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Books - सामूहिक यज्ञ योजना

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Language: HINDI
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सामूहिक यज्ञ योजना

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यज्ञों की भौतिक और आध्यात्मिक महत्ता असाधारण है। भौतिक या आध्यात्मिक जिस क्षेत्र पर भी दृष्टि डालें उसी में यज्ञ की महत्वपूर्ण उपयोगिता दृष्टिगोचर होती है। वेद में ज्ञान, कर्म, उपासना तीन विषय हैं। कर्म का अभिप्राय-कर्मकाण्ड से है, कर्मकाण्ड यज्ञ को कहते हैं। वेदों का लगभग एक तिहाई मंत्र भाग यज्ञों से संबंध रखता है। यों तो सभी वेदमंत्र ऐसे हैं जिनकी शक्ति को प्रस्फुरित करने के लिए उनका उच्चारण करते हुए यज्ञ करने की आवश्यकता होती है।

जिस प्रकार आजकल यन्त्रों (मशीनों) की सहायता से भौतिक जीवन के अनेकों सुख साधन उत्पन्न किये जाते हैं, उसी प्रकार प्राचीन काल में मन्त्रों के द्वारा मानव जीवन की सभी आवश्यकताओं को सरल करने का विज्ञान विकसित हुआ था। शब्द-विद्या एक बड़ी विद्या है। किस शब्द के बाद क्या शब्द कितने चढ़ाव उतार से बोला जाय तो उससे किस प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं और उनका सूक्ष्म प्रकृति पर तथा मनुष्य की भीतरी चेतना पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसी रहस्य को जानने में ऋषियों ने हजारों वर्षों तक श्रम किया था और शब्द-विद्या के वैज्ञानिक तथ्यों को जानकर मन्त्र शास्त्र की रचना की थी।

वेद मन्त्रों में यों शिक्षाएं भी बड़ी महत्वपूर्ण हैं, पर उन अक्षरों में शक्ति के स्रोत भी दबे पड़े हैं। जिस प्रकार अमुक स्वर-विन्यास के शब्दों की रचना करने से अनेक राग रागिनियां बजती हैं और उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है, उसी प्रकार मन्त्रोच्चारण से भी एक प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं और उनका भारी प्रभाव विश्वव्यापी प्रकृति पर सूक्ष्म जगत पर तथा प्राणियों के स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता है।

भारतीय तत्ववेत्ताओं ने कोयला, भाप, तेल, धातु आदि के आधार पर चलने वाले यन्त्रों को बहुत खर्चीला और जोखिम भरा जान लिया था। इसलिए इस ओर ध्यान न देकर शब्द विज्ञान के आधार पर मन्त्र विद्या का आविष्कार किया था और उनकी शक्ति से इस लोक के जड़ चेतन प्राणियों को ही नहीं, लोक लोकान्तरों के जीवों को सुखी बनाने का प्रयत्न किया था। खेद है कि हम पिछले तमसाच्छन्न युग में अपनी इन महत्वपूर्ण विद्याओं को खो बैठे। मन्त्र शास्त्र और यज्ञ विज्ञान को भली प्रकार समझने के लिए आज न तो अनुभवी विद्वान मौजूद हैं और न यवन काल के हम्माम गरम करने से उस विद्या के ग्रन्थ ही बच पाये हैं।

फिर भी जो कुछ बचा है और ज्ञात है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यज्ञों की प्रक्रिया में जो थोड़ा-सा समय और पैसा खर्च होता है उसकी अपेक्षा अनेकों गुना लाभ प्राप्त है। खेती में थोड़ा-सा बीज बोने पर अनेक गुनी फसल पैदा होती है। यज्ञ में भी आकाश रूपी भूमि में, हवन सामग्री रूपी बीज बोने की खेती की जाती है और चूंकि पृथ्वी से आकाश तत्व की शक्ति हजारों गुनी अधिक मानी गई है, उसी अनुमान से इस यज्ञीय खेती की फसल में भी हजारों गुना अधिक लाभ होता है।

(1) मनुष्य शरीर से निरन्तर निकलती रहने वाली गंदगी के कारण जो वायु मण्डल दूषित होता रहता है, उसकी शुद्धि यज्ञ की सुगन्ध से होती है। हम मनुष्य शरीर धारण करके जितना दुर्गन्ध पैदा करते हैं उतनी ही सुगन्ध भी पैदा करें तो सार्वजनिक वायु-तत्व को दूषित करने के अपराध से छुटकारा प्राप्त करते हैं।

(2) यज्ञ धूम्र आकाश में जाकर बादलों में मिलता है उससे वर्षा का अभाव दूर होता है। साथ ही यज्ञ धूम्र की शक्ति के कारण बादलों में प्राणशक्ति उसी प्रकार भर जाती है जिस प्रकार इन्जेक्शन की पिचकारी से थोड़ी-सी दवा भी शरीर में प्रवेश करादी जाय तो उसका प्रभाव सारे शरीर पर पड़ता है। यज्ञ कुण्डों को इन्जेक्शन की पिचकारी, मन्त्रों को सुई और आहुतियों को दवा मान कर आकाश में जो इन्जेक्शन लगाया जाता है उसका फल प्राणप्रद वर्षा के रूप में प्रकट होता है। ऐसी वर्षा से अन्न, घास पात, वनस्पतियां, जीवन जन्तु सभी बलवान परिपुष्ट एवं शक्ति सम्पन्न बनते हैं।

(3) यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्व वायु मण्डल में फैलाये जाते हैं उनसे हवा में घूमते हुए असंख्यों रोग कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं। डी.डी.टी., फिनाइल आदि छिड़कने, बीमारियों से बचाव करने की दवाएं या सुइयां लेने से भी कहीं अधिक कारगर उपाय यज्ञ करना है। साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है। दवाओं में सीमित स्थान एवं सीमित व्यक्तियों को ही बीमारियों से बचाने की शक्ति है, पर यज्ञ की वायु तो सर्वत्र ही पहुंचती है और प्रयत्न न करने वाले प्राणियों की भी सुरक्षा करती है। मनुष्यों की ही नहीं, पशु पक्षियों, कीटाणुओं एवं वृक्ष वनस्पतियों के आरोग्य की भी यज्ञ से रक्षा होती है।

(4) यज्ञ द्वारा प्रथक-प्रथक रोगों की भी चिकित्सा हो सकती है। यज्ञ तत्व का ठीक प्रकार उपयोग करके अन्य चिकित्सा पद्धतियों के मुकाबिले में अधिक मात्रा में अधिक शीघ्रतापूर्वक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

(5) यज्ञ द्वारा विश्वव्यापी पंच तत्वों की, तन्मात्रों की, तथा दिव्य शक्तियों की परिपुष्टि होती हैं। इसके क्षीण हो जाने पर दुखदायी असुरता संसार में बढ़ जाती है और मनुष्यों को नाना प्रकार के त्रास सहने पड़ते हैं। देवताओं का—सूक्ष्म जगत के उपयोगी देवतत्वों का भोजन यज्ञ है। जब उन्हें अपना आहार समुचित मात्रा में मिलता रहता है तो वे परिपुष्ट रहते हैं और असुरता को, दुख दारिद्र को दबाये रहते हैं। इस रहस्यमय तथ्य को गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं श्रीमुख से उद्घाटन किया है। (6) यज्ञ में जिन मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है उन की शक्ति असंख्यों गुनी अधिक होकर संसार में फैल जाती है, और उस शक्ति का लाभ सारे विश्व को प्राप्त होता है। रेडियो ब्रॉडकास्ट करते समय वक्ता की वाणी को शक्तिशाली विद्युत धारा से शक्तिशाली बना देते हैं तो वह आवाज संसार भर में रेडियो यन्त्रों पर सुनी जाने योग्य हो जाती है। मन्त्रोच्चारण के साथ यज्ञाग्नि की शक्ति बिजली की बैटरी, जनरेटर डायनेमो का काम करती है और मन्त्रशक्ति को प्रचण्ड करके सारे आकाश में फैला देती है। गायत्री मंत्र की सद्बुद्धि शक्ति को यज्ञों के द्वारा जब आकाश में फैलाया जाता है तो उसका प्रभाव समस्त प्राणियों पर पड़ता है और वे सद्बुद्धि से, सद्भावना से, सत्प्रवृत्तियों से अनुप्राणित होते हैं। अगणित व्याख्यानों और अनेकों पुस्तकों से भी शुद्ध बुद्धि-सन्मार्गगामी बुद्धि की जितनी उत्पत्ति हो सकती है उसमें असंख्यों गुनी सद्बुद्धि यज्ञों से उपजती है और सन्मार्ग गामी सद्बुद्धि से अनुप्राणित मनुष्य संसार में सुख शांति की स्थापना का प्रमुख आधार बनते हैं।

(7) यज्ञ की ऊष्मा मनुष्य के अन्तःकरण पर देवत्व की छाप डालती है। जहां यज्ञ होते हैं वह भूमि एवं प्रदेश सुसंस्कारों की छाप अपने अन्दर धारण कर लेता है और वहां जाने वालों पर भी दीर्घ काल तक प्रभाव डालती रहती है। प्राचीन काल में तीर्थ वहीं बने हैं जहां बड़े-बड़े यज्ञ हुए थे। जिन घरों में, जिन स्थानों में यज्ञ होते हैं वह भी एक प्रकार का तीर्थ बन जाता है और वहां जिनका आगमन रहता है उनकी मनोभूमि उच्च, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनती है। महिलाएं, छोटे बालक एवं गर्भस्थ बालक विशेष रूप से यज्ञ शक्ति से अनुप्राणित होते हैं। उन्हें सुसंस्कारित बनाने के लिए यज्ञीय वातावरण की समीपता बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है।

