• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • इन्द्रिय संयम का महत्व
    • वासनाओं को जीतने के लिये आध्यात्मिक चिन्तन
    • मनोवृत्तियों का सदुपयोग
    • इन्द्रिय-संयम और ब्रह्मचर्य व्रत
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Books - इन्द्रिय संयम

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


इन्द्रिय संयम का महत्व

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


2 Last
गायत्री का ग्यारहवां अक्षर ‘दे’ हमको इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने की शिक्षा देता है :—
देयानि स्ववशे पुंसा स्वेन्द्रियाण्याखिलानि वै ।
असंयतानि खादन्तीन्द्रियाण्ययेतानि स्वामिनम् ।।
अर्थात्—‘‘अपनी इन्द्रियों को वश में रखना चाहिये। असंयत इन्द्रियां स्वामी का नाश कर देती है।’’
इन्द्रियां आत्मा के औजार हैं, सेवक हैं, परमात्मा ने इन्हें इसलिये प्रदान किया है कि इनकी सहायता से आत्मा की आवश्यकताएं पूरी हों और सुख मिले। सभी इन्द्रियां बड़ी उपयोगी हैं। सभी का कार्य जीव को उत्कर्ष और आनन्द प्राप्त कराना है। यदि उनका सदुपयोग किया जाय तो मनुष्य निरंतर जीवन का मधुर रस चखता हुआ जन्म को सफल बना सकता है।
किसी भी इन्द्रिय का उपयोग पाप नहीं है। सच तो यह है कि अन्तःकरण की विविध क्षुधाओं को, तृषाओं को तृप्त करने का इन्द्रियां एक उत्तम माध्यम हैं। जैसे पेट की भूख, प्यास को न बुझाने से शरीर का स्वस्थ्य और संतुलन बिगड़ जाता है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर की ज्ञानेन्द्रियों की क्षुधा उचित रीति से तृप्त नहीं की जाती तो आन्तरिक क्षेत्र का संतुलन बिगड़ जाता है और अनेक प्रकार की मानसिक गड़बड़ी पैदा होने लगती हैं।
इन्द्रिय भोगों की बहुधा निन्दा की जाती है। उसका वास्तविक तात्पर्य यह है कि अनियन्त्रित इन्द्रियां, स्वाभाविक एवं आवश्यक मर्यादा का उल्लंघन करके इतनी स्वेच्छाचारी एवं चटोरी हो जाती हैं कि वे स्वास्थ्य और धर्म के लिए संकट उत्पन्न कर देती हैं। आजकल अधिकांश मनुष्य इसी प्रकार इन्द्रियों के गुलाम हैं। वे अपनी वासनाओं पर काबू नहीं रखते। बेकाबू हुई वासना अपने स्वामी को खा जाती है।
इसलिये यह परमावश्यक है कि इन्द्रियां हमारे काबू में रहें। वे अपनी मनमानी करके हमें चाहे जब चाहे जिधर न घसीट सकें, बल्कि जब हम स्वयं आवश्यकता अनुभव करें, जब हमारा विवेक निर्णय करे, तब उचित आन्तरिक भूख को बुझाने के लिए उनका उपयोग करें। यही इन्द्रिय-निग्रह है। निग्रहीत इन्द्रियों से बढ़कर मनुष्य का सच्चा मित्र तथा अनियन्त्रित इन्द्रियों से बढ़कर शत्रु और कोई नहीं है।
इन्द्रिय-नियंत्रण का मूलमंत्र—‘आत्मसंयम’
आत्म-नियंत्रण ही स्वर्ग द्वार है। यह प्रकाश तथा शांति की ओर ले जाता है। उसके बिना मनुष्य नर्कवासी है—वह अशांति और अंधकार में विलीन है। आत्म संयमी न होने से मनुष्य अपने माथे पर घोर दुखों को मढ़ता है—उसके दुःख और संताप उसे तब तक हैरान करते रहेंगे—जबतक वह आत्म नियंत्रण का कार्य आरम्भ नहीं कर देता। इसकी प्रतिस्पर्धा करने वाली कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो इसकी स्थान-पूर्ति कर सके। आत्म संयम आरम्भ करके कोई आदमी जो अपना उपकार कर सकता है—उससे अधिक हित करने वाली संसार की कोई शक्ति नहीं है।
आत्म नियंत्रण से मनुष्य अपने दैवी गुणों को प्रकाशित करके दैवी ज्ञान तथा शांति का भागी होता है। उसका अभ्यास प्रत्येक मनुष्य कर सकता है। निर्बल मनुष्य भी इसी समय से इसका अभ्यास आरम्भ कर सकता है। जब तक वह इस कार्य में प्रवृत्त नहीं होता, वह निर्बल बना रहेगा अथवा संभावना है कि उसकी निर्बलता बढ़ती जाय। जो आत्मा को अपने वश में नहीं करते, अपने हृदय को शुद्ध नहीं बनाते—ईश्वर के प्रति उनकी सब प्रार्थना व्यर्थ है जो कलह मूलक अज्ञानता तथा कुप्रवृत्तियों में लिपटे रहेंगे, उनका ईश्वर की सर्वज्ञता में विश्वास करना न करना बराबर है।
जो मनुष्य पर-दोष रत जिह्वा को ठीक नहीं करना चाहता, क्रुद्ध स्वभाव का दास बना रहना चाहता है और अपवित्र विचारों का उत्सर्ग नहीं कर सकता—उसे न तो कोई बाह्य शक्ति सन्मार्ग पर ला सकती है और न उसके किसी धार्मिक बात के समर्थन तथा विरोध ही से उसकी भलाई हो सकती है। मनुष्य अपने अन्तर्हित अंधकार पर विजय पाकर ही सत्य के प्रकाश का दर्शन पा सकता है।
खेद है कि मनुष्य आत्मसंयम के परम गौरव का अनुभव नहीं करता। वह इसकी निःसीम आवश्यकता को नहीं समझता और फलतः अध्यात्मिक स्वतन्त्रता तथा वैभव, जिनकी तरफ यह मनुष्य को प्रेरित करती है मनुष्य की दृष्टि-पथ से छिपे रहते हैं। इसी कारण मनुष्य कुवासनाओं का दास बना रहता है। पृथ्वी मंडल पर फैले हुए बलात्कार, अपवित्रता, रोग तथा दुःखों पर दृष्टि दौड़ाइये और देखिये कि कहां तक आत्मसंयम की कमी इन सबका कारण है। तब आप इसका पूर्ण अनुभव करेंगे कि आत्म नियंत्रण की कितनी अधिक आवश्यकता है। आत्म-संयम पुण्य की प्रथम सीढ़ी है। इससे प्रत्येक सद्गुणों की प्राप्ति होती है। सुव्यवस्थित तथा सच्चे धार्मिक जीवन की यह सर्व प्रथम आवश्यकता है।
प्रलोभनों से सदैव सावधान रहिये
इन्द्रियों के कुमार्गगामी होने का सबसे प्रधान कारण भांति भांति के प्रलोभन होते हैं। प्रलोभन एक ऐसा आकर्षक मोहचक्र है, जिसका कोई स्वरूप, आकार, स्थिति, अवस्था नियत नहीं है, किंतु फिर भी वह नाना रूपों में मानवमात्र को ठगने, पदच्युत कर पथभ्रष्ट कर देने के लिये आता है! जीवन में आने वाले बहुत-से मायावी प्रलोभन इतने मनमोहक, लुभावने और मादक होते हैं कि क्षणभर के लिये विवेकशून्य हो अदूरदर्शी बन हम विक्षिप्त से हो उठते हैं। हमारी चिन्तनशील सत्-प्रवृत्तियां पंगु हो उठती हैं तथा हम विषयवासना, आर्थिक लोभ, स्वार्थ, संकुचिततावश प्रलोभन के शिकार बन जाते हैं। अन्ततः उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों, कष्टों, त्रुटियों, अपमान तथा अप्रतिष्ठा से दग्ध होते रहते हैं। प्रलोभन जीवन की मृगतृष्णा है, तो बुद्धि का भ्रम मोह का मधुर रूप!
