कृपा-कथा : एक शिष्य की कलम से | गुरु ने उँगली पकड़ ली, फिर लोक-परलोक वही देखते है
गुरुदेव ने कहा - तुम्हारी कई पीढ़ियाँ मेरा कार्य करेगी। से आगे .....
किसी संत ने कहा है— जिसकी उँगली गुरु ने पकड़ ली, उसके लिए लोक और परलोक दोनों सुरक्षित हो जाते हैं। यह कथन हमने केवल सुना नहीं, बल्कि हमारे परिवार ने जिया है।
पूज्य गुरुदेव ने आसनसोल जेल में मेरे नाना जी से कहा था— “तुम्हारी कई पीढ़ियाँ मेरा कार्य करेंगी।” उस समय नाना जी को इस वाक्य की गहराई समझ में नहीं आई, पर समय के साथ उसका अर्थ स्वयं प्रकट होता चला गया।
सन 1953 के यज्ञ में पूज्य गुरुदेव का बुलावा नाना जी को आया। उनकी आज्ञा किसी सम्मोहन से कम न थी। सब कुछ छोड़कर नाना जी मथुरा के लिए निकल पड़े। बुलावे के साथ उनका आश्वासन भी था— “घर की चिंता मत करना, मैं स्वयं देख लूँगा।” गुरुदेव का दिया आश्वासन शब्द मात्र नहीं था, वह एक अटूट संकल्प था।
जब नाना जी मथुरा से लौटकर भागलपुर पहुँचे, तो मेरी नानी ने जो बताया, उसे सुनकर नाना जी स्तब्ध रह गए। जिस रात नाना जी घर से निकले थे, उसी रात मूसलाधार वर्षा हुई। बारिश के कारण घर में फिसलन हो गई और नानी गिर पड़ीं तथा असहाय ज़मीन पर पड़ी रोती रहीं। तभी किसी ने घर का फाटक खोला। एक व्यक्ति भीतर आया, नानी को सहारा देकर बिस्तर पर लिटाया, दवा दी और कहा—“चिंता मत कीजिए, डॉक्टर साहब बहुत अच्छे कार्य के लिए गए हैं। मैं आपकी देखभाल कर लूँगा।” घर के लिए पर्याप्त राशन भी पहुँचा दिया। मेरी नानी ने समझा कि नाना जी किसी को व्यवस्था सौंपकर गए हैं।
कुछ समय बाद नाना-नानी दोनों मथुरा पहुँचे। जैसे ही नानी ने पूज्य गुरुदेव को देखा, वह अचंभित रह गईं। भाव-विह्वल होकर बोलीं— “बारिश वाली रात यही तो आए थे, जिन्होंने मेरी सहायता की थी।”
नाना जी ने विस्मय से गुरुदेव से पूछा— “गुरुदेव, आप तो उस समय मथुरा में थे, फिर वहाँ कैसे?” गुरुदेव मंद मुस्कान के साथ बोले— “बस करो, दिमाग को बहुत दूर तक दौड़ाने की आवश्यकता नहीं।”
आज नाना जी के बाद तीसरी पीढ़ी में मैं गुरुदेव का कार्य कर रहा हूँ। उनके आशीर्वाद की छाया आज भी हमारे परिवार पर है। न कभी कोई अभाव आया, न घोर विपत्ति। और यदि कभी कोई संकट आया भी, तो जैसे वह केवल परिचय देने आया हो— गुरु-कवच से सुरक्षित हमारे परिवार को दूर से देखकर लौट गया। यही है गुरु-कृपा— अदृश्य, पर सर्वव्यापी।
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