क्षय रोग और उसकी चिकित्सा
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(श्री लक्ष्मी नारायणजी टण्डन एम. ए. लखनऊ)
क्षय के रोगी को अच्छा हो जाने पर भी अधिक शारीरिक तथा मानसिक परिश्रम से बचना ही चाहिए क्योंकि अंग्रेजी में कहावत है- ‘ह्रठ्ठष्द्ग ञ्ज. क्च. ड्डद्यख्ड्डब् ञ्ज.क्च.’ (एक बार क्षय, सदा की क्षय) जिसका तात्पर्य यह है कि आदमी अब चुटैल हो गया है। यदि संभल कर न रहेगा तो फिर उसकी तबियत पलट सकती है। पश्चिमीय देशों में इसे “ष्ठद्बह्यद्गद्बह्यद्ग शद्ध ख्द्गड्डद्मठ्ठद्गह्यह्य” अर्थात् कमजोरी की बीमारी कहते हैं। यदि उपयुक्त और बलवर्धक भोजन, कुछ ठंडी जलवायु वाले स्थान में निवास, नियमित जीवन, क्रमिक वैज्ञानिक आधार पर परिश्रम और विश्राम, अति का त्याग, चिंता, ग्लानि का त्याग, जिन परिस्थितियों तथा कारणों से क्षय हुआ था उनसे बचाव रखा जाय तो कोई कारण नहीं है कि क्षयी अच्छी आयु क्यों न पावे, पूरी जीवन क्यों न जिये।
प्राकृतिक नियमों के पालन तथा प्राकृतिक चिकित्सा से यह रोग दूर किया जा सकता है यदि रोगी की अवस्था अत्यधिक गिर नहीं गई है। प्राकृतिक-चिकित्सक, भगवान नहीं है। यह दावा वह नहीं कर सकता कि वह रोगी को चंगा ही कर देगा किन्तु इतना तो अवश्य हो सकता है कि उसके रोग में, उसकी पीड़ा में कमी हो जाय, रुकावट हो जाय और यदि रोगी को मरना ही है तो शान्ति की मौत मर सके।
यह तो सभी जानते हैं कि पृथ्वी (भोजन, पृथ्वी से ही उत्पन्न होता है) तत्व से जल तत्व, जल से अग्नि, अग्नि से वायु और वायु तत्व से आकाश तत्व अधिक सूक्ष्म तथा प्रभावोत्पादक होता है। अतः आकाश तत्व को प्राप्त करने के लिए हमें आत्म-संकेत, शिथिलीकरण, ईश्वर भक्ति तथा धर्म, यज्ञ आदि कृत्य उपयोगी होंगे। क्षयी यदि निम्नलिखित सामग्री से नित्य प्रातः साँय यज्ञ करे या अशक्त रोगी अपने कमरे में कराये तो बड़ा लाभ होगा- नीम की पत्ती 80 तोला, अकउआ 20 तोला, मोर पंखी 5 तोला, सरसों पाँच तोला, बच पाँच तोला, देवदारु पाँच तोला, अगर 5 तोला, चन्दन 5 तोला, हींग 1 तोला। इन सबको कूट पीस लिया जाय। कोयले की बिना धुँए वाले आग पर रोगी के स्थान पर डाली जाय। वायु तत्व के लिए खुले रोशनीदार कमरे, हरियाली से पूर्ण बगीचे आदि में रहना उपयोगी है ही। अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्राणायाम करे। उदाहरणार्थ पहले फेफड़े की पूरी साँस निकाल दें फिर उँगली से दाहिना नथुना बन्द करके बाँये नथुने से श्वांस लें। फिर अंगूठे से बाँया नथुना बन्द करें। जितनी देर श्वास घसीटी है उसकी आधी देर रोके फिर दाहिने नथने से धीरे-धीरे हवा निकाले इसमें उतना या उससे ज्यादा समय दे जितना श्वास घसीटने में लगा था। फिर नथुना बन्द कर हवा रोके जितना पहले रोका था। फिर दाहिने नथने से श्वांस घसीटे पहले की भाँति। फिर नथुना बन्द करके उतने ही देर रोके। फिर बाँये नथुने से धीरे-धीरे हवा निकाल दें पहले की भाँति। स्वामी रामतीर्थ जी का कहना है कि इससे क्षय में अवश्य लाभ होगा