हमारी वसीयत और विरासत (भाग 145): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
हमारे निजी जीवन में भगवत्कृपा निरंतर उतरती रही है। चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने का अत्यंत कठोर साधनाक्रम उन्हीं दिनों से लाद दिया गया जब दुधमुँही किशोरावस्था भी पूरी नहीं हो पाई थी। इसके बाद संगठन, साहित्य, जेल, परमार्थ के एक-से-एक बढ़कर कठिन काम सौंपे गए। साथ ही यह भी जाँचा जाता रहा कि जो किया गया, वह स्तर के अनुरूप बन पड़ा या नहीं। बड़ी प्रवंचना के सहारे संसारी ख्याति अर्जित करने की विडंबना तो नहीं रचाई गई। आद्यशक्ति गायत्री को युगशक्ति के रूप में विकसित और विस्तृत करने के दायित्व को सौंपकर वह जान लिया गया कि एक बीज ने अपने को गलाकर नये 24 लाख सहयोगी-समर्थक किस प्रकार बना लिए? उनके द्वारा 2400 प्रज्ञापीठें विनिर्मित कराने से लेकर सतयुगी वातावरण बनाने और प्रयोग-परीक्षणों की शृंखला अद्भुत-अनुपम स्तर तक की बना लेने में आत्मसमर्पण ही एकमात्र आधारभूत कारण रहा। सस्ता ईंधन ज्वलंत ज्वाला बनकर धधकता है, तो इसका कारण ईंधन का अग्नि में समर्पित हो जाना ही माना जा सकता है।
अब जबकि 75 वर्षों में से प्रत्येक को इसी प्रकार तपते-तपते बिता लिया, तो एक बड़ी कसौटी सिर पर लदी। इसमें नियंता की निष्ठुरता नहीं खोजी जानी चाहिए, वरन् यही सोचा जाना चाहिए कि उसकी दी हुई प्रखरता के परीक्षणक्रम में अधिक तेजी लाने की बात उचित समझी गई।
हीरक जयंती के वसंत पर्व पर अंतरिक्ष से दिव्य संदेश उतरा। उसमें ‘लक्ष’ शब्द था और पाँच उँगलियों का संकेत। यों यह एक पहेली थी, पर उसे सुलझने में देर नहीं लगी। प्रजापति ने देव, दानव और मानवों का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें एक शब्द का उपदेश दिया था— ‘द’। तीनों चतुर थे। उनने संकेत का सही अर्थ अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप निकाल लिया। कहा गया था— ‘द’। देवताओं ने दमन (संयम), दैत्यों ने दया, मानवों ने दान के रूप में उस संकेत का भाष्य किया, जो सर्वथा उचित था।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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