लालच के रूप अनेक हैं। कभी आप सोचते हैं, ‘मैं धनवान् बनूं, ऊंचा रहूं, मेरे ऊपर लक्ष्मी की कृपा रहे।’ इस उद्देश्य सिद्धि के हेतु आप रिश्वत, काला बाजार, झूठ, फरेब, कपट, हिंसा करके रुपये हड़पते हैं। ठेकेदार, ओवरसियर, इंजीनियर तक रिश्वत में हिस्सा लेते हैं। रेलवे, पुलिस, चुंगी इत्यादि विभागों में भ्रष्टाचार इसी स्वार्थ और संकुचितता के कारण फैले हुए हैं। डॉक्टर और वकील रोगी और मुवक्किलों से अधिकाधिक ऐंठना चाहते हैं। बाजार में खराब माल देकर अथवा निम्नकोटि की वस्तुओं का सम्मिश्रण कर व्यापारी खूब लाभ कमाना चाहते हैं। सिक्के ने जैसे मानवीयता का शोषण कर लिया हो। ऐसा जान पड़ रहा है प्रलोभन के अनेक रूप हैं—
‘अमुक व्यक्ति की पत्नी मेरी पत्नी की अपेक्षा सुन्दर है। मुझे भी सुन्दर पत्नी प्राप्त होनी चाहिये। मैं तो अमुक अभिनेत्री जैसी स्त्री से विवाह करूंगा।’
अमुक व्यक्ति का मकान सुन्दर है। अमुक के पास आलीशान कोठी, मोटर, नौकर-चाकर, सुन्दर वस्त्र, फर्नीचर इत्यादि हैं। मैं भी किसी प्रकार उचित-अनुचित कैसे ही उपायों से वस्तुएं-सुविधाएं प्राप्त करूं। अमुक मुझसे ऊंचे पद पर आसीन हो गया, मैं भी छल-बल कोशल से या रुपया दे-दिलाकर यही पद प्राप्त करूं।
अमुक व्यक्ति बड़ा सुस्वादु भोजन खाता है, मिठाई, पूड़ी, पकवान, मेवे, दूध, रबड़ी आदि बढ़िया से बढ़िया वस्तुएं नित्य चखता है। मैं भी किसी अच्छे-बुरे उपाय से ये चीजें प्राप्त करूं। ऐसा सोचते सोचते जैसे ही कोई तनिक-सा प्रलोभन आपको देता है कि आप बिना सोचे-समझे उसके समक्ष घुटने टेक देते हैं। रुपया, कमीशन, डाली, फल, मुफ्त सेवा, नाना उपहार ले लेना—सब प्रलोभन के ही स्वरूप हैं। इनका कोई आदि-अन्त नहीं। समुद्र की तरंगों की भांति वे आते ही रहते हैं।
नैतिक दृष्टि से कमजोर चरित्र वाले व्यक्ति आसानी से प्रलोभन के शिकार बनते हैं। जिनको आवश्यकताएं, विलासी इच्छाएं, चटोरपन, अनुचित मांगें, नशे बढ़े हुए हैं, वे प्रायः प्रलोभनों के सामने झुकते हुए देखे गये हैं। जिन्हें दान-दहेज, यात्राएं, भौतिकता, टीपटाप का शौक है, वे लालच में फंसते हैं। कभी-कभी सहज सात्त्विक बुद्धि वाले भी दूषित वातावरण के प्रभाव से प्रलोभनों के चक्कर में आ जाते हैं।
विषयों में रमणीयता का भास बुद्धि के विपर्यय से होता है। बुद्धि के विपर्यय में अज्ञान-सम्भूत अविद्या प्रधान कारण है। इस अविद्या, क्षणिक भावावेश, अदूरदर्शिता के ही कारण हमें प्रलोभन में रमणीयता का मिथ्या बोध होता है। प्रलोभन से तृप्ति एक प्रकार की मृग तृष्णा मात्र है।
प्रलोभन में मुख्यतः दो तत्व कार्य करते हैं—उत्सुकता एवं दूरी। ईसाइयों के मतानुसार आदि पुरुष एडम (आदम) का स्वर्ग से पतन ज्ञान-वृक्ष के फल को चखने की उत्सुकता के ही कारण हुआ था। उन्हें आदेश मिला था कि वे अन्य सब वृक्षों के फलों को चख सकते हैं, केवल उसी वृक्ष से बचते रहें। जिस बात के लिये हमें रोका जाता है, अप्रत्यक्ष रूप से उसके प्रति हम अधिकाधिक आकृष्ट होते हैं। अतः एडम को वर्जित फल के प्रति उत्सुकता उत्पन्न हो गयी। औत्सुक्य से प्रभावित होने के कारण उस फल में रमणीयता का भास हुआ। उन्होंने चुपचाप प्रलोभन के प्रति आत्मसमर्पण कर दिया। पर ईश्वर ने उन्हें इसकी बड़ी कड़ी सजा दी थी।
