हमारी वसीयत और विरासत (भाग 155):तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति
हमने जैसा कि इस पुस्तक में समय-समय पर संकेत किया है। जैसे हमारे बॉस के आदेश मिलते रहे हैं, वैसे ही हमारे संकल्प बनते, पकते व फलित होते गए हैं। सन् 1986 वर्ष का उत्तरार्द्ध हमारे जीवन का महत्त्वपूर्ण सोपान है। इस वर्ष के समापन के साथ हमारे पचहत्तरवें वर्ष की हीरक जयंती का वह अध्याय पूरा होता है, जिनके साथ एक-एक लाख के पाँच कार्यक्रम जुड़े हुए हैं। उसकी पूर्णाहुति का समय भी आ पहुँचा है। अखण्ड ज्योति पत्रिका जो इस मिशन की प्रेरणापुंज रही है; जिसके कारण यह विशाल परिवार बनकर खड़ा हो गया है, अपने जीवन के पचासवें वर्ष में प्रवेश कर रही है। उसकी स्वर्ण जयंती इस उपलक्ष्य में मनाई जा रही है। तीन वर्ष से हमारी सूक्ष्मीकरण-साधना चल रही है। उसे सावित्री-साधना या भारतवर्ष की देवात्मशक्ति की कुंडलिनी जागरण साधना भी कह सकते हैं। आमसाधक अपनी वैयक्तिक स्वर्गमुक्ति, ऋद्धि-सिद्धि के लिए साधना करते हैं, पर हमारी साधना विशुद्धतः लोक-मंगल के प्रयोजनों के निमित्त हुई है, जिससे न केवल अपने देश की गरिमा बढ़े, वरन् धरती पर बिखरे अनेक अभावों, संकटों, व्यवधानों, विपत्ति भरे घटाटोपों का निराकरण भी संभव हो सके।
इन तीन महा अनुष्ठानों की पूर्णाहुति एक विशेष धर्मानुष्ठान के द्वारा की जा रही है। 24 लक्ष्य के 24 महापुरश्चरणों के समापन पर— पूर्णाहुति के अवसर पर सन् 1958 में हमने 1000 कुंडी यज्ञ किया था, जो अविस्मरणीय बन गया। इस बार की तीन साधनाओं की पूर्णाहुति सारे भारत में कुल एक हजार स्थानों पर एक सौ आठ कुंडी यज्ञ एवं युगनिर्माण सम्मेलनों के रूप में होगी। एक वर्ष में एक हजार यज्ञों के माध्यम से एक लाख यज्ञों का संकल्प भी हमारा पूरा होगा एवं विभिन्न क्षेत्रों के वातावरण का परिशोधन करने में समृद्धि तथा प्रगति में सहायता मिलेगी।
यह न समझा जाए कि ये सभी संकेत-आदेश किसी व्यक्तिविशेष के लिए हैं, इसलिए उसे ही पूरा करना चाहिए। यहाँ यह समझ रखना चाहिए कि इतना बड़ा भार कोई एक व्यक्ति न तो उठा सकता है और न उसे लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। यह व्यक्ति वस्तुतः समुदाय है, जिसे आज की स्थिति में प्रज्ञा परिवार जैसी छोटी इकाई समझा जा सकता है, किंतु अगले दिनों यह उदार चेताओं की एक महान बिरादरी होगी। इस यशस्वी वर्ग में सम्मिलित होना— उनके दायित्वों में हाथ बँटाना, उन बड़भागियों के लिए एक अलौकिक वरदान है, जो अपने हिस्से का काम करके उपयुक्त अनुदान प्राप्त करते हैं।
युगसंधि 2000 तक चलेगी। तब तक हमें स्थूल या सूक्ष्मशरीर से सक्रिय रहना है। हमें सौंपे गए सभी कामों को पूरा करके ही जाना है। परिजन अब तक के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों में साथ देते, हाथ बँटाते और कदम-से-कदम मिलाकर चलते रहे हैं। विश्वास किया गया है कि इस अग्नि-परीक्षा की घड़ी में वे साथ नहीं छोड़ेंगे, मुँह नहीं मोड़ेंगे। इस श्रेय-साधना में सभी प्राणवानों की बराबर की भागीदारी रहेगी।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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