कृपा-कथा : एक शिष्य की कलम से परम वंदनीया माता जी जगन्माता माँ जगदंबा हैं
परम वंदनीया माता जी मेरे लिए केवल एक श्रद्धेय व्यक्तित्व नहीं, बल्कि साक्षात् जगन्नमाता—मां जगदंबा की अवतारी चेतना हैं। यह मेरा अटूट, अडिग और जीवनानुभव से उपजा विश्वास है। हमारा विराट गायत्री परिवार परम वंदनीया माता जी की ममत्वमयी गोद और वात्सल्यपूर्ण छाया में ही पला-बढ़ा है। उन्हीं के करुणामय प्रेम के कारण आज लगभग पंद्रह करोड़ साधक, संसार के कोने-कोने में रहते हुए भी, प्रेम और आत्मीयता की एक अदृश्य डोर से बंधे हुए हैं। यह कोई भावनात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्य है, जिसे असंख्य जीवनों ने अनुभूत किया है।
यह प्रसंग मेरे जीवन के उस कालखंड का है, जब मैं स्नातक के अंतिम वर्ष में अध्ययन कर रहा था। मेरा परिवार पहले से ही गायत्री परिवार से जुड़ा हुआ था। घर के लोग श्रद्धा और निष्ठा के साथ मिशन के कार्यक्रमों में भाग लेते थे। मैं भी उनके साथ, कभी-कभी, अपने भाइयों के संग मिशन के कार्यों में थोड़ा-बहुत सहयोग कर दिया करता था। उस समय तक मेरा जुड़ाव औपचारिक था; जीवन की दिशा अभी स्पष्ट नहीं थी।
सन 1991 की बात है। जिस स्थान पर मैं पढ़ाई कर रहा था, वहाँ मेरे नाम एक पत्र आया। लिफाफा देखकर मैं ठिठक गया। मेरे नाम में एक अत्यंत सूक्ष्म सा परिवर्तन था, किंतु पिता जी का नाम और पूरा पता पूर्णतः सही लिखा हुआ था। जिज्ञासावश मैंने पत्र खोला। भीतर लिखे शब्दों ने जैसे मेरे अंतर्मन को झकझोर दिया। वह पत्र परम वंदनीया माता जी का था। उसमें लिखा था—
“चिरंजीव,
क्या तुमने कभी कछुआ मादा को देखा है?
कछुआ मादा तालाब, नदी और समुद्र में निवास करती है, किंतु अपने अंडे वह किनारे की रेत में देती है। जब अंडों के भीतर बच्चे परिपक्व हो जाते हैं, तब वे अंडों को तोड़कर अपने वास्तविक घर—जल—में लौट जाते हैं।
बेटे, मेरी जितनी सीमा थी, उतने बच्चों को मैंने अपने पास जन्म दिया। शेष बच्चों को मैंने संसार के विभिन्न स्थानों पर बिखेर दिया है। अब अपनी पढ़ाई पूरी करके सीधे अपने घर चले आना। तुम्हारा असली मायका शांतिकुंज, हरिद्वार है।”
—माता भगवती देवी शर्मा
यह पत्र मेरे लिए केवल शब्दों का समूह नहीं था; यह एक आह्वान था, एक मातृ-पुकार थी। उसे पढ़ते ही मेरे भीतर कुछ ऐसा जाग उठा, जिसे शब्दों में बांध पाना कठिन है। ऐसा लगा मानो किसी ने मेरे जीवन के अब तक बिखरे हुए सूत्रों को एक केंद्र से जोड़ दिया हो। उस क्षण से शांतिकुंज जाने की इच्छा मेरे भीतर तीव्र और अविराम हो गई।
आश्चर्य की बात यह थी कि इस पत्र के मिलने से पहले मैं कभी शांतिकुंज नहीं गया था, न ही माता जी से मेरा कोई प्रत्यक्ष संपर्क था। फिर भी ऐसा अनुभव हुआ, जैसे यह स्थान मेरा जाना-पहचाना घर हो, जहाँ लौटने की प्रतीक्षा स्वयं आत्मा कर रही हो।
आज जब मैं अपने जीवन की यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो यह स्पष्ट अनुभव करता हूँ कि युगनिर्माण मिशन के कार्यों में मेरा जीवन लगना मेरा व्यक्तिगत निर्णय या समर्पण नहीं था। वह गुरुदेव और परम वंदनीया माता जी का चयन था। यह उनकी करुणा, उनकी कृपा और उनके अवतारी संकल्प का ही परिणाम था कि मुझे इस विराट परिवार का अंग बनने का सौभाग्य मिला।
परम वंदनीया माता जी की चेतना आज भी मेरे लिए मार्गदर्शक प्रकाश है—मातृत्व, त्याग और विश्व-कल्याण की जीवंत प्रतिमूर्ति। उनकी छाया में जीवन को अर्थ, दिशा और उद्देश्य प्राप्त हुआ, यही मेरा परम सौभाग्य है।
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