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Reading: साधुता का लक्षण-सत्य प्रियता है। · Page 11

साधुता का लक्षण-सत्य प्रियता है।

(श्री पं. जनार्दन झा)

जितना ही सत्यप्रियता का अभाव है उतना ही सुजनता का ह्रास है। सत्यप्रियता समाज के लिये एक ऐसा सुलभ बन्धन है कि जिससे समाज की बहुत बुराइयां दूर हो जाती हैं। सिर्फ झूठ न बोलने के भय से ही समाज का बहुत कुछ सुधार हो सकता है। किंतु बहुत लोगों के मुँह से यह सुनने में आता है कि बिना झूँठ बोले काम नहीं चलता। पाठशालाओं में शिक्षकों के निकट सजा पाने के डर से विद्यार्थीगण, घर में माँ-बाप और अन्यान्य गुरुजनों से धिक्कारे जाने के भय से लड़के-लड़कियाँ, मालिक के डर से नौकर और समाज की निन्दा और लोक लज्जा के भय से गाँव के रहने वाले झूँठ बोलना अंगीकार करते हैं। अब यह सोचना चाहिये कि घर-घर में व्याप्त होने वाले इस मिथ्या भाषण का मूल क्या है? इसका मूल डर है। डर जाने पर ही लोग झूठ का सहारा लेते हैं। भीरुता और कायरता के सिवा इस मिथ्या भाषण का और कारण क्या कहा जा सकता है। कई एक सामान्य गुणों के अभाव से यह भारी दोष उत्पन्न होता है। बिना विचारे जब कोई अनुचित कर्म कर बैठता है तब उसे भय होता है। वह सोचता है-दोष स्वीकार करने पर मैं दण्ड पाऊँगा, घर के लोग मुझ पर क्रोध करेंगे। अड़ोस-पड़ोस के लोग मुझे घृणा की दृष्टि से देखेंगे, और भी मुझे कितने ही दुःख झेलने पड़ेंगे। ऐसी हालत में क्या करना चाहिए? अपना दोष स्वीकार करके दण्ड पाना उचित है अथवा झूँठ के सहारे अपना दोष छिपाकर उद्धार पाना उचित है? कोई तो उस अपराधी व्यक्ति को यह सलाह देगा कि अगर दो-एक झूठ बात बोलने से सारा संकट मिट जाय, झूठ बोलने में हर्ज ही क्या? शुद्ध चरित्र वाले कहेंगे कि अपराधी अपने दोष को छिपाकर एक बार किसी तरह बच सकता है किन्तु उसी घड़ी से उसके भविष्य की आशा, शुभ संकल्प सर्वदा के लिए लुप्त हो जाता है। अपने अपराध-जनित संकट से रक्षा पाने के लिए बार-बार उसे झूठ बोलना पड़ता है, हृदय के उच्च भाव सभी एक एक निकल जाते हैं। अपना दोष स्वीकार कर लेने पर सत्यवादी को दण्ड जरूर होता है किन्तु सत्य से उसका हृदय उस दण्ड की अपेक्षा अधिक उन्नत होता है। उसके मन से सारा भय भाग जाता है, उसे झूठ बोलने के लिए फिर कभी बाध्य होना नहीं पड़ता किन्तु जो लोग मिथ्यावादी हैं वे हमेशा ही भयभीत रहते हैं, उनका हृदय उद्विग्न रहा करता है। उनके जी में आप ही आप ग्लानि होती रहती है। वे कौटिल्य धारण करके नीच से भी नीच कर्म करने लग जाते हैं। बाहर से वे भले ही ऐश्वर्यशाली देख पड़े पर भीतर से वे बराबर बेचैन रहा करते हैं। जो लोग सत्य भाषी हैं, उनके मन में शान्ति, हृदय में साहस, बोली में स्पष्टता और दृष्टि में तेज भरा रहता है। सभ्य समाज में उनका आदर होता है। अच्छे गुणों की प्रतिष्ठा सभी समय सब देशों में होती है। सत्य भाषण एक वह प्रधान गुण है जिसके धारण से मनुष्य मात्र गौरवान्वित हो सकता है। जो असत्य सेवी हैं वे किसी काल में बड़ाई नहीं पा सकते।

जिन-जिन गुणों की ज्योति से संसार जगमगा रहा है उन गुणों को प्राप्त करने की अभिलाषा किसे न होगी? उन सब गुणों को कोई एक ही साथ प्राप्त कर लेना चाहे यह कभी हो नहीं सकता। हाँ, एक-एक गुण का अभ्यास करके लोग गुणों से अपने को अलंकृत कर सकते हैं। अवगुण अनायास ही प्राप्त होता है किन्तु गुण विशेष साधन का फल है। यदि तुम गुणों का संग्रह करना चाहो तो उसका सुगम उपाय यही है कि सबसे पहले तुम सत्य का सहारा लो। दृढ़तापूर्वक प्रतिज्ञा करो- ‘मैं झूठ नहीं बोलूँगा।’ बस एक सत्य का आश्रय ग्रहण करने ही से और जितने गुण हैं वे आपसे आप आकर तुम्हारा हाथ पकड़ेंगे।

एक बड़े विज्ञ महात्मा का कथन है-’ज्ञान ही शक्ति है।’ ज्ञान का स्वरूप सत्य है, और अज्ञान का असत्य। इस सिद्धान्त से सत्य और शक्ति में कुछ भेद न रहा। जिसमें जितना सत्य का भाग है वह उतना ही शक्तिमान है। संसार में जितने अनिष्ट संघटित हुए हैं, हो रहे हैं और होंगे-इनका एक-मात्र कारण सत्य की ह्रासता है। एक बार भारतवर्ष की ही बात सोचकर देखो। उस भारत में जब सत्य का सम्मान था, सबके आचार विचार विशुद्ध थे, छल-कपट को लोग महापाप समझते थे, तब भारत में शक्ति, समृद्धि और सुखी था। ज्यों-ज्यों सत्य का ह्रास होने लगा त्यों-त्यों भारतवासी आर्यगण शक्तिहीन होने लगे। हाय! प्राचीन भारत की सत्यप्रियता, स्वधर्म निष्ठा, साधुता, धीरता और वीरता के साथ वर्तमान भारत की असत्यपरता, दुराचार, अशिष्टता, अधीरता और भीरुता की तुलना करते हैं तो हृदय विदीर्ण हो जाता है और लज्जा से सिर नीचे झुक जाता है। किन्तु हम लोग यदि अब भी सत्यव्रत धारण करके अपने चरित्र को सुधारेंगे तो थोड़े ही दिनों में वर्तमान भारत के समस्त कलंकों को मिटा डालेंगे। कितने ही विदेशियों ने जो हम लोगों को बहुत-बहुत गालियाँ दी हैं और कितने ही विदेशी जो हम लोगों की मूर्खता पर अब भी हँसते हैं और हम लोगों की घृणा की दृष्टि से देखते हैं वे लोग भी सद्भाव धारण करेंगे और हम लोगों के महत्व का परिचय पाकर बार-बार हमारी प्रशंसा करेंगे।