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Magazine - Year 1953 - Version 2

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द्वेष, भय और वासनाओं से मुक्ति का मार्ग

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(बर्मा के प्रधान मंत्री श्री ऊनू)

प्रत्येक प्राणी का वह चाहे न चाहे, मृत्यु के बाद तुरन्त पुनर्जन्म होता है। संसार के महासागर में जीवन और मृत्यु का यह अनवरत चक्र चलता ही रहता है। यह पुनर्जन्म चार योनियों में हो सकता है। (1) ब्रह्म (2) देव (3) मनुष्य (4) अन्य प्राणी।

जन्म और मरण के इस अनन्त चक्र का मुख्य कारण है लोभ, दोष, और मोह का प्राणियों में बद्ध-मूल होना। साधारण तौर पर कहा जाय तो कहा जा सकता है कि मनुष्य पशु से ऊपर है। देव मनुष्य से और ब्रह्म, देव से। किन्तु वस्तुतः इनमें से किसी भी रूप में जन्म लेना श्रेय और अभीष्ट नहीं है। क्योंकि एक बार जन्म ग्रहण करने पर फिर चाहे वह इनमें से किसी भी रूप में हो, उसे उसके परिणामों-जरा, रोग, मृत्यु प्रिय वियोग और अप्रिय संयोग आदि अपरिहार्य दुःखों को भोगना ही पड़ता है।

इस दुःख-ताप से बचने का उपाय क्या है? इसका एक ही उपाय है- जन्म मरण के चक्र से मुक्ति लोभ, दोष और मोह आदि भव-बन्धन के कारणों का समूल नाश करके ही प्राप्त की जा सकती है और इनका एक मात्र उपाय मन को वश में करना और उन एकाग्र ध्यान की एक उच्च स्थिति तक पहुँचाना।

जब मनुष्य का मन उस सीमा तक विकसित हो जाता है तो वह पथ की उन चार मंजिलों तक क्रमशः पहुँच सकता है जिन्हें पाली में (1) सोतापित्त, (स्त्रोतापति) (2) सकवागामी (सकृदागामी) (3) अनागामी और (4) अर्हत कहा जाता है।

जो व्यक्ति प्रथम मंजिल में पहुँचता है उसके अपने अंतिम लक्ष्य के सम्बन्ध में सब संशय छिन्न हो जाते हैं। दूसरी मंजिल में पहुँचने वाले की वासनाएँ पर्याप्त सीमा तक समाप्त हो जाती है। तीसरी मंजिल में पहुँचने पर मनुष्य का दोष, भय और दैनिक वासनाएँ उच्छिन्न हो जाती हैं, किन्तु उसमें उच्च योनि में जाने की आकाँक्षा बनी रहती है। किन्तु अर्हत, जो अन्तिम मंजिल में पहुँच गया है, न केवल दोष, भय और भौतिक वासनाओं को जीत लेता है, वरन् सभी आकांक्षाओं और राग-द्वेष पर भी विजय पा लेता है। व्यक्ति इस अन्तिम व्यवस्था में पहुँच जाता है, मृत्यु के बाद उसका पुनः संसार में आगमन नहीं होता।

संक्षेप में युद्ध द्वारा अविकृत स्थूल सिद्धान्तों का रूप यह है। इस सिद्धान्त के दो भाग हैं। पहला भाग मृत्यु के बाद की स्थिति के सम्बन्ध है, और साधारण मरणधर्मा मानव के लिए उसे सिद्ध कर सकना प्रायः असम्भव है। किन्तु इसके भाग का संबन्ध इह लोक के साथ है और उसे सिद्ध किया जा सकता है। मैं इस दूसरे भाग को ही कुछ स्पष्ट करने का प्रयत्न करूंगा।

