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Magazine - Year 1968 - Version 2

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अपना सम्मान आप स्वयं ही करें

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जीवन की सर्वोपरि सफलता इसी बात में है कि मनुष्य अपने लिए सम्माननीय स्थिति प्राप्त करे, संसार से धनी, निर्धन, विद्वान, मूर्ख, निर्बल, बलवान सभी को एक दिन जाना पड़ता है। वह जो कुछ धन-दौलत, वैभव-विभूति, सुख-दुःख उपार्जित करता है, सब यहीं इसी संसार में छूट जाता है। कुछ भी साथ नहीं जाता है। साथ यदि कुछ जाता है तो जाती है वह शाँति-अशाँति, सुख-दुःख, श्रेष्ठता-निकृष्टता आदि जो मनुष्य के कर्मों के अनुसार आत्मा में संचित होती रहती है।

आत्मा में अशाँति और असंतोष का ताप लेकर जाने वाले परलोक में भी लोक जैसी ही दुःखदायी स्थिति पाते हैं। और जो शाँति-संतोष का सुखदायी अमृत आत्मा में संग्रह करके जाते हैं, वे लोक की तरह परलोक में भी आनन्द और उल्लास की स्थिति के अधिकारी बनते हैं। इस वाँछनीय सुख-शाँति और संतोष का अमृत उस सम्मान से भी संचय होता है, जो मनुष्य अपने सत्कर्मों द्वारा अर्जित करता है और जो जीवन की सफलता का द्योतक बन कर लोक-परलोक को शीतल बनाता है। इसीलिये सम्माननीय स्थिति को मानव-जीवन की सर्वोपरि सफलता माना गया है।

जीने को तो संसार में ऐसे लोग भी जीते और खाते-कमाते हैं, जिन्हें लोग अपने पास आने देने तक में संकोच करते हैं। मुख पर भला-बुरा कहते हैं। नाम आते ही घृणा से थूक देते हैं। मुँह लगाना और बात करना पसंद नहीं करते। और यथासम्भव उन्हें बहिष्कार की स्थिति में रखने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार का हेय और निर्लज्ज जीवन, जीवन नहीं कहा जा सकता। जीवन तो वास्तव में उन लोगों का है, जिन्हें देखते ही लोग फूल की तरह खिल उठते हैं। बन्धुजन की तरह स्वागत करते हैं। नाम आते ही बड़ाई करने लगते हैं। और जिनसे व्यवहार करने में आत्म-गौरव और अहोभाग्य का अनुभव करते हैं। ऐसा सम्मानपूर्ण जीवन ही जीवन है। जिसे हर मनुष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। मनुष्य होकर जो अपने लिए मनुष्यों के बीच अनादर और तिरस्कार अर्जित करता है, वह मनुष्य नहीं बल्कि मनुष्य के नाम पर एक कलंक ही होता है। मनुष्य जीवन की शोभा और सार्थकता इसी बात में है कि उसे सम्मान और गौरव के फूलों से सुन्दर और सुरक्षित बना कर रक्खा जाय।

संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने धन-वैभव और पद-प्रतिष्ठा के कारण सम्मानित होते दिखलाई देते हैं। सैकड़ों लोग उनके दरबार की हाजिरी देते और आदाब बजाते रहते हैं। सामने आते ही नमस्कार करते, उठ कर आवभगत दिखलाते और हाँ-हुजूरी के साथ चापलूसी की झड़ी लगा देते हैं। किन्तु इसके साथ पीठ पीछे आलोचना करते, नापसन्दी और घृणा प्रकट करते हैं। इस प्रवंचना में पड़े लोग यदि अपने को सम्माननीय स्थिति में समझते हैं, तो भारी भ्रम है। लोग स्वार्थ, भय, लोभ अथवा किसी विवशता के कारण उन्हें दिखावे का सम्मान देते रहते हैं। उनके मन में उनके लिये किसी प्रकार का आदर नहीं होता है।

