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Magazine - Year 1961 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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मानव के अनुकरणीय आदर्श

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पाप का फल भोगना पड़ता है।

प्रसिद्ध चीनी यात्री फाहियान जब बालक था तो उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक बौद्ध मठ में भेज दिया। मठ में धर्म-शिक्षा के साथ खेती भी की जानी थी और उसका कार्य मठ के निवासी हो करते थे। एक दिन फाहियान अन्य बालकों के साथ एक धान के खेत को काटने के लिए भेजा गया। जब वे धान को काट रहे थे तो कुछ चोर बल पूर्वक वहाँ घुस आये और उन्होंने बालकों को डरा कर वहाँ से भगा दिया। पर फाहियान वहाँ से नहीं हटा, थोड़ी दूर पर खड़ा होकर कुछ सोचने लगा। चोरों ने सोचा कि वह अकेला क्या कर सकता है, अतः उसकी तरफ ध्यान न देकर उन्होंने तमाम फसल काट डाली और गट्ठर बाँध कर ले जाने को तैयार हुये। यह देखकर फाहियान बोला-भाइयों आपकी आधी से अधिक अवस्था समाप्त हो चुकी है। इस प्रकार का पाप कर्म करने से परलोक से आपको क्या गति होगी? पिछले जन्म में जो पाप किये थे उनके फल से आज दरिद्रावस्था से पड़े हो। अब फिर वैसे ही कर्म करके अपने लिए विष वृक्ष क्यों बो रहे हो?” फाहियान इतना कह कर मठ की तरफ चल दिया, पर उस छोटे बालक की बातों का चोरों के मन पर इतना असर हुआ कि वे कटे हुए धान को वहीं छोड़ गये और सदा के लिए चोरी को त्याग दिया।

वीरता का सम्मान।

दक्षिण भारत में एक छोटा सा राज्य बल्लारी नाम का था। एक बार महाराज शिवाजी की सेना ने उस पर आक्रमण किया। बल्लारी के सैनिक जी जान के लड़े, पर अल्प-संख्या में होने के कारण उनकी पराजय हुई। शेष सैनिक बन्दी कर लिये गये और उन्हीं में वह की शासिका रानी मलबाई थी। वीरता का आदर करने वाले महाराज शिवाजी ने उसको सम्मान पूर्वक ला ने की आज्ञा दी। पर मलबाई को बन्दिनी दशा में यह सम्मान बुरा लगा ओर उसने शिवाजी से कहा कि-मैं तो इस सम्मान के व्यवहार को अपमान की तरह समझती हूँ। आप मुझे एक हारे हुए शत्रु के नाते मृत्यु दण्ड दें।” शिवाजी महाराज ने सिंहासन से उतर कर स्वयं उसका अभिवादन किया और कहा-आप जैसी वीर रमणियों का मैं अपमान नहीं कर सकता मेरी माता जीजाबाई का हाल ही से देहावसान हो गया है। मैं उन्हीं की वीर-प्रकृति का दर्शन आपसे कर रहा हूँ ओर अब से मैं सदैव आपको माता के समान ही मानूँगा।” मलबाई के नेत्र स्नेह वश मर आये उसने कहा-तुम वास्तव में छत्रपति हो, तुमसे अवश्य ही धर्म और देश की रक्षा होगी।”

आदर्श चरित्र बल

बुन्देलखण्ड के महाराज छत्रसाल बड़े प्रजापालक थे। वे स्वयं नगर में घूमकर प्रजाजनों से उनके सुख दुःख की बात पूछते रहते थे और यथाशक्ति सब प्रकार से उनको सुखा करने की चेष्टा करते थे। एक दिन उनकी सुन्दर और तेजस्वी मूर्ति को देखकर एक नारी मोहित हो गई और उसने उनके पास जाकर कहा-महाराज मैं बड़ी दुखी हूँ।”

महाराज के आश्वासन देने पर उसने कहा-मैं सन्तान हीन हूँ और चाहती हूँ कि मेरे आप जैसा ही पुत्र हो।”

उसके वासनात्मक कथन का सुनकर थोड़ी देर के लिए तो छत्रसाल स्तब्ध रह गये। फिर विचार कर कहने लगे-आपको मेरे समान पुत्र चाहिये, तो मैं इसके लिये प्रस्तुत हूँ। आज से आप मेरी माता हुई और मैं सदा आपका इसी प्रकार सम्मान करूँगा

कर्तव्यपालन का अपूर्व उदाहरण

भारत के अन्तिम हिन्दू-सम्राट पृथ्वीराज युद्ध क्षेत्र से घायल होकर पड़े थे। उनको इतने अधिक घाव लगे थे कि वे न तो उठ सकते थे और न खिसक सकते थे। उस समय वे मूर्छितावस्था में पड़े थे। उसी दशा में कुछ गिद्ध उनका मुर्दा समझ कर खाने के लिये आगे बड़े। महाराज के एक प्रधान सामन्त सयमराज भी पास ही घायल अवस्था में पड़े थे वे भी घावों के कारण उठ नहीं सकते थे, पर वे होश हवास में थे, जब उन्होंने गिद्ध को पृथ्वीराज की तरफ आते देखा तो उनका स्वामिनिष्ठा का भाव उमड़ पड़ा और कोई उपाय न देखकर उन्होंने अपने बगल में पड़ी तलवार उठा ली और अपना माँस काटकर गिद्धों की तरफ फेंकने लगे। गिद्ध पृथ्वीराज को छोड़कर उन्हीं टुकड़ों को खाने में लग गये। इतने में पृथ्वीराज के बचे-खुचे सैनिक उनको ढूँढ़ते हुये वहाँ आ पहुँचे। उस समय तक सयमराज मरणासन्न हो गये थे और कुछ ही क्षणों में उनके प्राण पखेरू उड़ गये। पर कर्तव्य पालन के लिए उन्होंने जो अपूर्व आत्मबलिदान किया उससे उनका नाम आज तक अमर है।

कर्तव्यनिष्ठा का पुरस्कार

बादशाह अब्बास अपने एक पदाधिकारी के यहाँ दावत में गये। वहाँ उन्होंने और सब साथियों ने इतनी मदिरा पीली कि किसी के होश हवास दुरुस्त नहीं रहे। नशे की झौंक में बादशाह खड़ा हो गया और उस पदाधिकारी के अन्नपुर की और जाने लगा। पर दरवाजे पर उस पदाधिकारी का नौकर इस प्रकार खड़ा था कि उसे हटाये बिना बादशाह भीतर नहीं घुस सकते थे। उन्होंने नौकर से कहा-अभी यहाँ से हट जा वरना मैं तलवार से मेरा सिर उड़ा दूँगा।”

नौकर ने सिर झुकाकर कहा-हुजूर मेरे देश के स्वामी है, इस लिये मैं आप पर हाथ तो उठा नहीं सकता। पर यह निश्चय है कि आप मेरी लाश पर पैर रखकर ही भीतर जा सकेंगे। पर याद रखिये कि भीतर जाने पर बेग में तलवार लेकर आपक्त मुकाबला करेगा, क्योंकि जब उनकी अज्जत पर हमला किया जायेगा तो वे अपना बचाव जरूर करेगी।”

बादशाह का नशा सेवक की खरी बातों को सुन कर ठण्डा पड़ गया ओर वे वापस चले गये। दूसरे दिन उस पदाधिकारी ने बादशाह से कहा-मेरे जिस नौकर ने कल आपके सामने बेअदबी की थी, उसे मैंने दण्ड स्वरूप अपने यहाँ से निकाल दिया है।

बादशाह ने कहा-यह तो बहुत अच्छा हुआ। मैं उसे आपसे भाग कर अपने अंगरक्षकों का सरदार बनाना चाहता था। बस अब आप उसे बुलाकर मेरे पास भेज दीजिये।” सच्चे व्यक्ति की कदर सभी जगह होती है।

