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Magazine - Year 1955 - October 1955

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Language: HINDI
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गायत्री उपासना से अनेक संकटों की निवृत्ति

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भयानक संकटों से प्राण रक्षा (श्री प्रसादीलाल शर्मा, ‘दिनेश” कराहल)

मैं एक नितान्त गरीब ब्राह्मण का बालक हूँ। मेरे बचपन बड़े ही कष्ट से− कभी−कभी कई दिन तक भूखे और कभी अधपेट खाकर बीते हैं। पहले भी मैं अनियमित रूप से गायत्री जप किया करता था, किन्तु जब से किसी पवित्र प्रेरणा द्वारा मैं संयम−नियम सहित गायत्री उपासना करने लगा, तब से हमारे संकट क्रमशः हटते ही गये और आज 150) डेढ़ सौ रुपये मासिक हमारी आय है। पत्नी, सन्तान, भाई आदि सारा परिवार सुखी और स्वस्थ है। सभी शान्ति और प्रेम से जीवन अतिवाहित कर रहे हैं।

मैंने गायत्री महा विज्ञान में पढ़ा था:—

“भगवान की अनेक शक्ति यों में ‘गायत्री भी एक दिव्य शक्ति है, जिसकी उपासना करने से अनेक कठिन से कठिन संकट भी टल जाते हैं और अभीष्ट मनोरथों की प्राप्ति होती है। “आज अपने अनुभव के बल से मैं उपरोक्त वाक्यों की सत्यता की घोषणा करता हूँ कि वे अविकल−सम्पूर्ण सत्य हैं। मैं अभी तक अनेकों गायत्री अनुष्ठान कर चुका हूँ। अन्तर और बाहर के अनेकों अनुभव जीवन में रत्न की भाँति संरक्षित हैं। उनमें से दो−एक अनुभव, उपासकों के विश्वास को स्थिर करने की भावना से लिख रहा हूँ।

विक्रमी सम्वत् 2011 के चैत्र नवरात्रि में, मैं सवा लक्ष का अनुष्ठान सम्पूर्ण करके उठा ही था कि स्वप्न में माता ने मुझे आदेश दिया कि पुनः सवा लक्ष का अनुष्ठान गंगा के पुनीत−तटों पर जाकर करो। माता का आदेश पालन करने के लिये मैं चुपचाप श्रावण मास में, घर में किसी से बिना कुछ कहे ही हरिद्वार चला आया। यहाँ ब्रह्मकुण्ड पर कुछ समय ठहर कर अनुष्ठान प्रारम्भ कर दिया। कुछ दिन जप करने के उपरान्त मेरी इच्छा गंगा−पुलिन पर ही जप करते हुए आगे बढ़ने की हुई और बद्रीनारायण एवं केदारनाथ जप प्रति दिन गंगा किनारे ही पूरी करता था। वर्षा ऋतु थी, अतः वारिस के कारण कभी−कभी गिरिखण्ड, टूट कर लुढ़कते-2 नीचे आ गिरते थे, जिनके नीचे पिच कर अनेकों तीर्थ यात्री स्वर्ग प्रस्थान कर जाते थे। मैंने ऐसे होते हुए कई बार अपनी आँखों देखा, फिर भी माता के भरोसे साहस पूर्वक आगे बढ़ता ही रहा। देव प्रयाग में मुझे बलदेव प्रसाद जी तथा उनकी भगिनी का साथ मिल गया, जिससे मेरे संयम−नियम एवं जप में बड़ी सहायता मिली। केदार नाथ जाते हुए कुण्ड−चट्टी का एक पर्वत−खण्ड टूट कर गिर पड़ा। दोनों ओर के यात्री खड़े होकर यह भयंकर दृश्य देख रहे थे। खंड गिरने के बाद लघु प्रस्तर−खंड लुड़क−पुड़क कर बराबर गिरते जा रहे थे। रास्ता बन्द हो गया। सभी यात्री खड़े थे। मैंने माता के भरोसे गायत्री जप करते हुए पत्थरों के नीचे—टूटे हुए पहाड़ के बगल से चल दिया। सभी यात्री मुझे मना कर रहे, पर मुझे तो माता पर विश्वास था—सुरक्षित उस पार पहुंच गया। वहाँ सामान रख कर पुनः बलदेव जी तथा उनकी बहिन को लेने गया और उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ा। वे दोनों भयभीत से मेरे पीछे आ रहे थे। सहसा ही एक बहुत बड़ा पत्थर ठीक मेरे शिर पर गिरा। दोनों ओर के यात्री यह देख कर एक बार ही हाहाकार कर उठे। मैं गायत्री जप करता हुआ निश्चिन्तता से ही चलता रहा। ठीक जिस समय प्रस्तर खंड मेरे शिर पर गिर मुझे चूर−चूर कर देते, उस क्षण मैं एक थोड़े से झुके प्रस्तर−खण्ड के नीचे आ गया। बड़ा पत्थर का टुकड़ा, उसी से आ टकराया और उछल कर गंगा की धारा में जा पड़ा। सारे यात्री हर्षित−विस्मित स्वर में नारायण,नारायण पुकार रहे थे।

