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Magazine - Year 1950 - Version 2

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बच्चों का शोष (सूखा) रोग।

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(लेखक -आयुर्वेदाचार्य श्री सत्येंद्रनाथ जी शास्त्री)

जिस प्रकार देश में उत्पत्ति-संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है, उसी प्रकार मृत्यु संख्या भी बढ़ती ही जाती है। छोटे-छोटे बालक ठीक परिचर्या न होने से अकाल में ही काल के गाल में चले जाते हैं। कितने ही बालक उचित आहार दूध की कमी, रहने के स्थान की कमी, वस्त्रों की कमी, आदि के कारण और कितने ही रोग में फँसकर उचित चिकित्सा के न होने से मृत्यु मुख में गिरते हैं। बच्चों की मृत्यु का कारण ज्वर, खाँसी, दस्त, पेचिश, पसली, मोतीझरा, माता, और सूखा आदि रोग हैं। इन्हीं रोगों से बहुधा बालकों की मृत्यु होती है। इन सब रोगों में सूखा रोग सबसे अधिक कष्टदायक, असाध्य और दुश्चिकित्स्य है। दुर्भाग्य से यह रोग हमारे देश के बालकों में बहुत होता है। हमने देखा है कि सूखा रोग से पीड़ित सौ में निन्यानवे बालक अच्छे होते ही नहीं। दैवयोग से सौ में कोई एक आध ही बच पाता है।

सूखा रोग किसे कहते हैं?-इस रोग को वैद्यकशास्त्र में “शोष” कहते हैं। यह क्षय रोग का एक भेद है। जिस प्रकार क्षयरोग (तपेदिक) असाध्य होता है, उसी प्रकार बालकों को यह (सूखा रोग) भी असाध्य होता है।

सूखारोग के लक्षण :- सूखारोग का बालक बहुत दुर्बल हो जाता है। उसे हर समय थोड़ा बहुत ज्वर बना रहता है और दिन रात में कभी तेज भी हो जाता है। खाँसी रहती है, खाँसी में कभी कफ आता है, कभी नहीं आता। खाँसी के विकार से फुफ्फुस (फेफड़ों) में कफ (बलगम) बोलता रहता है। पेट कड़ा हो जाता है और पेट में अजीर्ण से मल की गांठें पड़ जाती हैं, कभी कभी अपने आप पतले दस्त भी हो जाते हैं। बच्चे को कभी भूख लगती है, कभी नहीं, प्रायः अरुचि ही रहा करती है। यहाँ तक कि माँ का दूध भी पच नहीं पाता। उसका स्वभाव चिड़चिड़ा और रूखा हो जाता है। वह हर समय रें-रें किया करता है। शरीर में रक्त-माँस की कमी हो जाती है, और उसके हाथ पाँव सूख कर पतले लकड़ी से हो जाते हैं। पीठ, रीढ़ खम्भा कमर आदि अंगों का माँस सूख जाता है और बैठक की जगह खाल लटक कर सलवटें पड़ जाया करती है। बच्चे की आवाज (स्वर) बहुत क्षीण हो जाती है तथा वह हर प्रकार से अशक्त हो जाता है।

सूखा रोग क्यों होता है? :- सूखारोग होने के मोटे-मोटे ये तीन कारण हैं।

(1) माता के पोषकतत्व हीन दूषित दूध से।

(2) दूषित ऊपरी दूध से।

(3) दूसरे रोगियों के संसर्ग से।

1-यह रोग बच्चों को दूध की खराबी से होता है। बच्चे तो किसी प्रकार का कुपथ्य करते नहीं, किन्तु उनको दूध पिलाने वाली उनकी माँ अथवा धाय कुपथ्य कर लेती हैं। जो छोटे-छोटे बालक अपनी माँ का दूध पीते हैं, उनको शरीर की वृद्धि और पोषण के लिये अच्छा दूध मिलना चाहिये। जो स्त्रियाँ अनेक प्रकार के खट्टे, बासी, अजीर्णकारक, दूध को दूषित करने वाले पदार्थ खाती हैं, अथवा अतिचिन्ता, क्रोध, शोक, ईर्ष्या, द्वेष, कलह और कामवासना से ग्रस्त रहती हैं, उनका दूध दूषित हो जाता है। दूषित दूध के पीने से बालकों को अजीर्ण, ज्वर, खाँसी, मोतीझरा, आदि अनेक रोग हो जाते हैं। अतः दूध पिलाने वाली माताओं को चाहिए, कि वे जब तक बच्चों को अपना दूध पिलावें तब तक ऊपर कहे हुए दूध को बिगाड़ने वाले अजीर्ण आदि कारणों से बचती रहें, और सदा शुद्ध, ताजा दुग्धवर्द्धक अग्निप्रदीपक आहार सेवन करें।