न्याय रक्षा।

ईरान का बादशाह नौशेरवाँ एक दिन शिकार खेलते हुये दूर निकल गया। दोपहर का समय हो जाने से एक गाँव के पास डेरा डालकर भोजन की व्यवस्था की गई। अकस्मात् मालूम हुआ कि नमक नहीं है। इस पर सेवक पास के घर में जाकर थोड़ा सा नमक ले आया। बादशाह ने उसे देखकर पूछा “नमक के दाम दे आये?” उसने उत्तर दिया-इतने से नमक के दाम क्या दिया जाय?” नौशेरवाँ ने फौरन कहा-अब से आगे कभी ऐसा काम मत करना ओर इस नमक की कीमत इसी समय जाकर दे आओ। तुम नहीं समझते कि अगर बादशाह किसी के बाग से बिना दाम दिये एक फल ले लें तो उसके कर्मचारी बाग को ही उजाड़कर खा जायेंगे नौशेरवाँ की इसी न्याय शीलता ने उसके राज्य की जड़ जमा दी और आज भी शासकों के लिए उसका आचरण आदर्श स्वरूप माना जाता है।

साधना की सफलता का मार्ग

वैराग्य होने के पश्चात् गौतम बुद्ध ने कई वर्ष तक जंगल में रहकर बड़ा कठोर तप किया। वहाँ उनका आहार लग-भग बन्द ही हो गया था। इससे शरीर सूखकर अस्थि-चर्म मात्र रह गया था। पर इतने पर भी आत्मज्ञान नहीं हुआ और इससे उनका चित्त भ्रमित रहता था।

एक दिन गौतम के तपस्या स्थान के पास होकर नगर की कुछ गायिकाएँ निकली। वे मार्ग में एक गीत गाती हुई चली जा रही थी, जिसका आशय यह था कि-वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो, अन्यथा उनसे मधुर स्वर नहीं निकलेगा। पर उनको इतना खींचो भी मत कि वे टूट जाय।”

इस गीत की ध्वनि गौतम के कान में पड़ी तो अकस्मात उनको अपनी भूल का पता लग गया। सुफल प्राप्त करने के लिये अत्यधिक कष्टपूर्ण तपस्या उचित नहीं, वरन् संयमित आहार, विश्राम, निद्रा आदि का जीवनयापन करने से ही साधना पूरी हो सकना सम्भव है। चाहे साँसारिक लक्ष्य हो और चाहें आध्यात्मिक सफलता के लिये मध्यम मार्ग का अनुसरण करना उचित है।

श्रेष्ठ शासक की कसौटी।

सम्राट अशोक ने अपने जन्म दिवस के उत्सव के दिन घोषणा की कि “आज उस प्रांतीय शासक को पुरस्कृत किया जायेगा। जिसको गत वर्ष का शासन कार्य सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगा।”

उत्तरीय प्रान्त के शासन के कहा-मैंने अपने प्रदेश के आय को पूर्व शिक्षा तिगुना कर दिया है।” दक्षिण विभाग के शासन कर्ता ने बतलाया-पहले वर्षों की अपेक्षा मैंने दुगुना सुवर्ण राज्य कोष में जमा करने को भेजा है” पूर्व वाले अधिकारी ने निवेदन किया-मैंने अपने प्रदेश के उपद्रवकारियों का भली प्रकार से दमन करके वहाँ के शासन को सुदृढ़ बना दिया है।” पश्चिम वाले कहने लगे-मैंने प्रजा से प्राप्त होने वालों कर में वृद्धि की है, शासन व्यय को घटाया है और राजस्व को बढ़ाने की सब प्रकार से चेष्टा की है।”

अन्त में मध्य देश के अधिकारी ने उठकर कहा-महाराज मैं तो राजस्व को बिलकुल नहीं बढ़ा सका वरन् गतवर्ष पहले की अपेक्षा बचत कम रही है। पर इस बीच में प्रजा की सुविधा के लिए अनेक चिकित्सालय, धर्मशालाएँ, विद्यालय, जलाशय आदि का निर्माण कराया गया है और कुछ कष्टदायक कार्यों को भी कम कर दिया गया है।”

अशोक ने अंतिम शासनाधिकारी के कर्तव्य से प्रसन्न होकर उसे पुरस्कृत किया ओर अन्य लोगों को समझाया कि केवल आय को बढ़ाने का ध्यान रखना ही पर्याप्त नहीं है। प्रजा के सुख-समृद्धि की वृद्धि करना शासनकर्ता का सर्व प्रथम कर्तव्य है। इसी मार्ग का अनुसरण करने से हमारा राज्य स्थायी हो सकता है।

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