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Magazine - Year 1948 - Version 2

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स्वप्न में अनुभव

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सततं साधनाभिर्योयाति साधकताँ नरः। स्वप्नावस्थासु जायन्ते तं दिव्या अनुभूतयः॥

(यः) जो (नरः) मनुष्य (सततं) निरन्तर (साधनाभिः) साधना करने से (साधकताँ) साधकत्व को (याति) प्राप्त हो जाता है (तं) उस व्यक्ति को (स्वप्नावस्थासु) स्वप्नावस्था में (दिव्या अनुभूतयः) दिव्य अनुभव (जायन्ते) होते हैं।

साधना से विशेष दिशा में मनोभूमि का निर्माण होता है। श्रद्धा विश्वास तथा साधना विधि की कार्य प्रणाली के अनुसार अन्तःकरण पर एक विशेष प्रकार की छाप पड़ती है तद्नुसार आन्तरिक क्रियाएं उसी दिशा में प्रवाहित होने लगती है? जिससे मन, बुद्धि और चित्त अहंकार का चतुष्टय वैसा ही रूप धारण करने लगता है। भावनाओं के संस्कार अंतर्मन में गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं। गायत्री साधक की मानसिक गतिविधि में आध्यात्मिकता एवं सात्विकता का प्रमुख स्थान बन जाता है।

जैसी इच्छा आकाँक्षा भावना, श्रद्धा और निष्ठा मनुष्य की होती है उसी के अनुसार उसे अनुभव आते हैं वैसे ही विचार उत्पन्न होते हैं और वैसी ही क्रियाएं बनती हैं, उसी प्रकार के साधन, सहयोग एवं अवसर प्राप्त होने लगते हैं। अन्तः चेतना का निर्माण जिस आधार पर हुआ है उसी आधार पर जागृत अवस्था, स्वप्न अवस्था सुषुप्ति अवस्था तथा तुरीय अवस्था में मन की गति विधियाँ होती रहती है गायत्री का साधक जागृत अवस्था में उत्तम विचारों में रमण करता है, उच्च भावनाओं तथा दिव्य आकाँक्षाओं के साथ स्मरण करता है, साथ ही जब वह निद्राग्रस्त होकर स्वप्नावस्था में होता है तो उसे अपने इस नये अन्तःनिर्माण के अनुरूप दृश्य तथा भावों का अनुभव होता है। उसे वैसे ही स्वप्न आते हैं।

गायत्री साधकों को साधारण व्यक्तियों की तरह निरर्थक स्वप्न प्रायः बहुत कम आते हैं। उनकी मनोभूमि ऐसी अव्यवस्थित नहीं होती जिसमें चाहे जिस प्रकार के उल्टे सीधे स्वप्नों का उद्भव होता है, जहाँ व्यवस्था स्थापित हो चुकी हैं। वहाँ की क्रियाएं भी व्यवस्थित होती है। गायत्री साधकों के स्वप्नों को हम बहुत समय से ध्यान पूर्वक सुनते रहे हैं। तद्नुसार हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा है। कि ऐसे लोगों के स्वप्न निरर्थक बहुत कम होते हैं उनमें सार्थकता की मात्रा ही अधिक रहती है।

निरर्थक स्वप्न, अत्यन्त अपूर्ण होते हैं, उनमें केवल किसी बात की छोटी सी झाँकी होती है, फिर तुरन्त उनका तारतम्य विग्रह जाता है। दैनिक व्यवहार की असाधारण क्रियाओं की सामान्य स्मृति मस्तिष्क में पुनःपुनः जागृत होती रहती हैं और भोजन, स्नान, वायुसेवन, जैसी साधारण बातों की दैनिक स्मृति के अस्त, व्यस्त स्वप्न दिखाई देते हैं ऐसे स्वप्नों को निरर्थक कहा जा सकता है। सार्थक स्वप्न कुछ विशेषता लिए हुए होते हैं, उनमें कोई विचित्रता, नवीनता, घटनाक्रम एवं प्रभावोत्पादक क्षमता होती है। उन्हें देखकर मन में भय, शोक, चिन्ता, क्रोध, हर्ष, विशाद, लोभ, मोह आदि के भाव उत्पन्न होते हैं। निद्रा त्याग देने पर भी उनकी छाप मन पर बनी रहती है और चित्त में बार बार यह जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि इस स्वप्न का अर्थ क्या है।

