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Books - अन्धविश्वासी नहीं विवेकशील बनिए

Media: TEXT
Language: HINDI
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अन्धविश्वासी नहीं, विवेकशील बनिए

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जब शरीर, वस्त्र या घर की सफाई नहीं की जाती है और जो मलीनता उत्पन्न होती है उसे जहां का तहां पड़ा रहने दिया जाता है तो कुछ ही समय में सड़ांद उत्पन्न हो जाती है। इसलिए नियम यह है कि जल्दी-जल्दी हर वस्तु की सफाई करते रहा जाय।सफाई आवश्यक—शरीर की सफाई न की जायगी तो पसीना, दांत, आंख, कान का मल बढ़ता, सूखता और जमा होता चला जायगा। शरीर में असंख्यों छोटे-बड़े छिद्र हैं और वे सभी निरन्तर गन्दगी निकालते रहते हैं। यह गन्दगी हानिकारक होती है, अधिक मात्रा में जमा हो जाने पर सड़ांद, कृमि एवं रोग उत्पन्न करती है। अतएव स्नान आदि के द्वारा देह पर भीतर से निकले हुये एवं बाहर से आकर जमा हुए मैलों को साफ करते रहना एक आवश्यक कर्तव्य माना गया है। जो इस कर्तव्य का पालन नहीं करते वे मलीनता लपेटे रहने के कारण समाज में घृणित समझे जाते और तिरस्कृत होते हैं। बीमारियां भी उन्हें घेर लेती हैं।हवा में उड़ने वाली धूलि और शरीर में भीतर से निकलने वाली गन्दगी कपड़ों को मैला करती रहती है। आज जो कपड़ा धुला हुआ था वह कल मैला हो जाता है। इस लिए बार-बार उसे धोना, सुखाना, पड़ता है। यदि कपड़े न धोये जायं तो वे दुर्गन्धयुक्त मैले कुचैले घृणास्पद बन जायेंगे। पहनने वाले को निन्दा, तिरस्कार एवं अस्वस्थता का भागी बनावेंगे। कमरों को झाड़ा न जाय तो हवा में उड़ने वाली धूल से फर्श ढक ही जायगा, दीवारों की सफाई न की जाय तो मकड़ी के जाले तथा दूसरे कीड़े-मकोड़ों के घर बन जायेंगे। बर्तनों को न मांजा जाय तो वे काले पड़ जायेंगे और अपनी चमक खो बैठेंगे। उनका उपयोग करते हुए घृणा उपजेगी। भौतिक जगत् में हर जगह सफाई को आवश्यक एवं अनिवार्य माना जाता है। म्युनिसिपल बोर्ड, सड़कों, नालियों, पाखाने, पेशाब-घरों एवं कूड़े-कचरे के साफ करने के लिये खर्चीली व्यवस्था वहन करती है। यदि उसमें जरा भी त्रुटि रहे तो नगर गन्दगी और बीमारी के घर बन जायं और वहां रहना भी कठिन हो जाय।मस्तिष्क की भी ठीक यही स्थिति है। उसमें निजी दुर्बुद्धि दुष्प्रवृत्तियों एवं कुसंस्कारों के कारण भीतरी मलीनता निरन्तर उत्पन्न होती रहती है। फिर बाह्य जगत् में भी अच्छाई की अपेक्षा बुराई अधिक है, उनका प्रभाव पड़ता ही है। ऐसी दशा में मानसिक संस्थान में धीरे-धीरे अनेक विकृतियां जमा होती चलती हैं। इनकी सफाई के लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन, आदि क्रिया के प्रयोगों को आवश्यक बताया गया है। मन में भी आलस्य की मात्रा कम नहीं है। शरीर यही चाहता रहता है कि उसे काम न करना पड़े, आराम के साथ दिन गुजर जायं। दबाव पड़ने पर ही वह कुछ करने को तैयार होता है, इसी प्रकार मन का भी यह स्वभाव है कि जो कुछ आस-पास होता दिखाई पड़ता है उसी को ठीक मानकर अपना लेता है और फिर धीरे-धीरे उसी परिपाटी का अभ्यस्त बन जाता है।नीर-क्षीर विवेक आवश्यकता—कहने की आवश्यकता नहीं कि आज चारों ओर अनुपयुक्त प्रथा-परम्पराओं और परिस्थितियों का ही बाहुल्य है। बुराइयों और मूर्खताओं में अपना कुछ विशेष आकर्षण रहता है जिसे लोग सहज ही अपना लेते हैं। बीड़ी सिगरेट को ही लीजिये, इसमें सब प्रकार से शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि ही हानि है। इस हानि से सब लोग परिचित हैं फिर भी देखा-देखी प्रतिस्पर्धा के कारण यह बुराई दिन-दूनी रात-चौगुनी पनपती ही जाती है। यही बात अन्य प्रथा-परम्पराओं के बारे में भी लागू होती है। आज कितनी ही बात हमारे समाज में ऐसी प्रचलित हैं जिनका न कोई कारण है, न लाभ। उनकी वास्तविकता भी कुछ नहीं, फिर भी वे चलती हैं और खूब चलती हैं। लोग उन्हें सचाई से भी अधिक सचाई मानते हैं, यद्यपि उनमें आदि से अन्त तक केवल मात्र भ्रान्ति भरी होती है।शरीर, वस्त्र और मकान में निरन्तर बढ़ने, पनपने वाली गंदगी की तरह समाज में भी अनेकों कुरीतियां, विकृतियों उपजती बढ़ती रहती हैं। मनुष्य का आलसी स्वभाव हर बात को तर्क की कसौटी पर नहीं कसता और न विवेक-पूर्वक तथ्यों को ढूंढ़ने का कष्ट उठाना चाहता है। स्वतंत्र चिन्तन और मौलिक प्रतिभा की न्यूनता के कारण वह बुराइयां और मूर्खताएं आस-पास अधिक मात्रा में प्रचलित होती हैं, उन्हें अपना कर अपने जीवन-क्रम में सम्मिलित कर लेता है। आवश्यकता इस बात की है कि लोगों में जब कि मूर्खों की ही संख्या अधिक है और उनकी गतिविधियों में भी अधिकांश मूर्खतापूर्ण ही होती हैं तो हर बात की विवेचना और समीक्षा की जाती है और जो कुछ उपयोगी दिखाई पड़ता है उसे अपनाकर शेष अनुपयुक्त की उपेक्षा कर दी जाती है। यदि ऐसा हुआ होता तो हम उन विचारों और कामों को अपनाने से बचे रहते जो हमारे लिए न तो उपयोगी हैं और न आवश्यक। यदि इस प्रकार की विवेकशीलता हममें रही होती तो हानिकर रूढ़ियों और अवांछनीय मान्यताओं के गुलाम होकर हम जो अपार-हानि उठाते रहते हैं, उससे बच गये होते। लेकिन हमारा दुर्भाग्य ही है कि किसी प्रकार की भी विचारशीलता को हम अपने भीतर जागृत नहीं कर पाते और अपनी मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक क्षमताएं उन बातों में बर्बाद करते रहते हैं, जो उपहासास्पद तो हैं ही हानिकर भी कम नहीं हैं।