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Magazine - Year 1950 - Version 2

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पतझर बारह मास इधर है

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(श्री राज बहादुर ‘विकल’)

तुम बसंत के गीत गा रहे पतझर बारह मास इधर है!

यह बसन्त उनका है जिनके महल और ऊँची दीवारें,

जिनके घर सोने चाँदी की होती रहती है झनकारें

मैं मजदूर, झोपड़ी मेरी रात रात-रोया करती है,

यहाँ भूख का ताँडव होता मति धीरज खोया करती है!

सोने को धरती व ओढ़ने को नीला आकाश इधर है!

धनवानों के घर बसन्त है पतझर बारह मास इधर है!!

रक्त चूस डाला धरती ने सरसों से है चेहरे पीले

नहीं धार की वर्षा होती अश्रुधार से आँगन गीले!

जिनको सुख वह व्यंग्य कर रहे हमने पाया केवल रोना,

मरने पर मरघट की छाती जीवन में खंडहर का कोना!!

तिल तिल करके प्राण जल रहे उनका क्षीण प्रकाश इधर है!

दौलत वालों का बसन्त है पतझर बारह मास इधर है!!

कोकिल की काकली नहीं है, भूखे बच्चों की चीत्कारें,

नंगी माँ बहनों का क्रन्दन लज्जा की मिटती मनुहारें।

खिली स्वप्न में भी न यहाँ पर उठते अरमानों की कलियाँ,

ओ बसन्त, तुम व्यंग्य कर रहे इधर भरे आँसू से गलियाँ!

तुम अनंग के दूत, तड़पने वालों का इतिहास इधर है!

तुम बसंत के गीत गा रहे पतझर बारह मास इधर है!!

आशाओं की बलिवेदी पर तिल तिलकर जल जाना होता!

उर के लहू से दो टुकड़ों का है मोल चुकाना होता-

तुम मधु की बूँदे ले आये बुझ न सकेगी भूख हमारी,

मेरा उर जलता पलाश सा असंतोष की ले चिनगारी!

मधुर उमंगों के तुम प्रहरी, जीवन का उपहास इधर है!

रोटी वालों का बसन्त है पतझर बारह मास इधर है!!

जिनके घर में सोना, चाँदी, सुरा, सुन्दरी, भोजन, प्याली,

उनके महलों में बसन्त है जिनके फूली है फुलवारी!

उनकी क्षण क्षण ही होली है उनको पल पल में दीवाली!

मेरा तो त्यौहार मौत है, जीवन मरने की तैयारी!

तुम संगीत सुरा में डूबे-रुक रुक चलती साँस हमारी!

धनवानों के घर बसंत है-पतझर बारह मास इधर है!

*समाप्त*

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