(8) कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से व्यक्तियों की मनोभूमि में यज्ञ से भारी सुधार होता है। इसलिए यज्ञ को पाप नाशक कहा गया है। यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मनोभूमि का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्वर्गीय आनन्द से भर देता है, इसलिए यज्ञ को स्वर्ग देने वाला कहा गया है।

(9) यज्ञों की शोध की जाय तो प्राचीन काल की भांति यज्ञ शक्ति से सम्पन्न अग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, सम्मोहनास्त्र, आदि अस्त्र शस्त्र पुष्पक विमान जैसे यंत्र, बन सकते हैं, अनेकों ऋद्धि सिद्धियों को उपलब्ध किया जा सकता है। लोक लोकान्तरों की यात्रा की जा सकती है। प्रखर बुद्धि सुसंतति, निरोगता एवं सम्पन्नता प्राप्त की जा सकती है। प्राचीन काल की भांति यज्ञीय लाभ पुनः प्राप्त हों इसकी शोध के लिए यह आवश्यक है कि जनसाधारण का ध्यान इधर आकर्षित हो और साधारण यज्ञ आयोजनों का प्रचार बढ़े।

(10) यज्ञीय धर्म प्रक्रियाओं में भाग लेने से आत्मा पर चढ़े हुए मल विक्षेप शुद्ध होते हैं। फलस्वरूप तेजी से उसमें ईश्वरीय प्रकाश आने लगता है। यज्ञ से आत्मा में ब्राह्मण तत्व, ऋषितत्व की वृद्धि दिन-दिन होती है और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम-लक्ष बहुत सरल हो जाता है। आत्मा और परमात्मा को जोड़ देने का, बांध देने का कार्य यज्ञाग्नि द्वारा ऐसे ही होता है जैसे लोहे के दो टूटे हुए टुकड़ों को वैल्डिंग की अग्नि जोड़ देती है। ब्राह्मणत्व यज्ञ के द्वारा ही प्राप्त होता है। इसीलिए ब्राह्मण कर्तव्य में यज्ञ, विद्या, दान—इन तीन की प्रधानता है। ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिये एक तिहाई जीवन यज्ञ कर्म के लिये अर्पित करना पड़ता है। लोगों के अन्तःकरणों में अंत्यज वृत्ति घटे और ब्राह्मण वृत्ति बढ़े इसके लिए वातावरण में यज्ञीय प्रभाव शक्ति भरना आवश्यक है।

(11) यज्ञ त्यागमय जीवन के आदर्श का प्रतीक है। इदन्न मम—(यह मेरा नहीं सम्पूर्ण समाज का है) इन भावनाओं के विकास से ही हमारा सनातन आध्यात्मिक समाजवाद जीवित रह सकता है। अपनी प्रिय वस्तुएं घृत, मिष्ठान्न, मेवा औषधियां, आदि हवन करके उन्हें सारे समाज के लिये बांट देकर हम उसी प्राचीन आदर्श को मनोभूमि में प्रतिष्ठापित करते हैं। मनुष्य अपनी योग्यता, शक्ति, विद्या, सम्पत्ति, प्रतिष्ठा, प्रभाव पद आदि का उपयोग अपने सुख के लिये कम से कम करके समाज को उसका अधिकाधिक लाभ दे यही आदर्श यज्ञ में सन्निहित है। यज्ञ की प्रतीक पूजा से उन भावनाओं को सारे समाज को हृदयंगम कराया जाता है।

(12) यज्ञ हमारा सर्वोत्तम शिक्षक है जो अपना आदर्श अपनी क्रिया से स्वयं ही प्रकट करता रहता है। (1) अग्नि का स्वभाव है कि सदा उष्णता और प्रकाश धारण किये रहती है हम भी उत्साह, श्रमशीलता, स्फूर्ति, आशा एवं विवेक शीलता की गर्मी और रोशनी अपने में धारण किये रहें। (2) अग्नि में जो वस्तु पड़ती है उसे वह अपने समान बना लेती है, हम भी अपने निकटवर्ती लोगों को अपने समान सद्गुणी बनावें। (3) अग्नि की ज्योति सदा ऊपर को ही उठती है, उलटने पर भी मुंह नीचे को नहीं करती, हम भी विषम परिस्थितियां आने पर भी अधोगामी न हों वरन् अपने आदर्श ऊंचे ही रखें। (4) अग्नि कोई वस्तु अपने पास नहीं रखती वरन् जो वस्तु मिली उसे सूक्ष्म बना कर आकाश में फैला देती है, हम भी उपलब्ध वस्तुओं को अपने लिये ही न रखें वरन् उन्हें समाज के हित में वितरण करते रहें। (5) अग्नि को ही यह शरीर भेंट किया जाने वाला है, इसलिये चिता का सदा स्मरण रखें, मृत्यु को सामने देखें, और सत्कर्मों में शीघ्रता करने एवं दुष्कर्मों से बचने को तत्पर रहें। इन भावनाओं के प्रतिनिधि रूप में यज्ञाग्नि की पूजा की जाती है।

(13) अपनी थोड़ी सी वस्तु को सूक्ष्म वायु रूप बना कर उन्हें समस्त जड़ चेतन प्राणियों को बिना किसी अपने पराये, मित्र शत्रु का भेद किये सांस द्वारा इस प्रकार गुप्त दान के रूप में खिला देना कि उन्हें पता भी न चले कि किस दानी ने हमें इतना पौष्टिक तत्व खिला दिया—सचमुच एक श्रेष्ठ ब्रह्मभोज का पुण्य प्राप्त करना है। कम खर्च में बहुत अधिक पुण्य प्राप्त करने का यज्ञ एक सर्वोत्तम उपाय है।

(14) यज्ञ सामूहिकता का प्रतीक है। अन्य उपासनाएं या धर्म प्रक्रियाएं ऐसी हैं जो अकेला कर या करा सकता है पर यज्ञ ऐसा कार्य है जिसमें अधिक जनता के सहयोग की जरूरत है। होली आदि बड़े यज्ञ तो सदा सामूहिक ही होते हैं। यज्ञ आयोजनों में सामूहिकता, सहकारिता और एकता की भावनाएं विकसित होती हैं।

(15) आपत्ति काल में, अनिष्ट निवारण में, कुसमय में, रक्षात्मक शांति शक्ति के रूप में यज्ञों का बड़ा महत्व है। वर्तमान काल में एटम युद्ध जैसी सत्यानाशी आसुरी संहार लीलाओं की सम्भावनाएं बढ़ती जा रही हैं। सन् 62 में एक राशि पर 8 ग्रह आने का कुयोग भी अशुभ सूचक है। ऐसे कुसमय आने पर शांति आयोजनों के रूप में यज्ञानुष्ठान को शास्त्रकारों ने सर्वोत्तम उपाय माना है। अरबों मनुष्यों और असंख्य जीवन जन्तुओं की शांति और सुरक्षा के लिये यज्ञ आयोजनों की श्रृंखला बढ़ाने की आवश्यकता है। (16) हिंदू जाति का प्रत्येक शुभ कार्य, प्रत्येक पर्व, त्यौहार संस्कार यज्ञ के साथ सम्पन्न होता है। यज्ञ भारतीय संस्कृति का पिता है। यज्ञ भारत की सर्वमान्य एवं प्राचीनतम वैदिक उपासना है। बीच के अंधकार युग में अनेक मतमतान्तर उपज पड़े और विघटनात्मक भारी मतभेद खड़े हो जाने से हिंदू जाति विश्रृंखलित हो गई। धार्मिक एकता, एवं भावनात्मक एकता को लाने के लिये यज्ञ आयोजनों की सर्वमान्य साधना का आश्रय लेना सब प्रकार दूरदर्शितापूर्ण है।

(17) यों यज्ञ सभी अच्छे हैं पर प्रथक-प्रथक यज्ञों के उद्देश्य और परिणाम भिन्न-भिन्न हैं। वर्षा का अभाव दूर करने के लिये विष्णुयज्ञ, विलासिता त्यागने और भक्ति भावना बढ़ाने के लिये रुद्रयज्ञ, बीमारियों को रोकने के लिये मृत्युंजय यज्ञ और लड़ाई के समय जनता में जोश भरने के लिये चण्डीयज्ञ कराये जाते हैं। पर जब मनुष्यों को कुमार्ग गामिता से बचाकर सन्मार्ग पर लाने का, विश्वव्यापी अशुभ को रोकने का प्रयोजन हो तो गायत्री यज्ञ ही एकमात्र अवलम्बन रह जाता है। आज की परिस्थितियों में गायत्री यज्ञ से बढ़ कर अधिक उपयुक्त अचूक एवं रामबाण और कोई धर्मानुष्ठान हो नहीं सकता।

इन सब बातों पर गंभीरता पूर्वक विचार करने से यह आवश्यक हो जाता है कि गायत्री यज्ञों का अधिकाधिक विस्तार हो। इस भारत भूमि को एक बार फिर यज्ञमयी करा दिया जाय, जिससे यहां फैले हुये पाप-ताप जल जांय और आत्मज्ञान, ऋतम्भरा प्रज्ञा, उच्च चरित्र, सत्कर्म, सद्भाव एवं आत्मबल की अखण्ड ज्योति का प्रकाश दशों दिशाओं में फैल जाय। भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान एवं युग निर्माण महान कार्य का शिलान्यास गायत्री महामंत्र की गगन भेदी ध्वनि और यज्ञों की प्रकाश ज्योति के साथ किया जाय।