छिपकली का शकुन—कुछ उदाहरण लीजिए। छिपकली एक घरेलू जीव है जो दीवारों पर चिपका रहता है, कीड़े-मकोड़े खाता रहता है। उसकी चलने की शक्ति यह है कि कभी-कभी ही थोड़ा रुक-रुक कर चल पाती है। दीवारों और छत पर निरन्तर चिपके रहने की उसके पंजों की पकड़ कभी-कभी ढीली हो जाती है फलस्वरूप अक्सर नीचे गिर पड़ती हैं। उसी समय यदि नीचे कोई आदमी बैठा है तो उसके किसी अंग पर गिर पड़ना भी स्वाभाविक है। यदि खाली जमीन पर भी वह गिरे तो फिर उठकर वह ऊपर चढ़ना चाहती है। कहां चढ़े किधर से चढ़े का पूरा विवेक उस मन्द-बुद्धि कीड़े को नहीं होता, अतएव कभी-कभी वह उधर ही कहीं बैठे खड़े मनुष्य के शरीर पर चढ़ जाता है। इस मामूली-सी महत्वहीन बात में न तो कोई विशेषता की बात है न अचम्भे की।पर यार लोगों ने बात का बतंगड़ और तिल का ताड़ बनाकर खड़ा कर दिया। ‘पल्ली-पतन’ एक पूरा शास्त्र ही बन गया। छिपकली किधर से गिरी, किधर को भागी, उसका सिर किधर था, पूंछ किधर थी, किस अंग पर चढ़ी, किस तिथि वार को गिरना, चढ़ना हुआ आदि बातों के अनेक प्रकार के फलादेश गढ़ दिये गये। किसी का फल हानि या किसी को लाभप्रद बता दिया गया। व्यर्थ की एक मानसिक उलझन खड़ी कर दी गई। जिसको हानिकर फल बताया गया उसे यह भी सुझाया गया कि क्या-क्या खर्च करने से वह अशुभ शान्त होगा। इस शान्ति में ऐसे विधि-विधान भी सम्मिलित किये गये जिनसे यह फलादेश बताने वाले पंडितों को आर्थिक लाभ होता है।बेचारी छिपकली, नींद या थकान से पंजों की पकड़ ढीली होने पर अक्सर नीचे गिरती है। उनका किसी के शरीर पर गिर पड़ने में क्या अनहोनी बात है। उसके गिरने-चढ़ने में शुभ-अशुभ की कौन-सी बात हो सकती है? क्यों हो सकती है? इसका न कोई कारण है और न आधार। पर जो हुल्लड़ चल पड़ा सो चल पड़ा। ऐसी ऊटपटांग बातें एक से दूसरे तक पहुंचती हैं और लोग उसे सचाई जैसी मानकर अपने विश्वास का अंग बना लेते हैं।कुत्ते का कान फड़फड़ाना—कुत्तों के कानों में अक्सर छह पैर वाले लाल कीड़े चिपके रहते हैं और वे उन्हें काटते रहते हैं। कई बार उनके चौड़े कर्ण-छिद्रों में मक्खियां घुसने लगती हैं। इसलिए अक्सर वे अपने कान फड़फड़ाते रहते हैं। किसी कुत्ते की गतिविधियों का लेखा-जोखा रखा जाय तो प्रतीत होगा कि वह प्रतिदिन सौ-पचास बार कान फड़फड़ाता है। यह उसकी एक स्वाभाविक दैनिक क्रिया है, पर यार लोगों ने उसे भी किसी अशुभ अनिष्ट का संकेत मान लिया है। कभी कोई व्यक्ति कहीं बाहर जा रहा है या किसी प्रसंग की चर्चा चला रहा है, अथवा कुछ तैयारी कर रहा है या कुछ सोच रहा हो और उसी समय कुत्ता कान फड़फड़ा दे तो समझा जायगा कि अपशकुन हो गया, अब वह काम बनने वाला नहीं है। इसी आधार पर लोग अपने महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम को रद्द कर देते हैं, वे मान बैठते हैं कि अपशकुन हो जाने से यह काम तो अब बनने वाला है नहीं, इसलिए इसके लिए प्रयत्न भी क्यों किया जाय। स्थायी रूप में योजना बदली न गई तो भी उस समय तो कार्यक्रम रद्द कर दिया या रोक दिया ही जाता है। उपयुक्त काम करने की प्रक्रिया में इस प्रकार बाधा पड़ जाने से हो सकता है कि अवसर निकल जाय, वह होने वाला काम स्वतः ही बिगड़ जाय। कोई यह नहीं सोचता कि आखिर कुत्ते के कान फड़फड़ाने से मनुष्य का कोई काम बिगड़ने का सम्बन्ध किस प्रकार हो सकता है? सम्बन्ध हो चाहे न हो इतना जरूर है कि इस प्रकार का विश्वास करने वालों के मन में एक बे सिर-पैर की आशंका जरूर उत्पन्न हो जाती है। जिसकी उथल-पुथल आत्म-विश्वास का डगमगा देती है और अधूरे एवं आशंकित मन से किये हुए काम का असफल बनाने की पृष्ठ-भूमि रचने लगती है।बिल्ली आगे से निकल जाय, छींक हो जाय, तेली दिखाई पड़ जाय तो शकुन बिगड़ गया। ऐसी बीसियों-पचासों चीजें हैं जो दिखाई पड़ जायं तो यह संदेह किया जाने लगता है कि अपशकुन हो गया और अब काम बिगड़ ही जायगा। किसी काम की सफलता के लिए मनोविज्ञान-शास्त्र के अनुसार मनुष्य में आवश्यक उत्साह, सफलता की आशा, अविचल धैर्य और समुचित आत्म-विश्वास होना ही चाहिए। इनमें कमी रहेगी तो अपेक्षित एकाग्रता, श्रमशीलता एवं तत्परता घट जायेगी। फलस्वरूप सफलता की सम्भावना में भी कमी पड़ेगी। शकुनवाद के मानने में यही सब से बड़ा नुकसान है कि अकारण मन आशंकित और आतंकित होता है। मन में असफलता की आशंका घुमड़ने लगती है। बहुत बार होता भी यही है कि शंका-शंकित व्यक्ति अपनी मानसिक दुर्बलता के कारण सचमुच सफलता से हाथ धो बैठता है। शकुनों के जंजाल में फंसने पर इसी प्रकार की हानि उठानी पड़ती है।शुभ और अशुभ का भ्रम—घर में आई हुई कौन वस्तु शुभ कौन अशुभ है, इसकी मान्यता अपनी अनोखी ही है। शनिश्चर के दिन लोहे की बनी कोई चीज खरीद ली जाय तो शनिश्चर देवता उस लोहे में लिपटे हुए घर चले आते हैं और अशुभ परिणाम उत्पन्न करते हैं। दिवाली के दिन जो पैसा घर में आता है यह लक्ष्मी का वरदान माना जाता है और उसे संभाल-संभाल कर रखते हैं। कार्तिक वदी धन त्रयोदशी के दिन लोग हर वर्ष जरूरत न होने पर भी बर्तन खरीदते हैं क्योंकि उस दिन जो बर्तन घर में आवेगा वह शुभ होगा। इस वहम के कारण हर वर्ष बर्तन वालों की खूब बिक्री होती है और खरीददारों के घर में अनावश्यक चीजें भी इकट्ठी होती रहती हैं। सम्भव है यह वह किसी होशियार बर्तन विक्रेता ने फैलाया है ताकि उसकी अधिक बिक्री हो सके।अन्ध-विश्वास उन्हें कहते हैं जो किसी मनचले व्यक्ति द्वारा कोई शकुन बनाकर फैला दिये जाते हैं और जिन्हें लोग बिना किसी तर्क वितर्क किये ऐसे ही स्वीकार कर लेते हैं। भोली और भयभीत प्रकृति के मनुष्य आमतौर से ऐसी बातों को अपनाने में अग्रणी रहते हैं। भारतवर्ष का नारी-समाज इस तरह के अन्ध-विश्वासों को जल्दी अपनाने और देर तक पकड़े रहने में अग्रणी रहता है। धूर्त लोग आये दिन कुछ न कुछ शिगूफे छोड़ते रहते हैं। इन भोली अबलाओं को बे सिर-पैर की बातों में उलझा कर वे पैसे कमाने का तमाशा देखने का मजा लूटते रहते हैं। कई बार तो कितने ही शिगूफेबान अपना उल्लू भी खूब सीधा करते रहते हैं।