छह महीना, नौ महीना अथवा एक वर्ष तक, जब तक बालक माता का दूध पीये तब तक, बच्चे की माँ को चाहिए कि वह दूध दलिया आदि दुग्धवर्धक और दुग्धपोषक पदार्थों का सेवन अवश्य किया करे। जो माताएँ ऐसा नहीं करतीं किन्तु इसके विपरीत दूध को बिगाड़ने वाले पदार्थों का सेवन करती हैं, उनका दूध अवश्य दूषित हो जाता है और उस दूध में बच्चे के शरीर का पोषण करने वाले पोषक तत्व नहीं रहते। बच्चे के शरीर की वृद्धि के लिये दूध में पोषक तत्वों का होना अत्यावश्यक है। जब बच्चों को पोषक तत्व हीन दूषित दूध पिलाया जाता है, तब वे दुर्बल और रोगी हो जाते हैं। पोषक तत्वहीन दूध को पीने वाले बालकों के शरीर रस, रक्त, माँस, चरबी, हड्डी, मज्जा आदि धातुओं की वृद्धि होना बन्द हो जाती है। इसके बाद जब वे दूषित दूध पीते हैं, तब उस दूषित दूध से अजीर्ण, ज्वर, खाँसी, दस्त, सूखा आदि रोग शरीर में उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार महादुष्ट सूखारोग की उत्पत्ति होती है। रोग, शत्रु और अग्नि इनको लगते ही मिटा देना चाहिए, ऐसा ऋषियों ने कहा है। जो लोग ऋषि वाक्य पर नहीं चलते वे सदा हानि उठाते हैं।

बालक जनने के बाद स्त्रियों का शरीर अत्यन्त दुर्बल और अशक्त हो जाता है। उस समय उनके शरीर की पुष्टि के लिये आहार और विश्राम तथा उचित परिचर्या की आवश्यकता होती है। यदि उस समय जरा भी असावधानी से काम लिया जाय तो प्रसूता (जच्चा) को ज्वर, खाँसी, दस्त, क्षय (दिक) आदि रोग शीघ्र ही पैदा हो जाते हैं, रोगी होने से प्रसूता (जच्चा) का दूध भी रोगी हो जाता है, और उस दूध में रोग के साथ साथ बालक के शरीर की पुष्टि व वृद्धि करने वाले पोषक तत्वों का अभाव हो जाता है। उस रोगी सारहीन दूध के पीने से बालक को सूखारोग हो जाता है। इस प्रकार माँ के दूषित और पोषक-तत्वहीन दूध के पिलाने से बालकों को सूखारोग हुआ करता है।

2-जिन माताओं के स्तनों में दूध कम उतरता है, अथवा जो अपनी बीमारी या कमजोरी से अपना दूध नहीं पिला सकतीं, वे बालक को ऊपर का दूध पिलाती है। ऊपर के दूध में गाय, बकरी या बाजार में गाय, भैंस, बकरी, भेड़ का मिला हुआ दूध होता है, हमारे यहाँ अधिकतर माताओं को बच्चों के दूध पिलाने का सही ढंग नहीं मालूम होता। इस विषय में माताओं को बहुत जानकारी की आवश्यकता है। जन्म से ही बालक को ऊपर का दूध पिलाना अच्छा नहीं। हमारा तो यह विचार है कि माताओं को कम से कम छह मास अथवा नौ मास तक शिशु को अपना ही दूध पिलाना चाहिये। क्योंकि शिशु को जैसा अनुकूल अपनी माँ का दूध होता है, वैसा और नहीं होता। यदि माता के दूध कम उतरे अथवा रोग आदि से दूषित हो तो उन्हें योग्य चिकित्सक से चिकित्सा कराकर उस दूध के दोषों को दूर करना चाहिये। नौ मास या एक वर्ष (12 मास) का बालक इस योग्य हो जाता है कि वह ऊपर के दूध को पचा सके। बालक को यदि ऊपर का ही दूध पिलाना हो तो गाय या बकरी का ताजा दूध लेकर उसमें थोड़ा जल मिलाकर मन्द अग्नि से औटाकर उसमें किंचित मीठा मिलाकर थोड़ा थोड़ा पिलाना चाहिए। गाय से बकरी का दूध अधिक अच्छा है।

