अपने चिकित्सक स्वयं बनिये
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जितनी अच्छी तरह आप स्वयं अपने मन को समझ सकते हैं, उसकी कमजोरियाँ, निर्बलतायें, न्यूनताएं या प्रवृत्तियां पहिचान सकते हैं इतनी उत्तमता से अन्य कोई भी चिकित्सक नहीं पहचान सकता। चिकित्सक को सम्भव है कि आप अपने गुप्त रहस्य न बता सकें किन्तु आप स्वयं उन्हें भली भाँति समझ सकते हैं और स्वयं अपने ध्यान सूचनाओं, विश्वास, तर्क तथा अध्ययन शक्तियों से उनका निराकरण भी कर सकते हैं। स्वयं यह कार्य जितनी अच्छी तरह से हो सकता है, इतनी उत्तमता से कोई भी मानसोपचारक नहीं कर सकता।
समस्त रोग तथा व्याधियों के मुख्य कारण ईर्ष्या, स्वार्थ, प्रतिशोध, क्रूर दुर्भाव रहता है। यदि तुम्हारा मन अशाँत या चंचल रहता है तो उसका अभिप्राय यह है कि तुम किसी से द्वेष रखते हो या ईर्ष्या, स्वार्थ, प्रतिशोध क्रोध आदि की भट्टी में जल रहे हो। प्रत्येक विरोध, तृष्णा, भ्रम, संक्षय या संघर्ष का अनिष्ट विचार निरंतर उथल-पुथल मचाया करता है। हमारे मन की कल्पना, मलिनता मोह, चिन्ता, सन्देह सब प्रकार की अनुकूलता की माँगें जैसे मान प्रतिष्ठा, धन-धान्य हमें अस्त-व्यस्त रखते हैं और जीवन को दुखी बनाते हैं, मनुष्य को, अनेक व्यर्थ के भय, न होने वाली बातों की चिन्तायें निरंतर दुःखी बनाया करते हैं। कितने ही व्यक्ति संसार के क्षुद्र मान, प्रतिष्ठा, जन कीर्ति वस्त्र, अहंकार जैसे जड़ पदार्थों के न मिलने से उद्विग्न बने रहते हैं। मिथ्या अहंकार के पीछे पागल रहते हैं। हमें अमुक भोजन चाहिये अमुक अलंकार चाहिये, अमुक सुन्दर स्त्री चाहिये -ऐसी अनेक कपोल कल्पित बातों को लेकर बहुसंख्यक बन्धनों में अपने आप को बाँधा करते हैं। साँसारिक आकांक्षाएं उन्हें बन्धन में बाँधती तथा चारों ओर घसीटती रहती हैं।
धर्मबुद्धि से रोगों का निराकरण-
इन अज्ञात ग्रन्थियों को आप स्वयं चाहें तो चेतन मन के समक्ष ला सकते हैं। यदि कारण ज्ञात हो और दुःख न हटे तो धार्मिक भावना बढ़ाने की निताँत आवश्यकता है। इस से आप के दुर्भाव मिथ्या आरोप, क्षुद्र त्रास कल्याणकारी मधुरता में बह जायेंगे। सब ओर से त्रस्त सताया हुआ व्यक्ति भी धर्म की एक डुबकी से पूर्ण परितृप्ति हो सकता है। धर्मबुद्धि मनुष्य में प्रारम्भ से ही रहे तो उसे क्यों मानसिक रोगों का शिकार बनना पड़े।
मनुष्य के शरीर में अशुद्ध एवं रोगी रुधिर तभी तक प्रवाहित होता है जब तक उस के मन में अशुद्ध विचार रहते हैं। दुःख व नरक तभी तक नजर आते हैं जब तक मन स्वार्थ, ईर्ष्या, प्रतिशोध एवं क्रोध के विनाशकारी दुर्भावों में व्यस्त रहता है। यदि तुम शरीर को निरोग, निर्विकार, स्वस्थ रखना चाहते हो तो मन के मेल को बहा दो। मत्सरता, द्वेष निरुत्साह और दूसरों से बदला लेने की भावना को बिल्कुल हटा दो। जिस प्रकार प्रकाश तथा विशुद्ध वायु के आने से गृह योग्य बन जाता है। उसी प्रकार सुख, मैत्री, करुणा, विश्व मैत्री, भलाई, परोपकार, मृदुता के विचारों में रमण करने से मुखाकृति सुन्दर बनती तथा शरीर व मन शान्त एवं आनन्ददाई बनता है।
मैत्री भावना से रोग निवारण-
