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Magazine - Year 1946 - August 1946

Media: TEXT
Language: HINDI
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उषःपान

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(चरक तीर्थ श्री दिगम्बर जी वक्षी)

मुख से औषधि पान करने के अतिरिक्त और भी ऐसे कितने तरीके हैं जिनसे हम अपने शरीर में इष्ट गुणों की परम्परा उत्पन्न कर सकते हैं। तैल-मर्दन, शिरो मर्दन, आदि से हम शरीर में हल्कापन, उत्साह इत्यादि गुणों की वृद्धि देखते हैं, आजकल के चिकित्सकों में सम्भवतः इस धारणा का सर्वथा अभाव ही प्रतीत होता है कि औषधि प्रदान करने के लिए इनके अलावा कोई और भी मार्ग है। पर यदि ठीक तौर से विचार किया जाय तो यह स्पष्ट हो जायगा कि शरीर के प्रत्येक रंध्र से उत्पन्न की हुई गुण-परम्परा समस्त शरीर में फैलकर इष्ट स्वास्थ्य का निर्माण कर सकती है। इस तरह के कई प्रकारों में एक उषःपान भी है।

उषःपान का कार्य नासिका द्वार से ही होता है। नासिका की भीतरी दीवार किंचित आर्द्र होना स्वाभाविक ही है। अगर उसमें कुछ आर्द्रता या शुष्कता मालूम हो तो यह जानना चाहिए कि शरीर में कुछ वैषम्य पैदा हो रहा है। शुष्कता जब अधिक बढ़ जाती है तब उसमें जलन पैदा हो जाती है और बाद में खून भी निकलने लगता है। ये लक्षण शरीर में पित्त-दोष की वृद्धि के सूचक होते हैं। ऐसी अवस्था में उषःपान करना लाभकारी है। पित्त की दाहात्मक अवस्था में उषःपान से विशेष लाभ होता देखा गया है।

उषःपान की विधि

“विगत घन निशीथे प्रातरुत्थाय नित्यं

पिवति खलु नरो यो घ्राणरंधे्रणावारिः।”

तथा-

“अनुदिनं त्वनुदिते रविमण्डले,

विपिति तोय मनुँजलिम मविट्।”

सूर्योदय के पहले नासिका से जलपान करना उषःपान कहलाता है। इसके लिये रात के समय ताँबे के पात्र में जल भर अपने बिस्तर के पास रखते हैं और सुबह उठते ही उस जल को पी जाते हैं रात भर ताँबे के पात्र में जल रहने के कारण उसमें ताँबे का कुछ गुण आ जाता है। तांबे के बर्तन में रक्खा हुआ जल 12 घण्टे के बाद विशुद्ध हो जाता है। चाँदी के बर्तन में रक्खा हुआ पानी और भी विशुद्ध होता है। इस सम्बन्ध में इस बात पर भी विचार रक्खा जाता है कि सवेरे सो कर उठने पर यह पानी पीते समय इस पर ध्यान रखा जाय कि उसका तापमान (Temperature) शरीर के तापमान के बराबर है।

इसके लिए यदि काँच का गिलास हो तो उससे नाक से पानी पीने में सुविधा होती है। सवेरे 4-5 बजे उठकर पहले नाक साफ कर लेना चाहिये और तब पानी से भरे हुए गिलास को नाक के किनारे लगाकर उसी तरह पानी पीना चाहिये जिस तरह से मुँह से पिया जाता है। नाक के भीतर के पृष्ठ भाग में दो झिल्लियाँ हैं। एक झिल्ली में उदर की ओर नलिका गई है। इसके ऊपर वाली झिल्ली में गधवह श्रोतसों के तन्तु आते हैं अगर उषःपान करते समय जरा जोर से पानी खींचा जाय तो इस ऊपर वाली झिल्ली में पानी के छींटे जाते हैं जिससे सिर में झनझनाहट-सी होती है और वह सुन्न हो जाता है। अतः उषःपान करते समय इसका विशेष ध्यान रखना चाहिये कि पानी जोर से न खींचा जाय। पानी को धीरे-धीरे ही नीचे उतारना चाहिये। कुछ लोग उषःपान करते समय थोड़ा-सा नमक भी जल से मिला देते हैं। इससे उसकी दाहशयिकता और भी बढ़ती है। लवण का यह धर्म है कि शरीर में उष्णता को सम रक्खे। शुशलर (Sehuessler) के टिशूरेमेडी (TissueRemedy) वाले लवण का स्वल्प प्रयोग दाह की अवस्था में बड़ी सफलता के साथ किया जा सकता है, यह बात सिद्ध हो चुकी है।