मनचले लोगों द्वारा प्रचलित अफवाहें—कुछ दिन पहले किसी मनचले ने अफवाह फैलादी कि—‘‘एक जंगल में देवी रोती हुई मिली। रास्तागीरों ने पूछा कि तू कौन है, क्यों रोती है? उसने कहा मैं भगवती देवी हूं। इस वर्ष ऐसा होने वाला है कि जो स्त्री अपने भाई के घर बिना बुलाये, बिना सूचना दिये पहुंचेगी और नारियल की गिरी का गोला तथा मिश्री भेंट करेगी उसका भाई तो बच जायगा, अन्यथा शेष सबके भाई या तो भयानक रूप से बीमार पड़ेंगे या मर जायेंगे।’’ यह अफवाह तेजी से फैली। एक स्त्री ने दूसरी से, दूसरी ने तीसरी को कहा और देखते-देखते यह दूर तक प्रचलित हो गई। उसी बात को जब कई के मुंह से सुना जाय तब तो उसके पक्के होने में कोई सन्देह ही नहीं रहता। अब स्त्रियां अपने भाइयों के यहां गोला और मिश्री ले-लेकर बिना बुलाये चलने लगीं। दो-चार जब हो आईं तो उनने औरों से कहा और उन्हें भी जाने की प्रेरणा दी। अब तो ऐसी भगदड़ मची कि एक भी घर की स्त्री ऐसी न  बची जो अपने मैके इसी प्रयोजन के लिये न गई हो। गाड़ियों में बरातों जैसी भीड़ें रहने लगीं। कहीं भी जाइये सवारियां मिलनी मुश्किल हो गई। जिधर देखिये उधर स्त्रियों का यातायात भारी संख्या में दिखाई देने लगा। किराये भाड़े में लाखों करोड़ों रुपया बर्बाद हो गया। गिरी के गोला इतने बिके कि दुकानदारों की बन आई, उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाया और दाम दूने ड्यौढ़े कर दिये। जाने-आने के प्रसंग में कम हर्ज हुए। जिन भाइयों की बहनें नहीं पहुंच पाईं या बहनें थीं ही नहीं, उन्होंने किन्हीं नाते-रिश्ते की बहिनों को पत्र डालकर बुलाया ताकि वे कहीं मर या बीमार न पड़ जायं। यह ऊधम अब से सात-आठ वर्ष पूर्व उत्तर-प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश के अधिकांश जिलों में चलता रहा।इसी प्रकार की एक अफवाह किसी ने फैला दी कि किसी देवी ने भविष्यवाणी की है कि जिनकी गोदी में लड़के हैं वे स्त्रियां सोमवार के दिन तालाब के किनारे बैठकर आधा सेर जलेबी खावें तो उनके लड़के बचेंगे नहीं तो एक वर्ष के भीतर वे मर जावेंगे। अफवाह जोरों से फैली। जलेबी का मांग बढ़ी। जो लोग और धन्धा करते थे उन्होंने भी जलेबी बनाना आरम्भ कर दिया। सोमवार के दिन जिधर देखें उधर जलेबी बाजार में छाई दिखाई पड़ने लगीं। फेरी वाले गली मुहल्लों में जलेबी के खौंमचे लेकर पहुंच गये और अफवाह का जोरों से समर्थन करने लगे। बच्चे वाली अधिकांश स्त्रियों ने जलेबी खरीदीं। तालाब के किनारे पहुंचीं और खाने लगीं। सोमवार के दिन तालाबों पर सैकड़ों स्त्रियों के झुण्ड पहुंचने लगे और वहां मेला जैसा लगने लगा। मसखरे लोग इस बेवकूफी का खूब रस लेने लगे। बात एक गांव से दूसरे गांव में फैली और आंधी तूफान की तरह उसका अनुकरण हर गांव में किया जाने लगा। किम्वदन्ती में कहा गया था कि—आधासेर जलेबी केवल बच्चे वाली स्त्री को ही खानी है। न खा सके तो तालाब में फेंक देनी है पर उसमें से एक टुकड़ा भी किसी बच्चे या व्यक्ति को नहीं देना है। इस आधार पर बच्चों के लिये अलग से जलेबियां खरीदी गईं। माताएं जब आधा सेर न खा सकीं तो उन्हें बची हुई जलेबी तालाब में फेंकनी पड़ीं। मनो जलेबी तालाब में इस प्रकार फेंकी गईं तो वे सड़ी, कीड़े उत्पन्न हुए, बदबू फैली और तालाबों का पानी गन्दा हो गया। जब तक लगभग सारी स्त्रियां जलेबी न खा चुकीं तब तक—लगभग एक साल तक गांव-गांव यह धमा चौकड़ी चलती रही। जलेबी वालों ने अपने धन्धे में गहरी कमाई करली घटिया से घटिया चीज बनाकर महंगे से महंगे दाम में खपा दीं। खराब जलेबियां भूख से अधिक मात्रा में खाने पर हजारों स्त्रियों को दस्त, कै, पेट का दर्द, खांसी आदि का शिकार बनना पड़ा।पति के सिर में जूते—इसी प्रकार एक बार अफवाह फैलाई गई कि अगले वर्ष कोई बीमारी फैलेगी और सुहागिनों को विधवा होना पड़ेगा। यह बात देवी ने अपने किसी भक्त को सपना देकर कहा है और साथ ही यह बताया है कि शनिश्चर को प्रातःकाल दिन निकलने से पूर्व बिना टोकें स्त्री अपने पति के सिर में पांच जूते लगा देगी—वह उस विपत्ति से बच जायेगी। कुछ स्त्रियों ने अपने पतियों को इसके लिये सहमत कर लिया और देवी के निर्देशानुसार शनिश्चर के दिन उनके सिर में पांच जूते लगा दिये। बात पतियों के अपमान और निन्दा की थी। इसलिये गुपचुप उसका प्रचार हुआ। स्त्रियों ने दूसरी स्त्रियों से गुपचुप अपनी करनी बखानी कि उनने किसी प्रकार पति के मना करने पर भी उन्हें सहमत कर लिया। जिन पुरुषों ने जूते खा लिये थे उनसे दूसरी स्त्रियों के पतियों ने पूछ-ताछ की तो उनने इसमें कुछ हर्ज न होने की बात और अपनी सहमति प्रकट कर दी। बात फैली तो गुपचुप पर उसका प्रचार इतना अधिक हुआ कि हर स्त्री और हर पुरुष तक यह बात पहुंच गई। जो पति आनाकानी करते हैं उनके घरों में कलह फैला, स्त्रियां रूठ गईं, रोटी खाना छोड़ बैठीं, रोने-गाने लगीं, आखिर पतियों को उनके आग्रह के आगे झुकना पड़ा। शनिश्चर को बिना दिन निकले—बिना टोकें हलके-हलके पांच जूते सिर में खाने पड़े। जिनने जूते मार लिए उन स्त्रियों ने अनुभव किया कि उनने कोई बड़ी सफलता प्राप्त करली और किसी बड़ी विपत्ति से छुटकारा ही पा लिया।