अनीति का विरोध होना ही चाहिए।
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
(पं.तुलसी रामजी शर्मा, वृन्दावन)
वर्तमान समय में अनेकों धूर्त, आलसी, प्रमादी, व्यसनी मूर्ख तथा कुमार्गगामी लोग संत पुरुषों का वेष बनाकर अपनी आत्मा को तथा दूसरों को ठगते हैं। ऐसे लोगों के संबंध में जनता की नीति क्या होनी चाहिए? इस प्रश्न पर नीचे के श्लोकों में महत्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है। इस नीति को अपनाने से धूर्तता का शीघ्र अन्त हो सकता है।
नास्ति दानात्परं मित्रमिह लोके परत्रय।
अपात्रे किन्तु यद् दतं दहत्यासप्तमं कुलम्॥
(अत्रि. 149)
अर्थ- इस लोक और परलोक में दान से बढ़कर कोई मित्र नहीं। परन्तु कुपात्र को दिया हुआ दान सात पीढ़ी को नरक में डालता है।
विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणेगृहमागते।
क्रीडन्त्यौषधः सर्वा यास्यामः परमागतिम्।
व्यास. 4।50
विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण के घर आने पर अन्न देवता प्रसन्न होते हैं कि इसके मुख में पहुँचने से हमारी परम गति होगी।
नष्ट शौचे व्रत भ्रष्टे विप्रेवेद विवर्जिते।
दीयमानं रुदत्यन्नं भयाद् वै दुष्कृतं कृतम्॥
व्यास. 4। 51॥
अपवित्र, व्रत-भ्रष्ट, अनपढ़ ब्राह्मण को दिया हुआ अन्न रोता है कि मेरी दुर्गति होगी।
पाखण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकामंछठान्।
हैतुकान् वकवृत्तींश्चवाँग मात्रेणापि नार्चयेत्॥
(मनु. 4।30)
पाखंडी (वेद बाह्य व्रतों के चिह्न-जैसे मनुष्य की खोपड़ी आदि धारण करने वाले) नीच कर्म करने वाले, बिडाल व्रति, कपटी, शठ, कुतर्की, बगुला भगत-ये लोग यदि घर पर आवें तो वाणी मात्र से भी सत्कार न करें।
वेद विद्या व्रतस्नाताञ् श्रोत्रियान्गृहमेधिनः।
पूजयेद्धव्यकव्येन विपरीताँश्च वर्जयेत्॥
वेद विद्या स्नातक, व्रत स्नातक, वेद का जानकार यदि घर आवे तो हव्य कव्य से पूजन करे इनके विपरीत हो उनका सत्कार न करे।
धिग्राज्यं तस्य राज्ञो वै यस्यदेशेऽवुधाजनाः।
पूज्यन्ते ब्राह्मणामूर्खादानमानादिकैरपि॥
(देवी भा. 3।10।39।)
मूर्खा यत्रसुगर्विष्ठा दानमानपरिग्रहैः।
तस्मिन्देशे न वस्तव्यं पंडितेन कदाचन॥41॥
उस राजा के राज्य को धिक्कार है जिसमें दान मानादि से मूर्ख ब्राह्मण पूजे जाते हैं॥39॥
जहाँ दान मानादि से मूर्ख गर्वीले हैं उस स्थल में पंडित को न बसना चाहिए॥41॥
अव्रताश्चानधीयाना यत्रभैक्ष्य चराद्विजाः।
तंग्रामं दंडयेद् राजा चौरभक्तद दंडवत्॥
(अत्रि. 22 पाराशर 1। 66। वसिष्ठ अ. 3। 5)
जिस ग्राम में अव्रती (ब्राह्मणोचित कर्मों से रहित) अनपढ़ ब्राह्मणों का जीवन-निर्वाह भिक्षा द्वारा होता है उस ग्रामवासियों को राजा चोर को भोजन देने वाले के समान दंड दे।
विद्वद् भोज्यमविद्वाँसो येषु राष्ट्रेषु भुँजते।
तेष्वनावृष्टि मिच्छन्ति महद्वा जायते भयम्॥1
(अत्रि. 23 वविष्ठ. 3।23)
जिस देश में विद्वानों के भोगने योग्य पदार्थ को मूर्ख भोगते हैं उस देश में अनावृष्टि होती है अथवा और कोई बड़ा भय उत्पन्न होता है।
इन वचनों के आधार पर यदि सरकार आज कल के भिखारियों पर कुछ दृष्टि डालती है तो क्या बुरा करती है।
सुभुक्तमपि विद्वाँसं धार्मिकं भोजयेद्द्विजम्।
नतुमूर्खमवृत्तस्थं दशरात्रमुपोषितम्॥
कूर्म प्र. 26।63॥
भोजन किये धर्मात्मा विद्वान ब्राह्मण को और भी भोजन करावे परन्तु दश दिन के भूखे दुराचारी मूर्ख को नहीं।
स्मरण रहे कि यही वचन पद्म पु. आदि खंड (57/63) में है।
न्यायागतस्य दव्यस्य वोद्धव्यौ द्वाव तिकमौ।
अपात्रे प्रतिपतिश्च पात्रे चा प्रतिपादनम्॥
(म.भा. शाँ. 26।61)
न्याय पूर्वक पैदा किये हुए द्रव्य का दो प्रकार से दुरुपयोग होता है एक तो सुपात्र को न देना और इससे भी बढ़कर यह है कि कुपात्र देना।
नदद्याद्यशसे दानं नभयान्नेकोपकारिणे।
न नृत्य गीतशीलेभ्यो हासकेभ्यश्चधार्मिकाः॥
(संस्कृत लोकोक्ति)
धर्मात्मा पुरुष यश के लिए दान न करे, न डर से, न उपकारी को न नाचने गाने वाले के लिए, न हंसाने वाले (मसखरे) के लिए। इनको देना वास्तव में दान नहीं।
गानेन न जीविका यस्य यस्यभार्या च पुँश्चली।
परोपतापिनश्चापि दत्तं भवति निष्फलम्॥
नारद पु. 12।9॥
गाने से जिसकी जीविका है, जिसकी स्त्री व्यभिचारिणी है जो अन्यों को दुखदायी है, ऐसे को देना निष्फल है।
नित्ययाश्चा परस्यापि0 (नारद पु.12।7)
अर्थात् नित्य माँगने वाले को देना व्यर्थ है।
कितवान् कुशीलवान् क्रूरान पाखण्डऽस्थाँश्चमानवाँन
विकर्मस्थान् शौण्डिकाँश्च क्षिप्रं निर्वासयेत्पुरात्
(मनु. 9।225)
जुआरी, कुशीलवान् (नाचने गाने वाले) दुष्ट, वेद निन्दक कुकर्मी शराबी इनको शीघ्र ही राजा अपने देश से निकाल दे। क्योंकि-
एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नः तस्कराः।
विकर्मक्रिययानित्यं वाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः॥226॥
ये जुआरी आदि गुप्त चोर राज्य में रह कर अपने बुरे आचरणों से सज्जनों को दुराचारी बना देते हैं।
अपूज्यपूजनाँचैव पूज्यानाञ् चाप्यपूजनात्।
नृ घातक समं पापं शश्व प्राप्न प्रोतिमानवः।
(म.भा. शाँ. 284।17)
निरादर के योग्य का आदर करने से और आदर के योग्य का निरादर करने से मनुष्य हत्या के समान पाप होता है।

