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Friday 03, July 2026

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन






परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



जिन कुरीतियों की वजह से समाज का सत्यानाश हुआ जाता है, उन कुरीतियों से संघर्ष करने के लिए आप सीना तानकर खड़े हो जाइये।  विशुद्ध पुण्य है विशुद्ध पूण्य आप यह मत सोचिए कि लड़ाई-झगड़े की बात कही जा रही है। लड़ाई झगड़े की बात तो भगवान भी कह रहे थे और अर्जुन को बार-बार कहा था कि आप लड़िए तस्मा युद्धाय युज्यस्व लड़ !  लड़ने के लिए दबाव डाला था तो लड़ना भी कोई पुण्य है? हाँ यह भी पुण्य है। पुण्य की आप सीमाबद्ध मत कीजिए। केवल पानी  पिलाने को पुण्य मत मानिये रोटी खिलाने को पुण्य मत मानिये व्यक्तित्यांे को उछाल देने का नाम सद्ज्ञान देने का नाम, सत्वृत्तियों के संवर्द्धन का नाम-यह भी पुण्य और परोपकार हैं। मसलन जो आप लोग, इस मिशन को आगे बढ़ा देते हैं,  जिसमें कि असंख्य मनुष्यों के उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना है और महाविनाश से रोकथाम करने के लिए इसमें बहुत काफी गुंजाइश है आप ऐसे पुनीत काम में संलग्न होते हैं अपना श्रम देते हैं, अपना समय देते हैं, अपने प्रभाव का उपयोग करते हैं, तो आप निश्चित रूप से समझिये कि यह किसी सोना दान करने वाले राजा कर्ण से कम महत्त्व का काम नहीं है।

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अखण्ड-ज्योति से



सत्संग-प्रेमी सज्जन व्यवहार शुद्धि के लिये निरन्तर विवेकपूर्वक सावधान रहते हैं। सतोगुणी प्रकृति दृढ़ रहने के लिये दूषित संग और तमोगुणी व रजोगुणी आहार नहीं करते हैं। अशुद्ध विचारों का निरन्तर सजग रहकर विरोध एवं परित्याग करते हुए शुद्ध, सात्विक विचारों को ही अपने मन व मस्तिष्क में स्थान देते हैं।

सत्संगी सदा शान्त, प्रसन्नचित्त, उत्साही, गम्भीर और दुखों के बीच में सहन-शील और निर्भय रहता है।

सत्संगी को मोह नहीं होता, प्रेम होता है। मोही वह है जो अपना सुख चाहता है। प्रेमी वह है जो प्रेमास्पद को ही सुखी देखने के लिये सब कुछ करता है।

सत्संगी किसी सम्बन्धी की मृत्यु में रोता नहीं लेकिन किसी के दुःख में उसे बहुत दुख होता है और दुखी के दुख निवारण के लिये उसके सभी प्रयत्न या कर्म होते हैं।

सत्संगी में गरीबों व दुखियों की सेवा के लिये तन, मन, धन से तत्परता रहती है। रात, दिन, जाड़ा, गर्मी, वर्षा आदि द्वंद्वों में भी सेवा के अवसरों में आलस्य या प्रमाद नहीं रहता। नीच जाति तथा पापीजनों से भी घृणा नहीं होती।

सत्संगी किसी की निन्दा नहीं करता और निन्दा करने वालों से बहुत बचता है, लेकिन अपनी निन्दा तथा अपने निन्दकों से विरोध या द्वेष नहीं करता। क्योंकि अपनी निन्दा से सत्संगी की बहुत उन्नति होती है, कई सद्गुणों का अभ्यास दृढ़ होता है, विनम्रता, सहनशीलता और निरभिमान आदि सद्भाव पुष्ट होते हैं।

सत्संगी अपनी सेवा नहीं कराता वरन् सेवा करता है। कभी-कभी दूसरों की प्रसन्नता के लिये, भाव विकास के लिये ही दूसरों को भी अपने प्रति सेवा का अवसर दे देता है।

अखण्ड ज्योति जून 1947
 

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