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Magazine - Year 1950 - Version 2

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निर्भय और निर्लोभी ही स्वतंत्र विचारक हो सकता है।

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जो चीज जिस रूप में हमारे सामने आती है। हमारे मन में उसकी वही रूप रेखा अंकित हो जाती है, और तब मन उसी प्रकार का चिंतन और मनन करता है और वैसा ही चिन्तन और मनन करते हुए मन भी उसी साँचे में ढल जाता है। परिणाम यह होता है कि चिन्तन की स्वतन्त्र दिशा का लोप हो जाता है। यहाँ तक कि चिन्तन की स्वतन्त्रता भी नष्ट हो जाती है।

चिन्तन की स्वतन्त्रता का भय का वातावरण जिस प्रकार शत्रु है वैसे ही धन भी अन्तराय है। ज्यादातर लोग गरीबी में रहकर अपना जीवन चला नहीं पाते। गरीबी में रहना तो एक प्रकार की तपस्या है, संयम है इसलिये धन के लिये उन्हें कहीं न कहीं अपना पल्ला फैलाना ही पड़ता है। पारिश्रमिक रूप से, प्रतिग्रह रूप से, किसी भी रूप से, धन जिससे मिलता है, मनुष्य उस धनी के प्रति कृतज्ञ हो जाता है, और वह अपनी सारी चिन्तन शक्ति उसके लिए सौंप देता है। इसलिए धन के गलत रास्ते जाने पर भी उसमें इतना नैतिक बल नहीं रहता कि उसके खिलाफ आवाज उठा सके बल्कि कभी कभी तो उसी के गुण गाते हुए पाया जाता है।

महाभारत में इसका एक प्रमाण मिलता है। भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य-जितने पाँडवों के हितैषी थे। उतने ही कौरवों के । परन्तु रहते थे कौरवों के आश्रय में। भरी सभा में जिस समय द्रौपदी को नंगा किया जा रहा था, ये लोग वहीं थे परन्तु उस कर्म के विरोध करने का भी इनमें नैतिक साहस नहीं रह गया था। जब कि इन्हीं द्रोणाचार्य ने अपने गुरुभाई द्रुपदराज द्वारा किया गया अपमान नहीं सहा और स्वयं गरीबी में रहना कबूल कर लिया था। लेकिन जैसे ही धन के लालच में आकर इन्होंने कौरवों के यहाँ आश्रय ग्रहण किया इनकी सत् असत् विवेकिनी बुद्धि लुप्त हो गई। और यहाँ तक लुप्त हुई कि द्रोणाचार्य जैसे सात महारथियों ने मिलकर सोलह वर्ष के बेचारे अकेले अभिमन्यु को, वह भी निःशस्त्र होने की अवस्था में, मार डाला ।

स्वतन्त्र चिन्तन की शक्ति होने पर कोई भी धर्मनिष्ठ ब्राह्मण क्या ऐसा करता? कदापि नहीं, द्रोणाचार्य ने युद्ध के आरम्भ में ही इस अन्यायाचरण के सम्बन्ध में अपना मत प्रकट किया था कि मनुष्य धन का दास है, धन मनुष्य का नहीं, कौरवों ने हमें धन से खरीद लिया है इसलिये हमें उन्हीं की ओर से लड़ना है। यदि धन से वे खरीदे गये न होते तो इन समस्त अधर्म एवं अन्यायाचरण के विरुद्ध हुँकार मारते, इन्हें क्या देर लगती। भीष्म पितामह का भी यही हाल था। उन्होंने भी इन्हीं शब्दों में जवाब दिया था।

इसलिए लोक में भी ऐसी कहावत है कि-“जैसा अन्न वैसा मन” अर्थात् जिस व्यक्ति का अन्न खाते हैं उसका समर्थन करना ही होता है।

क्योंकि तब वह मन स्वतन्त्र विचार करने के अयोग्य हो जाता है और वह अपने मालिक के प्रत्येक कार्य में गुण ही गुण देखता है, और यदि कहीं अवगुण दिखाई भी दे जाता है तो फिर उसके विरुद्ध बोलने की नैतिक शक्ति अपने में नहीं पाता ।