मानव मन का एक प्रधान धर्म है सन्देह करना। मनुष्य जिस धर्म का पालन करता है, वह भी उसके सन्देह से नहीं बनता। हम एक बौद्ध का उदाहरण लें। चाहे वह सामान्य बौद्ध हो और चाहे भिन्न, यदि हम उससे पूछें कि क्या तुम्हारी बौद्ध धर्म में पूर्ण आस्था है? यदि वह ईमानदार है तो उत्तर देगा ‘नहीं, कभी मुझ में संदेह की कणिका पैदा हो जाती है।’ किसी भी सच्चे आदमी के लिए यह उत्तर देना स्वाभाविक है और आप इससे भिन्न उत्तर की आशा भी नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि सन्देह मानव का स्वभाव है। किन्तु उसने इस पथ की पहली मंजिल तय कर ली है उसके मन से बुद्ध के सिद्धान्त के सम्बन्ध में समस्त संदेहों की निवृत्ति हो जायगी, क्योंकि उसने अपने अंतर्मन में समस्त दुखों के परिणाम को जान लिया है।

तीसरी मंजिल अर्थात् अनागामी की स्थिति इससे कहीं ऊँची है। मैं इसे थोड़ा स्पष्ट करूंगा। मनुष्य, चाहे वह कितना भी साधु हो, द्वेष से मुक्त नहीं हो सकता, इसी प्रकार चाहे वह कितना ही वीर हो, भय से मुक्त नहीं हो सकता। एक साधु प्रकृति मनुष्य अधिक से अधिक अपने द्वेष और क्रोध का दमन ही कर सकता है किन्तु वह जानता है कि उसमें द्वेष और भय की अनुभूति विद्यमान है। एक वीर पुरुष अधिक से अधिक अपने भय का दमन करने का प्रयत्न कर सकता है, किन्तु उसे यह संवेदन रहता है कि उसमें भय की भावना है किन्तु जो व्यक्ति पथ की तीसरी मंजिल में पहुँच जाता है उसमें केवल एक ही आकाँक्षा रह जाती है कि वह अपने से ऊँची योनि अर्थात् ब्रह्म योनि में जन्म ले। उसमें द्वेष, भय या किसी प्रकार की दैहिक वासना नहीं रहती। विश्व भर में कोई भी उसे भय, द्वेष या दैहिक भावनाओं से प्रलोभित नहीं कर सकता।

किन्तु सबसे अधिक आश्चर्यमय चौथी और अन्तिम दशा है। तीसरी दशा में फिर भी ब्रह्म बनने की आकाँक्षा बनी रहती है, किन्तु जब मनुष्य चौथी दशा में पहुँचता अर्थात् अर्हत बन जाता है तो उसमें न केवल द्वेष, भय या भौतिक भावनाओं का बल्कि किसी भी प्रकार की अतीन्द्रिय वासना का लेशमात्र भी नहीं रहता। उसकी सब वासनाएँ निःशेष हो जाती हैं। संसार में कोई भी अर्हत को द्वेष, भय अथवा किसी भी वासना की और आकृष्ट नहीं कर सकता।

पथ की इन प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ अवस्थाओं में होने वाले मानसिक और आध्यात्मिक परिवर्तन परलोक में नहीं, इह लोक में ही होते हैं और मनुष्य उन्हें इसी में प्राप्त कर सकता है।

आजकल जब कोई व्यक्ति पैनिसिलिन, एम. बी. की गोलियों, जेट विमान या अणुबम का आविष्कार करता है और संसार के सम्मुख उनकी घोषणा करता है तो वैज्ञानिक उनके परीक्षण कर सकते हैं। लोगों को बुद्ध के उपर्युक्त आविष्कार का भी अवश्य परीक्षण करना चाहिए। यह आविष्कार व्यक्तिगत आत्म निरीक्षण से हो सकता है। हमें बुद्ध के इस सिद्धाँत को धर्म मानकर नहीं चलाना चाहिए उसे संदेह, राग-द्वेष तथा इन्द्रियगम्य व अतीन्द्रिय वासनाओं से मुक्ति दिलाने वाली जीवन पद्धति का एक उपाय मानकर चलना चाहिए।

मेरा आपसे हार्दिक आग्रह है कि आप उपाय और उससे साधित जीवन-पद्धति की परीक्षा करने के लिए उसी भाँति गंभीरता से प्रयत्न करें जिस भाँति किसी नये वैज्ञानिक आविष्कार की परीक्षा की जाती है।

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