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Magazine - Year 1952 - Version 2

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बीमारियों का मूल कारण

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(श्री जितेन्द्रिय प्रसाद सिंह वर्मा)

अधिकाँश लोगों में बीमारियों के किसी न किसी कीटाणु से होने का भ्रम फैला हुआ है। वास्तव में मनुष्य बीमार इसलिए पड़ता है कि वह प्रकृति के स्वाभाविक नियमों का उल्लंघन करता है और इस दृष्टि से उसे पशुओं से भी बदतर कहा जा सकता है। मनुष्य की कुछ आदतें ऐसी हैं जो उसे स्वस्थ नहीं रहने देतीं।

मनुष्य के स्वाभाविक ढंग से रहने में उसकी जो आदतें बाधा डालती हैं, उनमें निम्न मुख्य हैं—

(1) भोजन सम्बन्धी बुरी आदतें— बीमारी का सब से मुख्य कारण यह है कि अक्सर मनुष्य उन पदार्थों को नहीं खाता, जिन में शरीर और मस्तिष्क को पुष्ट बनाने वाले तत्व प्रचुर मात्रा में मौजूद रहते हैं। भोजन की अधिकता, भोजन में नियमित समय के बीच अनाप- शनाप खाते रहने तथा उसके सम्बन्ध की अन्य अनियमित आदतों के कारण बीमारियाँ शरीर में डेरा जमाने लगती हैं। लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ने का एक कारण यह है कि लोग भोज्य पदार्थों का सेवन ऐसे रूप में करते हैं, जिसमें कि उनके आवश्यक विटामिन तत्वों और खनिजों का विनाश हो चुका होता है। इसके अलावा यह गलत धारणा बीमारियों के सम्बन्ध में फैली हुई है कि सभी बीमारियां कीटाणुओं के कारण होती हैं। बीमारियों के सम्बन्ध में प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्तों से जो लोग अपरिचित हैं उन में यह भ्रम और भी अधिक फैला हुआ है। इस विषय में स्पष्टीकरण के लिए हमें इस प्रश्न पर कुछ तफसीलवार विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है।

आरम्भ में यह स्पष्ट करना असंगत न होगा कि वस्तुओं में बाजार से ही बहुत सी दूषित चीजें मिली आती हैं, जिनसे मनुष्य के स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ता है मनुष्य भोजन के सिवाय चाय, काफी, शराब इत्यादि पीने की अस्वाभाविक आदतें भी डाल लेता है।

(2) शारीरिक श्रम की कमी।

(3) ऐसी हवा में साँस लेना, जिसमें ऑक्सीजन की कमी रहती है।

(4) मानसिक और शारीरिक श्रम की अधिकता।

(5) दवाई, टीका आदि का प्रयोग।

(6) अनियमित भोग-विलास।

(7) खड़े रहने या बैठने के गलत तरीके।

(8) शराब या तम्बाकू का उपयोग।

(9) मानसिक कुविचार और सोचने की बुरी आदतें।

(10) अप्रत्यक्ष प्रभाव

ऊपर जो बीमारियों के कारण बतलाये गये हैं, उन्हें मनुष्य के अस्वस्थ रहने में मुख्य स्थान दिया जा सकता है। इसके अलावा कुछ अन्य अप्रत्यक्ष कारण भी हैं जैसे अपच, कब्ज, छूत लगना अनिद्रा इत्यादि। इनका महत्व गौण इसलिए है कि यह उपर्युक्त कारणों के परिणामस्वरूप हैं, जिनके विषय में सतर्क रहने से हम इनके खतरे से भी बच सकते हैं।

अक्सर लोगों के मन में एक और भ्रम है कि प्राकृतिक चिकित्सक यह नहीं मानते कि कीटाणु होते ही नहीं। इसमें तनिक भी सन्देह के लिए स्थान नहीं है कि हवा, जिसमें हम साँस लेते हैं, भोजन, जिसे हम खाते हैं, पानी जिसे हम पीते हैं, कीटाणुओं से परिपूर्ण हैं। इनके अस्तित्व से भी हम इनकार नहीं करते। परन्तु इनकार हम इस बात से करते हैं कि कीटाणु बीमारी के कारण नहीं होते हैं, वास्तव में कीटाणु बीमारी के कारण नहीं होते।