इस भाँति सुरक्षा सहित तीनों व्यक्ति केदार नाथ का दर्शन कर वापस लौटे। गणेश चट्टी पर ठहरा हुआ था। प्रातः काल का समय था। काफी वर्षा हुई। सर्वत्र पानी ही पानी नजर आता था। वर्षा बंद होते ही हम तीनों उसी पानी में छप−छप करते हुए चले। कुछ दूर आने पर एक नाला ऊपर से गिरता हुआ मिला। हम लोग उसकी ओर बिना ध्यान दिये ही पूर्ववत् गति से आगे बढ़ते गये। सुभद्रा (बलदेव जी की बहन) इस समय आगे थी। नाला की धारा में पैर रखते ही वह गहरी जलधारा में गिर गयी एवं बहती हुई गंगा की तीव्र−प्रचण्ड धारा की ओर जाने लगी। मैं यह सोच रहा ही था कि उसका जीवन समाप्त हो चुका कि मैं भी एक प्रस्तरखंड से टकराकर उसी तीव्र नाले की धारा में जा गिरा। मेरा एक हाथ उसकी कमर जा पड़ा। मैंने उसकी साड़ी जोर से पकड़ ली। जल में अचानक धँसते ही जिस भाँति सुभद्रा माँ! माँ! कह कर चिल्लायी थी, मैं भी उसी भाँति सहसा माँ! माँ! कह कर पुकार उठा। सहसा ही लगा कि किसी ने हम दोनों को उठा कर, नाला के उस पार, गहरे जल से, छिछले जल में डाल दिया। सुभद्रा का भाई बलदेव जी तथा अन्य यात्री प्रसन्न और स्तम्भित थे। हम दोनों उठे और अगली चट्टी पर आकर ठहरे। उनके भाई एवं अन्य यात्री उस दिन नाले के इस पार आने का साहस नहीं कर सके। फिर दूसरे दिन हम सभी एक साथ मिले।

दूसरी चैत्र नवरात्रि में सरकारी कामों में बझे होने के कारण अनुष्ठान नहीं कर पाया—सोचा, पूर्णाहुति के दिन मैं भी गायत्री तपोभूमि मथुरा जा कर पूर्णाहुति कर आऊँगा। नवरात्रि का छठा दिवस था। उस दिन हम सभी कार्य के सिलसिले में एक धर्मशाला में ठहरे हुए थे। ब्राह्मी मुहूर्त्त की पवित्रता फैल रही थी, उसी समय अचानक ही मेरी नींद टूट गई। आँखें खोलकर देखा तो सामने एक परम स्वच्छ रूपवती कन्या खड़ी है। मेरे नेत्र खोलते ही वह कन्या अति माधुर्य भरी वाणी से कहने लगी—“पहले पुष्कर जाकर मेरे दर्शन कर आओ, तब गायत्री तपोभूमि जाना।” मैं कुछ पूछना ही चाहता था कि कन्या लुप्त हो गई। यह जाग्रत सपना की याद आज भी मेरे अन्तर में हलचल मचा जाता है।

मैंने उसी दिन अपने घर में पुष्कर जाने के लिये तार दिया। मेरी पत्नी तथा तीन मेरे अन्य साथी अपनी−अपनी पत्नी और बच्चों सहित वहीं मोटर पर आ गये। सबों के संग प्रसन्नता से पुष्कर की यात्रा की।