बिना नैतिक शक्ति हुए मनुष्य में स्वतंत्र विचार की शक्ति नहीं रहती । दलबन्दी और पार्टी बन्दियाँ स्वतंत्र विचारों का कैदखाना है। क्योंकि वे किन्हीं विशिष्ट स्वार्थों की पूर्ति के लिए बनाई जाती हैं । विशिष्ट स्वार्थ आते ही स्वतन्त्र विचार रफूचक्कर हो जाते हैं।

जब किसी विशिष्ट स्वार्थ को लेकर सरकारें बनायी जाती है तो तमाम स्वतन्त्र विचारकों को हथियाने की कोशिश की जाती है। भय या प्रलोभन ये ही दो हथियार हैं उन्हें हथियाने के। जो कल तक ब्रिटिश सरकार के पोषक थे। सरकार बदलते ही जब वे काँग्रेस सरकार के पोषक बन जाते हैं, तो समझा जाता है कि प्रलोभन ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया। यदि वे स्वतन्त्र विचारक होते तो या तो वे प्रारम्भ में ही ब्रिटिश सरकार का विरोध करते या फिर वे काँग्रेस सरकार के आते ही अवकाश ग्रहण कर लेते ।

अच्छे-अच्छे क्रान्तिकारी पैसे से खरीद लिए जाते हैं, विद्वान और वैज्ञानिक तो पैसे से खरीदे जाने का सर्वत्र उदाहरण है। आज के विज्ञान का उपयोग विनाश के लिए हो रहा है, यदि ये वैज्ञानिक स्वतन्त्र विचारक होते तो क्या अपने विज्ञान का उपयोग कुछ लोगों की स्वार्थ-पूर्ति और जनसंहार में होने देते ? वे अपना नमक का हक हलाल करने के लिए मजबूर रहते हैं, इसलिए जो न करना चाहिए वह भी करते रहते हैं। सरकारी नौकरी या सरकारी सहायता देकर आदमियों को फोड़ते और अपने काबू में करते हुए तो प्रायः देखा ही जाता है।

प्रतिग्रह भी स्वतन्त्र विचार का दुश्मन है। दान लेने वाला दानदाता का समर्थक, ज्ञात रूप से या अज्ञात रूप से, बन ही जाता है। इसी प्रकार जहाँ भय रहता है वहाँ स्वतन्त्र विचार हो ही नहीं सकता ।

इसीलिए भय और भोग पर विजय पाने के उपराँत ही मनुष्य स्वतन्त्र विचारों की उपासना कर सकता है। तब उसे नैतिक बल बढ़ाना पड़ता है और स्वयं को तपस्या की-कष्ट सहने की आँच में तपने के लिए छोड़ना पड़ता है। तब वह विज्ञापनों के चक्कर में नहीं फंसता बल्कि इन सबसे अपने को ऊपर उठाकर स्वतंत्र विचारों की साधना में अपने को खपा देता है। तब सारे प्रलोभन उसके लिए बेकार हो जाते हैं। संसार तो उसके लिए प्रयोग-शाला रहती है जहाँ वह अपने “स्व-“में प्रतिष्ठित रहता है और उसके तंत्र के आगे किसी को कुछ नहीं समझता ।

जो लोग यह स्वीकार करते हैं कि धन और भय अथवा भोग और भय मनुष्य को स्वतन्त्र विचारों से पृथक नहीं कर सकते, सचमुच ही वे भोले है, और उनमें अपने दैनिक जीवन को ही एकाग्रता पूर्वक देखने और उनका विश्लेषण करने की शक्ति नहीं है। यदि वे अपने अपने सिन्तडडडड और विचारों के साथ अपने जीवन की तुलना करें तो वे इसका प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त करेंगे।

सच तो यह है कि संयम का पाठ पढ़े बिना तथा गरीबी को अपनाये बिना स्वतन्त्र विचारक बना ही नहीं जा सकता। स्वतन्त्र विचार के लिए इतना बड़ा त्याग सहना संभव नहीं है इसीलिए तो आज भारतवर्ष में विचार क्रान्ति नहीं हो रही और मानसिक गुलामी में सबके सब जकड़े पड़े हैं।

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