विज्ञान और उसकी अस्थिरता
ईसा से 200 वर्ष पूर्व नीसिया के वैज्ञानिक ‘हिप्पार्कस’ ने बताया कि, “ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी है। अन्य ग्रह-उपग्रह उसके चारों ओर केंद्रीय शक्ति (एक्सेंट्रिक) कक्षाओं में— अधिचक्रों (एपिसाइकिल्स) में घूमते हैं।” प्रसिद्ध यूनानी वैज्ञानिक ‘टालेमियस’ (संक्षिप्त नाम टालेमी) ने इसी सिद्धांत को स्वीकार कर सौरमंडल की शोध की और 1028 ग्रह-नक्षत्रों को पृथ्वी के क्रम से इस तरह स्थापित किया कि बीच में पृथ्वी, दूसरे वृत्त में चंद्रमा, तीसरे में बुध, चौथे में शुक्र, पाँचवें में सूर्य, छठवें में मंगल, सातवें में बृहस्पति, आठवें में शनि, नवें में स्फटिकीय पिंड व तारे और दसवें में प्राइमम मोबाइल रखे। इसी आधार पर ही ज्योतिष शास्त्र का बहुचर्चित ग्रंथ 'अलमागेस्ट' तैयार किया गया था। 1400 वर्षों तक यह सिद्धांत अकाट्य माना गया। यही नहीं, उसके आधार पर की जाने वाली अधिकांश भविष्यवाणियाँ सत्य भी होती थीं। लोग ‘अलमागेस्ट’ को पूजते थे। एक प्रामाणिक वैज्ञानिक ग्रंथ मानते थे। टालेमी ने इसी पुस्तक में वृत्त (सर्किल) को 360 भाग (ग्रेजुएशन्स) में विभक्त कर 'पाई' (वृत्त की परिधि और अर्द्ध व्यास के अनुपात को रोमन अक्षर में व्यक्त किया जाता है, उसे पाई कहते हैं) का मूल्य 3.1416 निकाला था। वर्तमान पाई का मूल्य 3.1428 है। अंतर .0012 का नगण्य-सा है, किंतु इसी अंतर को यदि करोड़ों प्रकाश मील की दूरी पर आरोपित किया जाएगा तो जो ग्रह यहाँ से 10 करोड़ मील की दूरी पर होगा, वह लाखों मील आगे-पीछे हो जाएगा।
उस समय भी यदि विज्ञान को लोग इसी तरह मानते रहे हों जैसे आज, तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि विज्ञान झूठा क्यों हो गया? पृथ्वी से थोड़ी दूर तक सीमित रहने वाले तत्त्वों की भविष्यवाणियाँ सही उतरीं, तो भी फलितार्थ गलत। यही तो है— विज्ञान की परिमितता। हम जिसे कल तक अकाट्य माने बैठे थे, वही आज गलत साबित हो गया। ऐसे विज्ञान को कौन पूर्ण कहेगा? कौन यह दावा करेगा कि विज्ञान सत्य है, धर्म नहीं? विज्ञान मनुष्य के सीमित ज्ञान के सीमित निष्कर्ष हैं। उनको ही सब कुछ बिलकुल सत्य मान लेना मनुष्य के लिए कभी भी हितकारक न होगा। शाश्वत और सनातन नियम जो भी हैं, धर्म के हैं। सारे संसार का एक ही नियामक है, यह मान लेने में किसकी हानि है? परस्पर प्रेम, न्याय, ईमानदारी का व्यवहार करना चाहिए, हम सब भाई-भाई हैं, यह मान लेने पर किसका बुरा हो गया? धर्म, सुख और शांति प्राप्त करने का अकाट्य सिद्धांत है। यदि कोई सिद्धांत इसके विपरीत जाते हैं तो वह धर्म नहीं हो सकते, जबकि विज्ञान की सत्यता को कभी भी अंतिम नहीं कहा जा सकता।