रास्ते में मेरे एक अबोध नाती को चेचक हो गया और एक ही दो दिन में उसने भयंकर रूप धारण कर लिया। यहाँ तक कि हम लोग उसके जीवन से निराश हो गये।

माता की कृपा से एक धर्मशाला में हमें ठहरने का स्थान मिल गया। वहाँ घर से भी अधिक सुविधा का स्थान था। हमने उस बच्चे को उसी दशा में छोड़कर माता के भरोसे वहाँ से पुष्कर क्षेत्र के लिये चल दिया। परिवार के कुछ लोगों को बच्चे के साथ छोड़ आये। नवरात्रि के दिन ही वहाँ जाकर स्नान, दर्शन, जप, हवन किया। रात में स्वप्न में मुझे कहा गया—बच्चे स्वस्थ हो गये, तुम निश्चिंत रहो। पुष्कर राज से लौटने पर मैंने धर्मशाला में आकर आश्चर्य से देखा−कल का मरणासन्न शिशु आज किलकारियाँ भर रहा है।

बोलिये गायत्री माता की जय।

सिंह के चंगुल से बचा [श्री॰ गोविन्द प्रसाद शर्मा शिवपुरी]

मैंने एक बार सवालक्ष तथा दूसरी बार चौबीस हजार के गायत्री अनुष्ठान किये हैं। इससे मुझे जो लाभ, और अनुभव हुए हैं, उसे मैं ठीक उसी प्रकार प्रकट करना नहीं चाहता, जिस प्रकार लोभी व्यक्ति अपना धन छिपाता है।

शिवपुरी के अनेक गायत्री उपासकों के जो लाभ, हमारी जानकारी में आये हैं, उन्हें लोकहित के लिये प्रगट कर रहा हूँ।

पं॰ रामदास शर्मा ( शिवपुरी ) अपने नव दाम्पत्य—जीवन में पारस्परिक−कलह और विग्रह से अत्यन्त ही व्यथित और दुःखी रहते थे। किसी सद्प्रेरणा से उन्होंने इसकी शान्ति के लिये गायत्री उपासना प्रारंभ कर दी। कुछ ही दिनों में दोनों के हृदय में रुका हुआ प्रणय—श्रोत फूट पड़ा और दो सरिताओं के संगम की भाँति वे एक घास बन कर बहने लगे। क्रोध और कलह के स्थान में सद्भावना, प्रेम और सेवा की वृत्ति संस्थापित हो गई। वे सीता राम के दाम्पत्य को आदर्श बना कर चल रहे हैं।

एक दिन वे सरकारी काम से एक गांव जा रहे थे। रास्ते में अचानक ही एक झाड़ी से शेर निकल कर, उनके सामने खड़े हो गये। उन्होंने समझ लिया, अब तो प्राण की रक्षा करना मेरी शक्ति से बाहर की बात है। ऐसा सोच वे उसी स्थान पर खड़े होकर गायत्री-जप, ग्राह-ग्रसित-गज की भावना में करने लगे। शेर भी कुछ देर तक सामने गुर्राता रहा- फिर सहसा ही उसने छलांग मारी और दूर के किसी झाड़ियों की आड़ में चला गया।

ऐसे संकट के अवसर पर‍ सिवाय माता के और कौन अपने पुत्र के प्राण बचा सकती है?

श्री माधो प्रसाद जी (शिवपुरी) संग्रहणी रोग से संक्रमित थे। अनेकों चिकित्सकों से अनेकों प्रकार की चिकित्सा करायी, पर रोग मुक्त नहीं हो सके। चिकित्सकों ने यह कह दिया यह असाध्य संग्रहणी है। यह इसके प्राण के संग ही जायगी। यह सुनते ही उनकी स्नेहप्लुता—पत्नी−श्री श्री लाड़ो देवी की आँखें वर्षा की धारा सी बह चली, पर मुख से ‘आह’ तक भी नहीं निकली। पता नहीं किस प्रेरणा से वह मन ही मन गायत्री माता की शरण गयी और उपासना में तल्लीन हो गयीं। सभी ने आश्चर्य से देखा कि—मृत्यु घोषणा के दूसरे ही दिन उसके दस्तों की संख्या में काफी कमी हो गयी। उस दिन से दशा सुधरती ही चली गई। उसके चिकित्सक आज भी पूछते रहते हैं कि किस औषधि से तुम्हारी असाध्य संग्रहणी आराम हो गयी? यह सुनकर उसकी पत्नी की आंखों में, माता के प्रति कृतज्ञता के आँसू उमड़ पड़ते हैं और टप—टप कर पृथ्वी के सूखे रज—कणों को गीली करने लगते हैं।