सभी सोसाइटियों का, मीटिंग कमेटियों का पश्चिमी तरीका खोखला सिद्ध हुआ है। अब जन संगठन और जागृति का कार्य यज्ञों के साथ सम्पन्न किया जाना चाहिये। भारतीय जनता की मनोभूमि धार्मिकता पर आधारित है, इसलिये नैतिकता एवं सुसंस्कृत समाज का निर्माण करने का कार्य धार्मिक आधार पर ही होना चाहिये। इस देश में अब तक केवल धार्मिक आन्दोलन ही पनपे और सफल हुये हैं। महात्मा गांधी के स्वराज्य आन्दोलन की सफलता का एक भारी मनोवैज्ञानिक रहस्य यह भी है कि उन्होंने अपने आन्दोलन में धर्म चर्चा को बहुत स्थान दिया था और स्वयं भी महात्मा थे। धर्म चर्चा न करने और स्वयं महात्मा न होने के अभाव में अन्य नेता गण वह स्थान और सफलता प्राप्त न कर सके जो महात्मा गांधी को प्राप्त हुई। हमें राष्ट्र का नैतिक एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान करना है, अनेकों बुराइयों और कुरीतियों के फोड़ों से हमारे समाज शरीर की दुर्दशा हो रही है उसे निरोग बनाना है। इस निर्माण कार्य के लिये यज्ञ कुण्ड वैसी ही आध्यात्मिक भट्टियां सिद्ध होंगे जैसे इस्पात के कारखानों में लोहा गलाये और पकाने की भट्टियां लगाई जाती हैं।

सामूहिक गायत्री यज्ञों का प्रसार अब सर्वत्र होना चाहिये। बड़े-बड़े प्रीतिभोज कराने में जिस प्रकार अब तक लोग अपना गौरव और पुण्य समझते रहे हैं अब लोगों को यह अनुभव कराना और समझाना होगा कि अन्नदान केवल समाज सेवा में दिन रात लगे हुये सत्पात्र ब्राह्मणों को या दीन-हीन असमर्थ लोगों को ही कराने पर पुण्य हो सकता है पात्र कुपात्र का भेद न करके अन्धा-धुन्ध भोजन कराने से किसी सत्परिणाम की आशा नहीं करनी चाहिये। इसलिये प्रीतिभोजों, ब्रह्मभोजों के स्थान पर सामूहिक यज्ञों की परम्परा को पुनर्जीवित करना चाहिए।

गायत्री उपासकों के जी में कभी कोई बड़ा काम करने की इच्छा जागृत हो तो उन्हें एक बड़े यज्ञ की बात ही सोचनी चाहिए। एक व्यक्ति अपने खर्च से यज्ञ करें, कुछ लोगों को वेतन देकर यज्ञ करने के लिए नियुक्त करें यह तरीका केवल उन्हीं लोगों के लिए ठीक हो सकता है जो जन सम्पर्क में आना अपनी हेठी तौहीन समझते हैं, या जनता जिनके पास जाने से दूर रहना चाहती है। जिनका जनता से परिचय है, जिन्हें आशा है कि उनके कहने से कुछ लोग उनके साथ हो सकते हैं, ऐसे लोगों को अपने जीवन में, अपने प्रयत्न से एक बड़ा सामूहिक गायत्री यज्ञ कराने की बात अवश्य सोचनी चाहिये।

गायत्री यज्ञों का तरीका यह है कि यज्ञ की तिथि नियत करके उससे कुछ दिन पूर्व तैयारी में लग जाना चाहिए। यज्ञों के दो प्रकार हैं (1) साधारण यज्ञ (2) यज्ञानुष्ठान। साधारण हवनों में यही पर्याप्त है कि जो लोग यज्ञ में बैठें उन्हें गायत्री मंत्र का शुद्ध उच्चारण आता हो, यज्ञ में सम्मिलित होने के दिनों में या उससे कम से कम तीन दिन पूर्व से ब्रह्मचर्य पूर्वक रहे हों, तथा यज्ञ में स्नान करके धुले हुए शुद्ध वस्त्र पहन कर आवें। यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये अधिकाधिक लोगों को पहले से ही तैयार करना चाहिए। उन्हें शुद्ध गायत्री मन्त्र उच्चारण तथा ब्रह्मचर्य की बात पहले से ही बता देना चाहिए।

यज्ञानुष्ठानों में पहले नियत संख्या में जप कराया जाता है, जप पूरा होने पर उसका दशांश या शतांश हवन कराते हैं, यह सामूहिक अनुष्ठान कहलाता है। इसके लिए यज्ञ तिथि से कुछ दिन पूर्व से यज्ञ में सम्मिलित होने वाले भागीदार तैयार करने चाहिए। यह भागीदार अपनी सुविधानुसार प्रतिदिन कुछ नियत संख्या में जप किया करें। इस प्रकार अनेक भागीदारों को बांट कर 24 लक्ष जप का महापुरश्चरण आसानी से कराया जा सकता है। 40 दिन पूर्व से जप आरम्भ कराये जांय और प्रतिदिन एक घन्टा खर्च करके भागीदार 1 माला भी नित्य करें तो 60 भागीदारों द्वारा 24 लक्ष जप पूरा हो सकता है। भागीदार कम हो या कम जप करना चाहें तो 40 दिन की अपेक्षा समय बढ़ाया जा सकता है। कोई भागीदार कम कोई अधिक जप करे ऐसा भी चल सकता है। पारिश्रमिक देकर किसी साधु ब्रह्मचारी को भी इसके लिये बिठाया जा सकता है। प्रतिदिन 6 घन्टा जप करने से 60 माला होती हैं। इतना परिश्रम एक पंडित आसानी से कर सकता है। भागीदारों से जितना जप कम पड़े वह इस प्रकार पारिश्रमिक देकर पूरा कराया जा सकता है।

24 लक्ष जप का शतांश 24 हजार आहुति होती हैं। 5 कुण्डों की यज्ञशाला में से 4 में दो-दो व्यक्ति चारों ओर और बीच की यज्ञशाला में दो व्यक्ति तीन ओर इस प्रकार 38 व्यक्ति एक समय में बैठें तो 632 आहुतियों में 24 हजार पूरा हो जाता है। यदि हवन करने वाले अधिक हों तो कई पारी करके उतने उतने व्यक्ति बिठाकर आहुतियां पूरी कर लेनी चाहिए। हवन में बैठने वाले कम हों तो आहुतियों की संख्या उसी हिसाब से बढ़ाई जा सकती है। एक घन्टे में मोटे तौर पर 240 आहुतियां हो जाती हैं। 632 आहुतियों में 2।।-3 घन्टा लगता है। प्रारम्भिक देव पूजन और अन्त में पूर्णाहुति भी 1।।-2 घन्टा ले जाते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर यह हवन 4-5 घन्टे में हो जाता है। प्रातः हवन सायंकाल भजन एवं प्रवचनों का क्रम रखना चाहिए।

24 हजार हवन 1 दिन में पूरा हो जाता है। 1। लक्ष हवन के लिए 9 कुण्डों की यज्ञशाला में तीन दिन लगते हैं। आहुतियों से सौ गुना 1। करोड़ जप होना कठिन पड़ता है। इसलिए जप के लिए 24 लक्ष की संख्या ही पर्याप्त है। हवन 24 हजार के स्थान पर 1। लक्ष कराया जा सकता है। 9 कुंडों की यज्ञशाला में यों आठ यज्ञ शालाओं में आठ-आठ और बीच की में 6 इस प्रकार 70 होता एक साथ बैठ सकते हैं। पर यदि संख्या कम हो तो 8 पर चार और बीच की पर 6 इस प्रकार 32+6=38 होताओं से भी काम चल सकता है। आरम्भिक दिन में देव पूजन 1-1।। घण्टा समय लेता है और अन्तिम दिन पूर्णाहुति इतना ही समय लेती है। इसलिये प्रारम्भिक और अन्तिम दिन कुछ कम और बीच के दिन कुछ अधिक आहुतियां करनी चाहिये। होताओं की संख्या के आधार पर पारी बदली जा सकती है। यदि केवल 38 ही होता हों तो बीच में एक बार कुछ देर की छुट्टी कर लेनी चाहिए। होताओं की संख्या के आधार पर ही यह हिसाब लगाया जा सकता है कि 1। लक्ष हवन के लिये कुल कितनी आहुतियां करनी हैं और उसमें से आरम्भ के बीच के और अन्त के दिन कितनी-कितनी आहुतियां करने से समय के घण्टे प्रतिदिन बराबर रह सकते हैं।

यज्ञशाला में पैर धोकर ही कोई प्रवेश करे। कम आयु के ऐसे बच्चे जो मल मूत्र त्याग के बारे में अनजान होते हैं यज्ञशाला में प्रवेश न किये जांय। जिन स्त्री पुरुषों को, बालक-बालिकाओं को शुद्ध गायत्री मन्त्र याद हो वे हवन कर सकते हैं। स्नान करके, धुले वस्त्र पहन कर ही यज्ञ पर बैठा जाय। जहां तक हो सके यज्ञ पर कम से कम कपड़े पहन कर बैठना चाहिए ताकि यज्ञ की ऊष्मा शरीर के रोम कूपों से प्रवेश करके अपना प्रभाव डाल सके। कसे हुये भारी, अधिक कपड़े पहन कर यज्ञ में बैठने से समुचित लाभ नहीं मिल पाता। पजामे, नेकर न पहन कर यज्ञ में धोती ही पहननी चाहिये। पंजाबिन बहिनों को पजामा पहन कर भी यज्ञ में बैठने की विशेष छूट दी जा सकती है।

यज्ञशाला की सजावट जितनी नयनाभिराम हो सके उतनी ही उत्तम है। आदर्श वाक्य, चित्र, ध्वजा, पताका, झण्डी, पल्लव, बन्दनवार, केला के खम्भे, पत्ते रंगीन वस्त्र, पर्दे आदि की सहायता से जितनी अच्छी सजावट की जा सके करनी चाहिए। जमीन को लीप पोतकर कलात्मक चौक पूरने चाहिए। सुरुचि पूर्ण शोभा, सजावट और श्रृंगार का कलात्मक प्रयत्न जितना अधिक हो सके करना चाहिये। सामान्य जनता का चित्त आकर्षित करने के लिए अन्य देव मन्दिरों की भांति यज्ञशाला को, यज्ञ-मन्दिर को भी पूरे उत्साह के साथ सुसज्जित किया जाना चाहिए।

यज्ञ पात्र, कलश, चारों कोनों की वेदियां, बीच में सर्वतो भद्र वाली प्रधान वेदी, गायत्री माता और यज्ञ पिता के सुन्दर चित्रों की स्थापना, घृत दीप, अगरबत्ती शंख, घड़ियाल, रोली, अक्षत, कलावा, यज्ञोपवीत, पुष्प मालाएं, नारियल आदि सभी पूजा उपकरण पहले से ही जमा कर लेने चाहिए ताकि समय पर उनकी ढूंढ़ खोज करने में समय बर्बाद न हो।

यज्ञ से एक दिन पूर्व सायंकाल को जल यात्रा का आयोजन करना चाहिये। नगर के समीप किसी पवित्र जलाशय, नदी तालाब, बगीचा आदि से यज्ञ के लिए जल लाया जाता है। यज्ञ से कई दिन पूर्व महिलाओं में जा-जाकर यह प्रयत्न करना चाहिए कि अधिक से अधिक महिलाएं मंगल कलश लेने को तैयार हों। यज्ञ के लिये कलश भर कर लाना उन महिलाओं के लिए, उनके बच्चों तथा परिजनों के लिए परम मंगलमय होता है। इसमें सुहागिना, विधवा या कुमारी का भेद नहीं है। पन्द्रह वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाएं मंगल कलश ले सकती हैं। कलश लेने वाली महिलाएं धुले हुये पीले वस्त्र धारण किये हुये हों। पीले रंगे हुए, स्वस्तिक बने हुए, पुष्प, आदि से सजे हुए, पंच पल्लव एवं नारियलों से ढके हुए कलश यज्ञशाला से लेकर महिलाएं गाजे बाजे के साथ मंगल गान करते हुए, लाइनें बनाकर जुलूस की तरह जल लेने के लिए जाते हुए बड़ी भली मालूम पड़ती हैं। जलाशय पर जाकर पंच कर्म, स्वस्तिवाचन, देव पूजन, वरण, तिलक, वरुण पूजन, शान्ति पाठ आदि कृत्य करके कलशों में थोड़ा-थोड़ा जल भर कर वापिस लौटना चाहिए और यज्ञशाला में प्रवेश करते समय कलशों की आरती करनी चाहिये तथा लाने वाली महिलाओं का तिलक, अक्षत, अभिसिंचन, प्रसाद के साथ आशीर्वाद देना चाहिए। कलशों की संख्या कम से कम 10 और अधिक से अधिक 108 या जितनी अधिक हो सके कर लेनी चाहिये। यह बड़ा ही सुहावना एवं प्रभावोत्पादक आयोजन है।

हवन पर बैठने वाले जितने व्यक्ति हों उस सबके हाथ में हवन करने की पुस्तकें हों ताकि देव पूजन, स्वस्तिवाचन आदि के मन्त्रों को सब लोग साथ-साथ बोल सकें, लाउड स्पीकर की व्यवस्था जहां सम्भव हो, वहां उसकी व्यवस्था अवश्य कर लेनी चाहिये। गायत्री मन्त्र की आहुतियां सब लोग एक साथ और एक ध्वनि में बोलें, इसके लिये हारमोनियम का आधार बड़ा अच्छा रहता है। एक अच्छे स्वर वाला व्यक्ति हारमोनियम पर गायत्री मन्त्र गावे और अन्य सब लोग उसके साथ गला मिला कर उच्चारण करें तो यह पद्धति बड़ी सुन्दर रहती है। जिन लोगों के यज्ञोपवीत नहीं हुये हैं—उन्हें यज्ञ के समय यज्ञोपवीत देने का प्रबन्ध भी करना चाहिए।

अन्तिम दिन पूर्णाहुति एवं परिक्रमा करने के लिये उन लोगों को भी बुलाना चाहिये जो नियमित रूप से यज्ञ में शामिल नहीं हो सके हैं। जो लोग अपने घी भरे नारियल ला सकें उनके अतिरिक्त अन्य लोग साबित सुपाड़ी एवं सामग्री से पूर्णाहुति कर सकते हैं। पूर्णाहुति की, आहुति, घृत अवधाय, आरती, भस्म धारण, क्षमा प्रार्थना, शुभ कामना, अभिसिंचन परिक्रमा आदि क्रियाओं में सभी लोग व्यवस्था पूर्वक भाग ले सकें इसके नियन्त्रण के लिए कुछ कार्यकर्ता और स्वयं सेवकों की नियुक्ति यथा स्थान कर देनी चाहिये। नियंत्रण और व्यवस्था का पूर्व प्रबन्ध न रहने से भीड़ की गड़बड़ी से सारे कार्यक्रम अव्यवस्थित हो जाते हैं। पूर्णाहुति के बाद प्रसाद बांटना चाहिये। यदि सम्भव हो तो प्रयत्न यह भी करना चाहिए कि यज्ञ भस्म की तथा प्रसाद की एक-एक पुड़िया उन लोगों के घरों पर भी पहुंचाई जाय जो यज्ञ में भाग लेने नहीं आ सके हैं। यज्ञ में आये हुये अतिथियों की भोजन व्यवस्था आवश्यक है। गायत्री यज्ञों के अन्त में कन्या भोजन कराना चाहिये। गायत्री की प्रतिनिधि मानकर उन कन्याओं का समुचित स्वागत, सम्मान एवं अभिवादन किया जाय। चरण धोना, कलावा, तिलक, पुष्प माला, दक्षिणा, चरण स्पर्श जुलूस आदि के द्वारा कन्याओं का सार्वजनिक सम्मान करना चाहिये। कन्याओं की वेषभूषा, पीले रंग की एक जैसी हो तो और भी अच्छी है। मातृ शक्ति की जय के नारे लगाने चाहिये। यज्ञों के साथ बड़े-बड़े प्रीति भोजों में जो भारी धन खर्च किया जाता है वह अपव्यय है। केवल बाहर से आने वाले अतिथि या आमन्त्रित सत्पुरुषों तक ही सात्विक भोजन की व्यवस्था सीमित रखनी चाहिये। यज्ञों में आमतौर से गायत्री माता की जय, यज्ञ भगवान की जय, वेद भगवान की जय, भारतीय संस्कृति की जय, सत्य सनातन धर्म की जय के नारे लगाये जाने चाहिये। ‘नाश हो’ किसी का भी नहीं कहना चाहिये क्योंकि इसमें दुर्भावना भरी हुई है। यज्ञ के समय हमें अपने विचार क्षेत्र में केवल सद्भावनाओं को ही स्थान देना चाहिये। चौबीस हजार आहुतियों के लिये हवन सामग्री के रूप में 2 मन सुगन्धित औषधियां 2।। सेर जौ, 5 सेर चावल, 6।। सेर तिल तथा 5 सेज शकर मिलानी चाहिए। इस प्रकार 3 मन साकल्य पर्याप्त है। हवन सामग्री की शुद्धता की परीक्षा यह है कि उसमें तेल की चिकनाई नहीं होती। आज कल सड़े हुए गोले का या अन्य वस्तुओं का तेल मिलाकर सड़ी गली चीजें तथा लकड़ी का बुरादा इस ढंग से बना देते हैं कि औषधियों का असली रूप ढक जाता है। सुगन्धि के नाम पर एक दो तेज गन्ध की चीज मिलाकर शेष सस्ता कूड़ा कचरा भर देते हैं। इसलिए जहां तक संभव हो शुद्ध औषधियां लेकर कूट छान कर सामग्री बनानी चाहिए। उसका जो रूप बनेगा उसमें चिकनाई नाम को भी न होगी। बाजारू सामग्री तो यज्ञ का उद्देश्य पूरा न करके वैसी ही हानि पहुंचाती है जैसे दवा की शकल में बनी हुई कोई खराब चीज स्वास्थ को हानि पहुंचाती है। इसलिए हवन में शुद्ध औषधियां ही पड़ें यह ध्यान रखने की बात है। जहां शुद्ध हवन सामग्री बनाने में असुविधा हो वहां तपोभूमि में नित्य हवन करने के लिए बनाई हुई सामग्री में से अपनी आवश्यकता के लिए मंगाई जा सकती है। वहां से बिना किसी मुनाफे के शुद्ध शास्त्रोक्त सामग्री यज्ञों की आवश्यकता के अनुसार बना कर भेज देने का प्रबन्ध कर दिया गया है।

