना आवश्यक होता है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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