‘कोपरनिकस’ ने ‘अलमागेस्ट’ से असहमति प्रकट न की होती, तो आज जो ग्रहगणित का इतना सुधरा रूप सामने आ रहा है, वह न आया होता। ‘कोपरनिकस’ ने पहली बार बताया कि, “वैज्ञानिक धारणाओं को कभी अंतिम सत्य नहीं मान लिया जाना चाहिए।” उसने सूर्य को ब्रह्मांड का केंद्र बताया। यह धारणाएँ बहुत वर्षों तक चलती रहीं। अब 19वीं शताब्दी में तो अंतरिक्ष एक ऐसा आश्चर्य बन गया है कि उसमें यही तय नहीं किया जा सकता है कि विराट् ब्रह्मांड का केंद्र (न्यूक्लियस) कहाँ पर है। 'सूर्य'— सौर जगत का केंद्रक हो सकता है, ब्रह्मांड का नहीं। अकेली हमारी आकाशगंगा से ही प्रकाश पाने वाले अनेक सूर्य और उनके सौरमंडल विद्यमान हैं। फिर ऐसी-ऐसी करोड़ों आकाशगंगाएँ और हैं। उनमें कितने सौर जगत हैं, उसकी कुछ कल्पना ही नहीं की जा सकती। 50 करोड़ प्रकाश वर्ष और 10 करोड़ निहारिकाओं का अनुमान लगाने वाले आज के वैज्ञानिक भी इस जानकारी का आंशिक सत्य मानते हैं, पूर्ण सत्य नहीं। क्या उस विज्ञान पर भरोसा किया जा सकता है?
जिस विज्ञान को लोग प्रत्यक्षदर्शी और सर्वमान्य कहते हैं, क्या उसका प्रत्यक्ष दर्शन और प्रस्तुत प्रतिपादन सत्य है? इस पर नई पीढ़ी को नए सिरे से विचार करना पड़ेगा और उन सार्वभौमिक सिद्धांतों का अन्वेषण करना पड़ेगा, जो मानव प्रकृति और चेतन के संबंध में सही जानकारी दे सकते हों। जब भी ऐसी आवश्यकता उठेगी, हमें अपने अंदर से हल खोजना पड़ेगा; अपने अहंभाव का विश्लेषण और विकास करना पड़ेगा। इसी का नाम धर्म है; इसी का नाम अध्यात्म है।
ब्रह्मांड संबंधी उपरोक्त सिद्धांतों के साथ अब सैकड़ों वर्ष तक काम करने वाला न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत भी हवा में उड़ने लगा। एक दिन महाशय न्यूटन एक बगीचे में बैठे थे। उन्होंने देखा एक फल टूटकर नीचे जमीन पर आ गिरा। प्रश्न उठा— फल नीचे ही क्यों आया? वह आकाश में क्यों नहीं चला गया? इस घटना के बाद ‘न्यूटन’ ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को प्रतिपादित किया। उन्होंने बताया— “कणों के परिमाण के अनुपात से संसार के सभी कण दूसरे कणों को आकर्षित करते हैं। ‘न्यूटन’ के अनुसार— कणों की दूरी बढ़ने के साथ यह आकर्षणबल घटने लगता है। ‘न्यूटन’ के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत पर अनेक मशीनें बनी हैं, जो काम भी करती हैं, किंतु 1916 में ‘आइन्स्टीन’ ने बताया कि, “ब्रह्मांड के कण स्थान और समय में एक सीधी रेखा में चलते हैं। यही बात ग्रह-नक्षत्रों के बारे में भी है। वह भी सीधे चलते हैं, किंतु द्रव्य (मास) की उपस्थिति के कारण स्थान और समय का रूप बदल जाता है और ऐसा लगने लगता है कि कण या ग्रह-नक्षत्र वक्राकार पथ पर चलते हैं।” इस नए सिद्धांत को आइन्स्टीन ने 'सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत' (थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी) नाम दिया और बताया कि गुरुत्वाकर्षण द्रव्य का गुण न होकर, स्थान और समय का गुण है।
‘आइन्स्टीन’ उन वैज्ञानिकों में से हैं, जिनके सिद्धांत इतने गंभीर और क्लिष्ट हैं कि उनकी सतह तक पहुँचना हर व्यक्ति के वश की बात नहीं। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक दिन उनके सिद्धांत को भी गलत किया जा सकता है, पर हुआ यही। 1964 में प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक ‘डॉ० जयंत विष्णु नार्लिकर’ तथा ‘प्रोफेसर फ्रेड हायल’ ने एक गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत को जन्म दिया और बताया कि, “गुरुत्वाकर्षण न तो स्थान और समय का गुण है, न कणों का। वह तो ब्रह्मांड का गुण है।” ‘हायल’ ने अपने मत की पुष्टि में 'संतुलित अवस्था का सिद्धांत' प्रकाशित किया और बताया कि, “आकाश की पुरानी आकाशगंगाएँ मरती और नई जन्म लेती रहती हैं। ब्रह्मांड फैल रहा है और उसी के फलस्वरूप ऊर्जा द्रव्य (मास) में बदलती रहती है।” जहाँ इस तरह की क्रियाएँ चलती हैं, उसे हायल ने सृजन-क्षेत्र (क्रिएशन फील्ड) का नाम दिया। इन तथ्यों से ब्रह्मांड की कल्पना और गुरुत्वाकर्षण की अब तक चली आ रही मान्यताएँ ध्वस्त हो जाती हैं, तब क्या न्यूटन, टामस, गोल्ड हर्मन, बाँडो और आइन्स्टीन की बातें सच थीं। इस पर विचार करें, तो लगता है कि यह बुद्धिमान वैज्ञानिक भी यथार्थ की दृष्टि में अपरिपक्व बुद्धि वाले बच्चों जैसे थे और जो बच्चे आज का विज्ञान पढ़ते हैं, उनकी अपरिपक्वता के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता। सामान्य बातों को छोड़कर 10 वर्ष पूर्व एक विद्यार्थी ने जो कुछ पढ़ा था, आज उसका प्रायः 3 प्रतिशत गलत हो गया, जिसकी उसे जानकारी तक नहीं और वह अपने विद्यार्थी को, अपने मित्रों को वही बातें बता रहा होगा, अब जिनको अमान्य कर दिया गया है। क्या इस स्थिति में विज्ञान को सत्य कहा जा सकता है?
एक समय था, जब डाल्टन के परमाणुवाद को एक सर्वमान्य सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया गया था। डाल्टन का कहना था— “परमाणु अजन्मा, अविनाशी और अविभाज्य है।” इस सिद्धांत को 120 वर्ष तक अकाट्य माना जाता रहा। इस सिद्धांत ने ही डाल्टन को मूर्द्धन्य वैज्ञानिक का सम्मान दिलाया था।
किंतु क्या डाल्टन सत्य था? वही सिद्धांत जो 120 वर्ष तक वैज्ञानिकों की अन्य शोधों का माध्यम बना रहा, एक दिन खंड-खंड कर दिया गया। सन् 1867 में जे० जे० थांप्सन नामक वैज्ञानिक ने कैथोड किरणों (कैथोड रेज) का आविष्कार करके डाल्टन के परमाणुवाद सिद्धांत को खंडित कर दिया और बताया कि, “परमाणु भी विभाज्य है।” एक दिन उन्होंने न्यूनतम वायु दबाव की एक नली में ऋण ध्रुव (कैथोड) से विद्युत्धारा प्रवाहित की, उससे एक प्रकार की किरण कैथोड से निकलती हुई दिखाई दी, जिनके अध्ययन से सिद्ध हो गया कि परमाणु के भीतर भी आवेश या शक्ति-कण होते हैं। इन किरणों के मार्ग में ऋण पोल (निगेटिव पोल) लाने से विकर्षण (रिपल्सन) की क्रिया हुई और उन किरणों ने अपना मार्ग बदल दिया। इससे यह सिद्ध हुआ कि परमाणु के भीतर ऋण विद्युत् आवेश विद्यमान हैं, उसे इलेक्ट्रॉन्स कहा गया। इलेक्ट्रॉन्स का भार हाइड्रोजन परमाणु के भार का 1/1850 होता है। इसलिए वैज्ञानिकों को इसकी खोज के बाद भी अनिश्चय-सा रहा कि परमाणु की अभी अंतिम जानकारी नहीं हो सकी।