साधकों के सार्थक स्वप्नों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। (1) पूर्व संचित कुसंस्कारों का निष्कासन (2) श्रेष्ठ तत्वों की स्थापना का प्रकटी करण (3) किसी भविष्य संभावना का पूर्वाभास इन तीन श्रेणियों के अंतर्गत विविध प्रकार के सभी सार्थक स्वप्न आ जाते है।

पूर्व संचित कुसंस्कारों के निष्कासन में इस लिए होता है कि गायत्री साधना द्वारा आध्यात्मिक नये तत्वों की वृद्धि साधक के अन्तःकरण में हो जाती है। जहाँ तक वस्तु रखी जाती है वहाँ से दूसरी को हटाना पड़ता है। गिलास में पानी भरा जाय तो उसमें पहले से भरी हुई हवा को हटाना पड़ेगा। रेल के डिब्बे में नये मुसाफिरों को स्थान मिलने के लिए यह आवश्यक है कि उसमें बैठे हुए पुराने मुसाफिर उतरें। दिन का प्रकाश आने पर अन्धकार को भागना ही पड़ता है। इसी प्रकार गायत्री साधक के अंतर्जगत में जिन दिव्य तत्वों की वृद्धि होती है, उन सुसंस्कारों के लिए स्थान नियुक्त होने से उससे पूर्व नियुक्त कुसंस्कारों का निष्कासन स्वाभाविक है। यह निष्कासन जागृत अवस्था में भी होता रहता है और स्वप्न अवस्था में भी। विज्ञान के सिद्धान्तानुसार विस्फोटक उष्णवीर्य के परार्थ जब स्थान च्युत होते है तो वे एक झटका मारते हैं। बन्दूक जब चलाई जाती है तो वह पीछे की ओर एक जोरदार झटका मारती है। बारूद जब जलती है तो एक धड़ाके की आवाज करती है, दीपक बुझते समय एक बार जोर से लो उठाता है। इसी प्रकार कुसंस्कार भी मानस लोक से प्रमाण करते समय मस्तिष्क तन्तुओं पर आघात करते हैं और उन आघातों की प्रतिक्रिया स्वरूप जो विक्षोभ उत्पन्न होता है उसे स्वप्नावस्था में भयंकर अस्वाभाविक, अनिष्ट, एवं उपद्रव के रूप में देखा जाता है।

भयानक हिंसक पशु, सर्प, सिंह, व्याघ्र भूत, पिशाच, चोर, डाकू, आदि का आक्रमण होना सुनसान, एकान्त डरावना जंगल, दिखाई देना, किसी प्रिय जन की मृत्यु अग्निकाण्ड जल की बाढ़ भूकम्प युद्ध आदि के भयानक दृश्य दीखना, अपहरण अन्याय, शोषण, विश्वासघात, द्वारा अपना शिकार होना, कोई विपत्ति आना, अनिष्ट की आशंका से चित्त घबराना आदि भयंकर दिल धड़काने वाले ऐसे स्वप्न जिनके कारण मन में चिन्ता, बेचैनी, पीड़ा भय, क्रोध, द्वेष, शोक, कायरता, ग्लानि, घृणा आदि के भाव उत्पन्न होते हैं वे पूर्व संचित इन्हीं कुसंस्कारों की अन्तिम झाँकी का प्रमाण होते है। यह स्वप्न बताते हैं। कि जनम जन्मान्तरों की संचित यह कुप्रवृत्तियां अब अपना अन्तिम दर्शन ओर अभिवादन करती हुई विदा ले रही है और मन में स्वप्न में इस परिवर्तन को ध्यान पूर्वक देखने के साथ साथ एक अलंकारिक कथा के रूप में किसी शृंखला बद्ध घटना का चित्र गढ़ डाला है और उसे स्वप्न रूप में देखकर जी बहलाया है।