श्री भँवर सिंह की पत्नी गुलाब बाई (शिवपुरी) को अपने परिवार के अन्य लोगों से सदैव झगड़ा होता ही रहता था, इससे वह अपने जीवन से ही घबड़ा उठी थी। उन्होंने अपने आर्त्त-हृदय से गायत्री माता की प्रार्थना और जप करना शुरू किया, कुछ ही दिनों में वातावरण ऐसा बदल गया कि अब सबों को सबसे मिलकर ही रहने में रस आने लगा था। झगड़ा और कलह में अब किसी को रुचि ही नहीं रह गई।

श्री॰ देवी सिंह की पत्नी श्री॰ सावित्री बाई (शिवपुरी भूत बाधा से− कई वर्षों से कष्ट भोगती आ रही थी। एक दिन संयोग से इस सम्बन्ध में उसने बातें की। मैंने उसे विधिवत् गायत्री उपासना करने कहा। उस त्रस्त— भयभीत नारी ने उपासना प्रारम्भ कर दी और आज वह भूत बाधा से सदा के लिए मुक्त हो गयी हैं।

गायत्री माँ ने काल से बचाया। (श्री॰ बैजनाथ प्रसाद सौनकिया दिगौड़ा)

पूज्य आचार्य जी ने मुझे चैत्र नवरात्रि में गायत्री तपोभूमि मथुरा आने का अनुग्रह प्रसाद दिया था, पर मैं प्रारब्ध वश उत्पन्न परिस्थिति को लाँघ कर वहाँ नहीं जा सका। फिर भी गायत्री माता की अज्ञात प्रेरणा से हम चौदह उपासकों ने मिलकर दिगौड़ा के जगदम्बा मन्दिर में 24000 चौबीस हजार मन्त्र जपने का संकल्प प्रत्येक ने लिया और निष्ठा सहित जप करने लगे। प्रति दिन उस मन्दिर में बैठ कर अपना—अपना जप पूरा कर सभी घर जाने।

31 मार्च [1955] को जप करने के उपरान्त मैं घर आया तो दोपहर हो गयी थी। धूप तीखी हो रही थी। मैंने शीघ्रता के विचार से उस दिन केवल चावल पका लेने का ही निश्चय किया। रसोई घर में बैठ चूल्हा जलाया और चावल सिद्ध होने के बाद मैंने सोवा कि केवल भात [सिद्ध चावल] कैसे खाया जायगा, अतः अन्दर से थोड़ा गुड़ ले आना चाहिये। मेरे बगल में ही लालटेन रखा हुआ था। मैंने लैंप जलाया और उसे लेकर गुड़ लेने चला। उस समय मुझे इसकी जरा भी सुध नहीं थी कि यह दोपहर दिन है और इस समय लैम्प जला कर, पथ देख कर चलना और इसके प्रकार में आवश्यकता की वस्तुएं ढूंढ़ने की कोई जरूरत नहीं है। और आश्चर्य तो यह कि उस घर में जाते और आते समय मैंने अब तक कभी रात में भी प्रकाश का सहारा नहीं लिया और आज मैं अनजाने में ही दिन को लैम्प जला कर, जिस भाँति कोई रात में पय देख कर चलता है, उसी भाँति गुड़ लाने जा रहा था। जब गुड़ वाले घर के देहली पर गया तो देखा कि उसके प्रवेश द्वार पर एक सर्प बैठा हुआ जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रहा हो। मैंने जैसे ही सर्प को घर के दरवाजे पर बैठा हुआ देखा कि मुझे अचानक ही दिन को लैम्प जलाना, रात की भाँति पथ देख—देख कर चलना और गायत्री माता की कृपा का एक साथ ही ज्ञान हुआ और सर्प देखकर भागने के स्थान मैं में ठठाकर हँस पड़ा और उल्लास में भर कर ताली पीटने लगा। सर्प महाराज पता नहीं किधर भाग गये।

