• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • युगधर्म का परिपालन अनिवार्य
    • गरीबों द्वारा अमीरी का आडम्बर
    • तीनों उद्यान फलेंगे और निहाल करेंगे
    • दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे
    • साधनों से भी अधिक सद्गुणों की आवश्यकता
    • उदारता अपनाई जाये
    • मन: स्थिति बदले, तो परिस्थिति बदले
    • परिवर्तन का आधार तो ढूँढ़ें
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login


Back to Books

Books - मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 3 5 Last
विभूतियों को सही गलत तरीके से अर्जित कर लेना एक बात है और उनका सदुपयोग कर सकना सर्वथा दूसरी। सम्पदाओं के संग्रहकर्ता इस संसार में असंख्यों भरे पड़े हैं, पर जो उनका सही सदुपयोग कर पाये, वे खोजने पर भी उँगलियों पर गिनने जितने ही मिलेंगे। इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि सफलताएँ अर्जित करने वाले को सदुपयोग नहीं आता और जो उसे सही प्रयोजनों में प्रयुक्त कर सकते हैं, वे पुरुषार्थ को अर्जन के स्तर तक पहुँचा सकने में समर्थ नहीं हो पाते। काश, प्रतिभा और सदाशयता का एक ही केन्द्र पर केन्द्रीकरण बन पड़ा होता, तो यह संसार कितना सुखी और समुन्नत दृष्टिगोचर होता?

    सदुपयोग न बन पड़े तो इसमें भी किसी प्रकार संतोष किया जाता रह सकता है कि जो कमाया गया था, वह निरर्थक गुम गया, पर कष्ट तब होता है कि जिसके सदुपयोग से व्यक्ति और समाज का बहुत कुछ हित साधन हो सकता था, उसका ठीक उल्टा प्रयोग बन पड़ा और अनर्थ का वह सरंजाम जुटा, जिससे कम से कम बचा तो जा सकता था।

    समर्थ व्यक्ति ही उद्दण्डता अपनाते और अनाचार पर उतारू होते हैं। सम्पन्न लोग ही अपने वैभव को ऐसे प्रयोजनों में नियोजित करते हैं, जिनसे शोषण, उत्पीड़न और पतन- पराभव का माहौल बनें। संसार में छल, छद्म और प्रपञ्च के जाल बिछाने वालों में प्रधानतया वही लोग रहे हैं, जिन्हें विद्वान समझा और बुद्धिमान कहा जाता है। युद्धोन्माद भड़काने और असंख्यों पर अगणित विपत्तियाँ ढाने वालों में सत्ताधारी ही अग्रणी रहें हैं। अच्छा होता यह मूर्धन्य कहे जाने वाले सफल न होते। उस सफलता को क्या कहा जाये? जो विभूतियों के रूप में जब किसी पर विषम ज्वर की तरह चढ़ दौड़ती हैं, तो उसे एक प्रकार का उन्मादी बनाए बिना नहीं रहतीं। बदहवासी में लोग अधपगलों जैसी उद्दण्डता अपनाने के लिए उतारू हो उठते हैं।

    गए- गुजरे लोग किसी का बहुत भला नहीं कर सकते। उनके लिए अपनी गाड़ी घसीटना ही भारी पड़ता है। वे सब तो दरिद्रता, दुर्बलता और अशिक्षा के दल- दल में धँसे रहने के कारण किसी की कुछ भलाई भी नहीं कर सकते ।। सेवा सहायता का सुयोग उनसे बन ही नहीं पड़ता ।। इतने पर भी यह संतोष की बात है कि तथाकथित समर्थों की तरह वे अपनी चिनगारी को दावानल बनाकर, सुविस्तृत वन प्रदेशों को जला डालने की दृष्टता तो नहीं कर पाते।