इस सिद्धान्त से सभी प्राकृतिक चिकित्सक भी सहमत हैं कि बीमारियों में उनके कीटाणु वर्तमान रहते हैं। हमारा कहना तो यह है कि बीमारियों में मनुष्य के शरीर में उक्त कीटाणुओं की मौजूदगी इस बात का प्रमाण नहीं है कि कीटाणु ही उन बीमारियों के कारण हैं। बीमारियों के समय मनुष्य के शरीर में जो अन्य विकार प्रवेश करते हैं, उनमें कीटाणु भी हैं।

यह कहने की आवश्यकता हम नहीं समझते कि यदि कीटाणु बीमारियों के वास्तविक कारण होते तो बीमारियों के आरम्भ होने के पूर्व ही वे शरीर में मौजूद रहते, किन्तु ऐसा वास्तव में होता नहीं। यह एक अनुभव सिद्ध बात है। कभी-कभी कीटाणु न रहने पर भी लोगों में बिमारियों के लक्षण प्रगट होने लगते हैं। कितने ही प्रसिद्ध डाक्टरों ने इस सत्य को स्वीकार किया भी है किन्तु यह प्रश्न अभी विवादास्पद है। डॉ. आर. एल. वाटकिन्स ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि लोगों को तपेदिक होने के पूर्व उनके शरीर में उस बीमारी के कीटाणु मौजूद रहने का कोई भी प्रमाण नहीं मिलता। डॉक्टरों की तरफ से दावा किया जाता है कि तपेदिक के कीटाणु खून के जरिये स्नायुओं में प्रवेश कर जाते हैं, किन्तु प्रयोगात्मक रूप से खून में कीटाणु कभी भी नहीं पाय गये।

शारीरिक शक्ति का महत्व :- कीटाणुशास्त्र- विशारदों के बड़े बड़े ग्रन्थों में इस बात को मान लिया गया है कि अक्सर मनुष्यों के शरीर में बीमारियों के कीटाणु ऐसी अवस्था में भी पाये जाते हैं, जब कि उन्हें ये बीमारियाँ होती ही नहीं। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि बीमारियाँ कीटाणुओं के कारण नहीं होती। कहा जा सकता है कि यदि कीटाणु वास्तव में बीमारियों के कारण होते तो किसी के लिए उन बिमारियों से मुक्त रहना ही असम्भव हो जाता क्योंकि हवा से कीटाणुओं को नष्ट किया जाना किसी प्रकार सम्भव नहीं है। संक्रामक बीमारियों के विषय में लोगों में सब कार्य इस आधार पर किये जाते हैं कि जिन कीटाणुओं से वे फैलती हैं, उससे बचना चाहिए। परन्तु देखा यह जाता है कि शहर या नगर में बीमारी फैलाती है उसमें के अधिकाँश व्यक्ति उससे मुक्त रहते हैं और उसका आक्रमण केवल कुछ ही व्यक्तियों पर होता है।

डॉक्टरों की तरफ से कहा जाता है कि कीटाणु जो प्रत्येक व्यक्ति पर आक्रमण नहीं करते इसका कारण यह है कि कुछ व्यक्तियों में अन्य की अपेक्षा अवरोध शक्ति अधिक होती है और इसीलिए वे बीमार भी नहीं पड़ते। कीटाणु-शास्त्र के ज्ञाताओं का कहना है कि स्वस्थ शरीर में बीमारी के प्रति अवरोध शक्ति अधिक होती है, इस कारण कीटाणु उसमें पनपने नहीं पाते। दूसरे शब्दों में उन का कहना है कि कीटाणुओं को-फैलने फूलने के लिए आवश्यक जमीन की आवश्यकता होती है। डॉक्टर लोग जब इस परिणाम पर पहुँचते हैं तो प्राकृतिक चिकित्सक यदि यह कहें कि बीमारी कीटाणुओं के कारण नहीं, बल्कि “शरीर की विशेष अवस्था” के कारण होती है तो इनमें अनुचित ही क्या है।