किसी कुएं, तालाब के बारे में कभी-कभी ऐसी किम्वदन्ती फैला दी जाती है कि उसे किसी महात्मा का वरदान मिला है कि जो कोई उसमें स्नान करेगा या उसका जल पियेगा उसके सारे रोग दूर हो जायेंगे। अफवाह फैलती है और लोगों की भारी भीड़ जमा होने लगती है। एक को देख दूसरा पहुंचता है और दूसरे को देखकर तीसरा। इस प्रकार अन्धी भेड़ चाल का ढर्रा चल पड़ता है। बहुत लोग जिस काम को करते दिखाई पड़ते हैं उसे कमजोर मस्तिष्क वाले अटल सत्य मान लेते हैं और कहते हैं जब सारी दुनिया ऐसा कर रही है तो जरूर वह बात ठीक होनी चाहिए और हमें भी उसका लाभ उठाना चाहिए। देखते-देखते ऐसे कुआं, तालाब पुजाने लगते हैं। उनका कोई महन्त पुजारी बन बैठता है और भेंट चढ़ाने का लाभ उठाता है। राजस्थान में कोटा जिले के एक गांव में कुछ दिन पूर्व ऐसी ही अफवाह एक तालाब के बारे में फैलाकर उसका पुजापा लाखों रुपया इकट्ठा कर लिया था। इस प्रकार की लूटमार का षडयन्त्र करने के आरोप में पुलिस ने उन्हें पकड़ा और मुकदमा चलाया था। तालाब में वास्तविकता कुछ भी न थी। पुजापा लेने वालों के एजेन्ट अफवाह फैलाने के लिए नौकर थे। उनका काम यही था कि किसी अन्धे को नेत्र-ज्योति मिलने, किसी कोढ़ी के अच्छा होने और किसी दमा या लकवा-ग्रस्त को देखते-देखते भला-चंगा होने की अफवाह फैलाया करें। दो-चार आदमी भी ऐसी उद्धत अफवाह फैलाने को खड़े हो जायें तो निःसंदेह वह गप्प देखते-देखते हजारों लाखों व्यक्तियों में फैल जाती है और लालची या भीरु लोगों का यह देश देखते-देखते उस जंजाल में पड़कर अपना समय और धन गंवाने लगता है।करामाती छलावे—मथुरा जिले में एक तालाब है जहां अष्टमी के दिन नहाने से सन्तानहीनों के सन्तान होने की बात कही जाती है। तथ्य उसमें रत्ती भर भी नहीं पर एक को देखकर दूसरा उसकी नकल करता है। परिणाम चाहे किसी को कुछ न मिले पर कहीं भीड़ होना ही इस बात का प्रमाण मान लिया जाता है कि जब इतने लोग आते हैं तो क्या वे सब कोई बेवकूफ थोड़े ही हैं। एक दूसरे की बुद्धिमानी पर भरोसा करते हुए इस प्रकार अन्ध-विश्वासियों की शृंखला बढ़ती रहती है। अगली पंक्ति के लोग निराश होकर पछताते हैं पर पीछे वाले उनका अनुकरण करते चले जाते हैं। इस प्रकार यह भ्रम-जंजाल की जंजीर काफी लम्बी खिंचती चली जाती है।उड़ीसा प्रान्त के अंगुल नामक छोटे से ग्राम में उत्पन्न हुए एक दस वर्षीय बालक के बारे में यार लोगों ने अफवाह उड़ाई कि वह पूरा सिद्ध और चमत्कारी है उसके दर्शन मात्र करने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है। अफवाह बहुत जोरों से फैली और उड़ीसा ही नहीं सैकड़ों मील दूर तक के आदमी वहां पहुंचे छोटे गांव में पानी भोजन सफाई का उतना प्रबन्ध न हो सका। फलस्वरूप कुछ ही दिन में वहां भयानक हैजा फैला और अन्धी भेड़ों में से हजारों आदमी हैजे के शिकार होकर मर गये। आखिर पुलिस को वह लड़का तथा उसके बहाने अपना उल्लू सीधा करने वाले उस्ताद लोग फिर गिरफ्तार करने पड़े।मथुरा जिले में राया स्टेशन के पास एक धूर्त बाबा ने अपने चेलों के सहारे ऐसा ही षडयन्त्र रचा। उसके पास एक ही मिट्टी का बर्तन रहता था। ऐसे बर्तन को उधर ‘मलरिया’ कहते हैं। चूंकि उसकी पहचान मलरिया से की जाती थी इसलिये उसका नाम ‘मलरिया बाबा’ रख दिया गया। उसके सिद्ध और करामात की बात खूब उड़ाई गई। लाखों की संख्या में भीड़ पहुंचने लगी। तांगे, इक्के वालों ने किराया दूना चौगुना कर दिया। खाद्य पदार्थ बेचने वालों की पौ-बारह हुई। मनोकामना पूरी कराने के लिये लाखों लोग जा पहुंचे। लाभ तो किसी का क्या होना था, पर बाबा के खूब गुलछर्रे उड़े। इस झुण्ड में जेब कटों, उठाईगीरों और दूसरे बदमाशों ने भरपूर मनमानी की। पीछे पुलिस के हस्तक्षेप करने पर उसे भागना पड़ा। जांच करने पर पता चला कि वह बाबा कई बार का सजाबार अभ्यस्त अपराधी था। अब उसने अपराध करने का यह नया तरीका ढूंढ़ निकाला।सिद्ध पुरुषों के चमत्कार—सिद्ध पुरुषों और करामाती बाबाओं के पीछे ऐसे ही षडयन्त्र छिपे रहते हैं। उनके पीछे दश-बीस निठल्ले किस्म के अवांछनीय व्यक्ति होते हैं। वे इन करामाती बाबाओं के चमत्कारों की अनर्गल किम्वदन्तियां फैलाते रहते हैं। भोले व्यक्ति उनके बहकावे में आते रहते हैं और अन्ध-श्रद्धा में ग्रस्त अपना धन एवं समय गंवाते रहते हैं। कई बार तो इन षड़यंत्रों में बहकाई हुई स्त्रियां अपना शील सन्तोष तक गंवाने लगती हैं और पुरुष किसी भयानक षडयन्त्र के शिकार बन जाते हैं।यह धन्धा गांव-गांव और नगर-नगर पनप रहा है। कोई करामाती बाबा हर जगह मिल जाते हैं। शहरों में यह लोग सट्टा बताते हैं। सट्टा खेलने वाले जुआरी अब हर जगह बढ़ रहे हैं। मुफ्त का धन पाने की हविस लोगों को चोर, डाकू, ठग, उचक्का बनने के लिये बाध्य करती रहती है, जो उसे नहीं कर पाते वे या तो जुआरी बनते हैं या धोखेबाज। जुआ अपने विविध रूप में खूब पनप रहा है। कस्बों और शहरों में हर गली मुहल्ले में सट्टा खाने वाले दुकानदार पैदा हो गये हैं। दिखाने को तो वे कोई और रोजगार लिये बैठे रहते हैं पर खास धंधा उनका सट्टा होता है। इसी बहाने वे भोले लोगों का धन अपहरण करते रहते हैं। इन लोगों की मिली भगत उन करामाती बाबाओं से रहती है। लोग बाबा से सट्टा पूछने जाते हैं। बाबा किसी को गाली देते हैं, किसी को प्रसाद देते हैं, किसी की ओर उंगली उठाते हैं, किसी से ऊट-पटांग बातें कहते हैं। बस इसी आधार पर भक्त लोग सट्टा खुलने के नम्बर की सम्भावना पर उखाड़-पछाड़ करते हैं। कोई कुछ अनुमान लगाता है कोई कुछ। सभी भक्त अपने-अपने ढंग से अन्दाज लगाकर सट्टा लगा आते हैं। इन में से किसी एकाध का आ गया तो वह बाबा की भेंट-पूजा चढ़ाता है और सिद्धाई का विज्ञापन करता है। इससे दूसरे लोग प्रभावित होते हैं। सोचते हैं हमारी भेंट पूजा में कुछ कमी रही उसी से बाबा की कृपा नहीं हुई। अब अधिक भेंट पूजा करेंगे ताकि बाबा की कृपा से हमें भी लाभ हो जायगा। यह सिलसिला चलता रहता है। पुराने निराश भक्त हटते जाते हैं। नये आते जाते हैं, इस प्रकार यह धन्धा बराबर चलता रहता है। सट्टा बताने से लेकर सन्तान पैदा करने तक और बीमारियां दूर करने से लेकर भूत-पलीतों को वश में करने तक हर विद्या में यह बाबा पूर्ण निष्णात होते हैं। हर मनोकामना की पूर्ति का व्यापार इनकी दुकानों पर होता है। सौ आते हैं तो पचास को सफलता और पचास को असफलता मिलती ही है। जो असफल रहते हैं वे अपने भाग्य को कोसते हैं और जो सफल हो जाते हैं वे बाबा के गुण गाते और नये-नये चन्डूलों को फंसा कर लाते रहते हैं।