सच्चे और वास्तविक सम्मान की स्थिति में तो वे लोग होते हैं, समाज के सम्मान व्यक्ति, बिना किसी लोभ, लालच अथवा विवशता के, जिनका आदर करते हैं और वही भाव पीठ पीछे रखते हैं जो मुख पर प्रकट करते हैं, जिनको सम्पन्नता और विपन्नता दोनों अवस्थाओं में मित्रों ही नहीं शत्रुओं तक से आदर-सम्मान मिलता रहे, वे ही महाभाग वास्तविक रूप से सम्माननीय स्थिति में माने जायेंगे। निश्चय ही यह बड़ी गौरव और गरिमापूर्ण स्थिति होती है।

इस प्रकार की सम्माननीय स्थिति धन-दौलत पद, स्थान, अधिकार, सत्ता अथवा बल-बुद्धि के आधार प्राप्त नहीं होती है। यह प्राप्त होती है सदाचरण सद्भावनाओं के द्वारा। जो सत्पुरुष मन, वचन व कर्म से किसी का अनिष्ट नहीं करता, किसी को धोखा नहीं देता, किसी को प्रताड़ित नहीं करता, किसी को दुःख नहीं देता, किसी के साथ अनुचित व्यवहार नहीं करता, बल्कि इसके विपरीत यथासम्भव सेवा करने, सहायता पहुँचाने, प्रेम, दया और सहानुभूति देने के लिए तत्पर रहता है वही समाज में सच्चे सम्मान का अधिकारी बनता है। जो नम्र उदार और भद्र व्यक्ति है, जो अधर्म, अकर्मों और अनर्थ का हेतु नहीं बनता, जो अपने व्यवहार, व्यापार और कर्मों में सत्य और ईमानदारी की प्रतिष्ठा करता है, समाज के हित और कल्याण में जो निष्ठावान बना रहता है, उस देवपुरुष का सम्मान भला कौन न करेगा?

इस प्रकार जन-मन में अपने लिये आदरपूर्ण स्थान बना लेने वाले सत्पुरुष बदले में उससे ऐसी श्रद्धा और ऐसी सद्भावना पाते हैं, जो उनके मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य के लिये अमृत के तुल्य गुणकारी होती है। जिसके फलस्वरूप वह सम्मानित व्यक्ति हर स्थिति में आत्म-पुष्ट, आत्म-प्रसन्न और आत्मानन्दित बना रहता है। लोगों की श्रद्धापूर्ण सद्भावनायें आनन्द की अव्यक्त तरंगों की तरह निरन्तर उसकी ओर बहती रहती है, जिन्हें उसकी पुलकित आत्मा ग्रहण करती और अनुदिन पुष्ट होती रहती है। लोगों के उज्ज्वल भाव उसके मन और बुद्धि में प्रकाशित होकर उसे आलोकित बनाते रहते हैं और अधिकारी आपसे-आप, मानव से महामानव और पुरुष से महापुरुष बनता जाता है।

प्रायः लोगों को अपने प्रति यह भ्रम होता है कि वे समाज में सम्मान के योग्य हैं किन्तु समाज उन्हें समुचित सम्मान नहीं देता है। वास्तव में यह बात बड़ी विचित्र-सी लगती है कि कोई व्यक्ति सम्मान के योग्य हो और समाज उसको सम्मान न दे। जब समाज में तिरस्कार योग्य दुष्ट व्यक्तियों का अधिकार- लाँछन और तिरस्कार मिलता ही रहता है, तब उसी समाज से सम्मान योग्य व्यक्ति का सम्मान न मिले यह बात समझ में आने वाली नहीं है। यदि समाज में इस प्रवृत्ति का अभाव होता कि तिरस्कार के योग्य को तिरस्कार दे और सम्मान के योग्य को सम्मान तो निश्चय ही संसार में न तो कोई तिरस्कृत दिखलाई देता और न सम्मानित। सारे लोग न जाने किस प्रकार की एक ही स्थिति में दिखलाई देते। जबकि ऐसा है नहीं। समाज में हर जगह तिरस्कार के योग्य व्यक्ति तिरस्कृत और आदर के योग्य व्यक्ति स्पष्ट रूप से आदृत दिखलाई देते हैं। तब सम्मान न मिलने की शिकायत करने वालों के साथ ही समाज ऐसा अन्याय क्यों करता? इस प्रसंग में अवश्य ही कोई भूल अथवा भ्रम काम कर रहा होता है।

अच्छा हो कि सम्मान न मिलने की शिकायत करने वाले पहले आत्म-परीक्षण करके यह देख लें कि वास्तव में वे समाज में सम्मान पाने के सच्चे अधिकारी हैं भी या नहीं। क्योंकि कभी-कभी मनुष्य को दंभ अथवा अहंकार के प्रतिघात के कारण यह भ्रम पैदा हो जाता है कि वह सम्मान योग्य है पर समाज उसे सम्मान न देने का अन्याय कर रहा है। इस आत्म-निरीक्षण का सबसे उचित उपाय यह है कि व्यक्ति लोभ, मोह आदिक विकारों से मुक्त और निरहंकार होकर अपने अन्दर दृष्टि डाले और देखे कि क्या वह अपनी दृष्टि में स्वयं सम्मानित है या नहीं है, यदि वह ईमानदारी से यह पता लगा लेता है कि वह अपनी दृष्टि में स्वयं सम्मानित नहीं है, तो समाज से सम्मान न मिलने की शिकायत नहीं करनी चाहिये क्योंकि वह इस योग्य नहीं होता।

जो अपनी दृष्टि में स्वयं सम्मानित नहीं है वह समाज की दृष्टि में भी सम्मानित नहीं हो सकता। मनुष्य अपनी दृष्टि में जिस प्रकार का होता है, समाज भी प्रायः उसे उसी दृष्टि से देखता है। व्यक्ति और समाज की मानसिक प्रतिक्रियायें लगभग एक जैसी ही होती हैं। और यदि इसके विपरीत मनुष्य आत्म-निरीक्षण से इस परिणाम पर पहुँचता है कि वह अपनी दृष्टि में सम्मानित है तो अवश्य ही उसकी शिकायत ठीक है। समाज सम्मान न देकर उसके साथ अन्याय कर रहा है।

लेकिन प्रसंग यहीं पर समाप्त नहीं हो जाता है। आगे यह देखना होगा कि उसका निर्णय सही भी है या नहीं। माना सम्मान न मिलने की शिकायत करने वाला व्यक्ति परोपकारी, परमार्थी, सेवाग्रामी, सद्भावों और सत्यनिष्ठ है। वह सम्मान पाने की सारी शर्तें पूरी करता है। तथापि यदि सारे सत्कर्मों और सद्भावों के साथ उसकी कोई कामना जुड़ी है, तब भी वह उस दिव्य स्थिति की योग्यता में कमी रखता है। धन दौलत, लाभ-लोभ की कामना न होते हुए भी यदि प्रतिकार में सम्मान मिलने की वाँछा भी उस स्थिति की योग्यता कम कर देती है। सच्चे और आत्म-संतोषदायी सम्मान पाने के लिये इस वाँछा के त्याग करने की सीमा तक निष्काम रहना पड़ता है। मौन, मूक और निस्पृह सत्कर्मों के धनी ही समाज से वह सच्चा और सार्थक सम्मान पाते हैं, जिसकी प्राप्ति आध्यात्मिक साधना के समान ही आत्म-तत्व को प्रसन्न और परिपुष्ट करती है।

इन सब योग्यताओं के होते हुए भी यदि किसी को उसका अधिकृत सम्मान नहीं मिलता तो कहना होगा कि समाज उसे समझने में प्रमाद कर रहा है अथवा गतिविधि के साथ उसके मानसिक स्तर को परख रहा है। क्योंकि कभी-कभी मनुष्य बहुत समय तक जब तक उनके सत्कर्म सम्मान के रूप में फलीभूत नहीं होते बड़े ही निःस्वार्थ और निस्पृह बने रहते हैं। किन्तु ज्योंही वे उस अहंकार उत्पन्न कर देने वाली स्थिति में पहुँचते हैं, विचलित हो जाते हैं और अपनी उस प्रतिष्ठा को अर्थागम का स्रोत बना कर भुनाने लगते हैं।

अस्तु समाज का दिया हुआ वह प्रसाद अपवित्र होकर दोनों के लिये अहितकर बन जाता है। व्यक्ति तो स्वार्थ का आखेट होकर आत्मा का हनन करने लगता है और समाज उसके शोषण का लक्ष्य बन जाता है। अस्तु समाज अपना सम्मान-भाव एक बड़ी परीक्षा लेने के बाद ही देता है। और यही नीति दोनों के लिए ठीक व कल्याणकारी भी है।

इस कठोर परीक्षा में उत्तीर्ण होने का उपाय यही है कि मनुष्य परमार्थ और परोपकार के सम्मानदायक कामों को परिणाम-हीन कर्तव्य समझ कर करे। यद्यपि कोई भी कार्य कारण और परिणाम से रहित नहीं होता तथापि अपनी उच्च मनोभूमि की सहायता से परिणाम की ओर से विरत अथवा विस्मरणशील किया जा सकता है, यह कोई असम्भव अथवा असम्भाव्य बात नहीं है। यदि यह बात असम्भव होती तो न तो शास्त्रों में निष्काम कर्म का उपदेश होता और न सर्वसाधारण में यह लोकोक्ति ही प्रचलित होती- ‘‘नेकी कर कुएँ में डाल।’’

‘‘जीवन को सम्माननीय स्थिति में रखना, सर्वोपरि सुखद अवस्था है। क्योंकि उसमें सुस्वाद और पौष्टिक आध्यात्मिक खुराक प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है। सात्विक, पुष्टिकर आहार ठीक रीति से यदि प्राप्त होता जाये तो शरीर की बल-वृद्धि होती है, स्फूर्ति आती है, अंग सुदृढ़ होते हैं। जीवन-शक्ति बढ़ती है और तेज बढ़ने लगता है। इसी प्रकार यदि आत्म-सम्मान का सात्विक पोषण पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होता रहे तो मानसिक स्वास्थ्य की उन्नति होती है। बुद्धि बढ़ती है, सद्गुण विकसित होते हैं। कार्य शक्ति उत्पन्न करती है और बड़ी बाधाओं को पार करता हुआ, वह सफलता के उन्नति शिखर पर तीव्रगति से बढ़ता जाता है। अपने आपसे और दूसरों से प्राप्त सम्मान से प्रभावित वातावरण उसके मानसिक स्वास्थ्य की पुष्टि करेगा। प्रसन्नता, संतोष, शाँति, स्थिरता, आनन्द से उसका चित्त उमंगे लेता रहेगा। यह जीवन ही उसके लिये स्वर्ग होगा, भले ही वह धन-दौलत की दृष्टि से गरीब बना रहे।’’

सम्माननीय स्थिति प्राप्त करना जीवन की सर्वोपरि सफलता है। उसे पाने के लिये मनुष्य को परिणाम की ओर से विस्मरणशील बन कर परमार्थ परोपकार से प्रेरित सत्कर्म करते हुये सत्यनिष्ठ जीवन-यापन की पद्धति अपना कर चलना चाहिये। इस प्रकार का नीतिवान पुरुष सहज ही में लोक और परलोक दोनों को विजय कर लेता है।

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