भोजन का चुनाव
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(डा. लक्ष्मी नारायण टंडन, प्रेमी)
दूध, कुछ विशेष अवस्थाओं को छोड़ कर, सर्वोत्तम अहार है। प्रायः सभी आवश्यक तत्व, संतुलित अनुपात से इसमें मौजूद रहते हैं। दूध से उतर कर दही होता है। जिन्हें दूध न पचे वह दही का प्रयोग करे। पेट के रोगियों के लिए मट्ठा तथा मखनियाँ दूध अत्यन्त लाभप्रद होता है। मलाई भी अच्छी चीज है। पर खोया भारी चीज है। पनीर का प्रयोग प्रायः सर्वसाधारण भारतीय नहीं करते। इसमें प्रोटीन बहुत होता है। मक्खन तथा घी भी इसमें निकाला जाता है। वह भी बड़ी लाभ की वस्तु है। गाय, भैंस, बकरी के दूध का ही प्रायः भारतीय प्रयोग करते हैं। इनसे चर्बी तथा गरमी खूब मिलती है।
अनाजों में गेहूँ सर्वोत्तम है। चोकरदार घर की चक्की में पिसा आटा या दलिया सर्वोत्तम है। जौ भी अच्छी चीज है। चावल का प्रयोग भी बंगाल-बिहार-आसाम में बहुत होता है। घर में तैयार किये (मशीन से तैयार नहीं) चावल अच्छे होते है। यद्यपि वह गेहूँ जैसे पोषक तत्व नहीं रखते। चावल खाने वालों को फल तरकारी का प्रयोग अधिक करना चाहिये। दालों में मसूर की दाल सर्वोत्तम है, फिर मूँग की दाल। उर्दू की दाल सब से भारी होती है। दाल भी छिलके लगी खायें। इनसे, स्टार्च प्रोटीन आदि मिलता है।
सोयाबीन, शाक, हरी तथा अन्य तरकारियाँ भी बहुत लाभ दायक होती हैं। कद्दू, बैंगन, घीया आदि का अधिक प्रयोग बादी तथा भारी होने के कारण न करना चाहिये। कच्ची, तरकारी, शाक खाना बहुत अच्छा है जैसे खीरा, ककड़ी हरे चने, टमाटर, गाजर, मूली, गोभी, पता गोभी, फलियाँ, पालक, बथुई, सलाद आदि। तरकारी उबली खाई जाय, छिलकों सहित लें तो अच्छा है। इनमें लवण आदि खूब मिलते हैं।
ताजे फल खाना बहुत लाभप्रद है। अधिक खट्टे और चटपटे फल जैसे कमरख कैथा आदि का प्रयोग अत्यधिक न करे। इनसे लवण पर्याप्त मिलता है।
सूखे मेवे भी बहुत लाभ की चीज हैं। इनमें प्रोटीन खूब मिलता है। इनके सम्बन्ध में पहले कहा जा चुका है।
कुछ हानिप्रद वस्तुएं-
माँस बुरी चीज है। जिसे मारो उसके हृदय की आह कितनी बुरी होती है। इसे जाने भी दीजिये। धर्म अधर्म का विचार मत कीजिये। पर बुड्ढे, रोगी पशुओं का माँस कैसा होगा? मरने के बाद शीघ्रता से कैसे दूषित होता जाता है, माँस देर में हजम होता है यह देर तक आँतों में पड़ा रह कर सड़ेगा तो क्या होगा? गोश्त में जो मृत कोषाणु होंगे उसका हमारे पेट पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इन बातों पर विचार करने से भी माँस त्याज्य ही है। वैसे ही मछली और अंडे के बारे में कहा जा सकता हैं। इनमें प्रोटीन बहुत होता है। यह याद रखिए कि हमारे शरीर को एक सीमित मात्रा में ही इसकी आवश्यकता हैं। शेष मात्र तो यूरिक एसिड के रूप में पेशाब द्वारा निकल जाती है। यदि आवश्यकता से अधिक प्रोटीन खाई जायगी तो जिगर और गुर्दों पर अत्यधिक बोझ में यूरिक एसिड बढ़ेगा, वे रोगी और कमजोर हो जायेंगे। कठिन परिश्रम करने वाले ही यदा कदा इसे हजम कर सकते हैं। सर्वसाधारण नहीं।
शक्कर और गुड़ भी अनुपयोगी हैं विशेष कर सफेद शकर। यह गर्मी देने के अतिरिक्त कुछ नहीं करती। कठिन परिश्रम करने वाले ही इसे खा सकते हैं।
चाय-कहवा, काफी आदि भी कब्ज करते, खुश्की पैदा करते और वीर्य पतला करते हैं। इन्हें आवश्यकता होने पर ही पियें।
बाजार की मिठाइयाँ, डिब्बों के भोजन, बर्फ, मलाई की बर्फ, तथा खटाई-मिर्च तथा मसाले का अधिक प्रयोग भी हानिप्रद है।
सिगरेट बीड़ी तम्बाकू का निकोटीन भी स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है। यह सब रुधिर को दूषित करते, दिल फेफड़े और दिमाग को कमजोर बनाते, वीर्य को पतला करते, सन्तानोत्पादक अंगों में खराबी पैदा करते तथा अनेक रोगों के कारण बनते हैं। जीभ के लिए अपनी आयु को खोना कहाँ की बुद्धिमानी है?