उस दिन स्थानीय सभी उपासकों ने मिलकर एक सभा की आयोजना की और उस सभा में गायत्री माता का गुण−गान, उनकी महत्ता, उनके द्वारा होने वाले मानव जीवन के कल्याणों की विस्तृत चर्चा—भाषणादि हुए।

मैं भी यह सदैव सोचा करता हूँ कि यदि गायत्री माता की कृपा से मैंने दोपहर दिन में लैम्प जलाने की मूर्खता न की होती तो आज मैं अकाल मृत्यु ग्रस्त होकर किसी अन्य ही लोक का भोग कर रहा होता।

मृत्यु संकट से रक्षा (श्री मदन नरेश राम देव पूना)

मेरे गाँव से तीन कोश की दूरी पर श्री सुन्दरा देवी का स्थान है। यह हमारे प्रान्त का सुप्रसिद्ध स्थान है। मैं इसे गायत्री माता का ही रूप मानता हूँ। एक दिन मैंने दर्शन करने का निश्चय लिया। वर्षा ऋतु थी । जिस दिन प्रातः जाने का विचार निश्चित था उसके रात में ही काफी बारिश हुई थी, अतः हमारे साथ जाने वालों में से सभी ने, पहाड़ की चढ़ाई और फिसलन के भय से आना निश्चय बदल लिया। मैंने उस दिन दर्शन करने का अविचल संकल्प कर लिया था, अतः मैं माताजी जाने की सारी तैयारी करके माता के चरणों में प्रणाम कर गायत्री जपते हुए चल पड़ा। गाँव के अनेकों व्यक्ति यों ने वर्षा के समय जल की धारा में वह जाने तथा पहाड़ से फिसल गिरने का मय, जो कि वास्तविक ही था, मुझे दिखाया पर मैंने अपने मातृ दर्शन का निश्चय बदलना अनुचित समझा और प्रस्थान कर ही दिया। सभी खिसक गये पर मेरे साले (पत्नी के भाई) ने बड़े ही साहस और प्रेम से मेरा साथ दिया। तीन मील चलने से उपरान्त शेष तीन मील पहाड़ की ही चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। पहाड़ पर चढ़ने के प्रथम एक सरिता की धारा को पार करना पड़ता है, यह धारा कभी सूखती नहीं। इस नदी में वर्षा के जल से सहसा ही वेग से बाढ़ आती है और पार होने वालों को बहा ले जाती है। हम दोनों ने भोजनादि सामान, वस्त्र एवं पूजा स्वाध्याय की वस्तु सिर पर रखीं और नदी में उतर पड़े। नदी का लगभग अधिकाँश भाग पार कर चुके कि सहसा ही भयंकर वेग से नदी में बाढ़ आयी। हम दोनों माता का स्मरण करते हुए किसी भाँति किनारे पर आ गये। उलट कर देखा तो चार पुरुष उस भयंकर प्रवाह में बहते हुए जा रहे थे, जिसे अपना प्राण देकर भी बचाने का उपाय नहीं था।

माता की कृपा से इस मृत्यु धारा से हम दोनों ऊपर निकल आये। अब आगे दो पहाड़ों के मध्य से होकर जाने का पथ था। हम लोगों ने आगे चलने के लिये सोचा और पहाड़ के ऊपर दृष्टि दौड़ाई। देखा तुरत ही घनघोर बादलों से घिरकर पहाड़, रात से भी अधिक श्याम बन गया और मूसला धार होकर फिर आकाश स्वच्छ हो गया। कुछ ही देर फिर बादलों के दल, वही घनघोर कालिमा, वारिस और पुनः प्रकाश का आगमन। यह क्रम वहाँ निरन्तर चल रहा था। देख कर एक बार चित्त काँप उठा पर माता की सहायता की याद आते ही फिर साहस से भर उठा और आगे की ओर चल दिया। वारिस के कारण भयंकर आवाज के साथ पहाड़ के शिखरों से अनेकों धारा बहती चली जाती हैं। हमने ऐसी भयावह स्थिति देखने की तो कोई बात ही नहीं, कल्पना भी अपने जीवन में नहीं की थी। माता की कृपा की आशा से ही आगे बढ़ता जा रहा था। कुछ दूर जाने के बाद देखा कि आगे मन्दिर तक जाने के लिये अत्यधिक वर्षा के कारण कोई भी रास्ता नहीं रह गया था। फिर पीछे की ओर देखा तो अब लोटने का भी उपाय नहीं था। तब हम दोनों ने भी निश्चय किया कि यदि हमें मरना ही बदा है तो माता के दर्शनों के लिए चलते हुए ही हम प्रसन्न हृदय से मौत का भी आलिंगन कर लेंगे पर दर्शन किये बिना हर्गिज—हर्गिज नहीं लौटेंगे। गायत्री जप करते हुए हम रास्ते से 50 गज ऊपर पहाड़ पर चढ़ते हुये ही चलने लगे। कभी कभी ऊपर की जल धारा सीधे हमारे शिर पर गिरती थी, उस समय हृदय में माँ की याद लिये साहस पूर्वक पत्थर पकड़ते हुए हम पार कर जाते थे। माता की कृपा से उस समय हमारे हृदयों में इतना उत्साह उमड़ा पड़ता था कि इससे चौगुने संकट का भी हम लोग सामना करने में जरा भी नहीं घबराते—वरन् और भी हमारा साहस एवं उत्साह बढ़ जाता। सचमुच एक भयंकर संकट आकर उपस्थित ही हो गया। आगे लगभग 20 गज ऊपर से जल की मोटी धारा इतनी तेजी से गिरती थी, कि उसे सुरक्षा पूर्वक पार कर लेने में मानव शक्ति शायद ही सफल हो पाती। उसे भी पार करने में हम लोग जैसे बिना बल लगाये ही सुरक्षा सहित सफल हो गये। इसके आगे पुनः एक खतरा आया। एक धारा जिसकी चौड़ाई तो थोड़ी थी पर उसका वेग इतना तेज था कि हमारे पास जो लाठी थी उसे हम अपना सारा बल लगा कर भी, उस जल में स्थिर नहीं कर पाये। अब क्या हो? हम दोनों ने लाठी और सभी सामान खूब जोर से उस पार फेंक दिया और तैर कर सीधे उस पार लग गये। लगा जैसे गुलाब का पुष्प बहकर इस पार से उस पार चला गया हो।

अब एक मील की दूरी रह गयी थी। वारिस भी क्रमशः हल की होती जा रहा थी। कुछ दूर बढ़ने पर देखा कि एक भयंकर पहाड़ी सर्प दौड़ता हुआ हमारी ओर ही आ रहा था। हम लोग कहाँ भागते, खड़े रहे, वह दौड़ता आया हमें कुछ भी बिना क्षति पहुँचाये नजदीक से ही निकल गया। अब हम मन्दिर पहुँच चुके थे। मन्दिर के पुजारी जी ने हम लोगों के इस समय पहुँचने की बात असम्भव मान कर अत्यन्त आश्चर्य किया और हम लोगों को तब आश्चर्य हुआ जब कि हमने मन्दिर पहुँच कर देखा कि सिवाय ऊपरी वस्त्र के, उसमें बन्धी पूजा सामग्री, भोजन सामान (आटा आदि) तथा पुस्तकें, सम्पूर्ण की सम्पूर्ण सूखी ही थीं।

वर्षा छूट जाने के कारण हम निर्विघ्न रूपेण घर वापस लौटे।

स्मरण मात्र से प्राण रक्षा (अम्बादास पन्ढरीसा. भावसार)

शुक्रवार ता॰ 8−4−55 के दोपहर की घटना है। “श्री गायत्री आश्रम, खण्डवा” का साइनबोर्ड फ्रेम निर्माण कर्त्ता की दुकान से लाने जा रहा था। दुकान समीप थी। मैं गायत्री स्मरण में आनन्द मग्न होता सा जा रहा था। वहाँ, एक मदोन्मत्त सांड़, जा बिना अपराध के ही सामने वालों को अपनी झोंक में, सींग से उठा कर फेंक देने का अभ्यासी था, मेरे पीछे जोरों से दौड़ता हुआ आया और मेरी पीठ में सींग लगाया, किन्तु न जाने माँ गायत्री ने उसके अन्तर में कौन सी प्रेरणा दी कि मेरे शरीर का स्पर्श करते ही वह पीछे हट गया और मुझे छोड़, मेरी बगल से आगे आकर एक साइकिल वाले को जोरों से ठोकर दे दिया। उस बेचारे को चोट तो लगी किंतु कोई विशेष खतरा नहीं हुआ।