सबसे सस्ता, सबसे लाभदायक धन्धा—अब तो थोड़ी समझदारी भी बढ़ गई है, और लोग कुछ-कुछ तर्कवादी भी बन गये हैं, थोड़ी उखाड़ पछाड़ और जांच पड़ताल भी करते हैं पर कुछ समय पहले इतना भी न था। तब भोले लोगों की संख्या अधिक थी, तब धूर्त लोगों द्वारा उनकी श्रद्धा का शोषण खूब होता था। कुछ दिन पहले ऐसे तथाकथित सिद्ध पुरुष बहुत थे और उनमें से कई तो बहुत विख्यात हो गये हैं तथा उनके उत्तराधिकारी आज करोड़ों रुपये की सम्पत्ति के स्वामी बने हुए हैं। महाराष्ट्र के एक मुसलमान बाबा कुछ दिन पूर्व ऐसे पूजे कि लोगों ने उन्हें शंकर जी का अवतार तक कहना शुरू कर दिया। उनके फोटो घर-घर में पूजे जाते हैं और बच्चों के गले में उनके चित्र के ताबीज लटकाये जाते हैं। उन्हें मरे काफी दिन हो गये पर अभी भी उनके अनुयायी उन्हें अर्ध-जीवित बताते हैं और छाया रूप में लोगों को दर्शन देने तथा मनोकामनाएं पूरी करने की किम्वदन्ती बताते हैं। इसी आधार पर उनका धन्धा अब पहले से भी अधिक बढ़ गया है। इस करामात के पीछे और कुछ नहीं केवल एक ही तथ्य रहता है, दलालों द्वारा किया मिथ्या प्रचार। यह प्रचार धीरे-धीरे किम्वदन्ती बनता चला जाता है और लोग उसे लगभग सत्य मान बैठते हैं। फिर वही प्रचार अन्धविश्वासी भक्तों द्वारा एक दूसरे में चलने लगता है।बेचारे बालाजी की दुर्गति—कहीं मनुष्य सिद्ध पुरुष बनते हैं तो कहीं देवता की करामात से यह धन्धा चलाया जाता है। पिछले दिनों ‘‘बालाजी’’ (हनुमानजी) के नाम की इस सम्बन्ध में बड़ी दुर्गति की गई है। बेचारे ‘‘बालाजी’’ (हनुमान जी) की आत्मा जहां होगी वहां से इन दुराचारियों पर अपार रोष और धिक्कार बरसा रही होगी कि उनके  रामभक्त, धर्म-परायण, एवं लोक-सेवी स्वरूप को बदलकर क्या से क्या बना दिया गया।मथुरा में घाटी बहालराय मुहल्ले में एक किराये का मकान लेकर एक व्यक्ति ने दीवार पर सिन्दूर और घी से बालाजी (हनुमानजी) की मूर्ति बनाली। चार-पांच खुराफाती औरतें और तीन-चार पुरुष अपने एजेन्ट बना लिए, आमदनी में सब का हिस्सा निश्चित कर दिया। अब वे लोग सवेरे से ही आकर जम जाते। धूप जलती, दीपक जलता, बालाजी उन लोगों के शरीर में आते—मुख्य महन्त पूछता—इस भगत का कष्ट कब तक दूर होगा? क्यों यह कष्ट में पड़ा है? अब बालाजी का आवेश अन्य-अन्य बातें बताता। इसे अमुक भूत लगा है, इसकी विपत्ति का अमुक कारण है। मेरी पूजा में यह लाओ, यह दोगे तो अच्छा होगा। वह वस्तुएं लाई और दी जातीं। अच्छे होने की घोषणा की जाती। जिस पर आवेश आता वह कहता—बस अब मैं अच्छा हो गया ऐसे-ऐसे ही प्रपंच दिन भर गढ़े जाते। दर्शक बढ़ने लगे। नये-नये लोग आने लगे। संसार में किसी न किसी प्रकार का कष्ट सब को है। उनके ऐसा करने में यदि देवता की सहायता मात्र से काम चल जाता है तो इससे सस्ता तरीका और क्या हो सकता है। लोगों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती गई। साधारण प्रश्न पूछने का नाम ‘‘कच्ची अर्जी’’ और उपचार कराने की प्रार्थना का नाम ‘‘पक्की अर्जी’’ रखा गया। कच्ची अर्जी की फीस दस आना और पक्की अर्जी की डेढ़ रुपया रखी गई। दिन भर में सौ-दो-सौ कच्ची अर्जी और पक्की अर्जी वाले आने लगे। रोज दो चार सौ का धन्धा होने लगा। दलाल और बढ़ाये गये जो गली मुहल्लों में जाकर प्रचार करते और नये-नये शिकार फंसाकर लाते। इस तरह अच्छी-खासी आमदनी होने लगी और कोई बीमार या कष्ट ग्रस्त बनकर अपने को बहुत दूर से आया हुआ परदेशी बताकर वहां आने वाले और शरीर में बालाजी का आवेश प्रदर्शित करने वाले दलाल भारी आमदनी करने लगे। यह षड़यंत्र जब बहुत बढ़ चला और उसकी आड़ में अनेक तरह के अनाचार पनपने लगे तब उस मुहल्ले के लोगों ने उग्र विरोध किया और पुलिस को बुलाया। तब वे लोग अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर भागे। सुनते हैं कि अब उन्होंने भरतपुर के आस-पास दूसरी किसी जगह अपना वही धंधा चालू कर लिया है।‘‘बालाजी’’ के नाम पर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में ऐसे ही षड़यंत्र पूर्ण अड्डे चल रहे हैं। जहां अधिकांश तो दलाल लोग कौतुक रचे रहते हैं। कुछ भोले और कमजोर तबियत के लोग भी उससे प्रभावित होकर वैसा ही अनुकरण की मनोवैज्ञानिक परिपाटी में उलझ जाते हैं। मानसिक दुर्बलताओं से ग्रस्त व्यक्तियों की इस देश में कमी नहीं। अन्ध मान्यताएं उन्हें घसीट कर ऐसे अड्डों पर पहुंचा देती हैं। विश्वास बन जाने और चित्त हलका हो जाने से कई व्यक्तियों को लाभ भी होता है, पर अधिकांश को निराश ही होना पड़ता है, क्योंकि वहां कुछ भी नहीं होता। जो कुछ लाभ-हानि होती है उसमें यदि कुछ तथ्य तलाश किया जाय तो पहुंचने वाले  का विश्वास मात्र ही एक छोटा कारण दिखाई देता है। ऐसा विश्वास तो किसी भी छोटे बड़े माध्यम को अपना कर लिया जाय तो मानसिक दुर्बलताग्रस्त, भूत पलीत के सताये हुए व्यक्ति को लाभ हो सकता है। जिन पर उस प्रकार का मनोवैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता वे सर्वथा खाली हाथ लौटते हैं उन्हें रत्ती भर भी लाभ नहीं होता। लाभ तो तब हो जब वहां कुछ तथ्य भी तो हो।