कीटाणु हानिकार नहीं होते :- कनाडा के एक प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. जोन फ्रेजर ने अपने एक लेख में “क्या बीमारियाँ कीटाणुओं के कारण होती है?” अपने प्रयोगों का विवरण देकर उपरोक्त सिद्धान्तों से सत्य को प्रमाणित कर दिया था। कीटाणु खतरनाक हैं या नहीं इस प्रश्न को स्पष्ट करने के लिए टोरन्टो में सबसे अधिक काम हुआ है। सन् 1911,1912 और 1913 के 3 वर्ष तो केवल इसी बात का प्रयोग करने में निकल गये कि कीटाणुओं का आक्रमण कब होता है। वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुँचे कि बीमारी आरम्भ होने के बाद ही कीटाणु प्रगट होते हैं। इससे यह परिणाम निकला कि कीटाणु बीमारी के परिणाम स्वरूप होते हैं और शायद वे हानिकर भी नहीं होते।

सन् 1914 में कुछ नागरिकों ने इस सिद्धान्त को प्रमाणित किये जाने के लिए अपनी सेवाएं देने का अनुरोध किया। तब इस बात का पता लगाने के लिए कि कीटाणु हानिकारक होते हैं या नहीं कुछ लोगों को ताजे और तेज भोजन और पानी में मिला कर दिये गये। इन लोगों के मित्रों और सम्बन्धियों ने उनके इस कार्य का कड़ा विरोध किया और कहा कि यह अपने सिर पर आप ही आफत मोल लेना है।

पहले प्रयोग में डिप्थीरिया के (गले की झिल्ली में सूजन होने पर साँस लेने में कठिनाई होने का रोग) 50,000 कीटाणुओं को पानी में मिला कर पिया गया। कुछ दिन की प्रतीक्षा के बाद देखा गया कि बीमारी के कोई लक्षण उस व्यक्ति में नहीं दिखलाई दिये। डिप्थीरिया की बीमारी के कीटाणुओं पर सबसे पहले इसलिए प्रयोग किया गया कि इन्हें दबाने के लिए अचूक औषधियाँ अविष्कृत हो चुकी हैं। दूसरे प्रयोग में इसी बीमारी के हजारों कीटाणुओं को एक व्यक्ति के गले, जीभ, और नयनों में लपेट दिया गया, फिर भी बीमारी के कोई लक्षण प्रगट नहीं हुए। चूँकि इन कीटाणुओं का सन्तोषजनक रूप से प्रयोग हो चुका था इसलिए अन्य बीमारियों के कीटाणुओं के भी प्रयोग आरम्भ किये गये। निमोनिया के कीटाणुओं को करोड़ों की संख्या में दूध, पानी, रोटी, आलू और माँस के साथ मनुष्यों को खिलाया गया और उन्हें उभारने के प्रयत्न भी हर तरह से किये गये, फिर भी कोई परिणाम न निकला। बीमारी के कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति में नहीं पाये गये।

अन्य प्रयोग टाइफ़ाइड बुखार के कीटाणु पर हुए। स्वच्छ पानी, दूध, रोटी और आलू में बीमारी के करोड़ों कीटाणु मिला दिये गये किन्तु उनके भक्षण से किसी भी व्यक्ति को टाइफ़ाइड नहीं हुआ। गरदन तोड़ बुखार के करोड़ों कीटाणुओं को नथुने, गले, जीभ में लिपटाया गया और साथ ही भोजन में भी मिलाया गया किन्तु इससे कुछ भी परिणाम नहीं निकला।

इन प्रयोगों के आधार पर प्राकृतिक चिकित्सक इस सिद्धान्त पर पहुँचे हैं कि कीटाणु बीमारियों के कारण नहीं हैं, बल्कि बीमारियाँ शरीर की विशेष अवस्थाओं के कारण होती हैं।

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