सन् 1911 में रदरफोर्ड सोने की पत्तर पर अल्फा किरणों की बम्बार्डमेंट कर रहे थे। कुछ किरणें तो पत्तर को पार कर गईं; कुछ दाहिने-बाएँ मुड़ गईं, पर रदरफोर्ड ने देखा कि कुछ किरणें जिस मार्ग से जा रही थीं, उसी मार्ग से लौट आईं। चुंबक विज्ञान का एक सिद्धांत है— समान ध्रुव एकदूसरे के विपरीत दिशा में धकेलते हैं, असमान ध्रुव आकर्षित (अट्रेक्ट) होकर जुड़ जाते हैं। अल्फा किरणें, जो वापस लौट रही थीं, वे धनावेश युक्त थीं, इसलिए यह निश्चित किया गया कि सोने के परमाणु में वैसा ही धन आवेश होना चाहिए। तब परमाणु में दो कणों का अस्तित्व सामने आया, जिन्हें इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन नाम दिया गया।
इस सिद्धांत ने बहुत दिन तक वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन किया और उस युग में उसे ही सत्य माना जाता रहा। विज्ञान की भाषा तो तोतली है, जो मीठी भले ही लगती हो, पर होती निरर्थक है। उसे मानने वाले उस बालक की तरह हैं, जिन्हें अबोध कहा जा सकता है, पर उनकी बात को सत्य नहीं कहा जा सकता; क्योंकि आने वाला प्रत्येक नया वैज्ञानिक उस सिद्धांत को काटता हुआ या संशोधन करता हुआ आता है, जो सिद्धांत अब तक अकाट्य समझे जाते थे। वह एक नए पैसे के गुब्बारे की तरह अगले ही दिन फट्ट हो जाते हैं।
महाशय नील्स बोहर ने परमाणु के सिद्धांत को एक नया मोड़ दिया। उन्होंने कहा— “परमाणु में इलेक्ट्रॉन (ऋण आवेश) और प्रोटॉन (धन आवेश) है तो, पर वह एक साथ रह नहीं सकते। असमान विद्युत् आवेश होने के कारण उन्हें एकदूसरे में मिल जाना चाहिए तथा नष्ट हो जाना चाहिए।” उनके नष्ट होने का अर्थ था— परमाणु का नष्ट हो जाना, पर ऐसा होता नहीं। इसलिए उसने एक नए सिद्धांत को जन्म दिया और बताया कि, “इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। नाभिक उन्हें सेंट्रीफ्यूगल फोर्स से बाँधे हुए हैं और इलेक्ट्रॉन स्वयं भी सेंट्रीपीटल फोर्स से नाभिक की ओर खिंचते रहते हैं, कक्षा छोड़कर बाहर नहीं जाते।”
बाद में अपने सिद्धांत को उसी ने फिर सुधारा और कहा कि, “इलेक्ट्रॉन एक बंद कक्षा में घूमते हैं, अन्यथा इलेक्ट्रॉन को घुमाने वाली शक्ति का ह्रास होने पर वह केंद्रक में गिर जाता और परमाणु नष्ट हो जाता। परमाणु के नष्ट होने का अर्थ था— संसार का नष्ट हो जाना।” अपने इस सिद्धांत की पुष्टि इन्हीं महोदय ने नागासाकी और हिरोशिमा में बम गिराकर की, तो भी वह परमाणु के अंतिम सत्य को स्थिर नहीं कर सके।
आंशिक जानकारियाँ विषयों का पूर्ण प्रतिपादन नहीं कर सकतीं। मनुष्य के उलझाव वाले प्रश्न हैं— उसका 'अहं' और अहं से संबंधित सैकड़ों प्रश्न। हमारी चेतना का वास्तविक स्वरूप क्या है ?