यह घटना क्षण मात्र में ही हो गयी। मैं सोचता हूँ, यदि उस समय मैं गायत्री का स्मरण नहीं कर रहा होता, तो वह उन्मत्त सांड़, मेरी कचूमर निकाल देता और मैं किसी अन्य ही लोक का वासी हो गया होता।

आज माता के प्रति मेरा हृदय कृतज्ञता से भरा हुआ है, सोचता हूँ मैं अब इस जीवन को गायत्री माता की सेवा में समर्पित कर सकूँ तो मेरे और शायद सबों के लिये बड़ा कल्याणकारी सिद्ध हो।

नास्तिक से आस्तिक बन गया (श्री सदा शिव कृष्ण बोंडखे, खाम गाँव)

मैंने अपने इतने दिन के जीवन में, कभी देवी−देवताओं तथा भगवान का अस्तित्व स्वीकार नहीं किया। मेरे पेट में रोगों ने अपना स्थायी निवास बना लिया था। उसने अपने बाहुबल से अनेकों चिकित्सकों की औषधि सेना का विनाश कर, अपना घर आबाद रक्खा था। मैं इन संघर्षों से ऊब गया था। चुपचाप रोग देव का कटु तीव्र दंशन सह लिया करता। मेरी पत्नी ने बड़े ही स्नेह स्निग्ध−स्वर में कहा—भगवदाराधन करो, तभी तुम्हारे रोग दूर होंगे। मैंने उसे हँसी में उड़ा दिया। साथियों ने समझाया, तो उसका उपहास किया।

एकबार हमारे यहाँ के सेक्रेट्री महोदय श्री गायत्री तपोभूमि मथुरा से हो आये और यहाँ आकर गायत्री मन्त्र की बड़ी 2 महिमा हमें बतायी। मैंने उसका तीव्र प्रतिवाद किया। इस पर उन्होंने कहा—कि तुम इसका प्रयोग करके परीक्षण कर सकते हो। इस वाणी में उनकी सारी श्रद्धा−शक्ति केन्द्रित थी। मैंने भी इस बार, जाँच के तौर पर ही सही, उसे स्वीकार किया और नित्य−नियमित जप करने लगा। मैं स्वयं विस्मित था कि कैसे और क्यों स्वयं ही मेरे पेट के रोग एवं आर्थिक तथा अन्य समस्यायें स्वतः ही सुलझने लगीं थीं, जिन्हें मैं अपना सारी बुद्धि एवं अन्य शक्ति लगा कर भी सुलभ न कर पाया था?

आज मैं सबों का उपहास सह कर भी कट्टर आस्तिक हूँ और दुनिया के सभी नास्तिकों को चुनौती देता हूँ कि आप सभी गायत्री महामंत्र का परीक्षण करें।

रोग, किले को छोड़ कर भाग गया है। आज वहाँ गायत्री माता की कृपा रूप स्वास्थ्य देव स्वयं विराजमान हैं।

श्री गणपत विठोवा, खामगाँव के परिवार के एक न एक व्यक्ति सदा किसी न किसी रोग से ग्रसित ही रहते। कितने रुपये खर्च किये गये, कर इस क्रम में कोई अन्तर न आया। यहाँ तक कि आर्थिक दशा भी अब खर्च करने योग्य नहीं रही। इन्होंने भी उसी महामन्त्री की प्रेरणा से गायत्री उपासना प्रारम्भ की और कुछ ही दिनों में पारिवारिक रोगों के साथ आर्थिक कष्टों से भी छुटकारा पा गये।

श्री शुकदेव भाव जी होनाले, खाम गाँव के बाहु की एक पसली में भयंकर चमक, पीड़ित करता रहता था। पुष्कर औषधियों से उसका उपचार तीन चार वर्षं तक होता रहा, पर लाभ नहीं। उक्त उच्च अधिकारी के कहने से इन्होंने भी गायत्री उपासना प्रारम्भ कर दी और आज स्वस्थ होकर गायत्री माता की महत्ता का गुण गान कर रहे हैं।

प्रमेह दूर हुआ (ले.−श्री राम सूचित वर्मा, सिकोहना, बाराबंकी)