    लोक चिन्तन को दिग्भ्रान्त करने में जितना साहित्यकारों, कलाकारों, धर्मोपदेशकों, नेतृत्व करने वालों ने सर्वसाधारण को भड़काया है, उतना कदाचित् ही संसार के समस्त अशिक्षित कर सके हों। सम्पत्ति वालों ने, कलाकारों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों को अपने पैसे के बल पर खरीदा और कठपुतली की तरह नचाया है। कभी वैज्ञानिकों की स्वतन्त्र सत्ता रही होगी और वे लोकोपयोगी आविष्कार करते रहे होंगे, पर अब तो साधनों के सम्मुख उन्हें भी आत्मसमर्पण कर देना पड़ा है। वे वही सोचते- खोजते हैं, जो उनके अन्नदाता उनसे चाहते हैं। किसी की बुद्धिमत्ता ही नहीं, ईमान खरीद लेने तक का दावा तथाकथित सुसम्पन्न करने लगे हैं। उन्हें देवताओं और भगवानों को भी अपने साधनों के बल पर कुछ भी करने के लिए विवश करने की जुर्रत होने लगी है।

    साधनों की कमी पड़ने से कठिनाई बढ़ने की बात समझ में आती है, पर यह तथ्य और भी अधिक गम्भीरतापूर्वक समझा जाना चाहिए कि उनका बाहुल्य होने पर भी यदि दुरुपयोग चल पड़े, तो विपत्तियाँ और भी अधिक बढ़ेंगी। चाकू न होने पर शाक तरकारी काटने का काम अन्य किसी उपकरण से भी लिया जा सकता है ,, पर कोई चमकीला, धारदार तथा कीमती चाकू पेट में घुस पड़े, तो समझना चाहिए अभाव की तुलना में वह उपलब्धि और भी अधिक भारी पड़ी।

    पुरातन काल में साधन आज की अपेक्षा निश्चित ही बहुत कम थे। वैज्ञानिक आविष्कारों का तो तब सिलसिला तक नहीं चला था। इतने पर भी उन दिनों इतनी अधिक प्रसन्नता एवं सहकारिता का अनुभव होता था, जिसे देखते हुए वह समय सतयुग कहलाता था। मिल बाँटकर खाने की नीति अपनाए जाने पर जो था उसी में भली प्रकार काम चल जाता था, न कहीं विग्रह था, न संकट। ऐसे वातावरण में अभावों की अनुभूति तो हो ही कैसे सकती है? मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताएँ अत्यन्त स्वल्प हैं। उन्हें कुछ ही घण्टे के साधारण श्रम से सुविधापूर्वक उपलब्ध किया जा सकता है। हैरान तो वह तृष्णा करती है, जिसके पीछे दुरुपयोग की ललक लालसा जुड़ी होती है। यदि उस बौद्धिक विभ्रम से निपटा जा सके, तो गुजारे में कमी पड़ने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, मनुष्य सहज ही इतना अधिक उपार्जन करता रह सकता है कि दूसरों की सहायता करने का भी सुयोग बनता रहे।

अनाचार की वृद्धि का एक ही कारण है, अनावश्यक एवं अतिशय मात्रा में सज्जा सजाना, विलासिता के साधन जुटाना एवं संग्रह की लिप्सा से लालायित रहना। आग में ईंधन पड़ने की तरह हविश बढ़ती ही जाती है। विलासिता और अहन्ता के व्यामोह में, जो कमाया गया था, वह कम पड़ता ही रहता है, साथ ही यह उत्सुकता चल पड़ती है कि किसी प्रकार अपनों या दूसरों के हक का जितना भी कुछ छीना झपटा जा सके, उसमें कोताही न की जाये। इस प्रकार की ललक, संचय तो बहुत कर लेती है, पर उसका सदुपयोग सूझ नहीं पड़ता। भाव संवेदना एवं चिन्तन में उत्कृष्टता न होने पर मात्र अनियन्त्रित उपयोग ही एक मात्र मार्ग रह जाता है, जिसकी गहरी खाई कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी प्रभुता पाकर भी पटती नहीं है। इस मनःस्थिति में सन्तोष कहाँ? चैन कैसा? प्रसन्नता और प्रफुल्लता का अनुभव कर सकना तो कोसों पीछे रह जाता है।

    बीमार का निदान बन पड़ने के उपरान्त ही सही उपचार का सुयोग बनता है। प्रस्तुत समस्याओं का स्वरूप भले ही अनेक प्रकार का दीख पड़ता है, पर उसका मूल कारण एक ही है, बटोरना और बिखेरना। इस नीति को अपनाने वालों को खपते- पिसते तो निरन्तर रहना पड़ता है, पर ऐसा सुयोग नहीं बन पड़ता कि चल रहे पुरुषार्थ के सहारे अपना हित- साधन करते बन पड़े और दूसरों की सेवा सहायता करने का, पुण्य- परमार्थ यश- सम्मान भी हाथ लगता चले।

