दुर्गा पूजा का तत्त्वार्थ
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(श्री 108 स्वामी शाँतानन्द जी एम.ए.)
दसभुजी दुर्गा माता सिंह और असुर पर सवार हैं। दाहिना पैर सिंह पर और बायाँ पैर असुर पर स्थापित है। दश हस्तों में दश विध अस्त्र-शस्त्र हैं। दाहिनी ओर गणपति और सरस्वती। बायीं ओर कार्तिक (कुमार) और लक्ष्मी।
गणपति का वाहन चूहा, सरस्वती का वाहन राजहंस, लक्ष्मी का वाहन उल्लू, स्वामि-कार्तिक का वाहन मोर। महादेवी दुर्गा के ऊर्ध्व अंश में महादेव वृषभारूढ़ हैं। जिनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और दायें हाथ में डमरू। महादेवजी के दायें बायें अनन्त कोटि देवता विभिन्न वाहनों पर आरुढ़ हैं। ब्रह्मा हंस पर, इन्द्र ऐरावत पर, यमराज महिष पर इत्यादि।
महादेवी के सन्मुख पृथ्वी पर मृण्मय कलश स्थापित है। जिस के बीच में जल, ऊपर नारियल। माता के दक्षिण दिशा में छाज पर घट, कनक, घट, दीप, पंखा, शंख आदि स्थापना का लक्ष्यार्थ यही है कि साधक पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, इत्यादि पाँच तत्व और तन्मात्रा से निर्मित शरीर और मन महाशक्ति को अर्पण करते हुये परम शरणागत हो जावे।
घट में प्रेम रूपी जल में ब्रह्मानंद रूपी मीठा रस गुप्त रूप में स्थित है। घट पर सूर्य किरण पड़ने से उसकी छाया ओंकार रूप में नजर आती है।
पंच भौतिक शरीर और मन की हृदय रूपी गुफा में परमानन्द रूपी आत्मा स्थित है। गुरुदीक्षा पाकर मंत्र चेतन होने पर वही महाशक्ति अष्ट ऋद्धि सिद्धि में विभूषित होकर, ज्ञान विज्ञान संपन्न ब्रह्म वेत्ता गुरु को जगत हितार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष दाई परम शक्ति संचार का अधिकार देती है।
मंत्र, गुरु, इष्ट अर्थात् शब्द, अर्थ लक्ष्य इन तीनों का त्रिकुटी जान न होने पर सिद्धि असंभव है। ब्रह्मवेत्ता ज्ञान विज्ञान संपन्न गुरु महादेवी की पूजा में तत्पर है। यही देवी पूजन का यथार्थ दृश्य है। इसका लक्ष्यार्थ यही है कि निर्गुण परब्रह्म ने साकार रूप धारण किया है। जिनकी दश भुजा दश दिशा हैं। दश हाथ में दश अस्त्र धारित है। जो विभिन्न दिशाओं में विभिन्न रूप मंगल अमंगल दर्शाते हैं।
माता का दाहिना पैर सिंह पर धारण करने का गूढ़ लक्ष्यार्थ यही है कि महायोगी, महाबली, महात्यागी उद्योगी पुरुषसिंह साधक पर ही माता का दक्षिण चरण स्थापित है और महा-असुर महा-दैत्य के ऊपर उसका बाँया चरण स्थापित है। क्योंकि देव दैत्य उभय ही माता के प्रिय पुत्र हैं। दुर्बल, निर्बल इस संसार में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से और परलोक से वंचित रहता है। जब-जब महापाप रूप महा असुर अत्यन्त भक्त श्रेष्ठ सिंह पर हमला करता है तब-तब भक्त श्रेष्ठ की रक्षा करने के लिए माता संहार रूप धारण करके दुष्टों का निर्मूल करती हैं।
असुर के गले में साँप और छाती में शूल है। इसका लक्ष्यार्थ यही है कि जब माया रूपी सर्प-दंशन के जहर में विह्वल होकर ऊपर ताकता है अर्थात् ईश्वर की तरफ ताकता है तो विवेक रूप भाला में छाती पर अचानक बेधने पर महामाया के हाथ से संहार होता है अर्थात् माया मुक्त होता है।
महादेवी के अर्धांश में महादेव आदि विभिन्न देवों का भिन्न-भिन्न वाहन पर आरुढ़ रहने का लक्ष्यार्थ यही है कि सब देवता सूक्ष्म रूप में देवी की असुर संहार रूपी विराट लीला दर्शन करने के लिए स्वर्ग धाम अर्थात् महा आकाश में स्थित हैं। देवी का लक्ष्मी शारदा, गणपति, कार्तिक रूपी पुत्र पुत्री-अर्थ, ज्ञान, सिद्धि शक्ति दायिनी चार क्षुद्र शक्ति हैं। उल्लू, हंस, चूहा, मोर उन्हीं शक्तियों का वाहन होने का लक्ष्यार्थ हैं।
गणपति का आशीर्वाद पाने पर ही मूषक रूपी साधक माया बंधन, भव समुद्र से पार हो सकता है। लक्ष्मी का वाहन उलूक! लक्ष्यार्थ यही है कि परमार्थी संस्कारहीन जीव पर जब इस देवी की कृपा होती है तब वह परमार्थ रूप दिवस में अंधा होकर अनर्थ रूपी रात्रि में पाप पंक रूपी विषयक में उन्मत्त होता है। कार्तिक का वाहन मोर यही दर्शाता है कि जब साधक रूपी मोर कुण्डलिनी महाशक्ति रूपी सर्प को भक्षण कर सकता है तभी महाशक्तिवान होकर सर्वसिद्धि सम्पन्न होते हुए महा ऐश्वर्यशाली होता है। महा देवी वीणावादिनी शारदा साक्षात ज्ञान शक्ति की प्रत्यक्ष मूर्ति हैं। जिनके दाहिने हाथ में वेद, बायें में वीणा है। इसका लक्ष्यार्थ यही है कि ऋग्, यजु, शाम, अथर्व का परम ज्ञान इस शक्ति का दाहिना हाथ है अर्थात् ये ज्ञानदात्री हैं।
बायें हाथ में वीणा का तात्पर्य यही है कि साधक शरीर रूपी वीणा के इडा, सुषुम्ना, पिंगला रूपी तीन तारों का सहारा लेकर योग साधन करने पर साधक श्रेष्ठ परमपद को प्राप्त होकर परमहंस की पदवी में विभूषित होते हैं। परमहंस महात्मा की ही प्रत्यक्ष मूर्ति हंस रूप माता का वाहन दिखाया गया है। जो मायारूपी जल त्यागकर परमानन्द रूपी दूध पान करके सदा परमपद में लवलीन है।
स्वर्ग धाम में महाबली असुर के देवताओं पर आक्रमण करने पर इन्द्र, चन्द्र, वरुण, यम आदि सब देवताओं के स्वर्गधाम से वंचित होकर भगवान की स्तुति करने पर सर्व दैवी शक्ति एकत्रित होकर महाशक्ति दुर्गा रूप को धारण करके, उसने असुर संहार करके देवताओं को पुनः स्वर्गराज्य प्रदान किया। भगवान श्रीकृष्ण गीता में भी यही दिखाते हैं कि जब-जब पारमार्थिक जीव पर अनाचारियों का अत्याचार होता है तब-तब ही भगवान प्रकट होकर भक्तों की रक्षा अनाचारियों को दण्ड देकर धरती माता को आश्वासन देते हैं।
आइये हम सब उसी सच्चिदानन्द परमब्रह्म के साकार रूप के ध्यान पूजन में मग्न हो जावें। परमानंद रूपी माता हमारे समूल विघ्न नाश करके अपनी परमानंद पवित्र गोद में हमें निश्चय स्थान देगी।