कामवासना अन्य सब मनोवृत्तियों से अधिक प्रबल है। काम योग की अनियंत्रित इच्छाएं मन में उठती हैं। उन सबका सफल होना असंभव है। इसलिए वे परिस्थितियाँ द्वारा कुचली जाती रहती हैं, और मन मसोसकर वे अतृप्त, असंतुष्ट प्रेमिका की भाँति अंतर्गत के कोप भवन में खटपाटी लेकर पड़ी रहती हैं। यह अतृप्ति चुपचाप पड़ी नहीं रहती वरन् जब अवसर पाती है निद्रावस्था में अपने मनसूबों को चरितार्थ करने के लिए मन के लड्डू खाने के लिए मन चीते का स्वप्नों अभिनव रचती है। दिन में घर के लोगों के जागृत रहने के कारण चूहे डरते हैं और अपने बिलों में छुपे बैठे रहते है पर रात्रि को जब घर के आदमी सो जाते है तो चूहे अपने बिलों में से निकल कर निर्भयता पूर्वक उछल कूद मचाते हैं। कुचली हुई कामवासना भी यही करती है और अपनी क्षुधा का ख्याली पुलाव खाकर किसी प्रकार बुझाती है। स्वप्नावस्था में सुन्दर सुन्दर वस्तुओं का देखना उनसे खेलना, प्यार करना, जमा करना, रूपवती स्त्रियों को देखना, उनकी निकटता में आना, मनोहर नदी, तढाग, वन, उपवन, पुष्प, फल, नृत्य, गीत, वाद्य, उत्सव, समारोह जैसे दृश्यों को देखकर कुचली हुई वासनाएं किसी प्रकार अपने को तृप्त करती हैं। धन की, पद की, महत्व प्राप्ति की अतृप्त आकाँक्षाएं भी अपनी तृप्ति के झूठे अभिनय रचा करती हैं। कभी कभी ऐसा भी होता है कि अपनी अतृप्ति के दर्द का घाव की पीड़ा का और स्पष्ट रूप से अनुभव करने के लिए ऐसे स्वप्न दिखाई देते हैं मानों अतृप्ति और भी बढ़ गई। जो थोड़ा बहुत सुख या वह भी हाथ से चला गया अथवा मनोवांछा पूरा होते होते किसी आकस्मिक बाधा के कारण विघ्न उपस्थित हो गया।

अतृप्तियों को किसी अंश में या किसी अन्य प्रकार से तृप्त करने के एवं अतृप्ति को और भी उग्र रूप से अनुभव करने के लिए उपरोक्त प्रकार के स्वप्न आया करते हैं। यह दबी हुई वृत्तियां गायत्री की साधना के कारण उखड़कर अपना स्थान खाली करती हैं। इस परिवर्तन काल में वे अपने गुप्त रूप को प्रकट करती हुई विदा होती है। तद्नुसार साधक को साधना काल में प्रायः इस प्रकार के स्वप्न आया करते हैं। किसी मृतक प्रेमी के दर्शन, सुन्दर दृश्यों का अवलोकन, स्त्रियों से मिलना जुलना, मनोवाँछाओं का पूरा होना था। इच्छित वस्तुओं का और भी अधिक अभाव अनुभव होना आदि की घटनाओं के स्वप्न भी विशेष रूप से दिखाई देते हैं। इसका अर्थ है कि अनेकों दबी हुई अतृप्त तृष्णाएं, कामनाएं, वासनायें धीरे−धीरे करके अपनी विदाई की तैयारी कर रही हैं। आत्मिक तत्वों की वृद्धि के कारण ऐसा होना स्वाभाविक भी हैं।