तथा स्वस्थ मनुष्य अधिक स्वस्थ रहेंगे। बहुत अशक्त या बढ़े, हुए रोग वाले बहुत धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें। इस विषय पर विस्तार से फिर कभी लिखा जायगा। कम से कम श्वासक्रिया को तो ठीक किया ही जा सकता है। प्रायः लोगों के श्वास लेने का तरीका बहुत गलत होता है। यही ठीक करके हम क्षय को दूर कर सकते हैं। श्वास क्रिया से मतलब सिर्फ उस क्रिया से नहीं है जो श्वास लेने से फेफड़ों के अन्दर जाती है। न गहरी श्वासक्रिया से ही तात्पर्य है। श्वास निकालते समय पूरी हवा बाहर निकाल देना चाहिए। कितनी वायु अन्दर जाती है, इससे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि कितनी हवा बाहर निकाली जाती है। क्षय फेफड़ों के ऊपरी भाग से इसलिए प्रारंभ होता है क्योंकि यहाँ वर्षों तक गंदी हवा रुकी रहती है पूरी श्वास-क्रिया न करने से जब फेफड़े पूरे खाली होंगे तो स्वाभाविक रूप से फेफड़े और पैर के बीच का पर्दा (डायाफ्रेम) स्वतः पूरे परिमाण में हवा भर लेंगे। केवल सीने के ऊपरी भाग को ही श्वास लेने में फुलाना गलत है। ठीक यह है कि डायाफ्रेम फुलाया जाय। श्वास लेते समय पसलियों के निचले भाग फूलें। श्वास बाहर निकालते समय भी सीने को दबने न दो। पेट, पसलियों की तह में जहाँ तक दबाया जा सकता है दबाया जाय। श्वास लेते या निकालते समय झटके न लगें इसका ध्यान रखा जाय। अभ्यास से श्वास क्रिया में कठिनाई न पड़ेगी। इस सम्बन्ध में अन्य लेख में विस्तार पूर्वक लिखा जायगा।
सूर्य प्रकाश की क्षयी को बहुत आवश्यकता है। प्रातः के सूर्य की किरणों में नंगे बदन रोगी रह सकता है कुछ देर। पर फेफड़े के क्षयी को सूर्य की तेज किरणों और धूप से तो अवश्य ही बचना चाहिये-विशेष कर यदि उसे कभी खून आ चुका हो। हाँ हड्डी के क्षय या आँतों के क्षय में धूप बहुत लाभप्रद है। रंगीन शीशियों का धूप में रखा पानी चिकित्सक की राय के मुताबिक पिये। इस सम्बन्ध में विस्तार से अन्यत्र लिखा जाय। जल का प्रयोग कैसे हो इस सम्बन्ध में अखण्ड-ज्योति में इसी वर्ष लेख छप चुका है। भोजन क्या-क्या खायें, क्या-क्या न खायें, कौन भोजन एक साथ खायें कौन नहीं, यह भी जनवरी 49 के अंक में छप चुका है। तो भी संक्षेप में क्षयी निम्न लिखित इलाज करें। दूसरी स्टेज तक का टी.बी. ठीक हो सकता है-
(1) साफ खुला हवादार प्रकाश वाला स्थान।
(2) नंगे बदन पर जितनी देर हो सके-हवा और प्रकाश लें। धूप चिकित्सक से पूछ करे प्रातः की सूर्य-रश्मियाँ पाँच मिनट लें। धीरे-धीरे समय बढ़ावें।
(3) कमजोर रोगी उपवास न करें। एक बार बकरी का कच्चा दूध-दूध सर्वोत्तम है दूसरी बार रोगी या दलिया और एक भाजी तथा शाक, तीसरी बार दूध तथा फल चौथी बार तरकारी का रसा तथा दूध या किशमिश, मुनक्का और दूध।
(4) एनिमा प्रायः लिया करे। इस सम्बन्ध में भी इसी वर्ष मेरा लेख छपा है।
(5) साधारणतया वह अपना टाइमटेबल इस प्रकार रखें या सुविधानुसार अपनी शक्ति और स्वास्थ्य के अनुसार परिवर्तन कर लें-
6 बजे प्रातः-पैखाने, दातून, स्नान या देह अँगोछना, गर्म कपड़ा ओढ़ कर लेटे या शिथिलीकरण, सूर्य-रश्मि सेवन।
7॥-8 तक एक पाव दूध, एक संतरा, या रात के भिगाये मुनक्के और उसका पानी 8 से 10 तक हवा, रोशनी, धूप।
10॥ तक कटि-स्नान, मेहन स्नान, रीढ़ या पेडू पर गीली मिट्टी बाँधना जैसा चिकित्सक बताये। तेल मालिश करायें। अच्छा हो कि लाक्षादि तेल लें। प्रातः नहाया हो तो नहा कर कपड़े गर्म ओढ़े या टहले 11 बजे फल का रस।
1 बजे एक प्रकार का भोजन-रोटी, दलिया, शाक तरकारी आदि। ऊपर से आधा तोला गुड़ या शहद खायें।
फिर विश्राम।
2 से 3 तक दोपहर को फिर नंगे बदन हवा और सूर्य प्रकाश लें।
3 बजे पेडू पर मिट्टी बाँधे।
4॥-5 बजे फल या फल और दूध। (कच्चा नींबू, शहद, पत्तेदार शाक और हरी तरकारी किसी न किसी समय अवश्य ही खाई जायें)
6-7 बजे रात सिट्ज, हिप, स्पाइबल आदि स्नान यदि बताये हैं।
8 बजे रात मुनक्का खायें, दूध पियें।
9-10 बजे तक सो जाय ईश्वर का ध्यान तथा आत्म संकेत और शिथिलीकरण करते हुए। सोते समय लहसुन को कूट कर अपने सिरहाने रख लें। लहसुन का प्रयोग करें। यह अत्याधिक लाभप्रद इस रोग में होता है। अडूसे का प्रयोग भी इस रोग में अत्यन्त लाभप्रद होता है। केवल एक नुस्खा ही स्थानाभाव से लिखता हूँ- अडूसे के पत्ते 400 तोले (हरे) लेकर आठ गुने पानी में उबालें। पानी चौथाई रह जाने पर तब उतार कर छान लें। फिर बड़ी हड़ का चूर्ण 256 तोला, शक्कर 400 तोला मिला कर मंदाग्नि पर उबालें और जब अबलेह (चटनी के तरह) गाढ़ा हो जाय, तब नीचे उतार कर बंसलोचन 16 तोले, पीपल छोटी 8 तोला, दाल-चीनी, तेजपात, छोटी इलायची और नागकेसर चार-चार तोला का चूर्ण बनाकर मिलावें। फिर ठंडा हो जाने पर 32 तोला शहद मिलावें। मात्रा 1 से 2 तोला दूध के साथ दो बार। ताजी तुरन्त की सब्जी का रस भी अत्यन्त लाभ-प्रद बताया जाता है।
सब से बड़ी चीज तो यह है कि रोगी सदा प्रसन्न-चित्त तथा चिंतामुक्त रहे और आशामय साफ रहे।
वैद्यक में केवल दवाओं और रसों के आधार पर ही इलाज होता है। मोती भस्म, च्यवनप्राश द्राक्षासव, बसंतमालती, मकरध्वज, शीतोषलाद, वासावलेह आदि खिलाते हैं। लाक्षादि तेल की मालिश करते हैं। सिद्धान्त वही है कि क्षयी शक्ति हीन न होने पावे। वह अधिक शक्ति पा सके और इस प्रकार अपने रोग को दबाने की क्षमता उसमें हो जाय।
अब तो भारत में अनेक सैनाटोरियम तथा क्षय के अस्पताल हैं जहाँ धनवान रोगी अपना इलाज कर सकते हैं किन्तु रोगियों की संख्या देखते हुए अस्पतालों आदि की संख्या नगण्य है। इस दिशा में भारत सरकार बहुत कुछ कर रही है। प्रायः निर्धनों को ही यह रोग होता है और निर्धन या मध्यम वर्ग के परिवार में किसी के रोग होने पर रोगी तो मरता है, घर वालों का भी दिवाला निकल जाता है। यह राज रोग है। प्राचीन समय में विषयी राजाओं तथा धनिकों को ही होता था। पर अब तो धनी, निर्धन, स्त्री, पुरुष, बालक-बालिका कोई इसके पंजे से मुक्त नहीं। ईश्वर भारत-वासियों को सुबुद्धि तथा सुपरिस्थितियाँ देकर उनकी रक्षा करें।