    अपव्ययी प्रकारान्तर से दुर्गुणी हुए बिना नहीं रहता। निजी आवश्यकताओं की पूर्ति तो थोड़े में ही सफलतापूर्वक सम्भव हो जाती है, फिर अतिरिक्त उत्पादन का क्या हो? उदारता के अभाव में उसे अभावग्रस्तों के लिए लगा सकने का तो साहस ही नहीं उभरता, फिर निजी आवश्यकताओं के उपरान्त जो बचे, उसका आखिर हो क्या? मात्र एक ही मार्ग रह जाता है- दुरुपयोग इस प्रकार निकृष्ट स्तर की स्वार्थ संकीर्णता में फँसे और अधिक उपार्जन करते रहने में सफल समझे जाने वाले, बड़े कहे जाने वाले लोगों की रीति नीति साधारण जनों को भी प्रभावित करती है। वे भी वैसा ही अनुकरण करने के लिए लालायित रहने लगते हैं। योग्यता कम, परिश्रम कम, अपव्यय की अभिलाषा गगनचुम्बी, इसी माहौल में अनाचारों का टिड्डी दल दौड़ पड़ता है और संसार की हरीतिमा को सफाचट करके रख देता है।

First 3 5 Last


Other Version of this book



મન: સ્થિતિ બદલો તો પરિસ્થિતિ બદલાશે
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

मनस्थिति बदलें तो परिस्थिति बदले
Type: SCAN
Language: HINDI
...

मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books



બ્રહ્મવિદ્યાનું રહસ્યોદ્દઘાટન
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

चेतना का सहज स्वभाव स्नेह सहयोग
Type: TEXT
Language: HINDI
...

चेतना सहज स्वभाव स्नेह-सहयोग
Type: SCAN
Language: HINDI
...

मनुष्य गिरा हुआ देवता या उठा हुआ पशु?
Type: SCAN
Language: HINDI
...

मनुष्य गिरा हुआ देवता या उठा हुआ पशु ?
Type: TEXT
Language: HINDI
...

બુદ્ધિ વધારવાના ઉપાય
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

बुद्धि बढ़ाने की वैज्ञानिक विधि
Type: SCAN
Language: HINDI
...

ब्रह्मविद्या का रहस्योद्घाटन
Type: SCAN
Language: HINDI
...

બ્રહ્મવિદ્યાનું રહસ્યોદ્દઘાટન
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

આગળ વધવાની તૈયારી
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

आगे बढऩे की तैयारी
Type: SCAN
Language: HINDI
...

गायत्री से बुद्धि विकास
Type: SCAN
Language: HINDI
...

गायत्री से बुद्धि विकास
Type: TEXT
Language: HINDI
...

गायत्री द्वारा प्राण शक्ति का अभिवर्धन्
Type: SCAN
Language: EN
...

सफलता के सात सूत्र साधन
Type: SCAN
Language: HINDI
...

સફળતાનાં સાત સ્વર્ણિમ સૂત્ર
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

चिंताओं से छुटकारे का मार्ग
Type: SCAN
Language: HINDI
...

चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग
Type: TEXT
Language: HINDI
...

शक्ति का सदुपयोग
Type: SCAN
Language: HINDI
...

शक्ति का सदुपयोग
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Prepare Yourself to Excel
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

काय-ऊर्जा एवं उसकी चमत्कारी सामर्थ्य
Type: SCAN
Language: HINDI
...

The Astonishing Power of the Bio-physical and Subtle Energies of the Human Body
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

ब्रह्मविद्या का रहस्योद्घाटन
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Articles of Books

  • युगधर्म का परिपालन अनिवार्य
  • गरीबों द्वारा अमीरी का आडम्बर
  • तीनों उद्यान फलेंगे और निहाल करेंगे
  • दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे
  • साधनों से भी अधिक सद्गुणों की आवश्यकता
  • उदारता अपनाई जाये
  • मन: स्थिति बदले, तो परिस्थिति बदले
  • परिवर्तन का आधार तो ढूँढ़ें
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj