गंध योग का साधन
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(संकीर्तन)
पंचतत्वों में पृथ्वी तत्व सबसे स्थूल है और उनकी तन्मात्रा गंध भी दूसरी तन्मात्राओं की अपेक्षा सुग्राह्य। अतएव सबसे अधिक विकसित इन्द्रिय नासिका मानी जाती है। स्वेदज प्राणियों में भी नासिका का विकास पाया जाता है। वे सूँघकर ही अपने आहार का पता लगाते हैं। इसी प्रकार आन्तर शब्दादि के जागृत करने में भी सबसे सुलभता से गंध ही जागृत होती है। थोड़े ही दिनों में साधक को गंध का अनुभव होने लगता है और तब उसके लिए साधन में रुचि का होना स्वाभाविक हो जाता है। यह गंध कहीं बाहर से नहीं आती। उसके भीतर से ही उसका उद्भव होता है और साधन की उच्चावस्था में वह चाहे जिस वस्तु से इच्छित सुगन्ध प्राप्त कर सकता है। दूसरों को भी उसका अनुभव करा सकता है।
प्रायः साधकों को यह अनुभव होगा कि कभी-कभी कोई सुगन्ध अकस्मात आने लगती है। आस-पास उसका कोई कारण नहीं होता। पास के दूसरे लोगों को उसका अनुभव भी नहीं होता। लेकिन उनको तीव्रता से उसका बोध होता है। ऐसी अवस्था चलते फिरते चाहे जब हो सकती है और कभी-कभी वह दो-तीन घण्टे तक स्थायी भी रहती है। इसका कारण नासिका के गंध तन्तुओं का जागृत हो जाना है। वे किसी भी प्रकार के आध्यात्मिक साधक में मन की अनुकूल अवस्था के कारण जागृत हो जाते हैं। दूसरे प्रकार के साधक स्वेच्छा से उसे जागृत नहीं करते। उसके जागृत होने के रहस्य को नहीं जानते। अतएव उनका उस पर अधिकार नहीं होता। वे उसे अपनी इच्छा से न तो पुनः जागृत कर सकते और न उसी समय उसे स्थिर रख सकते। इसके विपरीत ज्यों ही वे उसे स्थिर करने की चेष्टा करने लगते हैं वह विलीन हो जाती है। गंध के साधक उसे स्वेच्छा से जागृत करते हैं, अतः वे उसे स्थिर भी कर सकते हैं और पुनः भी चाहे जब उसका उत्थान कर सकते हैं। उनकी प्रबल एकाग्रता उसे इतना उद्दीप्त भी कर सकती है कि समीप के लोग भी भली प्रकार उस गंध का तीव्रता से अनुभव करने लगें।
गंध की साधना का मूल मंत्र है नासिका की नोक पर त्राटक करना। एकान्त स्थान पर नीरव समय में किसी भी एक आसन से सीधे बैठकर, गर्दन को तनिक आगे की ओर झुकाकर अपलक नेत्रों से तब तक नासिका के नेत्र को एकाग्र होकर देखते रहना चाहिये, जब तक नेत्रों से अश्रु न गिरने लगें। साधन का स्थान और समय निश्चित होना चाहिए। उसे बदलना नहीं चाहिए। नासिका पर दृष्टि स्थिर करके बराबर यह भावना करते रहना चाहिये कि अब गंध आ रही है। प्रारम्भ में एक महीने तक साधन का आरम्भ करते समय एक गुलाब के इत्र का फाया अथवा एक गुलाब का फूल रखना चाहिए। साधन के लिए बैठने पर नासिकाग्र पर दृष्टि स्थिर करके चार पाँच सेकेण्ड एकाग्र होकर उसे सूँघना चाहिए और फिर उसे पृथक करके उसी गंध की भावना करना चाहिए। बार-बार यह सोचना चाहिये कि वही गंध आ रही है और मैं उसे सूँघ रहा हूँ। साधन समाप्त करने पर मुख में पानी भरकर नेत्रों पर जल के छींटे देकर उन्हें भली प्रकार धो डालिये और मुख का जल थूक दीजिये। पन्द्रह बीस दिन बाद एक आँसू पोंछकर फिर ध्यान जमाना चाहिए। इस प्रकार इस क्रम को बढ़ाना चाहिये।
जब गंध स्वतः आने लगे तब इत्र या फूल का सहारा लेना बंद करे दें। उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते, हर समय गंध के अनुभव की ओर ध्यान रखना चाहिए। सदा उसी का अनुभव करना चाहिए। गंध प्रायः बदलती रहेगी, कभी मधुर, कभी कटु, कभी भली, कभी अप्रिय। कोई भी गंध आवे उसे दूर करने का प्रयत्न न किया जावे। किसी गंध को स्थिर रखने की चेष्टा भी न हो। जो भी गंध आती हो, तटस्थ रूप से आप उसका अनुभव कीजिए। यदि ध्यान के समय जब आप नासिका पर दृष्टि लगाये हों, कोई दृश्य दिखलाई देने लगे अथवा कोई शब्द सुनाई दे तो उसकी ओर आकृष्ट न हों, कहीं अन्यत्र ध्यान न जाने दें। फिर वह कितना ही महत्वपूर्ण या अद्भुत क्यों न प्रतीत होता हो। इस प्रकार निरन्तर गंध पर ध्यान रखने का परिणाम यह होगा कि गंध का बदलना बंद हो जायेगा। यदि साधक गंध प्रदर्शन के फेर में न पड़ा, यशेच्छा से दूसरों को गंधानुभव कराने के लोभ को दबा सका तो उसे निर्णन्ध अवस्था प्राप्त होगी। यहीं मन का लय होकर समाधि अवस्था प्राप्त होती है।