3-तीसरा कारण-छोटा बालक किसी रोगी बालक बालक या पुरुष-स्त्री के पास रहता है और उस रोग से पीड़ित रोगी का झूठा जल, दूध अन्न आदि वस्तु खा लेता है, तो उसके शरीर में उस रोग के कीटाणु बहुत शीघ्रता से प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं। अतः माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने उन्हें कोंपल-कलेवर बालकों को रोगी मनुष्यों से सदा अलग ही रखा करें।

सूखारोग का परिणाम-

हम पहले ही लिख चुके हैं कि यह रोग असाध्य होता है। जिस घर में यह बच्चों को लग जाता है, उसमें क्षयरोग की भाँति अनेकों बच्चों की जाने जाती हैं। हमने स्वयं देखा है कि इसी महादुष्ट रोग से एक एक माँ ने अपने नौ नौ बालक गंवाये हैं। अनेकों घर इस रोग के प्रताप से बलहीन हो गये। आगे का वंश चलाने वाला कोई बालक ही न जीया। धनी घरों में बालकों को जब यह रोग लग जाता है तब उसकी चिकित्सा में वैद्यों और डाक्टरों के लिए हजारों रुपया गँवाया जाता है, परन्तु अन्त में कोई लाभ नहीं होता। यह प्राण नाशक रोग बालक की जीवन लीला समाप्त करके ही पीछा छोड़ता है। बहुत कम बच्चे इस मूँजी मरज के पंजे से बच पाते हैं।

रोग से बचने के उपाय :-

जो जो कारण रोग होने के बताये गये हैं, उन कारणों से बालकों को बचाना चाहिये। सब से प्रथम बालक के लिये शुद्ध दूध और यदि वह अन्न खाने लगा हो तो अन्य खाने-पीने की वस्तु का ठीक प्रबन्ध करना चाहिये। यदि बच्चे को माता के दूध की खराबी से यह (सूखा) रोग हुआ हो तो माता के दूध को शुद्ध कराने को चिकित्सा करानी चाहिये और उसकी माता का दूध पिलाना बन्द कराकर उत्तम गाय या बकरी का विधिपूर्वक औटाया हुआ शुद्ध दूध पिलाना चाहिये। बच्चे को योग्य चिकित्सक को दिखाना चाहिए। इस रोग को चिकित्सा में ढील डालना या टालम-टोल करना अच्छा नहीं क्योंकि बहुत बढ़ जाने पर यह अच्छा होता ही नहीं ऐसा देखा गया है।

(1) बालक को अत्युत्तम “स्वर्ण भस्म” (सोने का भस्म) दो चावल (चौथाई रत्ती) लेकर उसे एक-एक रत्ती दूध बच और अतीस के चूर्ण में मिलाकर नित्य प्रातः काल और सायंकाल खिलावें। उत्तम स्वर्ण भस्म विश्वसनीय स्थान से योग्य वैद्यराजों से लेवें, नकली से लाभ न होगा।

(2) अतीस, काकड़ा सींगीं, छोटी पीपल और नागरमोथा इन चारों को उत्तम-उत्तम (अतीस घुनी न हो) लेकर कूटकर चूर्ण बनावें। इस चूर्ण की मात्रा बालकों के लिए एक रत्ती से चार रत्ती तक की है। इस चूर्ण में दो चावल स्वर्ण भस्म और आधी रत्ती मोती या मूँगा की भस्म मिला कर मधु (छोटी मक्खी का असली शहद) से मिलाकर दिन रात्रि में दो बार से चार बार तक खिलावें।

(3) “सितोपलादि चूर्ण” (योग्य वैद्यों के यहाँ सदा मिलता है) में स्वर्णभस्म अथवा मोती भस्म अथवा मूँगा की भस्म मिलाकर दिन−रात में चार बार नित्य समान भाग मधु घृत में मिलाकर खिलावें।

(4) “च्यवनप्राश अवलेह” माशे में स्वर्ण या मोती-मूँगा की भस्म मिलाकर दूध में घोलकर दिन-रात्रि में सवेरे, दोपहर, शाम-तीन बार खिलावें।

(5) बच्चे के शरीर में “महालाक्षादि तैल” या “बृहच्छतावरी तैल” अथवा “अश्वगन्धादि तैल” की नित्य मालिश करें, और साथ ही ऊपर लिखी औषधियों में से कोई औषधि खिलावें। औषधियों के सेवन के समय बच्चे को सिर्फ दूध ही पिलाना चाहिये, और कुछ नहीं। इस प्रकार बालक की चिकित्सा करानी चाहिये।

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