भूत-पलीतों की भ्रान्त कल्पना—छोटे दर्जे के लोग किसी व्यक्ति को सिद्ध बनाकर या देवता के चमत्कार पर अपना धन्धा चलाने की अपेक्षा भूत-पलीतों के नाम पर अपनी दुकान चलाते हैं। ओझा, सयाने, झाड़-फूंक करने वाले दूसरी श्रेणी में आते हैं। किसी को बुखार खांसी, दर्द, घाटा, मुकदमा कुछ भी कष्ट क्यों न हो, ओझाजी उसे भूत की करतूत ही बतावेंगे। उसे ठीक करने के लिए भूत को भगाना या मनाना पड़ेगा। इसका खर्चीला विधान ओझाजी ही बतावेंगे। जो झाड़-फूंक पूजा-पत्री बताई जायगी वह ऐसी होगी, जिसमें बताने वाले या विधान कराने वाले का आर्थिक स्वार्थ किसी न किसी रूप में अवश्य सिद्ध होता है। अपने आपको भूतों का प्रतिनिधि या उन्हें बुलाने-भगाने की सामर्थ्य से सम्पन्न बताकर ओझाजी सामान्य लोगों पर अपना रौब-आतंक जमाये रहते हैं। उनकी सामर्थ्य से डरकर लोग उन्हें प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं इस संदर्भ से उनके कई प्रकार के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष-स्वार्थ सिद्ध होते रहते हैं।भूतों की करतूत की कितनी ही अनर्गल गाथाएं ये ओझा लोग फैलाते रहते हैं। सर्वथा कपोल-कल्पित गाथाओं की अपनी बीती या अपनी देखी बताते रहते हैं। भोले लोग उस पर विश्वास कर लेते हैं, भूतों के अस्तित्व और आतंक की बात उनके अन्तर्मन में बैठ जाती है। शरीर में कोई कष्ट होने या किसी तरह की परोक्ष कठिनाई आने पर वे उसमें किसी भूत की करतूत खोजने लगते हैं। मन में एक अज्ञात भय समाया रहता है। डरा हुआ मन एक के बाद दूसरी कठिनाइयों और घटनाओं का तारतम्य भूत की करतूतों से बिठाता है और एक-एक करके वह घटनाक्रम को भूतों का एक क्रमबद्ध आक्रमण मान लेता है। अब उसे पक्का विश्वास जम जाता है कि वह भूतों के उत्पीड़न से आक्रान्त है। उसकी यह मान्यता एक प्रकार के भूतोन्माद का रूप धारण करके उस पर सवार हो जाती है। स्वयं मोहित भयाक्रान्त मन उससे तरह-तरह की ऐसी चेष्टाएं कराता है। जैसे मानो भूत ही उनके शरीर में प्रवेश करके कुछ कह या कर रहा है। उस प्रकार अपने विश्वास के द्वारा विनिर्मित यह भूत कई बार इतना उग्र एवं प्रबल हो जाता है कि वह रोगी के प्राण लेकर ही हटता है। कितने ही बेचारे अन्ध विश्वासी लोग इसी प्रकार अपनी जान गंवाते एवं चिरकाल तक दुःसह कष्ट में देखे गये हैं।भूत-विश्वासी लोग ऐसे रोगी की मान्यता को और भी पुष्ट करते रहते हैं। स्याने-दिवाने, ओझा तान्त्रिक आ-आकर रोगी को भ्रान्त मान्यताओं को और भी परिपुष्ट करते रहते हैं। इस प्रपंच का घर के छोटे-छोटे बालकों तथा पास-पड़ौस के कमजोर तबियत के दूसरे लोगों पर भी असर पड़ता है और वे भूतवाद की मान्यताओं के विश्वासी बन जाते हैं। उन्हें भी कोई भय या कष्ट होता है तो भूत की आशंका मान बैठते हैं, उसी तरह की झाड़-फूंक कराते हैं। इस तरह छूत की बीमारी की तरह यह अन्ध-विश्वास बढ़ता और फलता-फूलता रहता है भारतवर्ष में अगणित व्यक्ति इस भूतवाद के मानसिक भय व भ्रम का त्रास पाते और अपनी मनोभूमि को दुर्बल बनाते चले जाते हैं।भूतवाद एक अवास्तविक भ्रम—देखा गया है कि यह भ्रम पिछड़े हुए लोगों में ही अधिक पाया जाता है। पढ़े लिखे, सुशिक्षित और समझदार लोगों में ऐसी अनर्गल उछल-कूद कहीं भी नहीं पाई जाती। विचारने की बात है कि यह भूतों का अस्तित्व होता और वे बात-बात में लोगों को डराते परेशान करते रहे होते तो यह बात क्या बिना पढ़े, क्या देश में क्या विदेश में, सर्वत्र ही  उनका अस्तित्व दृष्टिगोचर होता। बुखार, खांसी, दस्त, दर्द आदि बीमारियों का अपना अस्तित्व है। वे बिना किसी देश, धर्म, जाति, स्तर का ख्याल किये सभी लोगों को समय-समय पर कष्ट देती रहती हैं। पर भूतों के बारे में ऐसी बात नहीं है वे केवल पिछड़े हुए कमजोर मानसिक स्तर के लोगों को ही अपना परिचय देते हैं। जो उन पर विश्वास नहीं करते, उनके पास भी नहीं फटकते। किसी आर्य समाजी को भूत नहीं सताता। जिन आदिवासियों और भील, कोलों को पग-पग पर भूत, प्रेतों की मनौती चढ़ानी पड़ती है, उसी क्षेत्र में ईसाई धर्म के प्रचारक पादरियों को कोई भूत छूता भी नहीं। इसका क्या कारण है? कारण स्पष्ट है जिनके मन में भूतवाद की जितनी गहरी भ्रान्ति जमी होगी वे उतने ही उस व्यथा से आक्रान्त हो रहे होंगे। जिन्होंने इसे प्रपंच-मात्र समझा होगा और इस व्यर्थ के बतंगड़ से सर्वथा अछूते रहे होंगे, उन्हें कोई भूत स्पर्श तक न कर रहा होगा।मानसिक दुर्बलता बढ़ाने वाला यह भूतवाद का भ्रम जंजाल हमारे देश में गरीब एवं पिछड़े लोगों के लिए एक घातक जंजाल बना हुआ है। कितने भोले लोगों के लिए यह भ्रान्ति एक भयानक बीमारी बनकर शोषण कर रही है। गरीबी, बीमारी, अशिक्षा के त्रिदोष से पीड़ित भारत की गरीब जनता के लिए भूतोन्माद की एक और बीमारी एक दुसह भार बनी हुई है। कितने ही संडे-मुसंडे लोग इसी बहाने से अपना उल्लू सीधा करते हैं और कितने ही बेकस एवं बेबस लोग अपने शारीरिक, मानसिक, आर्थिक शोषण करते हुए बर्बाद होते रहते हैं।