जो पदार्थ, इन्द्रियों को तृप्त करने के नाना साधन, हमसे दूर रहते हैं, जिन्हें हम दैनिक जीवन में नहीं पाते, जिनका स्वाद हमने नहीं उठाया है, वे ही दूरी के कारण हमें आकर्षक प्रतीत होते हैं। वास्तव में रमणीयता किसी बाह्य जगत की वस्तु में नहीं है। वह तो हमारी कल्पना तथा उत्सुकता की भावनाओं की प्रतिच्छाया मात्र है। वस्तु को आकर्षक बनाने वाला हमारा मन है जो क्षण-क्षण नाना वस्तुओं पर मचल-मचल जाता है, नयी वस्तु की ओर हमें बरबस खींच ले जाता है। कभी वह जिह्वा को उत्तेजित कर हमें सुस्वादु वस्तुओं की ओर आकृष्ट करता है, कहीं कानों को मधुर संगीत सुनने के लिए खींचता है। कहीं हमारी वासना को उद्दीप्त कर मादक वृत्तियों को उत्तेजित कर देता है। मनकी कोई भी गुप्त अतृप्त इच्छा प्रलोभन का रूप धारण कर लेती है। विवेक का नियन्त्रण ढीला पड़ते ही मन हमें स्थान-स्थान पर बहकाता फिरता है। अथवा विवेक पर आवरण (पर्दा, तमोवृत्ति, इन्द्रिय-दोष, बीमारी, प्रमाद) पड़ा रहने से बुद्धि तिरोहित हो जाती है। फलतः हम पतन की ओर जाते हैं, हमारा वातावरण गन्दा हो जाता है, हम दूसरों को धोखा देते है, झूठ बोलते, ठगते हैं। विवेक पर पर्दा रहने से ही दुष्ट पुरुष विद्या को विवाद में, धन को अहंकार और विलास में, बल को परपीड़ा में लगाते हैं, निर्बलों को सताते हैं। अतः मन पर सतर्कता से अन्तर दृष्टि रखनी चाहिये।
जैसे युद्ध करते समय जागरूक सन्तरी को यह ध्यान रखना पड़ता है कि न जाने शत्रु का कब आक्रमण हो जाय, कब किस रूप में शत्रु प्रकट हो जाय, उसी प्रकार मन रूपी चंचल शत्रु पर तीव्र दृष्टि और विवेक को जागरूक रखने की अतीव आवश्यकता है। जहां मन आपको किसी इन्द्रिय सम्बन्धी प्रलोभन की ओर खींचे, वहीं उसके विपरीत कार्य कर उसकी दुष्टता को रोक देना चाहिए।
मन बड़ा बलवान शत्रु है। वासना और कुविचार का जादू इस पर बड़ी शीघ्रता से होता है। बड़े-बड़े संयमी व्यक्ति वासना के चक्र में आकर मन को न रोक सकने के कारण पथ भ्रष्ट हो जाते हैं। मन को शुद्ध करना अत्यन्त दुष्कर कृत्य है। इससे युद्ध करने में एक विचित्रता है। यदि युद्ध करने वाला दृढ़ता से युद्ध में संलग्न रहे, निज इच्छा शक्ति को मनके व्यापारों में लगाये रहे, तो युद्ध में संलग्न सैनिक की शक्ति अधिकाधिक बढ़ती है और एक दिन वह इस पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है। यदि तनिक भी इसकी चंचलता में बहक गये, तो यह मनुष्य के चरित्र, आदर्श, संयम, नैतिक दृढ़ता, धर्म को तोड़-फोड़ कर, सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर डालता है।
