किस धर्म को स्वीकार करें।
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(डॉ. गोपाल प्रसाद ‘बंशी’, बेतिया)
परमहंस श्री स्वामी रामतीर्थ जी महाराज ने इसके संबंध में 8 बातें बतलायी हैं-
1- किसी धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि वह सबसे प्राचीन है। सबसे प्राचीन होना उनके सच्चे होने का प्रमाण नहीं है। कभी-कभी पुराने से पुराने घरों को गिराना उचित होता है और पुराने वस्त्र अवश्य बदलने पड़ते हैं। यदि कोई नये से नया मार्ग नीति और विवेक की कसौटी पर खरी उतरे, तो वह उस ताजे गुलाब के फूल के सदृश उत्तम है, जिस पर चमकती हुई ओंस के कण-शोभायमान हो रहे हैं।
2- किसी धर्म को इसलिये स्वीकार मत करो कि वह सबसे नया है। सबसे नई चीजें समय की कसौटी से परखी जाने के कारण सर्वथा सर्वश्रेष्ठ नहीं होती।
3- किसी धर्म को इसलिये स्वीकार मत करो कि उस विपुल जन-संख्या का विश्वास है, क्योंकि विपुल जनसंख्या का विश्वास तो वास्तव में शैतान अर्थात् अज्ञान के धर्म पर होता है। एक समय था, जब विपुल जन-संख्या गुलामी की प्रथा को स्वीकार करती थी, परन्तु यह बात गुलामी की प्रथा के उन्नति होने का कोई प्रमाण नहीं हो सकती।
4- किसी धर्म को इसलिये स्वीकार मत करो कि उस पर चलने वाले कुछ थोड़े से चुने हुए लोग हैं, क्योंकि कभी-कभी यह थोड़ी संख्या, जो किसी धर्म को स्वीकार करती है, अंधकार और भ्रान्ति में होती है।
5- किसी धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि वह राजों और महाराजों द्वारा प्राप्त हुआ है। राजा लोगों में प्रायः आध्यात्मिक धन का पूरा अभाव रहता है।
6- किसी धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि उसका प्रवर्तक त्याग-मूर्ति है, क्योंकि ऐसे बहुत त्यागी हैं, जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया है, पर जानते कुछ भी नहीं, और वस्तुतः वे धर्मोन्मादी हैं।
7- किसी धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि वह ऐसे मनुष्य का चलाया हुआ है, जिसका चरित्र परमश्रेष्ठ है। अनेकशः परम श्रेष्ठ चरित्र के लोग सत्य का निरूपण करने में असफल रहे हैं। हो सकता है, किसी मनुष्य की पाचन शक्ति असाधारण रूप से प्रबल हो तो भी उसे पाचन-क्रिया का कुछ भी ज्ञान न हो। यह एक चित्रकार है जो कला-चातुर्य का एक मनोहर, उत्कृष्ट और अत्युत्तम नमूना दिखलाता है, परन्तु यही चित्रकार शायद अत्यन्त कुरूप हो। ऐसे भी लोग हैं, जो अत्यन्त कुरूप होते हैं, पर तो वे सुन्दर सत्यों का निरूपण करते हैं। सुकरात इसी प्रकार का मनुष्य था।
8-जिस किस चीज को स्वीकार करो या जिस किसी धर्म पर विश्वास करो, तो उसकी निजी श्रेष्ठता के ही कारण करो। उसकी स्वयं जाँच-पड़ताल करो, खूब छान-बीन करो।

