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Reading: दुःखी दुनिया · Page 35

दुःखी दुनिया

(श्री हरिकृष्णजी प्रेमी)

बन-बन में, औ कण-कण पर, इन चरणों के भी नीचे।

जाने किस-किसने कब कब, है निर्मल आँसू सींचे॥

जग कुचल-कुचल कर उनको, चलता है आँखें मीचे।

अवकाश किसे है उनकी तसवीर बैठ कर खींचे।

जिस हरियाली झुटमुट में कर रखी तरु ने छाया।

जाने उस के प्राणों में किस समता की है माया॥

उस सूने बन में किसने करुणा का दीप बुलाया?

किसने जग की आँखों से है अपना रूप छिपाया?

सूनी समाधि के ऊपर वह कौन अकेली रोती।

उज्ज्वल करने को किसकी स्मृति-रेखा हग से धोती?

तब रहे भूमि के नीचे कितने ‘प्राणों से प्यारे!

कितने ही महल मिले हैं रज में, अभाग्य के मारे॥

परिवर्तन के मनमाने भूचाल अचानक आकर।

चल दत हैं, चुपके से गिरि-शृंगों तक को ढाकर॥

यह समय-सिंधु अनजाने भीषण तूफान उठा कर।

गंभीर शाँत बन जाता कितने ही पोत डुबा कर॥

है मौन शून्य के उर में जाने किन-किन के गाने?

किसने दुनिया-दुनिया के अन्तर के स्वर पहचाने?

टूटे पत्तों से उड़ते फिरते कितने दीवाने।

कितनी ही वीणाओं में हैं विकल व्यथा के गाने॥

जो खड़े हुए है निश्चल पर्वत से मन को मारे।

उनके भी डर से झरते रहते कितने फव्वारे!

मुसकान अधर पर दिखती, प्राणों में व्यथा सघन है।

जग के दीपक के तल में छाया तम-तोम गहन है॥

ऐ काल, कौन सुन पाया है तेरी पूर्ण कहानी।

ए व्यथा, जगत में करती फिरती है तू मनमानी॥

वैभव के सिंहासन पर चढ़कर हँसते अभिमानी।

कहते हैं ईश्वर का भय है दुनिया की नादानी॥

- अनन्त के पथ पर,

*समाप्त*