सवालक्ष आहुतियों में इसी अनुपात से 10 मन सुगन्धित द्रव्य और 2।। मन तिल, जौ, चावल, शक्कर कुल 12।। मन हवन द्रव्य चाहिये। सामग्री सूखी जैसी न रहे इसलिये उसमें दूध तथा घी मिलाकर चिकना बना लेना चाहिए। 24 हजार आहुतियों में प्रायः 10 सेर और 1। लक्ष आहुतियों में 30 सेर घी की जरूरत पड़ती है। पतली समिधाएं व्यवस्थानुसार खर्च करने से 24 हजार में 4 मन और सवालक्ष में 15 मन के करीब लग जाती है। अधिक मोटी समिधाएं रखी जांय और उन्हें अधिक डाला जाय तो अधिक लकड़ी लग सकती है। इसलिए प्रबन्ध कुछ अधिक का ही रखना चाहिए। आम, ढाक, पीपल, बरगद, छोंकर आदि की जो लकड़ी जहां सुविधानुसार मिल सके उसका प्रबन्ध कर लेना चाहिए। समिधाएं पतली चिरी हुई तथा सूखी हुई, बिना सड़ी घुनी हों। समिधाओं को पानी में धोकर धूप में सुखा कर रखना चाहिए।

सामान्य गायत्री हवन की अपेक्षा बड़े सामूहिक यज्ञों में कुछ क्रिया काण्ड बढ़ जाता है। प्रयत्न यह करना चाहिए कि अपने क्षेत्र के किसी सुयोग्य व्यक्ति को 1 महीने या इससे भी कम समय के लिए गायत्री तपोभूमि में भेज कर यज्ञों का पूरा विधान सिखा लिया जाय और वह ट्रेन्ड व्यक्ति उस क्षेत्र के यज्ञों की व्यवस्था ठीक प्रकार करा दिया करें। वैसा प्रबन्ध न हो सके तो तपोभूमि से यज्ञ संचालक तथा प्रवचन करने वाले धर्म प्रचारक बुलाये जा सकते हैं।

यज्ञों के साथ-साथ प्रवचनों का प्रबन्ध होना आवश्यक है। जनता में धार्मिकता, नैतिकता, मानवता, कर्तव्य परायणता, संगठन, समाज सुधार की भावनाएं ऐसे अवसरों पर अवश्य भरी जानी चाहिए। इस कार्य के लिए युगधर्म को पहचानने वाले, प्रगतिशील एवं रचनात्मक विचार रखने वाले गायक या प्रवचनकर्ता उपयुक्त हो सकते हैं। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति विद्वान या अमुक वेषधारी है, इस आधार पर प्रवचन का अधिकारी न मान लिया जाय। कई व्यक्ति शिक्षा की दृष्टि से विद्वान और वेष की दृष्टि से भिक्षु लगते हैं पर उनके विचार बड़े प्रतिगामी, अन्धकार युग के प्रतीक, एवं जन-मानस में आलस्य अवसाद पैदा करने वाले होते हैं। यह लोग अमुक अवतार या अमुक देवता की कीर्ति सुनने-सुनाने से ही स्वर्ग या मुक्ति मिलने की बात कहते हैं और मानव जीवन के उत्कर्ष की व्यवहारिक समस्याओं को या तो समझते नहीं या उलझे विचार प्रकट करते हैं। ऐसे लोगों के प्रतिगामी विचारों का गायत्री यज्ञों की सद्बुद्धि की प्रेरणा देने वाली वेदियों से प्रसार न हो, इसलिए यह पूरा-पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए कि वक्ता के विचारों का पहले पता लगा लिया जाय। विभिन्न विचारों के परस्पर विरोधी विचारों के लोगों को एक वेदी पर एकत्रित कर देने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिये। कई बार ऐसे वक्ता एक ही वेदी पर एक दूसरे का खंडन-मंडन करना शुरू कर देते हैं और यज्ञ के साथ-साथ राष्ट्र का सांस्कृतिक पुनरुत्थान करने के महान उद्देश्य को भारी हानि पहुंचाते हैं। जहां प्रगतिशील विचारों के वक्ता न मिलें वहां अखण्ड ज्योति में से या गायत्री साहित्य में से कुछ पृष्ठ पढ़ कर सुना कर धर्म प्रचार की आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है।

यज्ञ आयोजनों में सम्मिलित होने के लिए, उनमें सहयोग देने के लिए स्वभावतः सभी धर्म प्रेमियों को बड़ी प्रसन्नता होती है। परन्तु दक्षिणाजीवी पंडित पुरोहित हर जगह इनका विरोध करते हैं कोई न कोई त्रुटि इनमें ढूंढ़ते हैं, और लोगों को बहकाते हैं कि इनमें भाग न लें। इस विरोध का कारण आर्थिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक है। इन तथ्यों को भली प्रकार जाने बिना इस विरोध का कारण समझ में नहीं आता।

बात यह है कि पिछले 20-25 वर्षों से कई साधु सन्तों द्वारा बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजन कराये गये हैं। इनमें हजारों लाखों रुपयों की बड़ी-बड़ी निधियां सेठ साहूकारों से एकत्रित की जाती रही हैं। इनमें केवल ब्राह्मण पण्डित ही हवन करने को नियुक्त किये जाते रहे हैं। साधारण हवन करने वालों को सौ-सौ दो, दो-सौ की और ब्रह्मा, आचार्य आदि बनने वालों हजारों रुपयों की दक्षिणा तथा भारी सामान प्राप्त होता रहा है। मिठाई मलाई छनती रही है सो अलग। वही नक्शा इन पण्डितों के दिमाग पर जमा हुआ है। वे देखते हैं कि उनके नगर में यज्ञ हो रहा है पर लम्बी-चौड़ी दक्षिणा और मिठाई-मलाई का कोई जुगाड़ नहीं बैठ रहा है तो उन्हें स्वभावतः बड़ी जलन होती है। केवल ब्राह्मण ही हवन पर बैठें और उन्हें जातिगत सम्मान प्राप्त हो, इसके स्थान पर अन्य वर्णों के लोग भी यज्ञ करें और उनका बड़प्पन, सामान्य लोगों की बराबर रह जाय यह उन्हें अनुचित प्रतीत होता है। हवन कार्य कराने और मन्त्रोच्चारण कराने के लिए बाहर के आदमी आते हैं, या स्थानीय लोग ही मिल जुलकर कर लेते हैं तो उन्हें लगता है कि हमारी आजीविका पर हमला हो रहा है। अभी तो यह लोग हवन कराने के हमारे एकाधिकार को छीनते हैं, पीछे कथा, विवाह आदि अन्य दान दक्षिणा के कार्यों को भी छीन लेंगे। ऐसे-ऐसे कारणों को विचार करके उनके मन में विरोध भावना उठती है। अब तक दूसरे साधुओं द्वारा होने वाले यज्ञों में जितनी हवन सामग्री खर्च होती थी और उससे बीसियों गुना लड्डू मालपुये उड़ते रहते थे वैसे ब्रह्मभोजों की व्यवस्था इन यज्ञों में न देखकर उन्हें झुंझलाहट आती है। ग्राम पुरोहितों की सलाह पर जो बड़े पण्डित आचार्य दूर शहरों में बुलाये जाते हैं और जिन्हें हजारों रुपये का सामान तथा दक्षिणा मिलती है, उसमें एक बड़ा कमीशन भाग इन सलाहकार स्थानीय पण्डितों को भी मिलता है। गायत्री यज्ञों की जो प्रणाली है उसमें इस प्रकार की गुंजाइश न होने से भी उन्हें निराशा होती है।

ऐसे ही कारणों से अपनी आर्थिक तथा सम्मानात्मक हानि देखकर यह पंडित पुरोहित अड़ंगे लगाते हैं और ऊटपटांग जो जी में आता है सो आक्षेप लगाते हैं, त्रुटियां बताते हैं, और यज्ञों में शामिल होने वालों को चुपके-चुपके यह भी कहते हैं कि इस यज्ञ में सहयोग न करो नहीं तो तुम्हारी हानि हो जायगी।

इन कठिनाइयों से हमें सजग रहना चाहिए। जहां आर्थिक और भोजन आदि के मामले में स्थानीय पंडितों को संतुष्ट करना संभव हो वहां वैसा कुछ प्रबन्ध करके झगड़े को शान्त कर लेना चाहिए। जहां वे न मनाये जा सकें वहां उनके विरोध की परवा न करने की मनोभूमि पहले से ही बना लेनी चाहिए। चूंकि ऐसे लोगों की आत्मिक दुर्बलता उनमें कोई बल नहीं छोड़ती इसलिए उनके विरोध से डरने की जरा भी बात नहीं है। कोई प्रभावशाली व्यक्ति जरा मजबूती की भाषा में उन्हें समझा दे तो जजमानों के नाराज होने का भय उन्हें तुरन्त ही चुप भी करा देता है।

चूंकि अपनी क्रिया पद्धति पूर्ण शास्त्रोक्त है, हजारों धर्म ग्रन्थों के अध्ययन के आधार पर सभी कार्यक्रम एवं विधान निर्धारित किये गये हैं। इसलिए इनके संबंध में शंका सन्देह में पड़ना व्यर्थ है। जो कार्य परमार्थ बुद्धि से, विश्व हित के लिए किये जा रहे हैं, उनमें वे बातें नहीं देखी जातीं जो व्यक्तिगत रूप से सकाम कामना के लिए किये जाने वालों में देखी जाती हैं यज्ञ प्रत्येक हिन्दू का नित्यकर्म है जिस यज्ञ के बिना हिन्दू का कोई त्यौहार, कोई पर्व कोई उत्सव कोई संस्कार पूरा नहीं होता जिस यज्ञ के बिना विवाह पूर्ण नहीं होता, जिस यज्ञ की गोदी में चिता बनाकर अंत्येष्टि संस्कार के रूप में प्रत्येक हिन्दू अपनी जीवन लीला समाप्त करता है, उस भारतीय धर्म के आदि पिता यज्ञ के सम्बन्ध में अड़ंगे लगाना और रोड़े अटकाना असुरता का ही एक कृत्य है शुभ कार्य में कोई त्रुटि भी रहती हो तो उसका कभी कोई अशुभ परिणाम नहीं हो सकता। यज्ञों में बड़े-बड़े प्रीति भोज करके बहुत धन व्यय करने से कोई धार्मिक लाभ नहीं हो सकता। आगन्तुकों को न्यूनाधिक प्रसाद देने की अतिथियों एवं विद्वानों को भोजन कराने की व्यवस्था होनी चाहिए पर हजारों रुपया लड्डू मालपुओं में खर्च कर डालना बेकार है। ब्रह्म भोज की पूर्ति सत् साहित्य वितरण करके की जानी चाहिए। हर यज्ञ में गायत्री चालीसा, चित्र, आदर्श वाक्य या अन्य सस्ती गायत्री यज्ञ का महत्व बताने वाली पुस्तकें वितरण करने के लिए कुछ निधि अवश्य रखनी चाहिए। ज्ञान-दान का ब्रह्मदान का पुण्य अन्नदान से सौ गुना अधिक माना गया है। खाया हुआ अन्न कुछ ही देर बाद मल बनकर निकल जाता है पर सत् साहित्य द्वारा ज्ञान बीज जिन अन्तःकरणों में बोया जाता है उनमें से दो-चार के भीतर भी वह बीज उग आवे तो उस आत्मा का ही नहीं, संसार के अनेक प्राणियों का भारी हित साधन हो सकता है। ज्ञान दान को, ब्रह्मदान को, गायत्री यज्ञों में ब्रह्म भोज का स्थान दिया जाना चाहिए। सामर्थ्यानुसार सत् साहित्य वितरण अवश्य किया जाय। खरीदने के लिए भी आगन्तुकों को प्रेरणा की जाय।

वास्तविक रूप में गायत्री उपासना एक आध्यात्मिक व्यायाम है जिससे सूक्ष्म शरीर में छिपी हुई आत्मिक शक्तियां विकसित होती हैं। यज्ञ एक आध्यात्मिक उपचार है जिससे लौकिक एवं पारलौकिक सुख शान्ति का द्वारा खुलता है। सामाजिक दृष्टि से गायत्री उच्च विचार धारा मस्तिष्कों में भरे रखने की प्रक्रिया है। यज्ञ को त्यागमय सत्कार्यों की क्रिया पद्धति या जीवन नीति कह सकते हैं। सादा जीवन उच्च विचार की उक्ति बहुत दिनों से प्रचलित है। पर भारतीय संस्कृति का आदर्श ‘‘आदर्श पूर्ण उच्च विचार और स्नेहसिक्त त्यागमय व्यवहार’’ रहा है। गायत्री और यज्ञ इन दोनों ही आदर्शों की ध्वजा हैं। जिस प्रकार वेद भगवान की सवारी रथ या हाथी पर निकालने का सुरुचिपूर्ण प्रदर्शन इस बात का प्रेरक है कि हमें वेदों का अध्ययन एवं वैदिक आदर्शों का अनुगमन करना चाहिए, इसी प्रकार गायत्री यज्ञों का आदर्श जहां देव पूजा और पारलौकिक सुख है वहां यह भी है कि इन आयोजनों के द्वारा जनता में मानवोचित नैतिकता, कर्तव्य परायणता, सामाजिकता, सहकारिता, संयम एवं उदारता के भावों की अभिवृद्धि की जाय। इसके लिए यज्ञ में भाग लेने वालों को परस्पर विचार विनियम, आत्म चिन्तन, कुछ बुराइयों को सुधारने और कुछ अच्छाइयों को बढ़ाने का व्रत लेने का भी प्रयत्न करना चाहिए। वैयक्तिक और सामूहिक रूप से सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए योजनाएं बनानी चाहिये और उन पर चलने को तत्पर होना चाहिये। प्रवचनों की व्यवस्था अवश्य रखी जाय। आमतौर से पुराने विचारों के भक्त किन्हीं देवता या अवतारों की लीलाएं सुनाते हैं और यह बताते हैं कि इन लीलाओं को सुनने मात्र से स्वर्ग मिल सकता है या अमुक देवता का नाम लेने या भक्ति करने से जीवन नौका पार हो सकती है। यह विचार मनोविनोद मात्र हैं। हमें जीवन की गति विधियों को सुव्यवस्थित करने, उच्च नैतिक आदर्श अपनाने एवं संसार के सामने अपनी महानता प्रदर्शित करने की प्रेरणाप्रद शिक्षाओं का ही प्रवचनों में आयोजन करना चाहिये। इसके लिए प्रगतिशील और विवेकवान वक्ताओं को ही ढूंढ़ना चाहिये। इनके बिना यज्ञ का उद्देश्य अधूरा ही रह जायगा यही बात भजनों कीर्तनों के सम्बन्ध में होनी चाहिये। देवताओं का गुण गाते रहने या उनका नाम लेते रहने की अपेक्षा देवताओं से सद्गुण देने, सत्प्रवृत्तियां जगाने की प्रार्थना करने वाले भजन कीर्तन गाने चाहिये, ताकि गायक ओर सुनने वाले कुछ प्रेरणा लेकर जावें।

संगठन को मजबूत करने और बढ़ाने का हर संभव प्रयत्न इन यज्ञों में किया जाना चाहिए। इस युग में संगठन ही प्रधान शक्ति है। धार्मिक विचार के लोगों को संगठित होकर सांस्कृतिक पुनर्निर्माण में लगने की प्रवृत्ति पैदा करना इन यज्ञों का उद्देश्य होना चाहिए। जिस यज्ञ में विचार धाराएं फैलाने का कार्य जितना अधिक हो उसे उतना ही सफल माना जाना चाहिये। हर सामूहिक यज्ञ के संयोजक को अपने मस्तिष्क में यह बात भली प्रकार जमा लेनी चाहिए और जितना समय और श्रम यज्ञ व्यवस्था में लगाया गया है उतना ही आगन्तुकों में उच्च प्रेरणाएं भरने में भी लगाना चाहिये इस कार्य की उपेक्षा जरा भी न की जाय। जहां संभव हो वहां लाउडस्पीकर का प्रबन्ध अवश्य किया जाय ताकि सुनने वालों और वक्ताओं को सुविधा रहे।

यज्ञ आयोजनों में अधिकाधिक लोगों से धन इकट्ठा किया जाय चाहे वह थोड़ा-थोड़ा ही क्यों न हो। थोड़े से लोगों से अधिक पैसा लेकर कार्य सम्पन्न करने की अपेक्षा अधिक लोगों से थोड़ा-थोड़ा पैसा लेना अच्छा है। कारण यह है कि पैसा इकट्ठा करने वाले को अपने कार्य की महत्ता उसे समझानी पड़ती है जो देता है। इसी प्रकार देने वाला भी उस कार्य के सम्बन्ध में अधिक दिलचस्पी लेता है तथा उसके प्रति अपना ममत्व जोड़ता है जिसके लिये उसने पैसा खर्च किया है। जनता को अपने कार्य का महत्व समझाने के लिये पर्चे, पोस्टर आदि छपाने और वितरण करने की बड़ी जरूरत है। जहां यज्ञ हो वहां के आस-पास के क्षेत्र में दीवारों पर गायत्री और यज्ञ की महत्ता बताने वाले सुन्दर अक्षरों में वाक्य भी लिखने चाहिये। कार्य की महत्ता समझने पर जनता अवश्य ही उस कार्य में सहयोग देती है।

यज्ञों में धन-शक्ति के साथ ही जन शक्ति की भी बड़ी आवश्यकता रहती है। महिलाओं में धर्म भावना स्वभावतः बहुत अधिक होती है, यदि उन्हें यज्ञ के लाभ समझा दिये जावें और घर वालों को रोक को ढीला करा दिया जाय तो यज्ञ पर बैठने के लिये उनमें उत्साह फूट पड़ता है और यज्ञ कुण्डों पर उनकी पर्याप्त संख्या देखी जा सकती है। जहां महिलाएं अधिक हों वहां उनके लिए कुछ कुण्ड अलग नियुक्त कर देने चाहिये। यज्ञशाला निर्माण तथा अन्यान्य कार्य व्यवस्थाओं के लिये भी लोगों का सहयोग, समय एवं श्रम दान लेना चाहिये। समझदार लड़के बड़े उत्साह से सहयोग देते हैं। कुछ सज्जनों को यज्ञ के समय से कुछ दिन पूर्व ही पूरा समय यज्ञ व्यवस्था में लगाने को तैयार कर लेना चाहिये। बिना अधिक एवं बुद्धिमान सहयोगियों के कोई कार्य भली प्रकार सफल नहीं हो पाता।

सार्वजनिक धन की एक-एक पाई का हिसाब शीशे की तरह स्पष्ट रखना चाहिये। हिसाब रखने में थोड़ी भी उपेक्षा या असावधानी करने से अकारण बदनामी और कलंक उठाने का अवसर आ जाता है। पैसा या सामान उगाहने, जमा करने एवं खर्च करने के लिये कम से कम तीन आदमियों की कमेटी हो और प्रत्येक आय व्यय की जानकारी उस कमेटी के सभी सदस्यों को रहे। यज्ञ कार्य सम्पन्न होने के बाद जिन सदस्यों का पैसा था उनकी एक मीटिंग बुलाकर सारा हिसाब सुना देना चाहिये। हिसाब की पवित्रता रखना यज्ञों में अत्यन्त आवश्यक है। यों खर्च की परिस्थिति के अनुसार व्यवस्था बनती है पर साधारण 24 हजार का एक दिवसीय यज्ञ ढाई तीन सौ में और तीन दिवसीय 1। लक्ष का यज्ञ सात आठ सौ रुपये में बड़ी अच्छी तरह हो सकता है। पुरुषार्थी व्यक्तियों के लिये इतनी व्यवस्था कर लेना कुछ अधिक कठिन नहीं है।

नवरात्रियों में या विभिन्न पर्व उत्सवों पर ग्राम-ग्राम में नगर-नगर में यज्ञ होते रहने चाहिये। इसके लिए पंडाल बनाने की, सजावट की तथा यज्ञोपयोग की आवश्यक वस्तुएं एक बार खरीद लानी चाहिये और उन्हें सुरक्षित रखना चाहिये ताकि बार-बार काम आती रहें। कई शाखा संगठन मिल कर इस प्रकार का एक संग्रह कर लिया जाय तो वस्तुएं समय-समय पर इस क्षेत्र में होने वाले यज्ञों में काम आती रह सकती है और बार-बार का खर्च बच सकता है।

यज्ञों के अन्त में दक्षिणा देने का नियम है। दक्षिणा देते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि लेने वाला इसका क्या उपयोग करेगा। जहां जितना उत्तम उपयोग होता है वहां उतनी ही दक्षिणा सफल मानी जाती है। गायत्री परिवारों का अखिल भारतीय संगठन तपोभूमि में है। यहां भेजा हुआ पैसा आश्रम के नित्य यज्ञ में तथा देशव्यापी गायत्री प्रचार में व्यय होता है; इसलिये प्रत्येक सामूहिक यज्ञ में तपोभूमि की आत्मा को ब्रह्मा या आचार्य मानकर सामर्थ्यानुसार दक्षिणा भेजनी चाहिए, जिससे संख्या का कार्यक्रम चलने में पैसे के अभाव में जो भारी कठिनाई रहती है, उसकी कुछ पूर्ति होती रहे।

5 कुण्डों की यज्ञशाला निर्माण करने के लिये 16-16 हाथ लम्बी चौड़ी यज्ञशाला चाहिए। 9 कुण्डों के लिये 20 हाथ या 24 हाथ लम्बाई चौड़ाई की यज्ञशाला पर्याप्त है। जमीन से कुछ ऊंचा चबूतरा उठा कर यज्ञशाला बनाने में शोभा रहती है। 12 द्वार बनाने के लिये 12 बल्लियां लगानी चाहिये। ऊपर छाया का ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये जिसमें छाया भी रहे और धुंआ भी निकलता रहे।

प्रतिगामी विचारधारा के लोग कहते देखे गये हैं कि यज्ञ पर केवल ब्राह्मण ही बैठे, स्त्रियां न बैठें, गायत्री मंत्र का उच्चारण न किया जाय, सुगन्धित पदार्थों की जगह केवल तिल जौ चावल से ही काम चला लिया जाय। यह चारों ही बातें अविवेकपूर्ण हैं। यज्ञ कुण्डों से निकलने वाली ऊष्मा एवं शक्ति का लाभ तथा दान दक्षिणा दोनों ही लाभ ब्राह्मणों को मिले यह अन्याय है। जिन्होंने इतनी श्रद्धा, तत्परता के साथ अपना खर्च करके यज्ञ कराया है उन लोगों को यज्ञ की आरोग्यकारी, सद्बुद्धि दायिनी तथा श्रेय साधक ऊष्मा से वंचित रखा जाय, इसमें कोई बुद्धिमानी नहीं है।

स्त्रियों को पैर की जूती सामाजिक दर्जे में हीन, तिरष्कृत मानना, उनकी गणना पशुओं में करना और यह समझना कि उनके छूने से यज्ञ अपवित्र हो जायगा कोई विवेकपूर्ण बात नहीं है। यह भारतीय विचारधारा के सर्वथा प्रतिकूल-मध्य युग की कठोर एवं मानवता से रहित विचारधारा हैं। हम मातृ-शक्ति की प्रतिष्ठा, गौरव को समझने वाले लोग हैं। यहां नारी की पवित्रता और श्रेष्ठता नर की अपेक्षा भी अधिक मानी गई है। नारी को इतनी पतित मानना कि वह यज्ञ न करे या वेद मन्त्र न बोले कोई धार्मिक मनोवृत्ति नहीं हो सकती।

मन्त्र उच्चारण के बिना वायु मण्डल में वे ध्वनि तरंगें कैसे उत्पन्न होंगी, जो असंख्यों मस्तिष्कों और अन्तःकरणों में प्रवेश करके सद्बुद्धि का संचार करती हैं? यज्ञाग्नि की विद्युत धारा का संमिश्रण होने से वेद मन्त्रों की शक्ति तरंगें सारे आकाश में उसी प्रकार फैलती हैं, जिस प्रकार रेडियो ट्रान्समीटर की बिजली को वक्ता की आवाज में जोड़कर आकाश में फेंक देते हैं और उसे सारे संसार में सुना जा सकता है। यदि चुपचाप बिना मंत्रोच्चार के हवन किया जाय तो उससे यह विचार एवं भाव फैलाने वाली मन्त्रों की शक्ति किस प्रकार प्रस्फुटित होगी? चुपचाप तान्त्रिक मंत्रों का तो हवन करते हैं, पर वेद मंत्रों के ऊपर, गायत्री मंत्र के ऊपर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। सुगन्धित एवं आरोग्य वर्धक औषधियां ही वायुशोधक एवं रोग निवारक होती हैं, उन्हें हटा कर केवल अन्न का, जौ चावल आदि का हवन किया जाय तो वे आरोग्यवर्धक एवं वायुशोधक उद्देश्य कैसे पूरे होंगे? थोड़ा हविष्यान्न (तिल जौ चावल) भी सामग्री में मिलाने का विधान है पर सबका सब केवल खाद्यान्न ही हवन करना, किफायत एवं सस्तेपन का कारण तो हो सकता है पर उससे वे लाभ कदापि प्राप्त नहीं हो सकते जो औषधियों के हवन से पूरे होते हैं।

चूंकि आम रिवाज यह है कि जो कुछ हमने देखा है वही सनातन धर्म है, वही उचित है। इसी आधार पर अब तक घोर बंधन में पड़ी हुई, पर्दे से जरा भी बाहर न निकलने वाली स्त्रियां, यज्ञों में बैठने जाती नहीं देखी गई तो वह हमारा न देखना धर्मशास्त्र बन गया। अन्य किसी वर्ण को गायत्री मन्त्र याद नहीं होता था, उन्हें बताया भी नहीं जाता था, दूसरे ब्राह्मणों की जीविका भी स्वयं हवन करने पर ही निर्भर थी, इसलिए अन्य वर्णों का हवन पर न बैठना भी सनातन धर्म हो गया। बहुत से ब्राह्मण भी ऐसे होते थे कि जो शूद्र गायत्री मन्त्र या कोई और मन्त्र उच्चारण नहीं कर सकते उनसे भी वे यज्ञ की दक्षिणा का लाभ उठाना चाहते थे ऐसे लोगों की सुविधा के लिये यह बचत निकाली गई कि बिना मंत्रोच्चार के केवल स्वाहा कह कर हवन कर लिया जाय। अब वही बचत एक व्यवस्था के रूप में सामने रखी जाती है। जिजमान यज्ञ में जो खर्च करना चाहता है उसका बहुत थोड़ा अंश सस्ते जौ चावल आदि होमने में खर्च हो और शेष सारा धन दक्षिणा देव पूजा, वस्त्र, यात्रा आदि के नाम पर पंडित जी को मिल जाय इसीलिये यह ढंग निकाला गया था। अब वही ‘ढंग’ एक नियम बताया जाता है। बुद्धि की कसौटी पर विवेक पूर्वक जरा भी इन बातों पर विचार किया जाय तो खरे खोटे की उचित अनुचित की परीक्षा सहज ही हो सकती है! हमें अविवेक पूर्ण रूढ़ियों का गुलाम नहीं विवेक का पुजारी बनना चाहिए।

अपने आयोजित यज्ञों का संचालन ऐसे हाथों में न सौंपना चाहिए जो विवेक की उपेक्षा करके रूढ़ियों पर ही अड़ने की हठधर्मी करते हैं। कई स्थानों पर देखा गया है कि बड़े आयोजन करने की इच्छा करने वाले कार्यकर्ता उतना धन अपने बलबूते पर तो जुटाने का साहस नहीं करते, उस कार्य के लिए किसी धनी आदमी को आगे कर लेते हैं। वे धनी लोग विवेक को आधार न मान कर किसी बड़े तिलक वाले पंडित के प्रभाव में आ जाते हैं और सारी व्यवस्था को ही उलट देते हैं। वही उलटे विचारों का कार्य चल पड़ता है। गायत्री परिवार के उद्देश्य एक कोने पर उठाकर रख दिये जाते हैं। परिवार के सदस्यों को ऐसी स्थिति से सदा ही बचना चाहिए। बड़े न सही छोटे-बहुत छोटे-सामूहिक हवन कर लिये जांय पर सिद्धान्तों की हत्या न की जाय। यदि किन्हीं प्रभावशाली या धनी लोगों को धन संग्रह या व्यवस्था के लोभ से सम्मिलित किया जाय तो उपरोक्त चार तथ्यों के संबंध में भली प्रकार स्पष्टीकरण कर लेना चाहिए। आदर्शहीन आयोजन के लिए सहयोग लेना और देना दोनों ही व्यर्थ है।

जहां बहुत बड़े—अधिक जनता को आमन्त्रित करने योग्य सार्वजनिक यज्ञों की व्यवस्था न हो सके, खर्च कम करना हो तो वहां छोटा सामूहिक यज्ञ करना चाहिए। इसे एक दो व्यक्ति ही मिलकर कर सकते हैं, अपने घर के आंगन में बांसों और रंगीन कपड़ों की सहायता से सुन्दर सुसज्जित मण्डप बना कर उसी में एक कुण्ड एक-एक फुट लम्बा-चौड़ा गहरा, तीन मेखलाओं सहित बना लेना चाहिए। कुण्ड में असुविधा हो तो एक हाथ लम्बी एक हाथ चौड़ी, चार अंगुल ऊंची वेदी बनाई जा सकती है। चार कोनों पर चार चौकियां रख कर कलश स्थापित करने चाहिए। बीच में प्रधान पूजा वेदी पर गायत्री माता का चित्र सजा लेना चाहिए।

मुहल्ला पड़ौस के, नाते रिश्ते के, कुटुम्ब, परिचय के सभी नर-नारियों को आमन्त्रित किया जाय। जो आते जांय वे हाथ पैर धोकर लाइन से क्रमबद्ध बैठते जांय। जो जप करना चाहें उन्हें मालाएं और जो पाठ करना चाहे उन्हें गायत्री चालीसा या सहस्र नाम दे दिये जांय। आगन्तुकों का जप और पाठ चालू रहे। हवन वेदी पर सब लोग बारी बारी बैठते जांय। जितने व्यक्तियों के आने की आशा हो, जितनी आहुतियां करनी हों, जितना समय लगाना हो, उस हिसाब से पारी बदलते रहें। पूर्णाहुति परिक्रमा आदि होने के बाद ही कीर्तन प्रवचन का कुछ कार्यक्रम भी अवश्य रख लिया जाय।

ऐसे छोटे सामूहिक हवन प्रातःकाल या सायंकाल आगन्तुकों की सुविधा के अनुसार रखे जा सकते हैं। प्रवचनों के बाद ही कीर्तन प्रवचन के लिए कम से कम दो घंटा समय रख लिया जाय। यदि कोई प्रभावशाली गायक या वक्ता हों और यह आशा हो कि पीछे भी लोग उत्साह पूर्वक इकट्ठे होंगे तो प्रातः काल हवन होने की दशा में शाम को प्रवचन रखे जा सकते हैं। आगन्तुकों को प्रसाद में साधारण-सी कोई मीठी चीज, फलों के टुकड़े, आदि खाने की वस्तु देने के अतिरिक्त कोई सस्ता सा गायत्री विषयक ज्ञानवर्धक साहित्य भी अवश्य देना चाहिए। अन्न दान से ज्ञान दान का पुण्य सौ गुना अधिक माना गया है। हवन के बाद कन्याओं का पूजन और भोजन भी कराया जाय। ऐसे सामूहिक हवन दस बीस रुपया खर्च में ही बड़े आनन्द से हो जाते हैं। पारिवारिक सत्संग कभी इस उपासक यहां, कभी उस उपासक के यहां होते रहने चाहिये। ऐसे यज्ञों में बहुत छोटा हवन भी किया जा सकता है जिसमें दो चार रुपया ही खर्च हो। प्रत्येक यज्ञ सामूहिक हो ताकि एक व्यक्ति पर अधिक बोझ न पड़े और अन्य लोग भी सामूहिकता एवं सहकारिता के महत्व को समझे। जहां खर्च की बहुत तंगी हो और अन्य कोई व्यवस्था न बन पड़े वहां एक सुसज्जित चौकी पर गायत्री माता का प्रतीक कलश और यज्ञ पिता का प्रतीक घृत दीप प्रतिष्ठापित करलें। उसकी रोली, अक्षत, पुष्प, जल आरती आदि से पूजा करके जप, पाठ, कीर्तन एवं प्रवचन का कार्यक्रम रखा जा सकता है। खर्च की कठिनाई पड़ने पर इस प्रकार के सस्ते आयोजन हो सकते हैं, पर उन्हें करना अवश्य चाहिये। यदि अपनी संस्कृति को पुनः जीवित एवं जागृत करना हो तो सामूहिक यज्ञ कार्यक्रमों का पूरा-पूरा प्रसार होना चाहिए चाहे वे आयोजन खर्च और प्रदर्शन की दृष्टि से कितने ही छोटे क्यों न हों। एक बात हर संयोजक को ध्यान रखनी है कि केवल एक जाति को ही हवन करने देना, स्त्रियों का बहिष्कार करना, मंत्र न बोलना जैसे अविवेक पूर्ण प्रतिबन्ध लगने की बात पर जहां जोर दिया जाता हो, अपनी बात न चल पा रही हो तो उस आयोजन को करना ही व्यर्थ है। किसी प्रकार यज्ञ की लकीर पीट ली जाय, बड़ा हवन दिखाई पड़े, इसलिए किसी भी प्रकार कुछ कर लिया जाय-यह सोचना भूल है। गलत परम्परा डालने से अविवेक के आगे झुक जाने से, तो उस कार्य को न करना ही उत्तम है।

होली आदि त्यौहारों पर जहां संभव हो सामूहिक यज्ञ कराने का प्रयत्न करना चाहिये। विवाहों में पंडित लोग नाम मात्र की चिन्ह पूजा का जैसा हवन कराते हैं। नामकरण, मुण्डन, यज्ञोपवीत आदि संस्कारों में भी हवन की लकीर ही पिटती हैं। शरीर त्याग होने पर चिता में भी कपाल क्रिया के समय थोड़ा-सा घी मात्र डाल देने की प्रथा है इन कार्यों में अधिक सुव्यवस्थित यज्ञ होने चाहिए। मृतक के तेरहवें पर बहुत लड्डू पूड़ी बनवाने में कमी करके अंत्येष्टि संस्कार का यज्ञ, चिता पर विधिवत् किया जाय ऐसा प्रयत्न करना चाहिये। सामूहिक यज्ञों का विधान ‘गायत्री यज्ञ विधान’ में छपा है। प्रत्येक संस्कार के यज्ञ का सरल विधान तपोभूमि द्वारा प्रकाशित ‘संस्कार पद्धति’ में छपे हैं। इन्हें कोई व्यक्ति एक दो महीने तपोभूमि में रहकर सीख ले तो अपने क्षेत्र में इस प्रकार के यज्ञ आयोजनों द्वारा जनता की बड़ी सेवा कर सकता है।

रामायण पाठ, गीता पाठ, व्रत उद्यापन, कथा वार्ता कीर्तन आदि के आदि आयोजन लोग करते रहते हैं। उनके साथ-साथ गायत्री यज्ञ की भी व्यवस्था जुड़ जाय ऐसा प्रयत्न करना चाहिए। अन्य लोगों के विविध धार्मिक आयोजनों में उत्साह पूर्वक भाग लेना चाहिए साथ ही यह भी प्रयत्न करना चाहिए कि कोई भी धर्म आयोजन गायत्री यज्ञ से रहित न रहने पाये।

घर के सब लोगों का जन्म दिन मनाया जाय, जीवन का महत्व समझाया जाय और जिसका जन्म दिन हो वह आगे क्या करे यह सुझाव एवं आशीर्वाद देने, उपहारों से उसे प्रसन्न करने, जीवन का महत्व पहचाने के लिए प्रेरित करने का अवसर देने के लिये जन्म तिथियां अवश्य मंगाई जांय। इसी प्रकार परिवार के स्वर्गीय पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिये उनके सद्गुणों से प्रेरणा लेने के लिये शिक्षात्मक श्राद्ध मनाये जाने चाहिये। इन दोनों आयोजनों में हवन को प्रधानता देकर सहज ही सुन्दर सा उत्सव आयोजन बन सकता है।

भारतीय धर्म के आदि पिता यज्ञ को उसका स्वाभाविक सम्मान एवं महत्व प्राप्त होना ही चाहिए। आज अनेक दृष्टियों से सामूहिक गायत्री यज्ञों की बड़ी भारी आवश्यकता है। इसके लिये हमें शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिये।
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