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Magazine - Year 1941 - Version 2

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आवश्यकताओं को कम करो।

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(ले. श्री सेठ अगरचन्द नाहटा, सिलहट, असम)

अपने पूर्वजों के सुख शान्तिमय जीवन से जब हम अपने वर्तमान जीवन की तुलना करते हैं, तो हमारे जीवन में अधिक अशान्ति पाई जाती है। यही क्यों, आज भी ग्रामीण जीवन शहर निवासियों के जीवन की अपेक्षा अधिक सुखमय नजर आता है। इसके कारण पर विचार करने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि उनकी आवश्यकताएं कम हैं और हमारी आवश्यकताएं इतनी अधिक बढ़ चुकी हैं, कि उनकी प्राप्ति करने में अविरत घुड़दौड़ लगी रहती है। साधारणतया लोगों की यह धारणा होती है कि शहर वाले नानाविधि वस्तुओं का उपभोग कर आनन्द उठाते हैं, ग्राम निवासियों को वे कहाँ से नसीब हों। पर जरा गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाये तो यह धारणा ठीक प्रतीत नहीं होती। यह ठीक है कि शहर में अनेक प्रकार की खाने पीने की चीजें मिलती हैं, और ग्राम निवासी केवल दाल रोटी, छाछ, दलिया ही पा सकते हैं फिर भी ग्राम निवासी अधिक स्वस्थ हैं और प्राप्त होने वाली थोड़ी वस्तुओं में ही संतुष्ट हैं, किन्तु शहर वाले अधिक प्रकार की खाद्य वस्तुएं प्राप्त होने पर भी अन्य विविध स्वादिष्ट वस्तुओं को खाने के लिये लालायित रहने के कारण अशान्त रहते हैं। इससे प्रतीत होता है कि यदि शाँति पाने की इच्छा हो, तो आवश्यकताओं को कम करना चाहिये।

सुख और शाँति तो संतोष में हैं, वस्तुओं के अधिकाधिक उपयोग में तो अधिक अशान्ति ही सम्भव है। मुझे बहुत बार विचार होता है, कि हमने अपनी आवश्यकताओं को बढ़ा कर ही अशान्ति मोल ली है, कलकत्ते में श्रमजीवियों को देखता हूँ और सिलहट में अपने आश्रित मजदूरों पर दृष्टिपात करता हूँ, तो उनको दिन भर कठोर परिश्रम करके भी रात्रि को सुख निद्रा में सोता हुआ पाता हूँ, वैसी निद्रा किसी लखपती को भी नहीं आती। मजदूर लोग संध्या होते ही खाने पीने से निपट कर गाना बजाना शुरू कर देते हैं और उसमें इतने मस्त हो जाते हैं, कि चिन्ता पास भी नहीं फटकती। किन्तु एक लखपती को रात के बारह बजे भी नींद नहीं आ रही है। एक के बाद दूसरी आवश्यकताओं की चिन्ता तैयार खड़ी है, उन चिन्ताओं का कोई आरपार नहीं। सब प्रकार की सुख सामग्री उसके पास मौजूद है, फिर भी जरूरतों का अन्त नहीं, इसके विपरीत मजदूर गरीबी में भी प्रसन्न है और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं।

बड़े आदमी नित्य नये आविष्कार करके फूले नहीं समाते। जनता समझती है, कि यह जो नित्य नई सुविधाओं का आविष्कार हो रहा है, हमारे लिये आनन्दप्रद होगा। विलास की नवीन-नवीन वस्तुएं बड़ी आकर्षक प्रतीत होती हैं, किंतु परिणामतः वे उससे तृष्णा को ही भड़काती हैं जो आकाश की तरह अनन्त हैं। मनुष्य उसके चक्कर में पड़ कर अपने अमूल्य जीवन को खो बैठता है, वह सुख चाहता है, पर दुख पल्ले पड़ता है। भारतीय ऋषियों ने सारे जीवन को तत्वचिन्तन में लगा कर इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था, कि-”जीवन को संयमित बनाओ, वासनाओं पर विजय प्राप्त करो, जो प्राप्त हो, उसी में संतोष करो, यही शाँति का राज-मार्ग है।” किन्तु आज की सभ्यता उन सिद्धान्तों का उपहास करती है और आवश्यकताओं को बढ़ाने में लगी हुई है, फलस्वरूप चिन्ता और अशाँति के बादल चारों और छाये हुए दिखाई पड़ रहें हैं।

मोटे तौर से यह बात कठिन प्रतीत होती है, कि जिनकी आवश्यकताएं बढ़ी हुई हैं, वे उन्हें क्यों कर घटा सकेंगे। बढ़े हुए खर्चे को कम करना बड़ा दुष्कर कार्य मालूम होता है, पर वास्तव में ऐसी बात नहीं है। जब आप दृढ़निश्चय के साथ आवश्यकताओं की कमी करने में जुट जावेंगे, तो आपको अनुभव होगा कि हमने अनेक अनावश्यक वस्तुओं को व्यर्थ ही आवश्यक समझ रखा था। हमारा गुजारा तो थोड़ी सी वस्तुओं से ही आनन्दपूर्वक हो सकता है। जीवन यापन करने और महान उद्देश्य की प्राप्ति करने के लिये बहुत सा जंजाल जमा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अनुभव बताता है कि सुख संग्रह करने में नहीं, अपरिग्रह में है।

जहाँ तक हो सके कम से कम वस्तुओं द्वारा जीवन-यापन करने का प्रयत्न करिये। ध्यान रखिये जितना ही आप अधिक जमा करेंगे, उतने ही अधिक गहरे दलदल में फंसेंगे। आवश्यकता को बढ़ाने में अशान्ति का और संयमित जीवन में शाँति का तत्व छिपा हुआ है।

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