विज्ञान के पास इसका कोई उत्तर नहीं? मृत्यु के बाद हमारा क्या होता है? विज्ञान चुप। प्राणिमात्र के साथ हमारे क्या संबंध हैं? हम क्यों अस्थिर हैं? चिरशांति के उपाय क्या हैं? क्यों हम जीते और मर जाते हैं? जब तक इनका स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, मनुष्य भटकता रहेगा, जबकि विज्ञान के पास इन भव रोगों का कोई इलाज नहीं।
इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन का सम्मिलित भार भी परमाणु भार से कम था, इसलिए यह सोचा गया कि नाभिक (न्यूक्लियस) में कोई ऐसा कण है, जिसमें भार तो है, पर विद्युत् आवेश नहीं। उससे न्यूट्रॉन का अस्तित्व सामने आया। इसके बाद एक और कण पाजिट्रॉन की खोज की गई। अभी तक यह कहा जाता था कि इलेक्ट्रॉन वृत्ताकार कक्ष (सरकुलर आरबिट) में चक्कर लगाते हैं, किंतु ‘समरफील्ड’ ने उसे भी संशोधित कर दिया और बताया कि इलेक्ट्रॉन वृत्ताकार कक्ष में नहीं, अंडाकार कक्ष (इलिप्टिकल आरबिट) में चक्कर लगाते हैं।
अब एक और सिद्धांत— क्लाउड थ्योरी का सृजन हो रहा है। उसके अनुसार— “इलेक्ट्रॉन्स की कोई कक्षा नहीं, बल्कि वे न्यूक्लियस के चारों ओर घिरे सघन बादलों में कुछ विचित्र प्रकार से इस तरह घूमते हैं, जैसे आकाश में ग्रह-नक्षत्र।” अभी भी अंतिम सत्य की खोज नहीं की गई। वैज्ञानिक 'पदार्थों' के अतिरिक्त किसी शक्ति को नहीं मानते, पर उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि प्राकृतिक नियमों (लॉज ऑफ नेचर) को तोड़कर शाप, वरदान, पूर्वाभास, स्वप्नाभास वाली शक्ति कौन-सी है और क्या उसका परमाणु या विराट् ब्रह्मांड से भी कोई संबंध है। मस्तिष्क में विचार कहाँ से आते हैं? भावनाओं का अस्तित्व क्या है? जब तक विज्ञान इनकी जानकारी नहीं दे देता, क्या उसे सत्य रूप में स्वीकार किया जा सकता है? जबकि अभी परमाणु के बारे में ही यह अनिश्चित है कि उसमें इतनी शक्ति कहाँ से आती है?
मानवीय जीवन के इन प्रश्नों का हल करना तो दूर, वैज्ञानिक अपने ही सिद्धांतों के प्रति आश्वस्त नहीं। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिकों के सिद्धांतों को भी अब केले के पत्तों की तरह जगह-जगह से काट दिया जाता है। कल तक जो औषधि रोगनाशक समझी जाती थी, आज उसे विष उत्पादक और रोगवर्द्धक कहकर रोक दिया जाता है। इंजेक्शन बदलते चले जा रहे हैं, तो भी स्वास्थ्य की समस्या हल नहीं हुई। पहले नींद के लिए लेसरजिक एसिड डाइ इथाइल इमाइड (एल० एस० डी०) दी जाती थी। उससे अनेक लोग बहरे हो गए; अनेक मस्तिष्क संबंधी बीमारियाँ खड़ी हो गईं। एक 42 वर्षीय बुढ़िया ने उक्त दवा का सेवन किया और पीने के 36 घंटे बाद मर गई। उसके दुष्फल देखकर उसे बदला गया, फिर पैरानोइया दी जाने लगी। वह भी खतरनाक सिद्ध हुई। इसके बाद और कई तरह के मिश्रण बदले, सोनेरिल लारजेक्टिल, एलेविजर वेलेरियन, ब्रोमाइड मिक्चर और मार्फिया आदि बदलती चली आईं, पर इनमें से ऐसी एक भी नहीं, जो विषोत्पादक न हो।
विज्ञान को तो सत्य इष्ट है, पर वह स्वयं सत्य नहीं। क्रमशः विकसित होने वाला विज्ञान सत्य तक पहुँच भी सकता है और सारे संसार को नष्ट-भ्रष्ट भी कर सकता है। नागासाकी जैसा कोई विस्फोट प्रयोगशाला में ही हो सकता है।
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, विज्ञान और उसकी अस्थिरता, पृष्ठ 25-33
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