मैंने बचपन में कुचाल तथा अनुचित आहार−बिहार से अपनी जवानी की तेजस्विता खो दिया। तरुणाई की मस्ती, शक्तिमत्ता एवं स्वाभाविक उल्लास मेरे लिये कल्पना की वस्तु ही रह गई।

प्रमेह ने असमय ही मेरे शरीर को जीर्ण−शीर्ण कर दिया। मैंने इस महारोग से छुटकारा पाने के लिये अनेकों वैद्यों और डाक्टरों की शरण ली। सभी ने आश्वासन दिया−−विश्वास दिलाया, पर चिकित्सा से रोग घटने के स्थान में बढ़ता ही चला गया। पत्र−पत्रिका के विज्ञापनों को देख उस औषधियों को मंगा कर भी प्रयोग किया, पर कभी लाभ के दर्शन नहीं हुए।

एक दिन हमारे मित्र हरि प्रसाद वर्मा मिले। उन्हें मेरी दशा देख, सुन और जान कर बड़ी करुणा उत्पन्न हुई। उन्होंने प्रेम पूर्वक मुझे समझाकर 24000 गायत्री उपासना करने के लिये प्रोत्साहित किया। मरता क्या न करता? मैं तो सचमुच अपने जीवन की आशा दिनों−दिन खोता जा रहा था। सारे विधि−विधानों के पालन सहित मैं गायत्री अनुष्ठान में लग गया। कुछ ही दिनों में मेरे अन्तर में अद्भुत साहस और शक्ति का संचार हुआ। लगा कोई दिव्य शक्ति मुझमें वर्षा की सरिता की तरह बढ़ती ही जा रही है। मेरा रोग धीरे−धीरे नष्ट होने लगा। उपासना में आकर्षण भी बढ़ता गया और आज मैं माता की कृपा से पूर्ण आरोग्य लाभ कर जवानी का—का अनुभव करने लगा हूँ। ऐसी कृपा माता के सिवाय और कौन कर सकती है?

मेरा पुत्र, जो अभी तीन वर्ष 6 महीने का है, बचपन से ही रोगी, पिलपिला, कभी पेट फूलना, कभी बुखार आना, लगा ही रहता था। मैंने उसके स्वास्थ्य की कामना से भी गायत्री उपासना की और माता की कृपा उस शिशु के शरीर में निर्मल−सबल स्वास्थ्य बनकर खेल रही है। हम उसे देख माता के करुणा−वात्सल्य की याद कर लिया करते हैं।

भूत बाधा से छुटकारा (श्री शिवशंकर शर्मा, शिवपुरी.)

लगभग दो वर्ष हुए, मुझे अखण्ड ज्योति पढ़ने को मिली। उससे प्रभावित होकर मैं अखण्ड ज्योति का ग्राहक बना। आचार्य जी से अपने जीवन को सफल बनाने का मार्ग पूछा। उन्होंने श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना करने का आदेश दिया। मैंने तदनुसार माता की उपासना आरम्भ कर दी। माता की कृपा से मेरे स्वभाव एवं विचारों में सात्त्विकता का संचार हुआ और मन में अत्यधिक शाँति उत्पन्न हुई छवढ़ा निवासी श्री मेरुलाल जी की पत्नी गंगाबाई भूत बाधा सताया करती थी। उसने मुझसे कहा। मैंने आचार्य जी का नाम ले गायत्री मन्त्र से उसे झाड़ा लगाया और मन्त्र से अभिमन्त्रित जल पिलाया। इस प्रकार गायत्री माता की महान अनुकम्पा से उसको भूत बाधा से छुटकारा मिल गया। एक दिन अचानक श्री कल्यान प्रसाद की धर्म पत्नी फूल कुँवारी को भूत का सामना करना पड़, जिससे वह बेहोश हो गई। मैं पहुँचा और उसको गायत्री मन्त्र− अभिमन्त्रित जल पिलाया एवं उसी से झाड़ा लगाया। कुछ मिनटों के बाद वह पूर्ण स्वस्थ हो गई। माता की उपासना का ऐसा ही फल होता है। मेरा विश्वास दिन पर दिन दृढ़ हो रहा है। आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी मेरी उन्नति हुई है। विवेक बुद्धि का विकास हुआ है।

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October 1955
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