कुछ लोगों का यह विचार है कि उषःपान के बाद फिर सो जाना चाहिये। पर उषःपान के बाद थोड़ी देर के लिए लेटे रहना ही ठीक होगा। उषःपान के बाद विशेष रूप से निद्रा की आवश्यकता हो, ऐसी कोई बात नहीं। सोकर उठते ही हम उषःपान से शरीर के अन्दर जो एक शीत आन्दोलन पैदा करते हैं उसमें बाहर जाने या किसी अन्य काम में लगे रहने के कारण शीतोष्ण का व्यत्यय न आने पाये, यही खास तौर से ध्यान देने योग्य बात है। उषःपान के द्वारा शरीर में उत्पन्न हुई शीत-लहर शरीर में स्थिर हो इसलिए 15-20 मिनट के लिए लेटे रहना लाभदायक है।

उपयोग- यह क्रिया शीतलता उत्पन्न करने वाली होने के कारण पित्त प्रकृति के लोगों के लिए तथा उष्ण प्रदेश में रहने वाले व्यक्तियों के लिए खास तौर से उपयुक्त है। यह गरमी के दिन है। इस ऋतु में नाक से खून निकलने की शिकायत प्रायः हुआ करती है। लू का प्रकोप भी बहुत होता है। इन अवस्थाओं में शरीर की उष्णता बढ़ जाती है जिसका लक्षण दाह के रूप में प्रकट होता है।

यह शरीर की स्वाभाविक गति है कि वह अन्दर की उष्णता को बाहर निकाल देने का प्रयत्न करता है ऐसी हालत में अगर दिन निकलते ही शरीर के अन्दर शीत आन्दोलन रख छोड़े तो उपरोक्त विकार के दूर होने में बहुत कुछ मदद मिल सकती है।

यह देखा गया है कि नाक से खून निकलने की हालत में उषःपान से विशेष लाभ होता है। इस ऋतु में मूत्र कृच्छ की शिकायत भी अकसर देखी जाती है। इस में पेशाब बहुत कम और पीले रंग का होता है और पेशाब करने में जलन-सी होती है। उषःपान से यह शिकायत बिल्कुल जाती रहती है। अधिक लाभ के लिए पानी में कुछ नमक मिलाने की भी कभी-कभी जरूरत पड़ती है। पाव भर पानी में दो रत्ती नमक छोड़ने से काम चल जाता है।

नेत्र विकार- इस ऋतु में नेत्र-विकार अधिकतर उत्पन्न होते हैं। आयुर्वेद में नेत्र को पित्त का स्थान माना गया है। शरीर में पित्त की होने वाली वृद्धि का लक्षण प्रायः नेत्र से प्रकट होता है। जब शरीर में दाह बढ़ता है तो आँखों में जलन होने लगती हैं। आँखें लाल हो जाया करती हैं। किसी किसी को तो जरा-सी धूप में निकलने पर आँखें लाल हो जाने की शिकायत हो जाया करती है। आँख आना इस ऋतु की साधारण बीमारी है। इन सब अवस्थाओं में उषःपान आश्चर्यजनक रूप से लाभकारी सिद्ध हुआ है। उषःपान से शरीर की अनावश्यक गरमी बाहर निकल आती है। उषःपान के उपरान्त खूब साफ पेशाब होना इसके सुन्दर परिणाम का परिचायक होता है।

उषःपान से नासिका के पिछले भाग की झिल्ली में शीतलता उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव मस्तिष्क पर भी पड़ता है। मस्तिष्क के पिण्ड इस शीतलता में पुष्ट होकर अधिक कार्यक्षम बनते हैं। इसलिए प्राचीन ग्रन्थों में उषःपान को फलश्रुति में ‘भवति मति पूर्णः चक्षुषस्ताक्ष्य तुल्यः’ ऐसा वर्णन मिलता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि उषःपान एक सुलभ उपाय है जिसमें एक टके का भी खर्च नहीं। उष्ण प्रदेश में रहने वालों को तो इसका उपयोग जरूर करना चाहिए। गरमी के दिनों में सभी स्त्री-पुरुषों के लिए यह अमृत-तुल्य है।

उष्णकाल समाप्त हो जाने पर यह क्रिया प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयुक्त न होगी क्योंकि उषःपान शीतलता उत्पन्न करता है इसलिए शीतकाल में इस क्रिया का किंचित अनुपयोग ही होगा। अतः शीतकाल में इसका प्रयोग न करना चाहिए और अगर किया भी जाय तो जरा कम करना चाहिए। कफ प्रकृति के व्यक्तियों को ग्रीष्म-ऋतु में भी कुछ कम करना चाहिए। ऐसा देखा गया है कि जहाँ पित्त का कुछ भी सम्बन्ध न हो ऐसी अवस्था में किया हुआ उषःपान उदराग्नि को मन्द कर देता है और शरीर में जड़ता उत्पन्न करता है। - जीवन सखा

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August 1946
Type: TEXT
Language: HINDI
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