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प्रज्ञा पुत्रों को इतना तो करना ही है

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प्रज्ञापुत्रों को यह तो करना ही है

समय का महत्व समझें—समयदान दें
इन दिनों नये सृजन के लिए समयदान देना ‘‘गोरस बेचन हरि-मिलन’’ जैसा अति महत्त्वपूर्ण कार्य है। जिसमें स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही सधते हैं। उद्यान रोपने वाला माली स्वयं भी अपने पुरुषार्थ को फलते-फूलते अपनी आंखों देखता है, दर्शकों की सराहना सुनता है और छाया, फूल-फलों से अनेकों को राहत पहुंचाता है। इसके अतिरिक्त अपनी भावी पीढ़ियों को गौरवान्वित रहने और अनवरत लाभ उठाने का अवसर भी प्रदान करता है। ठीक ऐसी ही दूरदर्शिता, इन दिनों युग संधि की वेला में महाकाल द्वारा भेजे गये आमन्त्रण को स्वीकार करने में है। इसमें स्वार्थ और परमार्थ का असाधारण समन्वय है; लोक और परलोक के उभयपक्षीय लाभों से लाभान्वित होना है।
इन दिनों किसी को भी व्यस्तता, अभावग्रस्तता जैसी सामान्य बातों को तिल से ताड़ नहीं बनने देना चाहिए। आपत्ति काल में अथवा सौभाग्य का सृजन करने वाले अवसरों पर लोग इस प्रकार न सही उस प्रकार चालू क्रिया-कलापों की व्यवस्था बना लेते हैं और जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, उसमें उपेक्षा बरतने जैसी चूक नहीं करते। मनुष्य जीवन में अनेकों प्रकार की प्रतिकूलतायें आती रहती हैं। उनके सम्बन्ध में भी तो कोई हल निकालकर काम चलाना पड़ता है। भावना होने और सूझ-बूझ से काम लेने पर कोई न कोई मार्ग ऐसा मिल ही जाता है, जिसमें निर्वाह भी चलता रहे और परमार्थ भी सधता रहे। संसार में महा मानवों ने इसी समझदारी को अपनाकर अपने उच्चस्तरीय कार्यक्रम बनाये हैं और उच्चकोटि की आदर्शवादिता अपनाकर अपने को धन्य बनाने और संसार के लिए उज्ज्वल भविष्य की संरचना करने में समर्थ, कृतकृत्य एवं धन्य हुए हैं। आज के भावनाशील दूरदर्शियों, प्राणवानों, जागरूकों को भी ऐसी ही सोच उभारनी चाहिए और समयदान की साहसिकता अपनानी ही चाहिए। युगधर्म इससे कम में सधता नहीं है।
अपनी विचारणा और गतिविधियों में आदर्शवादी परिवर्तन कर लेने पर व्यक्ति में इतनी प्रतिभा-प्रखरता उभरती है, कि उसके सहारे अति कठिन दिखने वाले कार्यों में भी हनुमान, अर्जुन जैसी भूमिकायें निवाही जा सके। परिवार को सुसंस्कारी और स्वावलम्बी बनाने भर से कर्तव्यपालन हो जाता है। आवश्यक नहीं कि कुटुम्बियों के लिए विलासिता और सम्पन्नता के ऐसे साधन जुटाने में ही अपने को खपा दिया जाय, जिससे उनका निर्वाह बिना कुछ किए ही चलता रहे। इस प्रकार मुफ्त का माल खाने वाले के पल्ले दुर्व्यसन और दुर्गुण ही पड़ते हैं।
लिप्सा और कुत्सा की हथकड़ी-बेड़ियों को थोड़ा ढीला किया जा सके, तो इतने भर से हर किसी को वह सुविधा मिल सकती है, जिसके आधार पर अपने को धन्य बनाने और संसार को सुरम्य-समुन्नत बनाने वाला श्रेय सौभाग्य मिल सके। भावनाओं में उत्कृष्टता का समावेश होते ही क्रिया-कलापों में सहज ही असाधारण परिवर्तन बन पड़ता है और साथ ही वह सुयोग-सौभाग्य सामने आ खड़ा होता है, जिसके आधार पर समय की पुकार सुनने, युग-धर्म अपनाने और अपने को धन्य बनाने के दैवी वरदान सिर पर बरसने लगे। इस विश्व का भाग्य बदल देने वाली युग परिवर्तन की इस क्रान्ति की भागीदारी लेने में, किसी भी जागृत आत्मा को आना-कानी नहीं करनी चाहिए। युगधर्म के निर्वाह में अपने हिस्से की भागीदारी पूरी करने में कायरता को आड़े नहीं आने देना चाहिए। तथाकथित शुभ चिन्तकों के दबाव-व्यवधान की भी इसीलिए चिन्ता नहीं करनी चाहिए, कि उनमें संकीर्ण स्वार्थपरता के अतिरिक्त और कुछ तथ्य होता नहीं।