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Magazine - Year 1968 - Version 2

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माँसाहार घृणित और मानवता के विरुद्ध है

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कहने को तो आज-कल पढ़े-लिखे सुशिक्षित व्यक्ति भी इस युग को सभ्यता और संस्कृति के विकास का युग मानते हैं, पर वस्तुस्थिति ठीक इससे विपरीत है। यदि अधिक चमकीले वस्त्र, सुन्दर केश-सज्जा, बढ़िया इमारतें, मोटर-रेल आदि वैज्ञानिक यातायात के साधन और केवल लच्छेदार व्यावहारिक भाषा को ही सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक मानना हो तब तो बात अलग है, लोग प्रसन्नता पूर्वक अपने आपको सभ्य एवं सुसंस्कृत मान सकते हैं, किन्तु यदि सभ्यता और संस्कृति मानवता के प्रतीक माने जांय तो वह भी देखना पड़ेगा कि करुणा, दया, क्षमा, संवेदना, सहानुभूति तथा सौहार्द आदि सामाजिक गुणों के प्रति लोगों के अन्तःकरण में कितना आदर भाव है। इनके आधार पर ही किसी युग के सभ्य एवं संस्कृत होने का सही अनुमान किया जा सकता है।

आज की सामाजिक स्थिति को मानवता की तुला पर तोलें तो परिणाम बड़े निराशा-जनक मिलते हैं। इन दिनों मनुष्य में पाशविकता के अधिक लक्षण दिखाई दे रहे हैं फिर भला ऐसी प्रवृत्ति रखने वाला मनुष्य अपने आपको सभ्य एवं सुसंस्कृत किस मुँह से कहता है?

मनुष्य समाज को गिराने वाली अनेक दुष्प्रवृत्तियाँ हैं पर हमारी दृष्टि में माँसाहार उनमें से सबसे अधिक घृणित है। माँसाहार मनुष्यों में निष्ठुरता, क्रूरता, निर्दयता, स्वार्थ साधन आदि समाज विरोधी प्रवृत्तियों की वृद्धि करने वाला सिद्ध होता है। इससे मालूम पड़ता है कि लोगों के आध्यात्मिक गुण नष्ट हो चुके हैं और वह अपने स्वाद, स्वास्थ्य और स्वार्थ के लिये बड़े-से-बड़ा अपराध कर सकते हैं। जिस समाज में ऐसे अनात्मवादी व्यक्ति विद्यमान हों उसमें मानवता के गुणों की कदापि आशा नहीं की जा सकती।

माँस-भोजन मानवता की स्थापना एवं स्थिरता के लिये बहुत बड़ी बाधा है। यह सब जानते हैं कि एक सुखी समाज के लिये स्वस्थ गुणों के नागरिकों का होना कितना आवश्यक है। व्यक्ति का सद्गुणी होना उसके आन्तरिक सदाचार पर निर्भर है अर्थात् सभ्य समाज की रचना तभी हो सकती है, जब लोगों के मन स्वच्छ हों। यद्यपि अभी पाश्चात्य विद्वान इस बात को नहीं जान पाये पर हमारे तत्त्वदर्शी ऋषि-मुनियों ने इस बात को बहुत पहले जान लिया था कि मन और कुछ नहीं अन्न का सूक्ष्म संस्कार मात्र है।

अर्थात् मनुष्य के आहार का जो गुण होगा उसके मन में भी वैसे ही गुणों का, विचारों का जन्म होगा और जैसे लोगों के विचार होंगे, आचरण भी वैसे ही होंगे। इस वैज्ञानिक तथ्य की पूर्ण जानकारी के बाद ही स्वच्छ आहार ग्रहण करने की आवश्यकता का प्रतिपादन किया गया था और भोजन-व्यवस्था को अनेक कड़े नियमों से प्रतिबन्धित कर दिया था।

भोजन की स्वच्छता, सादगी, सफाई और उसे भावनापूर्वक ग्रहण करने की भारतीय प्रणाली मनोवैज्ञानिक ही न थी, वह विचार-विज्ञान की गहन कसौटी पर कसी हुई थी। यदि मानव के निर्माण में उसकी प्रवृत्तियों के बनने में भोजन का कोई प्रभाव न होता तो मनीषी-जन उसकी खोज, गुण-अवगुण की उपयोगिता एवं अनुपयोगिता पर इतना गहन तथ्यान्वेषण न करते।

माँस से मनोवृत्तियाँ क्रूर, दुस्साहसी, निर्दय और निष्ठुर होती हैं, तो इन दुर्गुणों से समाज भी निश्चित रूप से प्रभावित होता ही है। जो व्यक्ति माँस के लिये जीवों पर दया नहीं कर सकता वह अपने बाल-बच्चों के प्रति दयालु होगा ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। क्या आश्चर्य- यदि ऐसी कोई स्थिति बन जाय, जब अन्न न मिले और माँस के लिये दूसरे जीवों का अभाव हो जाय तो मनुष्य-मनुष्य का ही माँस न खाने लगे।

हम आज के मनुष्यों को जीवन-दर्शन की गहराई पर उतारना चाहते हैं और उसे यह बताना चाहते हैं कि मनुष्य और अन्य जीवों के मध्य केवल शारीरिक असमानता है। ज्ञान, पशुओं को भी होता है, मनुष्य जितना विचार तो पशु-पक्षी भी कर लेते हैं, हर्ष, शोक से वे भी पीड़ित होते हैं। प्राणों का मोह उन्हें भी उतना ही होता है जितना मनुष्यों को, फिर आत्मिक दृष्टि से अन्य जीवों और मनुष्यों में भेद-भाव कहाँ रहा? एक आत्मा दूसरी आत्मा को मार कर खा जाय, इससे कुत्सित अपराध और क्या हो सकता है।

स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से भी माँस मनुष्य का स्वाभाविक आहार नहीं है। माँस भक्षण में सामयिक उत्तेजना और शक्ति का अनुभव हो सकता है, पर स्वास्थ्य को स्थायी रूप से सुदृढ़ और कार्यक्षम बनाने के लिये उसे कभी अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता। इस सम्बन्ध में केवल भारतीय विद्वान या ग्रन्थ ही पर्याप्त प्रकाश नहीं डालते अपितु वर्तमान समय में योरोप और अमेरिका के वैज्ञानिकों, शरीर-शास्त्र वेत्ताओं तथा प्रसिद्ध डाक्टरों ने भी जो खोज परीक्षण एवं अनुभव किये हैं और जो निष्पत्तियाँ दी हैं, उनसे भी यही सिद्ध होता है कि माँसाहार स्थायी स्वास्थ्य की समस्या हल नहीं कर सकता, वरन् उससे अनेकों प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।

इंग्लैंड के प्रसिद्ध डा. हेनरी परडो ने लिखा है- ‘‘मैं ऐसे अनेक व्यक्तियों को जानता हूँ जो माँसाहार त्याग कर शाकाहारी बन जाने से पहले की अपेक्षा अधिक स्वस्थ हो गये और कब्ज, गठिया, मृगी आदि रोगों से छुटकारा पा गये। मैं निस्संकोच कह सकता हूँ कि जो व्यक्ति पूर्णतया शाकाहार पर रहते हैं वे माँसाहारियों की अपेक्षा रोगों के शिकार बहुत कम होते हैं।”

डा.रसैल ने अपनी ‘सार्वभौम भोजन’ नामक पुस्तक में लिखा है- ‘‘जहाँ माँसाहार जितना कम होगा वहाँ कैंसर की बीमारी भी उतनी ही कम होगी।” डा.पर्कस ने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख किया है कि “माँसाहार के कारण ही वे बहुत दिनों तक सिर-दर्द, मानसिक थकावट तथा गठिया से ग्रसित रहे।”

डा. हेग ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “डाइट एण्ड फूड” में लिखा है- ‘‘शाकाहार से शक्ति उत्पन्न होती है और माँसाहार से उत्तेजना बढ़ती है, परिश्रम के अवसर पर माँसाहारी शीघ्र थक जाता है। जिसे इसकी आदत पड़ जाती है, वह शराब आदि उत्तेजक पदार्थों की आवश्यकता अनुभव करता है। यदि वे न मिलें तो सिर-दर्द, उदासी, स्नायु, दुर्बलता आदि का शिकार हो जाता है। ऐसे लोग निराशा-ग्रस्त होकर आत्म-हत्या करते हैं। इंग्लैण्ड में माँस और शराब का प्रचार बहुत अधिक है, इसलिए वहाँ आत्म-हत्यायें भी बहुत अधिक होती हैं।”

इसी प्रकार मेरी एस. ब्राउन, डा. क्लाडसन, जार्ज बर्नार्ड शा, डा. लम्स शैप तथा लन्दन की “वेजीटेरियन ऐसोसियेशन” आदि ने भी माँसाहार से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव पर काफी विस्तृत प्रकाश डाला है।