द्वेष, क्रोध, ईर्ष्या स्वार्थ, क्रूरता का प्रतिकार मैत्री भावना से होता है। कायरता से मुक्त होना हो तो योग सूत्र में वर्णित मैत्री भावना का आश्रय ग्रहण करो। मैत्री भावना भीरुता की विनाशक है। मनुष्य को सब के प्रति सद्भावना रखना ही और शुद्ध, रमणीय, मधुर प्रदेश में ही शान्ति है, वहीं तृप्ति है। संसार के बाह्य पदार्थों से वृत्ति हटा कर आत्मा में ही स्थिर रहो। उसी प्रशान्त प्रदेश में तुम्हें अखण्ड प्रसन्नता, सुस्थिर बुद्धि, और पूर्ण तृप्ति होगी।
आप प्रातः अथवा सायंकाल शान्त चित्त होकर इन भावनाओं में रमण कीजिए-”मैं हर प्रकार से परिपूर्ण हूँ। तृप्त हूँ। मुझे पूर्ण अनुभव है कि वास्तविक सुख का भंडार तो आत्मा है। मैं संसार के मिथ्या धन, मान, प्रतिष्ठा, वैभव बढ़ाने के लिए हाय-हाय नहीं करता, मैंने आत्मा में स्थिरता प्राप्त कर ली है। अतः मुझे पूरी बे फिक्री है, निश्चिन्तता है, आत्म-तृप्ति है। मेरे पास सब कुछ है। मुझे बाहरी सम्पदाओं की आवश्यकता नहीं है। मेरे हृदय से प्रलोभन, लोभ, अतृप्ति, अनिष्ट कल्पनाएँ, दुष्ट वासनाएँ, दुश्चिंताएं विनष्ट हो गई हैं और मैं आध्यात्मिक उच्च शिखर पर आरुढ़ हो गया हूँ। मेरी आत्मा में सब प्रकार का सामर्थ्य है। मैं उसी में तृप्त हूँ।”
इस प्रकार की उच्च भावनाओं में ध्यान मग्न होने से हृदय में अपूर्व शान्ति का अनुभव होगा और अज्ञानाँधकार दूर होकर तुम्हारे अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश देदीप्यमान होने लगेगा। जिसका मन अनात्म पदार्थों में लीन नहीं होता वही सर्व व्यापी चेतन में स्थिर एवं एकाग्र रहता है।
दुःखों की ओर से उपेक्षा की भावना-
दुःखों, क्लेशों, हानियों को पुनः-पुनः स्मरण करने की अपेक्षा उन्हें पर्वत के समान समझने के बजाय उधर से विमुख तथा लापरवाह होकर विस्मृत कर देना आध्यात्मिक शान्ति कर देने वाला है। भूल जाना, विस्मृत कर देना, उसे याद न करना ही एकमात्र उत्तम है। उधर से लापरवाह होकर किसी नवीन कार्य में संलग्न होना उत्तम है। आप अपने रोगों का विचार न कर उधर से सर्वदा के निमित्त उपेक्षित हो जाइये। आप तो यही उच्चारण कीजिए-”परमात्मा स्वास्थ्य है और स्वास्थ्य पर मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार है। पर मेरा कर्त्तव्य है कि जल्दी से जल्दी उस खजाने पर अधिकार जमा लूँ। मैं अनुभव कर रहा हूँ कि आदर्श स्वास्थ्य तथा बल की तरंगें मुझ में से निकल कर रोग, क्लेश और शोक को धो रही हैं।” उसका आभास करना ही मैत्री भावना का स्वरूप है। जब आप समस्त विश्व के प्राणियों से मित्रता का नाता निबाहते हैं तो आप शत्रु को भी मित्र ही समझते हैं। आप किसी भी अवस्था में दूसरे की बुराई सोच ही नहीं सकते। मैत्री भावना से परिपूर्ण हृदय में अक्षय शान्ति विराजती है, वह भयानक स्वप्नों से अस्त-व्यस्त नहीं होता। स्मरण रखिए, जब हम दूसरों का अकल्याण बुरा चाहते हैं, ईर्ष्या, द्वेष, विरोध करते हैं तभी उनसे डरा करते हैं और बेचैन रहते हैं किन्तु अपने शत्रुता, विद्वेषियों, प्रतिद्वंद्वियों के प्रति प्रेम, क्षमा, भ्रातृभाव रखते हैं अपने प्रति क्रोध करने वाले से भी मीठी अमृत सदृश वाणी में बोलते हैं, प्रेम पूर्वक शान्त चित्त से बुद्धि, इन्द्रियों से सबकी भलाई ही भलाई सोचते हैं तो मन का मैल नष्ट होता है और सुख की नींद मिलती है। पशुत्व से हम आत्मभावना की ओर अग्रसर होते हैं। इसी एक मैत्री भावना के अभ्यास द्वारा निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि परनिंदा से मुक्ति, धृति, पवित्रता प्राप्त होती है और ईश्वरीय संपत्ति की वृद्धि होती है मैत्री भावना की साधना के लिए शरीर की बाह्य तथा आन्तरिक शुद्धि के साथ-साथ निरन्तर आत्मनिरीक्षण और सद्विचार की नितान्त आवश्यकता है।