दूसरी श्रेणी के स्वप्न वे होते हैं। जिनसे इस बात का पता चलता है कि अपने अन्दर सात्विकता की मात्रा में लगातार अभिवृद्धि हो रही है। सतोगुणी कार्यों का स्वयं करने या किसी अन्य के द्वारा होते हुए देखने के स्वप्न ऐसा ही परिचय देते हैं। पीड़ितों की सेवा अभावग्रस्तों की सहायता, दान, जप, तप, यज्ञ, व्रत, उपवास, तीर्थ, मन्दिर, पूजा, धार्मिक, कर्मकाण्ड, कथा, कीर्तन, प्रवचन, उपदेश, माता, पिता, साधु, महात्मा, नेता, विद्वान, गुरुजनों, की समीपता स्वाध्याय, अध्ययन, आकाशवाणी, देवी देवताओं के दर्शन दिव्य प्रकाश आदि आध्यात्मिक, सतोगुणी, शुभ स्वप्नों में मन अपने आप अपने अन्दर आये हुए नये शुभ तत्वों को देखता है और उन दृश्यों से शान्ति लाभ करता है।

तीसरे प्रकार के स्वप्न भविष्य में घटित होने वाली किन्हीं घटनाओं की ओर संकेत करते हैं। प्रातःकाल सूर्योदय से एक से दो घंटे पूर्व देखे हुए स्वप्नों में सचाई का बहुत अंश होता है। ब्रह्ममुहूर्त में एक तो साधक का मस्तिष्क निर्मल होता है दूसरे प्रकृति के अन्तराल का कोलाहल भी रात्रि की स्तब्धता के कारण बहुत अंशों में शान्त हो जाता है। उस समय सत तत्व की प्रधानता रहने के कारण वातावरण स्वच्छ रहता है अतएव सूक्ष्म जगत में विचरण करते हुए भविष्यों का, भावी विधानों का बहुत कुछ आभास मिलने लगता है।

कभी कभी अस्पष्ट और उलझे हुए ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं। जिनसे यह तो मालूम होता है कि यह भविष्य में होने वाले किसी लाभ या हानि के संकेत हैं पर स्पष्ट रूप से यह विदित नहीं हो पाता कि इनका वास्तविक तात्पर्य क्या है। ऐसी उलझनों को स्वप्नों के कई कारण होते है। (1) भविष्य का विधान प्रारब्ध कर्मों से बनता है पर वर्तमान कर्मों से उस विधान में काफी हेर फेर हो सकता है। कोई पूर्व निर्धारित विधि का विधान, साधक के वर्तमान कर्मों के कारण कुछ परिवर्तित हो जाता है तो उसका निश्चित और स्पष्ट रूप बिगड़ कर अनिश्चित और अस्पष्ट हो जाता है। तदनुसार स्वप्न में उलझी हुई बात दिखाई पड़ती है। (2) कुछ भावी विधान ऐसे हैं जो नये कर्मों के नयी परिस्थितियों के, अनुसार बनते और परिवर्तित होते है। तेजी मंदी सट्टा लाटरी आदि के बारे में, जब तक भविष्य का भ्रूण ही तैयार हो पाता है पूर्ण रूप से उसकी स्पष्टता नहीं हो पाती तब तक उसका पूर्णमास साधक को स्वप्न में मिले तो वह एकाँगी एवं अपूर्ण होता है (3) अपने मन की सीमा जितने क्षेत्र में होती है वह व्यक्ति को ‘अहम’ की एक आध्यात्मिक इकाई होती है। इतने विस्तृत क्षेत्र का भविष्य उसका अपना भविष्य बन जाता है। भविष्य सूचक स्वप्न इस ‘अहम’ के सीमा क्षेत्र तक के अपने को दिखाई पड़ सकते हैं इसलिए ऐसा भी हो जाता है कि जो संदेश स्वप्न में मिला है वह अपनेपन की मर्यादा में आने वाले किसी कुटुंबी, पड़ौसी, रिश्तेदार, या मित्र के लिए हो। (4) साधक की मनोभूमि पूर्ण रूप से निर्मल न हो गई हो तो आकाश के सूक्ष्म अन्तराल में बढ़ते तथ्य अधूरे या रूपांतरित होकर दिखाई पड़ते है जैसे कोई व्यक्ति अपने घर से हमसे मिलने के लिए रवाना हो चुका हो तो उस व्यक्ति के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति के आने का आभास मिले। होता यह है कि साधक की दिव्य दृष्टि धुँधली होती है जैसे दृष्टिदोष होने पर दूर चलने वाले मनुष्यों को पुतले तो दिखाई पड़ते है पर उनकी शकल नहीं पहचानी जाती। अब इस धुँधले अस्पष्ट आभास के ऊपर हमारी स्वप्न माया एक अकल्पित आवरण चढ़ा कर कोई झूठमूठ की आकृति जोड़ देती है और रस्सी को सर्प बना देती है। ऐसे स्वप्न आधे सत्य होते हैं आधे असत्य। परन्तु जैसे जैसे साधक की मनोभूमि अधिक निर्मल होती जाती है वैसे ही वैसे उसकी दिव्य दृष्टि स्वच्छ होती जाती है और उसके स्वप्न अधिकाधिक सार्थकता युक्त होने लगते हैं।