मन को दृढ़ निश्चय पर स्थिर रखने और उसी पर एकाग्र ध्यान रखने से मुमुक्षु की इच्छा शक्ति प्रबल बनती है। मन का स्वभाव मनुष्य की इच्छा के अनुकूल बन जाने का है। इसे जिन विषयों की ओर दृढ़ता से एकाग्र कीजिये, वही कार्य करने लगेगा। वह व्यर्थ निश्चेष्ट निष्क्रिय नहीं बैठना चाहता। अच्छाई या बुराई–वह किसी न किसी ओर निश्चय आकृष्ट होगा। यदि आप शुभ रचनात्मक समुन्नत कार्यों में उसे न लगायेंगे, तो वह बुराई की ओर चलेगा। यदि आप उसे पुष्प-पुष्प विचरण करने वाली मधु-लोभी तितली बना देंगे—जो रूप, रस और गन्ध पर मंडराये—तो वह अवश्य आपको किसी भयंकर स्थिति में डाल देगा। यदि आप उसे उद्दण्ड रखेंगे तो वह दिन-रात असंख्य स्थानों पर भ्रान्तिमति रहेगा। यदि आप शुभ ईष्ट-पदार्थों के सुविचारों में उसे स्थिर रक्खेंगे, तो वह आपका सबसे बड़ा मित्र बन जायगा।
जब-जब अपने अन्तःकरण में विषय-वासना का प्रबल संघर्ष उत्पन्न हो, तब तब, नीर-क्षीर-विवेकी निश्चयात्मिका बुद्धि को जाग्रत् कीजिये। मन से थोड़ी देर पृथक रहकर इसके कार्य-व्यापारों पर तीव्र दृष्टि रखिये। वह, कुविचार, कुत्सित चिन्तन, वासना का ताण्डव कुकल्पना-चक्र टूट जायेगा और आप मन के साथ चलायमान न होंगे। मन के व्यापार के साथ निज आत्मा की समस्वरता न होने दें। इसी अभ्यास द्वारा वह आज्ञा देने वाला न रह कर सीधा-सादा आज्ञाकारी अनुचर बन जायगा—
मन लोभी, मन लालची, मन चंचल मन चोर ।
मन के मत चलिये नहीं, पलक पलक मन और ।।
प्रमाद में फंसी इन्द्रियों के सुख में स्थिरता नहीं है। इन्द्रिय सुख दुःख रूप है। यह अस्थिर और क्षणिक है। यह आनन्द आवरण मात्र है। इन्द्रिय सुख के लिये मनुष्य को अनेक कुचक्री, कुटिल रीतियों का अवलम्ब लेना पड़ता है। एक सुख की लालसा में मनुष्य अधिकाधिक उलझता ही जाता है। एक इन्द्रिय को तृप्त करते-करते मनुष्य दूसरी-तीसरी, अधिकाधिक सांसारिकता में लिप्त होता ही जाता है। अन्ततः पाप योनि को प्राप्त होता है। जब तक मन ओर इन्द्रियों पर पूरा नियन्त्रण नहीं होता, तब तक सुख की आशा रखना व्यर्थ है। मन पर निरन्तर कड़ी दृष्टि रखिये—स्वयं भगवान् श्री कृष्णजी ने गीता में हमें मन पर तीखी निगाह रखने की ओर निर्देश किया है—
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुमायताः ।। (6।36)
‘मन को संयमित न करने वाले पुरुष के द्वारा योग दुष्प्राप्य है। स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा ही योग प्राप्त होता है। इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है।’
अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करने में बहुत सहायता मिलती है। गीता में मन को भगवान् में एकाग्र करने का अमूल्य उपदेश है—
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
तत ततो नियम्यैदतदत्मन्येव वशं नयेत् ।। (6।26)
‘यह अस्थिर और चंचल मन जिस-जिस कारण से संसार में जाय, उस-उससे हटा कर इसे बार-बार आत्मा में लगावे।’
सुख रूप भासने वाले विषय-वासना के प्रलोभन में कदापि न फंसिये। मन के विपरीत चलिये। परमात्मा का जो रूप आपको विशेष आकर्षक प्रतीत होता हो, उसी में मन बुद्धि को एकाग्र करने का सतत अभ्यास करते रहिये। वैराग्य और शुभचिन्तन के अभ्यास से ही प्रलोभन से ही मुक्ति मिल सकती है।