आत्म-संतोष से रोग-मुक्ति—
आज के प्रलोभनों से भरे भौतिक जगत में हमारी आवश्यकताएं अत्याधिक बढ़ चुकी हैं। हमारी तृष्णा अपरिमित रूप में बढ़ती जा रही हैं। हम सभी उचित अनुचित इच्छाओं की तृप्ति इसी लोक में करना चाहते हैं। इसी अतृप्त बुद्धि या अतृप्त उच्छृंखल तृष्णा का परिणाम मानसिक व्याधियाँ हैं जैसे प्रकृति माता हमें यह सिखा देना चाहती हो कि हमें अपने मन पर संयम नहीं है। असंतोषी, अतृप्त व्यक्ति पग-पग पर व्याधियों का शिकार होता है। अतः हमें चाहिए कि आत्मतृप्ति की भावना को दृढ़ करें और बे फिक्री पूर्ण निश्चिन्तता से रहें।
अमुक वस्तु से हमें आनन्द होगा या अमुक वस्तु प्राप्त न होगी तो हमें खेद या दुःख होगा- इस प्रकार की वासना-जन्य मान्यताओं को एक दम त्याग देना चाहिए। पूर्ण सुख-पूर्ण आनन्द का भंडार तो हमारा आत्मा है। आनन्द हमारे भीतर है। आत्मा के सामर्थ्य पर बारबार चिंतन करने से आत्मशक्ति का बोध होता है तथा सब प्रकार के मानसिक रोग दूर होते हैं। जीवन का विकास भीतर से होता है। जिस क्षण तुम्हें अपने व्यक्तित्व के केन्द्र आत्मा के भीतर स्थिरता प्राप्त हो जायगी, उसी क्षण अक्षय उत्साह तथा आत्मभाव (देवभाव) की तरंगें तुममें उद्वेलित होने लगेंगी। प्रातःकाल उठते ही नित्य प्रसन्नता एवं शान्ति के विचारों में रमण करने से शुभ आध्यात्मिक संस्कार अंकित होते हैं। “शान्ति, आनन्द, तृप्ति का अनन्त स्त्रोत मेरे अन्तःकरण में बह रहा है।” -इस भावना में तद्रूप हो जाने से समस्त मानसिक रोगों का निराकरण होता है। जो रोगी आत्मद्योतन द्वारा आत्मशक्ति का रहस्य समझ गया है, उसके समस्त दुःख रोग दूर हो जाते हैं-
ज्ञात्वा देवं पाशा पहानिः
क्षीणेः क्लेशै जन्म मृत्यु प्रहाणिः
(श्वेताश्वतरोपनिषदो)
जो मनुष्य अन्तर्स्थित आत्म-देव को जान लेता है, वह आध्यात्मिक शक्ति के रहस्य को समझ लेता है और मानसिक अशान्ति से मुक्त हो जाता है। आत्मा की खिड़कियाँ खोलिए और प्रकाश आने दीजिए।
निर्दोष प्रसन्नता रोग निवारक है।
मानसिक रोग निवारणार्थ “हास्य भाव” बेचूक निशाना है। यह हृदय में शीतलता देता है, फुफुस को फैलाता है और उसके अंतरंग परदे को पुष्ट करता है। यदि आपका मन उदास है, खिन्न है, चंचल है, भ्रमित है बस, ठीक उसी समय आप इस महौषधि (हास्योपचार) से सहायता लीजिए। थोड़ा मुसकुराइये। इस मुसकराहट को बाहर हँसी के रूप में प्रकट करो तत्पश्चात् जोर से हँसने लगो, खूब हँसो। यहाँ तक हँसो कि लोट-पोट हो जाओ। इस महौषधि का महत्व सेवन से ही ज्ञात होगा, केवल पढ़ने मात्र से नहीं। सृष्टि के प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी हैं जो हँसना जानता है और “हास्य भाव” से मानसिक व्याधियों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। अतः हँसो और इतने हँसो कि हँसते हँसते पेट दुखने लगे।

