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कुसंगत में मत बैठो!

पानी जैसी जमीन पर बहता है, उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे बुरे लोगों के अनुसार बदल जाता है। इसलिए चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन अच्छे व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल−मिल जाते हैं और अपने को भी वैसा ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, परन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भर रहती है जहाँ वह उठता बैठता है। आदमी का घर चाहे कहीं भी हो, पर असल में उसका निवास स्थान वह है जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों की सोहबत पसन्द करता है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति के ऊपर निर्भर है। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे काम करे यह बहुत कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, लेकिन धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग से ही उत्पन्न होती है। याद रखो कुसंग से बढ़कर कोई हानि नहीं और सत्संगति से बढ़ कर कोई लाभ नहीं।