कृपया कथा : एक शिष्य की कलम से गुरुदेव ने कहा - तुम्हारी कई पीढ़ियाँ मेरा कार्य करेगी।
मेरे नाना जी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाते थे, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर आसनसोल जेल में बंदी बना दिया गया।
जेल के बैरक में प्रवेश करते ही एक दुबला-पतला किंतु ऊँची कद-काठी वाला तेजस्वी युवक उनके पास आया। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति और नेत्रों में विलक्षण तेज था। वह हाथ में पानी का गिलास लिए हुए बोला—
“आओ मित्र, पानी पी लो।”
नाना जी ने पानी ग्रहण किया। कुछ क्षण बाद सहज जिज्ञासा से कहा—
“आपने मुझे मित्र कहा, जबकि मैं आपको जानता तक नहीं।”
युवक मंद मुस्कान के साथ बोला—
“तुम नहीं समझ पाओगे। तुम्हारी तो कई पीढ़ियाँ मेरा कार्य करेंगी।”
समय बीत गया। जेल से मुक्ति मिली, देश स्वतंत्र हुआ और जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता गया।
वर्ष 1953 में नाना जी को एक पत्र प्राप्त हुआ। पत्र में लिखा था—
“राष्ट्र निर्माण के लिए एक बहुत बड़ा अभियान आरंभ होने जा रहा है। इसमें तुम्हारी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। शीघ्र मथुरा आ जाओ। घर की चिंता मत करना, उसकी व्यवस्था मैं स्वयं देख लूँगा।”
नाना जी अपनी डायरी में लिखते हैं कि उस व्यक्ति से कभी उन्होंने अपने घर का पता तक साझा नहीं किया था। फिर भी पत्र उनके हाथों में था—पूर्ण विश्वास के साथ।
(आगे की कथा नाना जी के शब्दों में)
“पत्र पढ़ते-पढ़ते मैं जैसे सम्मोहित हो गया। घर में जो कपड़ा मिला, उसे एक प्लास्टिक की टोकरी में डाल लिया और बिना कुछ सोचे निकल पड़ा। पत्नी ने पूछा—‘कहाँ जा रहे हो?’
मैं बस इतना ही कह सका—‘तीन-चार दिन में लौट आऊँगा।’
बैलगाड़ी से स्टेशन पहुँचा। बैलगाड़ी वाले ने कहा—‘मेरा काम यहीं तक था, आगे स्टेशन पर एक आदमी मिलेगा, वही तुम्हें ट्रेन में बैठाएगा।’
स्टेशन पर सचमुच एक व्यक्ति खड़ा था। उसने कहा—‘बहुत से लोगों को अभी इकट्ठा करना है, जल्दी चढ़ो, यह ट्रेन मथुरा जाएगी।’
ट्रेन चल पड़ी। मथुरा पहुँचने से कुछ पहले ट्रेन जंगल के बीच रुक गई। नीचे खड़ा एक व्यक्ति बोला—‘आगे बैलगाड़ी वाला तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।’
जंगल के रास्तों से होता हुआ मैं मथुरा पहुँचा।
जैसे ही गुरुदेव के सामने पहुँचा, उन्होंने मुस्कराते हुए कहा—
‘तुम बहुत सीधे हो। तुम्हारे पीछे चार-चार आदमी लगाने पड़े। अगर सबके पीछे इतने लोग लगाने पड़ें तो काम कैसे चलेगा?’
फिर उन्होंने गंभीर स्वर में कहा—
‘यहाँ एक बहुत बड़ा यज्ञ होने वाला है। तुम्हें अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है। घर की चिंता मत करना, उसकी व्यवस्था मैंने कर दी है।’”
समय ने सिद्ध कर दिया कि गुरुदेव का कथन अक्षरशः सत्य था। घर की व्यवस्था सचमुच स्वयं बनती चली गई—उसका उल्लेख फिर कभी।
गुरुदेव के वचनों के अनुसार, नाना जी के बाद मेरी माँ, फिर मेरे पिता और आज मैं स्वयं इस मिशन के कार्य में संलग्न हूँ।
आज जब इन घटनाओं पर चिंतन करता हूँ, तो यह अनुभव होता है कि भगवान महाकाल, जिसे चुनते हैं, उसे अपने समीप बुलाने के लिए कितनी अदृश्य व्यवस्थाएँ करते हैं। अपनी कृपा का प्रसाद ऐसे प्रदान करते हैं कि जीवन तृप्त हो उठता है।
जब ईश्वर किसी एक को चुनता है, तो केवल वही नहीं—
उसकी अनेक पीढ़ियाँ, जन्म-जन्मांतर तक, सँवर जाती हैं।
यही है पूज्य गुरुदेव की अवतारी चेतना—
जो समय, स्थान और व्यक्ति से परे जाकर
युग निर्माण की धारा प्रवाहित करती है।
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