स्वप्न केवल रात्रि में या निद्रा ग्रस्त होने पर ही नहीं आते पर जागृत दशा में भी आते हैं। ध्यान को एक प्रकार का जागृत स्वप्न ही समझना चाहिए। कल्पना के घोड़े पर चढ़कर हम सुदूर स्थानों के विविधविधि, संभव और असंभव, दृश्य देखा करते हैं। यह एक प्रकार के स्वप्न ही है। निद्राग्रस्त स्वप्नों में अंतर्मन की क्रियाएं प्रधान होती है, जागृत स्वप्नों में बहिर्मन की क्रियाएं प्रमुख रूप से काम करती हैं। इतना अन्तर तो अवश्य है पर इसके अतिरिक्त निद्रित स्वप्न और जागृत स्वप्नों की प्रणाली एक ही हैं। जागृत अवस्था में साधक के मनोलोक में नाना प्रकार की विचार धाराएं और कल्पनाएं घुड़दौड़ मचाती है, यह भी तीन प्रकार की ही होती है, पूर्व कुसंस्कारों के निष्कासन, श्रेष्ठ तत्वों के प्रकटीकरण तथा भविष्य के पूर्वाभास की सूचना देने के लिए मस्तिष्क में विविध प्रकार के विचार भाव एवं कल्पना चित्र आते हैं। जो फल निद्रित स्वप्नों का होता है वही जागृत स्वप्नों का भी होता है।

कभी कभी जागृत अवस्था में भी कोई सूक्ष्म चमत्कारी, दैवी, अलौकिक, दृश्य किस किसी को दिखाई दे जाते हैं। इष्ट देव का किसी किसी को चर्मचक्षुओं से दर्शन होता है, कोई कोई भूत प्रेतों को प्रत्यक्ष देखते हैं, किन्हीं किन्हीं को दूसरों के चेहरे पर तेजोवलय और मनोगत भावों का आकार दिखाई देता है जिसके आधार पर वे दूसरों की आन्तरिक स्थिति को पहचान लेते हैं, रागी का अच्छा होना न होना संघर्ष में हारना जीतना, चोरी में गई वस्तु, आगामी लाभ हानि, विपत्ति सम्पत्ति जाति के बारे में कई मनुष्यों के अन्तःकरण में एक प्रकार की आकाश वाणी सी होती है और वह कई बार इतनी सच निकलती है कि आश्चर्य से दंग रह जाना पड़ता है। साधक जितना ही साधना पथ में अधिक बढ़ता है उसके निद्रित और जागृत स्वप्न अधिक स्पष्ट सार्थक और सत्य होते हैं।

यह स्वप्न सिद्धि भी गायत्री साधना की एक महत्वपूर्ण सिद्धि है।

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