टोना-टोटका के गोरख-धन्धे—टोना-टोटका करने वाले लोग एक दूसरे को डराते, धमकाते और बे सिर-पैर की भ्रान्तियों के शिकार होते रहते हैं। अमुक स्त्री कल हमारे बच्चे को घूर-घूर कर देख रही थी, इसलिए उसकी नजर लग गई और हमारा बच्चा बीमार हो गया। ऐसी आशंका मन में कई व्यक्ति उपजाते हैं और अपनी उस कल्पना को सत्य मान बैठते हैं। कोई बेचारी स्त्री अपने महज वात्सल्य से ही बच्चे को देख रही थी, और चाहे बच्चे को बीमारी का कारण उनके रहन-सहन की कोई अव्यवस्था या शारीरिक स्थिति ही थी, पर उसका दोष उस गरीबिनी को लग गया। नजर लगा देने की दोषी वह ठहराई गई। उससे घृणा की गई, द्वेष उत्पन्न किया गया और अवसर मिला तो उसे उसी अपराध में किसी प्रकार दंडित भी किया गया। सोचने की बात है कि नजर लगने की मान्यता के पीछे क्या कुछ सचाई भी है। यदि ऐसा होता तो बाल-विकास प्रदर्शनियों में पुरस्कार पाने वाले, जिन्हें देखने और सराहने भारी भीड़ पहुंचती है, सभी उन्हें दुलारते हैं, जिनके चित्र पत्रिकाओं में छपते हैं, वे अवश्य ही नजर लगने के शिकार हो गये होते। काले, कलूटे, भेड़े-भोंड़े, लकड़ी से पैर और लौकी सा पेट लिये हुए, नाक टपकाते और कपड़ों में रोज टट्टी करते हुए, लड़ैले लल्ला ही इस नजर गुजर के शिकार होते हैं, जबकि अंग्रेजों और दूसरी समुन्नत जातियों के बच्चे गुलाब के फूल जैसे सुन्दर और गेंद की तरह उछलते फिरते हैं, उन्हें न तो नजर लगती है और न वहां कोई ऐसी बेहूदा बातों पर विश्वास ही करता है। कहीं किसी की नजर न लग जाय इसलिए माथे पर काजल का काला टीका कोई अपने बच्चों को नहीं लगाता और न उन्हें इसलिये राख चटाता है कि दूध पीकर घर से बाहर निकलने पर कोई भूत उन्हें न घर दबोचे। यह उपहासास्पद मूढ़ मान्यताएं तो अभागे भारतीयों के पल्ले ही बंधी हुई हैं।रोमांचकारी दुष्परिणाम—टोना-टोटका के नाम पर आए दिन जघन्य कृत्य होते रहते हैं जिनकी चर्चा कभी-कभी अखबारों में छपने वाले समाचारों से विचारशील लोगों तक भी पहुंच जाती है तो उन्हें इस पिछड़ेपन पर भारी वेदना होती है। तांत्रिक लोग अपने चंगुल में फंसे हुए चण्डूलों से घृणित कुकर्म कराते रहते हैं। युग-निर्माण योजना (पाक्षिक) में गत वर्ष इस प्रकार के जो समाचार छपे हैं उन्हें पढ़कर  यही कहना पड़ता है, कि हे भगवन्! तू हमें इस घोर अन्धतमिस्रा से न जाने कब तक उबारेगा। ऐसे नृशंस समाचारों की कुछ वानगी नीचे देखिये। (1) चांदा जिले की पुलिस ने तीन गोड़ों को नर-बलि के आरोप में गिरफ्तार किया। उन पर आरोप यह था कि उनने अपने किसी प्रयोजन की सिद्धि के लिये देवी को प्रसन्न करने के निमित्त एक रास्ता चलते व्यक्ति को काट डाला और उसका खून खुद पिया। (2) अमृतसर में करतारचन्द नामक शरणार्थी युवक को पुलिस ने गला काट कर आत्म-हत्या करते हुए गिरफ्तार कर लिया। युवक देवी को प्रसन्न कर उससे अभीष्ट वरदान प्राप्त करने के लिये अपनी बलि देना चाहता था। इसके लिए वह अपना गला काट पर पूरी तरह कट न सका और घायल अवस्था में चिल्लाते  हुए पुलिस द्वारा पकड़ा गया। (3) ग्राल डोरीवाला थाना जेड़ीवाला जिला अमृतसर के एक व्यक्ति को दस वर्ष की कैद का दंड दिया है। अपराधी ने एक साधु के कहने पर सन्तान प्राप्ति के उपाय रूप में पड़ौसी की एक तीन वर्ष की बच्ची की बलि दे दी थी। (4) बाराबंकी जिले के खेता सराय गांव में एक धोबी अपने डेढ़ वर्षीय बालक को रात में अपनी सोती हुई पत्नी की बगल से उठाकर ले गया और चौराहे पर ले जाकर गोबर की मूर्ति के आगे सिर काटकर चढ़ा दिया। कहते हैं कि धोबी किसी देवता से कुछ वरदान पाना चाहता था, इसके लिये उसने ऐसा किया। (4) कानपुर के जूहीलेवर मुहल्ले में एक 24 वर्षीय महिला तथा उसके पति को पुलिस ने इसलिये पकड़ा कि उन लोगों ने किसी तांत्रिक के बहकावे में आकर अपने पड़ौसी की आठ वर्षीय बालिका को छिपा लिया और उसकी निर्देश पूर्वक बलि करदी। (6) इटावा जिले के औरैया नगर में एक धन लोलुप आढ़तिया ने एक रिक्शा चालक का दो वर्षीय बालक चुरा मंगाया और उसकी बलि करदी। (7) गुड़गांवा क्षेत्र के पटौदी गांव में एक महिला ने नौ झोंपड़ियों में आग लगादी। इस निस्संतान स्त्री से किसी तांत्रिक ने कह दिया था कि यदि वह नौ झोपड़ियों में आग लगादें तो उसे बच्चा हो जायगा। (8) इन्दौर के सैशन जज ने चिमाली गांव की एक 22 वर्षीय विवाहिता युवती को आजन्म कारावास की सजा दी है। उक्त महिला ने अपने एक वर्षीय बालक की शुभ कामना के लिए दूसरे के दस वर्षीय बालक की हत्या कर दी थी। उसे किसी ने बताया था की तेरा बच्चा तभी जियेगा जब किसी दूसरे के बच्चे की बलि दे देगी। उसने वैसा ही किया भी। (9) राबर्टस गंज (मिर्जापुर) की कंजड़ बस्ती में कंजड़ों के मुखिया ने किसी पुरुष के व्यभिचार दोष से सफाई की शर्त यह रखी कि यदि उसे गरम लोहे की सलाख से जलाया जाय और वह न जले तो ही उसे सच्चा माना जायगा और 200) पुरस्कार भी दिया जायगा पर यदि जलाया तो 381) दण्ड भी देना पड़ेगा और नाक कान भी काट लिये जायेंगे। यह फैसला कार्यान्वित होने ही वाला था कि पुलिस आ धमकी और गरम लोहे की सलाख समेत कंजड़ों के मुखिया पकड़ लिये गये। (10) लखीमपुर जिले के दरेरी गांव के एक निवासी को यह बताया गया कि किसी तेली का सिर काटकर उसकी एक मास तक पूजा की जाय तो वह बोलने लगता है और भूत भविष्य तथा वर्तमान की बातें बताता है। उसने पड़ौस के गांव के तेली का सिर काट कर उसकी पूजा आरम्भ कर दी। पूजा को 20 दिन ही हो जाय थे कि पुलिस को पता चल गया और कटे हुए सिर समेत चार व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया गया। (11) तुमसर (मध्यप्रदेश) के समीप मुर्दी गांव के धन्नू नामक व्यक्ति को पुलिस ने सौतेली मां की हत्या के अपराध में पकड़ा है। कहते हैं अभियुक्त को यह विश्वास था कि सौतेली मां उस पर जादू-टोना कराया करती थी। (12) बस्तर में एक आदिवासी महिला को उस ग्राम के कई लोगों ने मिलकर इसलिए जला दिया कि उस पर जादू टोना करने और भूत-प्रेतों की शक्ति से सम्पन्न होने का संदेह था।अनुपयुक्त भ्रान्तियां—चेचक की बीमारी स्पष्टतः एक रक्त दोष एवं छूत से उत्पन्न होने वाला रोग है। अन्य रोगों की तरह समझदार लोग उसकी भी चिकित्सा कराते हैं। पर अभी भी शिक्षित और अशिक्षित दोनों ही वर्गों में ऐसे लाखों करोड़ों लोग मौजूद हैं, जो उसे ‘देवी जी’ का आगमन कहते हैं। उनका विश्वास होता है कि इलाज कराने से देवी नाराज हो जायगी इसलिए पूजा मनौती करना ही ठीक है। इस भ्रम में पड़े हुए परिवारों में कितने ही रोगी अपनी आंखें ही नहीं बहुमूल्य जिन्दगियां तक खो बैठते हैं। पर घर वाले खरवाहिनी शीतला देती के मंदिर में मनौती मनाने के अतिरिक्त और किसी उपचार का साहस नहीं कर पाते। देवी माता के रूठ जाने का भय उन्हें हर घड़ी सताता रहता है।