मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ (Kavita)
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मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ।
मैं शापों को वरदान बना सकता हूँ॥
मैं शूलों को भी फूल समझता आया।
मझधार विकट को कूल समझता आया॥
इस जग को विधि की भूल समझता आया।
कंचन की काया धूल समझता आया॥
मैं आहों को मधु गान बना सकता हूँ।
मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ॥1॥
मैंने मधु की बरसातें कभी न देखीं।
वैभव की घड़ियाँ आते कभी न देखीं॥
सोने के दिन की बातें कभी न देखीं।
वे चाँदी वाली रातें कभी न देखीं॥
मैं निशि को स्वर्ग-विहान बना सकता हूँ।
मैं मानव को भगवान् बना सकता हूँ॥2॥
विष भरी जुबानें हिलते देख चुका हूँ।
उर को छालों से छीलते देख चुका हूँ॥
नव कुसुम शूल में खिलते देख चुका हूँ।
अरमान खाक में मिलते देख चुका हूँ॥
मैं जली कटी गुणगान बना सकता हूँ।
मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ॥3॥
तुम जीवन में पाषाण न बनकर आओ।
मुसकाओ प्रिय, सुनसान न बनकर आओ॥
मधु बरसाओ अंगार न बनकर आओ।
तुम परिचित हो अनजान न बनकर आओ॥
मैं लज्जा को पहचान बना सकता हूँ।
मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ।
*समाप्त*
(श्री यमुनाप्रसाद शर्मा, पालीवाल)
(श्री यमुनाप्रसाद शर्मा, पालीवाल)