माँसाहार से इस प्रकार की हानियाँ होने का मुख्य कारण उसमें पाया जाने वाला “यूरिक एसिड” नामक तत्व होता है जो शरीर के भीतरी अंगों में विषैला प्रभाव डालता है। यह “मूत्राम्ल” जब अधिक मात्रा में खून में मिल जाता है तो मस्तक में दर्द, हिस्टीरिया, निद्रा-नाश, श्वास अजीर्ण और यकृत आदि अनेक रोग हो जाते हैं और लोगों का स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है।

माँसाहार से शरीर में शक्ति आती है, यह ख्याल करना बिल्कुल गलत है। कुछ दिन पूर्व कानपुर के किन्हीं ऐसे दो अखाड़ों के पहलवानों में कुश्तियाँ हुईं जिसमें एक अखाड़े के पहलवान अधिकाँश मुसलमान थे और माँस-भक्षण करते थे और दूसरे में सब हिन्दू थे जो विशुद्ध दूध, फल, घी और मेवों का इस्तेमाल करते थे। इस प्रतियोगिता में उस समय लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब मुसलमान पहलवानों में से एक भी विजयी नहीं हुआ जबकि देखने में वे अधिक मोटे ताजे थे। इस घटना से अखाड़े का उस्ताद इतना प्रभावित हुआ कि उसने तमाम मुसलमान पहलवानों का माँसाहार बन्द करा दिया।

सन् 1898 में एक ऐसी ही प्रतियोगिता जर्मन में हुई। इसमें माँसाहारियों और शाकाहारियों में सत्तर मील पैदल चलने की होड़ हुई। प्रतियोगिता में बीस माँसाहारी थे, 6 शाकाहारी। शाकाहारी माँसाहारियों से बहुत पहले गन्तव्य स्थान पर पहुँच गये। सबसे कम समय, 14 घण्टे में सत्तर मील की दूरी तय करने वाला शाकाहारी ही था, 20 माँसाहारियों में से केवल एक व्यक्ति इस दूरी को तय कर सका और वह भी अन्तिम शाकाहारी के एक घण्टे बाद। उस एक को छोड़ कर शेष केवल 45 मील तक चल सके, इसके बाद उन्हें वहाँ से मोटरों पर लाना पड़ा।

सन् 1899 में क्वेटा नामक एक स्थान में एक ऐसी ही दिलचस्प रस्साकसी प्रतियोगिता रखी गई। इसमें एक ओर माँसाहारी अंग्रेज थे दूसरी ओर सिख रेजीमेंट के निरामिष जवान। कुछ देर की खींचतान के बाद अँग्रेज जवानों के हाथ छिल गये और उन्हें रस्सा छोड़ना पड़ा। शाकाहारी जवानों की उसमें जीत हुई।

माँस की तरह अण्डा भी पक्षियों का भ्रूण ही होता है, उसे यदि पूर्ण जीवित पक्षी न माना जाय तो भी उसमें जीव का अंश तो होता ही है। आखिर बच्चा तो उसी से बनता है। यदि केवल स्वास्थ्य बनाने का ही प्रश्न हो तो उससे स्वादिष्ट और अधिक शक्तिवर्द्धक पदार्थ इस संसार में मौजूद हैं, उनका प्रयोग किया जा सकता है। दूध और घी की शक्ति अण्डों से हजार गुना अधिक होती है। फल और मेवों से भी स्वास्थ्य को सुदृढ़ और शरीर को अधिक बलवान बनाया जा सकता है। प्राकृतिक साधन माँस की अपेक्षा स्वादिष्ट और गुणकारी भी होते हैं।

धार्मिक, नैतिक, शारीरिक अथवा सामाजिक- किसी भी दृष्टि से देखा जाय शाकाहार ही मनुष्य का प्राकृतिक भोजन है। जहाँ माँसाहार से तामस, काम, क्रोध, आलस्य प्रमाद, जड़ता आदि दुर्गुणों की वृद्धि होती है, वहाँ शुद्ध शाकाहार से स्फूर्ति, पवित्रता, प्रसन्नता, शक्ति तथा दीर्घ आयुष्य प्राप्त होता है।

पहली माँसाहार की स्थिति सामाजिक जीवन को अधःपतित बना कर लोगों के लिये अनेक उपद्रव खड़ी कर देती है जिसके फलस्वरूप लोग नारकीय यंत्रणाओं में फँसे रहते हैं, पर दूसरी स्थिति से समाज का देवत्व जागता है। सुख और समृद्धि का वातावरण बनता है। आज इस बात की प्रतीक्षा की जा रही है कि ऋषियों की इस पवित्र भूमि से माँसाहार का घृणित अपराध किस दिन दूर होगा?

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