वर्षा न होने पर स्त्रियों के नंगी होकर हल चलाने जैसे टोटके किये जाते हैं। पशुओं में बीमारी फैलने पर ओझा लोग एक बड़े से मिट्टी के पात्र में आग जलाते हुए एक जन समूह के साथ उसे गांव में घर-घर घुमाते हैं और गांव की सीमा रेखा पर उस अग्नि-पात्र को गाड़ देते हैं। उस सीमा से लगा हुआ जो गांव होता है वे सावधान रहते हैं कि कहीं हमारी दिशा में वह टोटका न गाड़ा जाय नहीं तो हमारे गांव में बीमारी फैल जायगी। इसी झंझट में कई बार तो गांव के लोगों में सामूहिक फौजदारी होते और कितने ही व्यक्तियों के घायल होते देखा गया है।उस प्रकार की अन्ध-मान्यताएं क्या किसी देश, धर्म या समाज का गौरव बढ़ा सकती हैं? नहीं, कदापि नहीं। प्रत्यक्षतः तो समय समय और शक्ति की बर्बादी उनमें है ही। प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से होने वाली हानियां भी कम नहीं है। इन भ्रान्तियों के दुष्परिणाम तत्काल तो जो होते हैं सो होते ही हैं, सब से बड़ी हानि यह है कि उस जंजाल में उलझे हुए मस्तिष्क एक प्रकार से प्रतिगामी और अवरुद्ध बन जाते हैं। सही तरह से सोच सकने की मौलिक प्रतिभा ही वे खो बैठते हैं। जो जिस तरह बहका देता है, उस तरह बहक जाते हैं और हवा में उड़ते हुए तिनकों की तरह अस्त-व्यस्त विचार तथा कार्य करते हुए अन्धकार पूर्ण भविष्य की ओर पैर बढ़ाते चलते हैं।यह स्मरण रखने की बात है कि इस दुनिया में जितना उपयुक्त है उससे कम अनुपयुक्त नहीं है। अच्छी और सही मान्यताओं की अपेक्षा बुरी, भ्रान्त एवं हानिकारक विचारधारा, प्रथा, परम्परा, का ही बाहुल्य है। इसलिए हमें सदा परख की कसौटी तैयार रखनी चाहिए। हर बात की वास्तविकता देखनी चाहिए। यदि कोई विचार, कोई विश्वास तथा कोई प्रचलन हमें अनुपयुक्त एवं अवास्तविक दिखाई पड़े तो साहस पूर्वक उसे स्वीकार करने से, अपनाने से इनकार कर देना चाहिए तभी हमारी मौलिकता एवं विवेकशीलता का विकास है। उज्ज्वल भविष्य की आकांक्षा करने वाले प्रत्येक प्रगतिशील व्यक्ति की मनोभूमि विवेकशीलता की दिशा में अधिकाधिक तीव्रगति से विकसित होना ही चाहिए।जब तक शरीर में दुर्बलता रहेगी तब तक कोई न कोई बीमारी आक्रमण करती ही रहेगी। जब तक मूर्खता रहेगी तब तक धूर्तता का बोलबाला भी बना रहेगा। जिनके पास विचार-शक्ति का अभाव है, किसी के भी बहकावे में आ जाते हैं, उन्हें ठगने के लिए भी कोई न कोई पैदा होता रहेगा। पिछले दिनों जनता की मानसिक दुर्बलता बढ़ी, अविद्या एवं अन्ध-श्रद्धा का अन्धकार छाया रहा, उसमें अनेक उल्लू चमगादड़ों की घात लगती रही है। वह प्रक्रिया अब भी चल रही है। फलतः धर्म की आड़ में ठगी करने वालों की संख्या कम नहीं हो रही वरन् बढ़ ही रही है। कितने ही व्यक्ति तो अपने आपको अवतार तक कहते फिरते हैं और भोले लोगों को उसी आधार पर उल्लू बनाते रहते हैं। अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए अवतार होते हैं, वे सज्जनता का त्राण और दुष्टता का विनाश करते हैं। इन आज के अवतारियों को इस कसौटी पर कसा जाय तो उनके कर्त्तव्य से रत्तीभर भी ऐसा आभास नहीं मिलता कि उन्होंने लोक-निर्माण के लिए कुछ भी ऐसा कोई किया हो जिससे यह कहा जा सके कि अवतार का प्रयोजन पूरा होता है, फिर भी भोली जनता विशेषतया भावुक स्त्रियां उनके पीछे लगी फिरती हैं और न जाने क्या-क्या आशा उनसे लगाये बैठी रहती हैं।लोगों की मान्यता है कि जो चमत्कार दिखा सके वह सिद्ध पुरुष या योगी होता है। पिछले दिनों हर महापुरुष के साथ चमत्कार दिखाने वाली बात जोड़ी जाती रही है इस मान्यता के भ्रम में फंसे हुए लोगों को कितने ही धूर्त लोग बाजीगरी के खेल दिखाते हैं। कई व्यक्ति मिलजुल कर षडयंत्र बनाते हैं और भोले लोगों को सामने कोई चमत्कार रचकर खड़ा कर देते हैं। तर्क एवं परख की क्षमता न होने से भोले लोग उनसे प्रभावित हो जाते हैं, फलस्वरूप बुरी तरह ठगाये जाते रहते हैं। नोट दूना करने वाले, सोना दूना करते वाले, गढ़ा धन बताने वाले, देवता सिद्ध कराने वाले, ठग आरम्भ में कुछ ऐसे ही चमत्कार दिखा देते हैं। लोग भावावेश में उन ठगों पर विश्वास कर लेते हैं और बुरी तरह ठगे जाते हैं। ऐसी घटनाएं आये दिन समाचार-पत्रों में छपती रहती हैं। सामान्यतः 56 लाख निकम्मे व्यक्ति कोई न कोई आडम्बर रचकर आसानी से अन्ध-श्रद्धालुओं को बहकाते और उनका शोषण करते रहते हैं।श्रद्धा जितनी श्रेयस्कर है, उतनी ही अन्ध-श्रद्धा हानिकारक। जो कुछ कहा जा रहा है, जो कुछ सुना जा रहा है, वह सभी सत्य नहीं हो सकता है। इस धूर्तता के युग में अगणित बे सिर-पैर की बातें प्रचलित हैं, अनेक मूर्खताएं बुद्धिमानों द्वारा भी की जाती रहती हैं। हर शिक्षित व्यक्ति बुद्धिमान् नहीं होता, हर व्यक्ति की बुद्धिमानी उसके निर्धारित कारोबार तक ही सीमित होती है, शेष बातों में वह अन्य साधारण लोगों की तरह मूर्ख भी हो सकता है, इसलिए किसी तथा कथित विद्वान, धनी या सत्ताधारी जो कुछ मानते या कहते सुने जायं उस पर भरोसा कर लेना भी उचित नहीं। हमें हर बात को तर्क और परख की कड़ी कसौटी पर कसना चाहिए और किसी बात को तथ्यों एवं प्रमाणों के आधार पर ही स्वीकार करना चाहिए। हम वास्तविकता एवं उपयोगिता को ही महत्व देने लगें तो अन्ध-विश्वासों के जंजाल से निकल कर सचाई का प्रमाण प्राप्त कर सकते हैं और सीधी राह चलते चलते हुए सुख-शान्ति का लक्ष्य पा सकते हैं।****समाप्त*
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