2 Last


Other Version of this book



इन्द्रिय संयम
Type: TEXT
Language: HINDI
...

इंद्रिय संयम
Type: SCAN
Language: HINDI
...

ઇન્દ્રિય સંયમ
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...


Releted Books



પરિવર્તનની મહાન ક્ષણ
Type: SCAN
Language: EN
...

The Great Moments of Change
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

परिवर्तन के महान क्षण
Type: SCAN
Language: EN
...

परिवर्तन के महान् क्षण
Type: TEXT
Language: EN
...

परिष्कृत अध्यात्म हमारे जीवन में उतरे
Type: SCAN
Language: HINDI
...

પરિષ્કૃત અધ્યાત્મ આપણા જીવનમાં ઉતરે
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

જીવન સાધનાનાં સોનેરી સૂત્રો
Type: SCAN
Language: EN
...

जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र
Type: TEXT
Language: EN
...

தவ வாழ்க்கைக்கான
Type: SCAN
Language: EN
...

जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र
Type: SCAN
Language: EN
...

మానసిక సంతులనం
Type: SCAN
Language: TELUGU
...

Mental Balance
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

மன சமநிலை
Type: SCAN
Language: TAMIL
...

मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले
Type: TEXT
Language: EN
...

મન: સ્થિતિ બદલો તો પરિસ્થિતિ બદલાશે
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

मनस्थिति बदलें तो परिस्थिति बदले
Type: SCAN
Language: EN
...

गायत्री साधना से कुण्डलिनी जागरण
Type: TEXT
Language: HINDI
...

गायत्री साधना से कुण्डलिनी जागरण
Type: SCAN
Language: HINDI
...

गायत्री साधना के दो स्तर
Type: TEXT
Language: HINDI
...

गायत्री सर्वतोन्मुखी समर्थता की अधिष्ठात्री
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Health Wealth and Spirituality
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

प्रखर प्रतिभा की जननी इच्छा शक्ति
Type: SCAN
Language: HINDI
...

प्रखर प्रतिभा की जननी इच्छा शक्ति
Type: TEXT
Language: HINDI
...

प्रज्ञा परिजनों में नव जीवन संचार
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Articles of Books

  • इन्द्रिय संयम का महत्व
  • वासनाओं को जीतने के लिये आध्यात्मिक चिन्तन
  • मनोवृत्तियों का सदुपयोग
  • इन्द्रिय-संयम और ब्रह्मचर्य व्रत
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj