• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • गायत्री उपासना कैसे करें?
    • कुछ विशेष साधनाएं
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login


Back to Books

Books - गायत्री उपासना कैसे

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


गायत्री उपासना कैसे करें?

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


1 Last


ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

विधि पूर्वक साधना करना एक महत्व पूर्ण बात है। किसी कार्य को उचित क्रिया पद्धति के साथ किया जाय तो उसका लाभ और फल ठीक प्रकार होता है। अविधि पूर्वक किये हुए कार्य या तो असफल रहते हैं या उनका स्वल्प फल होता है। इसलिए गायत्री उपासकों को उपासना का विधि विधान भली प्रकार समझ लेना चाहिए।

शरीर को शुद्ध करके साधना पर बैठना चाहिए। साधारणतः स्नान द्वारा ही शरीर की शुद्धि होती है पर किसी विवशता, ऋतु प्रतिकूलता, या अस्वस्थता की दशा में हाथ मुंह धोकर या गीले कपड़े से शरीर पोंछ कर भी काम चलाया जा सकता है। साधना के समय जिन सूती वस्त्रों को शरीर पर धारण किया जाय वे धुले हुए होने चाहिए। पालती मार कर सीधे साधे ढंग से बैठना चाहिए। कष्टसाध्य आसनों से चित्त में अस्थिरता आती है। बिना बिछाये जमीन पर बैठना चाहिए। कुश का आसन, चटाई आदि के आसन सर्वोत्तम है। पशु चर्म गायत्री साधना के उपयुक्त नहीं।

माला तुलसी की या चन्दन की लेनी चाहिए। प्रातःकाल सूर्योदय से दो घंटे पूर्व गायत्री साधना आरम्भ की जा सकती है। दिन में किसी भी समय जप हो सकता है। सूर्य अस्त होने के एक घंटे बाद तक जप समाप्त कर लेना चाहिए। 2 घंटा प्रातःकाल के और 1 घंटा सायंकाल का यह तीन घन्टे छोड़ कर रात्रि के अन्य भागों में नियमित गायत्री साधना नहीं होती। हां मौन मानसिक जप किसी भी समय हो सकता है। प्रातःकाल पूर्व की ओर, मध्यान्ह को उत्तर की ओर, शाम को पश्चिम की मुख करके बैठने का विधान है। परन्तु यदि मूर्ति या चित्र किसी स्थान पर स्थापित हों तो दिशा का विचार न करके उसके सम्मुख ही बैठना उचित है।

माला जपते समय सुमेरु (माला के आरम्भ का सबसे बड़ा दाना) का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। एक माला पूरी होने पर उसे मस्तक से लगाकर पीछे को ही उलट देनी चाहिए। इस प्रकार सुमेरु का उल्लंघन नहीं होता। तर्जनी उंगली का जप के समय उपयोग नहीं किया जाता।

मल-मूत्र त्याग या किसी अनिवार्य कार्य के लिए बीच में उठना पड़े तो हाथ मुंह धोकर तब दुबारा बैठना चाहिए। जप नियमित संख्या में तथा नियत समय पर करना उचित है। यदि कभी बाहर जाने या अन्य कारणों से जप छूट जाय तो आगे थोड़ा थोड़ा करके उस छूटे हुए जप को पूरा कर लेना चाहिए और एक माला प्रायश्चित्य स्वरूप अधिक करनी चाहिए। जब स्नान की या विधिवत् पूजा की सुविधा न हो या घर में जन्म मृत्यु का सूतक हो गया हो तो मन ही मन मौन मानसिक जप करना चाहिए। जप उस प्रकार करना चाहिए कि कंठ से ध्वनि होती रहे, होठ हिलते रहें, परन्तु पास बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से उसे सुन समझ न सके।

गायत्री का अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य तीनों वर्णों को है। गायत्री उपासकों को यज्ञोपवीत अवश्य धारण करना चाहिए। अपनी गायत्री साधना के लिए किसी अनुभवी तथा सदाचारी व्यक्ति को ‘मार्ग दर्शक’ या गुरु अवश्य नियत कर लेना चाहिए। ताकि अपनी स्थिति के लिए किस प्रकार साधना करना उपयोगी होगा इस बात की उचित सलाह प्राप्त होती रहे। शास्त्रों में कहा गया है कि—‘निगुरा की साधना निष्फल जाती है।’ अनेक लोग अनेक प्रकार की बातें कह कर अपना मीन मेख निकाल कर साधक को संदेह में डाल देते हैं और उनकी श्रद्धा को शिथिल कर देते हैं। इसलिए साधक को अपने पथ प्रदर्शक (गुरु) की बताई हुई विधि को ही सर्वोत्तम मानकर चलना चाहिए। यदि उस विधान में कोई त्रुटि होगी तो उसका दोष उस गुरु पर रहेगा। साधक को तो अपनी शुद्ध निष्ठा के कारण शुभ फल ही मिलेगा। इसलिए स्वेच्छा पूर्ण मनमौजी साधना करने की अपेक्षा किसी अनुभवी पथ प्रदर्शक की सलाह लेना अधिक उपयुक्त है। नित्य की साधारण साधना में शाप मोचन मुद्रा आदि की आवश्यकता नहीं है।

साधक का आहार विहार सात्विक रहना चाहिए। पर जिनका आहार विहार सात्विक नहीं है ये भी उपासना कर सकते हैं क्योंकि उपासना के प्रभाव से उनकी बुराइयां बहुत जल्दी सुधरती हैं और वे कुछ ही दिनों में अनेक बुराइयों को छोड़ कर शुद्ध सतोगुणी बनने लगते हैं।

दैनिक साधना का क्रम यह है (1) भूत शुद्धि (2) पूजा (3) जप (4) प्रार्थना। आसन पर बैठकर अपने शरीर और मन को पवित्र बनाने के लिए देह पांच तत्वों को शुद्ध करने के लिए भूत शुद्धि की जाती है। इसे ही ब्रह्म संध्या भी कहते हैं। संध्या में पांच कृत्य करने पड़ते हैं। (1) आचमन (2) शिखा वंधन (3) प्राणायाम (4) अघमर्षण (5) न्यास। इनका विधान बहुत सरल है—

(1) जल भरे हुए पात्र में से दाहिने हाथ की हथेली पर जल लेकर उसका तीन बार आचमन करें। आचमन के समय गायत्री मन्त्र पढ़ें। तीन आचमनों का तात्पर्य गायत्री की हृीं—सत्व प्रधान श्रीं—समृद्धि प्रधान और क्लीं—बल प्रधान शक्तियों का मातृ दुग्ध की तरह पान करना है।

(2) आचमन के पश्चात शिखा को जल से गीला करके उसमें ऐसी गांठ लगानी चाहिए जो सिरा खींचने से खुल जाय। ऐसे आधी गांठ लगानी चाहिए जो सिरा खींचने से खुल जाय। इसे आधी गांठ कहते हैं। गांठ लगाते समय गायत्री मन्त्र का उच्चारण प्रयोजन ब्रह्म रन्ध्र में स्थित शतदल चक्र की सूक्ष्म शक्तियों का जागरण करना है। जिसके शिखा स्थान पर बाल न हों वे जल से उस स्थान को स्पर्श करले।

(3) ब्रह्म सन्ध्या अथवा भूत शुद्धी का तीसरा कोष प्राणायाम है। वह इस प्रकार करना चाहिए।

(अ) स्वस्थ चित्त से बैठिये, मुख को बन्द कर लीजिए, नेत्रों को बन्द या अधखुला रखिए, अब सांस को धीरे-धीरे नासिका द्वारा भीतर खींचना आरम्भ कीजिए और ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस मन्त्र का मन ही मन उच्चारण करते चलिए। और भावना कीजिए कि ‘‘विश्वव्यापी दुख नाशक, सुख स्वरूप, ब्रह्म की चैतन्य प्राण शक्ति को मैं नासिका द्वारा आकर्षित कर रहा हूं।’’ इस भावना और इस मन्त्र के साथ धीरे धीरे सांस खींचिए और जितनी अधिक वायु भीतर भर सकें भरीए।

(ब) अब वायु को भीतर रोकिये और ‘तत्सवितुर्वरेण्यं इस भाग का जप कीजिये साथ ही भावना कीजिए कि ‘‘नासिका द्वारा खींचा हुआ वह प्राण श्रेष्ठ है। सूर्य के समान तेजस्वी है। उसका तेज, मेरे अंग प्रत्यंग में, रोम-रोम में भरा जा रहा है।’’ इस भावना के साथ पूरक की अपेक्षा आधे समय तक वायु को रोक रखे।

(स) अब नासिका द्वारा वायु को धीरे-धीरे निकालना आरम्भ कीजिए और ‘‘भर्गो देवस्य धीमहि’’ इस मन्त्र भाग को जपिये तथा भावना कीजिए कि ‘‘यह दिव्य प्राण मेरे पापों को नाश करता हुआ विदा हो रहा है।’’ वायु को निकालने में प्रायः उतना ही समय लगाना चाहिये जितना वायु खींचने में लगा था।

(द) जब भीतर की वायु बाहर निकल जावे तो जितनी देर वायु को भीतर रोक रखा था उतनी ही देर बाहर रोक रखें अर्थात् बिना सांस लिए रहें और ‘‘धियो योनः प्रचोदयात्’’ इस मन्त्र को जपते रहें। साथ ही भावना करें कि ‘‘भगवती वेदमाता गायत्री हमारी सद्बुद्धि को जागृत कर रही हैं।’’

यह एक प्राणायाम हुआ। अब इसी प्रकार पुनः इन क्रियाओं की पुनरुक्ति करते हुए दूसरा प्राणायाम करें। सन्ध्या में यह पांच प्राणायाम करने चाहिये। जिससे शरीर स्थिर प्राण, अपान, व्यान, समन, उदान नामक पांचों प्राणों का व्यायाम प्रस्फुरण और परिमार्जन हो जाता है।

(4) अघमर्षण के लिए दाहिने हाथ की हथेली पर जल लेकर उसे दाहिने नथुने के समीप ले जाना चाहिये। समीप का अर्थ है छः अंगुल दूर। बांए हाथ के अंगूठे से धीरे-धीरे सांस खींचना आरम्भ करें। सांस खींचते समय भावना करें कि ‘‘गायत्री माता की पुण्य प्रतीक यह जल अपनी दिव्य शक्तियों सहित पापों का संहार करने के लिए सांस के साथ मेरे अन्दर प्रवेश कर रहा है। और भीतर से पापों को, मलों को, विकारों को, संहार कर रहा है।’’

जब पूरी सांस खींच चुकें तो बांया नथुना खोल दें और दाहिना नथुना अंगूठे से बन्द करदें और सांस बाहर निकालनी आरम्भ करें। दाहिनी हथेली पर रखे हुए जल को अब बांये नथुने के सामने करें और भावना करें कि ‘‘नष्ट हुए पापों की लाशों का समूह सांस के साथ बाहर निकल कर इस जल में गिर रहा है।’’ जब सांस पूरी बाहर निकल जाय तो उस जल को बिना देखे घृणा पूर्वक बांई ओर पटक देना चाहिए।

अघमर्षण क्रिया में जल को हथेली पर भरते समय ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’’ दाहिने नथुने से सांस खींचते समय ‘‘तत्सवितुर्वरेण्यं’’ इतना मन्त्र भाग जपना चाहिए और बांये नथुने से सांस छोड़ते समय ‘भर्गो देवस्य धीमहि’’ और जल पटकते समय ‘‘धियो योनः प्रचोदयात्’’ उच्चारण करना चाहिए।

यह क्रिया तीन बार करनी चाहिए जिससे काया के, वाणी के और मन के त्रिविध पापों का संहार हो सके।

[5] न्यास कहते हैं धारण करने को। अंग-प्रत्यंगों में गायत्री की सतोगुणी शक्ति धारण करने, स्थापित करने भरने ओत-प्रोत करने के लिए न्यास किया जाता है। गायत्री की ब्रह्म सन्ध्या में अंगूठा और अनामिका उंगली का प्रयोग प्रयोजनीय ठहराया गया है। अंगूठा और अनामिका उंगली को मिलाकर विभिन्न अंगों का स्पर्श इस भावना से करना चाहिए कि मेरे यह अंग गायत्री शक्ति से पवित्र तथा बलवान हो रहे हैं। अंग स्पर्श के साथ निम्न प्रकार मन्त्रोच्चारण करना चाहिए—

(1) ॐ भूर्भुवः स्वः—भूर्घांयै नमः। (2) तत्सवितुः—नेत्राभ्यां नमः। (3) वरेण्यं—कर्णाभ्यानमः (4) भर्गो—मुखायनमः। (5) देवस्य—कंठाय नमः। (6) धीमहि—हृदयाय नमः। (7) धियो योनः—नाभ्यै नमः। (8) प्रचोदयात्—हस्त पादाभ्यां नमः।

भूत शुद्धि या गायत्री की ब्रह्म संध्या यह छोटी सी है। कुछ मिनटों में पूरी हो जाती है। इस पंच क्रियाओं का क्या महत्व है, इनके साथ किन मनोभावनाओं का समावेश होना चाहिए यह सब बातें गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ में लिखी जा चुकी हैं, इन थोड़े से पृष्ठों में पूर्ण जानकारी का लिखा जाना संभव भी नहीं है।

जो साकार उपासना में विश्वास रखते हैं वे गायत्री की मूर्ति या शीशे में मढ़ा हुआ चित्र सामने रख कर उसका धूप, दीप, गंध, अक्षत, पुष्प, तांबूल, पुंगीफल आदि वस्तुएं उपलब्ध हों उनमें से पूजन करलें। जो निराकार उपासना पर विश्वास रखते हों वे चित्र या मूर्ति के स्थान पर अग्नि की स्थापना कर सकते हैं। धूप अगरबत्ती, घृत का दीपक आदि की आग को गायत्री का प्रतीक मान कर उसे प्रणाम करना चाहिए। गायत्री महाशक्ति के उस पूजा स्थान पर आगमन की भावना करते हुए यह आवाहन मन्त्र पढ़ना चाहिए:—

भूत शुद्धि या ब्रह्म संध्या के पश्चात पूजा का नम्बर आता है।

आयातु वरदा देवी अक्षरं ब्रह्म वादिनी ।
गायत्री छन्दसां माता ह्य योने नमोस्तुते ।।

पूजा के उपरान्त जप प्रारम्भ कर देना चाहिए। जप कम से कम एक माला (108 मन्त्र) अवश्य हो। अधिक मालाएं जपने की सुविधा हो तो 3, 5, 7, 9, 11 इस प्रकार विषम संख्या में मालाएं जपनी चाहिए। जप के समय आकाश में सूर्य समान तेजस्वी मंडल का ध्यान करना चाहिए उसके मध्य में साकार उपासक गायत्री माता की मूर्ति का और निराकार उपासक ‘ॐ’ अक्षर का ध्यान करते रहें।

जप पूरा हो जाने पर प्रार्थना स्वरूप त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थना एवं कोई गायत्री स्तोत्र या गायत्री चालीसा का पाठ किया जाता है। यह सब याद न हो तो केवल भावना से भी प्रार्थना हो सकती है। अन्त में विसर्जन मन्त्र पढ़ते पूजा समाप्त कर देनी चाहिए। विसर्जन मन्त्र यह है—

उत्तमे शिखरे देवि भूम्यां पर्वत मूर्धिनि ।
ब्रह्मणभ्योह्यनुज्ञानं गच्छ देवियथा सुखम् ।।

यह दैनिक साधन है। प्रातःकाल का समय इसके लिए सर्वोत्तम है। जिन्हें सुविधा हो प्रातः सायं दोनों समय कर सकते हैं। जल पात्र को सूर्य के सम्मुख अर्घ्यण रूप में चढ़ा देना चाहिए। पूजा चढ़ाई हुई वस्तुएं चावल नैवेद्य आदि चिड़ियों को डाल देने चाहिए। पुष्प आदि किसी जलाशय में पहुंचा देने चाहिए। पूजा की वस्तुएं इधर उधर पैरों कुचलती न फिरें इसका ध्यान रखना चाहिए। यह, दैनिक साधना विधि सर्व साधारण के लिए नित्य प्रयोग करने की है। इससे मनुष्य की आत्मा निर्मल होती है तथा दैवी तत्व अपने भीतर बढ़ने से अनेक प्रकार के अध्यात्मिक एवं सांसारिक शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।




1 Last


Other Version of this book



गायत्री उपासना कैसे
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • गायत्री उपासना कैसे करें?
  • कुछ विशेष साधनाएं
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj