धर्म कार्यों में अशुद्ध घृत न बरता जाय।
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(श्री अनिप्रास दास पोद्दार, कलकत्ता)
वनस्पति घी मनुष्य जाति के स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला एक मन्द विष है। इसके प्रचलन से गौ वध को प्रोत्साहन मिलता है जिससे भारत का गौ धन दिन-दिन कम होता जा रहा है। कल्याण के ‘गौ अंक’ में इस तथ्य पर सुविस्तृत प्रकाश डाला गया है।
डॉक्टर एम॰ एन॰ गोडबोले, रु.्न., क्च.स्ष्., क्क.॥.ष्ठ (क्चद्गह्द्यद्बठ्ठ) गौ अंक में लिखते हैं कि ‘वनस्पति घी में निकिल धातु डालते हैं, जिसके परमाणु उसमें रहते हैं, जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाते हैं। ऐसे ही तेजाब इसमें दिये जाते हैं जो स्वास्थ्य पर बुरा असर करते हैं। जिस गैस द्वारा यह जमाया जाता है उसकी गरमी 40-49 सेंटी ग्रेड होती है। लेकिन मानव शरीर में 37 सेंटी ग्रेड तापमान ही होता है। अतः मानव शरीर से या तो वह अनपचा ही निकल जाता है या यकृत और प्लीहा की नसों में जमा हो जाता है और कब्ज तथा अन्य उदर रोगों का सृजन करता है एवं धीरे-धीरे मनुष्य के प्राणों का ग्राहक बन जाता है। आगे वे लिखते हैं कि इसमें घी की सुगंध और विटामिन के लिए एक प्रकार का मछली का तेल मिलाया जाता है।
डेयरी एक्सपर्ट सर दातारसिंह ने हाल ही में भिवानी गौ कान्फ्रेन्स के पद से भाषण देते हुए वेजीटेबल घी को गौर रक्षा में बाधा पहुँचाने वाला बताया है। यह राष्ट्रीय धन और स्वास्थ्य का नाशक है। ऐसे अशुद्ध अपवित्र और हानिकर पदार्थ को व्यवहार में लाने से जितना बचा जाय उतना ही अच्छा है। निकट भविष्य में 20-30 कारखाने इसके और भी खुलने वाले हैं, यदि जनता ने इसकी हानियों की ओर ध्यान न दिया तो इसका प्रचार और भी तीव्र गति से बढ़ेगा और राष्ट्रीय स्वास्थ्य तथा धन की भारी क्षति होगी।
ऐसे हानिकारक और अपवित्र पदार्थ को धार्मिक कृत्यों में तो स्थान दिया ही नहीं जाना चाहिए। मन्दिरों में भगवान के भोज्य पदार्थों में, यज्ञों की आहुतियों तथा पित्रेश्वरों के श्राद्धों में और अन्य प्रकार के ब्रह्मभोज, और धर्म यज्ञादि कार्यों में इसका प्रयोग करने से धर्म लाभ के स्थान पर धर्म हानि होती है। धार्मिक व्यक्तियों को इस दिशा में पूरी-पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। देव और पित्रों को अशुद्ध एवं हानिकारक पदार्थ देने से उनका वरदान नहीं अभिशाप ही प्राप्त होता है।
देव पूजा और धार्मिक कर्मकाण्ड करने कराने वाले धर्म प्रिय व्यक्तियों से मेरा विशेष रूप से अनुरोध है कि वे धर्मकार्यों में इसका पूर्णतया निषेध करें। मन्दिरों में इस घृत के दीपक न जलाए जाय। जो लोग देव पूजन का सामान बेचते हैं उन पर कड़ी दृष्टि रखी जाय केवल उन्हीं के यहाँ से सामग्री मँगाई जाय जो शुद्ध घृत बेचने का विश्वास दिलावें। इस दिशा में देश व्यापी आन्दोलन होने की आवश्यकता है। प्रमुख तीर्थों के विद्वान पंडित, महंत, साधु, संन्यासी इस आन्दोलन का नेतृत्व करें और स्थान स्थान पर ऐसे निश्चय करावें कि देव मन्दिरों एवं धर्म कार्यों में केवल शुद्ध एवं विश्वस्त घृत का ही प्रयोग हो। प्रशुद्ध वेजीटेबल घी का उपयोग निषिद्ध हो। आशा हैं कि विज्ञजन धार्मिक क्षेत्रों से इसका निषेध आरम्भ करके इस आन्दोलन को आगे बढ़ावेंगे और गौ रक्षा तथा देश के धन, धर्म तथा स्वास्थ्य की रक्षा करके पुण्य के भागी बनेंगे।

