देना तू मुझको बूँद बूँद!
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(ले. श्री सत्य भूषण योगी)
लेने वालों से खचा द्वार
तू मुक्त हस्त देता सँभार॥
भर देता चपक लवालब तू-
उनके तुझ में है भरा प्यार॥
सच, दाता तेरा कोप बड़ा।
देने का तुझ को शौक बड़ा॥
पर मुझको मत ज्यादा देना-
करके कुछ अपना हदय कड़ा॥
मेरे भविष्य का क्षितिज देख-
देना तू मुझको बूँद बूँद॥1॥
यदि एक बार सकब दे देगा।
सम्भव न फि र रह जाएगा॥
मैं क्या माँगूँगा फि र तुझसे-
तू क्या देगा? पछतायेगा॥
और इतना एक साथ लेकर।
मैं क्या रस पाऊँगा प्रियवर॥
सब पड़ा रहेगा बिना पिये-
प्रिय! बना भार मेरे शिर पर॥
पीलूँ या भार उइाऊँ प्रिय,
देना तू मुझको बूँद बूँद॥2॥
तू बूँद बूँद देता जाए।
तू बूँद बूँद रस बरसाए॥
मैं चातक सा मुँह खोले हूँ-
तू बूँद बूँद हित तरसाए॥
है इसमें दाता का महत्व।
है इसमें याचक का ममत्व॥
अमरत्व यही है देने का-
लेने का सच्चा यही तत्व॥
युग-युग तक है यदि इष्ट प्राण्य,
देना तू मुझको बूँद बूँद॥3॥
यह बूँद बूँद लेती सीपी।
यह बूँद बूँद लेता मधुकर॥
लेता है मधुमय अम्बर से-
यह बूँद बूँद धरती का उर॥
जब बूँद बूँद का रस चाखें,
प्यारे।़ जीने का तभी स्वाद॥
जब चाट चाट कर होट मुझे,
सब पीने वाले रखें याद॥
देखो, क्या कहती हैं आँखें,
देना तू मुझको बूँद बूँद॥4॥
ऊषा ने माँगा है तुझसे,
प्रिय।़ ज्योति भरा विस्तृत-सागर॥
देखो, वह उसमें डूब मरी,
वह सुन पाई क्या जीवन स्वर॥
रजनी ने माँगी है तुझ से,
जग-प्राण ज्योति की बूँद बूँद॥
वह झिलमिल 2 समनों को,
जिससे लख पाए नयन मूँद॥
कुछ जागृत हो कुछ समने हों,
देना तू मुझको बूँद बूँद॥5॥
*समाप्त*

