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Magazine - Year 1955 - Version 2

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गायत्री अनुष्ठान से मृत को जीवन-दान

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(श्री. नन्द कुमार शर्मा, कोटा)

मुझे प्रसन्नता है कि मेरे जीवन में ‘अखण्ड ज्योति’ का पथ-प्रदर्शन मिला। आज पाँच वर्ष से पिताजी की प्रेरणा से प्रतिदिन पाँच माला गायत्री जप तथा उसका हवन करते आ रहा हूँ। उनकी आयु 70 साल है। चैत्र नवरात्रि में मैंने पूज्य गुरुदेव से आदेश प्राप्त कर पिताजी के आत्म-कल्याण के लिये सवा लख तथा महायज्ञ के लिये 24000 का अनुष्ठान किया था।

श्रावण मास में पिताजी बीमार पड़े। वृद्ध थे ही और बुखार ने झकझोर डाला। चिकित्सा की गयी, पर हालत दिनों दिन गिरती ही गयी। सभी के विचार से इस वृद्धावस्था में उनका शरीर त्याग ही भला और सुन्दर-जँचता था, पर मेरे हृदय की ममता उन से बिछुड़ना जरा भी पसन्द नहीं करती। उनके महा प्रस्थान का दिवस था। उनकी दशा से सभी को यह अवगत ही था। मैं जप कर रहा था। अचानक ही सभी एक साथ रो पड़े। मैंने समझ लिये कि पिताजी इस नश्वर शरीर का त्याग कर रहे है। ममता की अधिकता से मैं भी फूट कर रो पड़ा। सामने गायत्री माता की प्रतिमा थी। मैंने दीन और करुण स्वर में प्रार्थना की माँ। और कुछ दिन मेरे पिता को जीने दे। सहसा ही विद्युत सा चमक उठा और मैं बेसुध सा हो गया। उसी समय मेरी अन्तर चेतना में किसी ने कहा- यदि महायज्ञ के लिये किया गया 24000 के अनुष्ठान को शीघ्रता से पिता को संकल्प कर दो तो ऐसा हो सकता है। मैं उपासना छोड़कर आतुर भाव से दौड़ता हुआ पिताजी के निकट गया। उनका सार शरीर हाथ-पाँव सभी ठण्डे हो चुके थे। नाक भी शीतल और टेढ़ी हो चुकी थी। सभी उन्हें खाट से उतार कर नीचे सुला रहे थे। मैं देखते ही निराश हो गया फिर भी उसी दशा में मैंने उन्हें बैठाकर 24000 जप का तुलसीदल, गंगाजल लेकर संकल्प किया और वह उनके मुख में डाल दिया। तुरन्त ही उनकी प्राण चेतना लौट आयी और स्वयं ही नीचे से उठ कर खाट पर बैठ गये। सभी आश्चर्य से अवाक् होकर इस चमत्कार की मौन व्याख्या कर रहे थे और मैं माता के चरणों में पड़ कर भाव-विभोर होकर सिसक रहा था।

मेरे पिता अब पूरे स्वस्थ एवं इतने सरल हैं कि इस वृद्धावस्था में भी अपना सब काम स्वयं ही कर लेते हैं।

पुत्र प्राप्ति तथा विग्रह की शान्ति (श्री मूलजी उद्धवजी वेदान्त, कोटजी)

मेरी पुत्री चन्द्रलता की सास बड़ी ही दुष्ट प्रकृति की थी। एक बार उसने चन्द्रलता को बेतरह मारा। यह सुन कर मुझे बड़ी वेदना हुई। चैत्र नवरात्रि का अवसर था। मैंने उसके इस संकट निवृत्ति की भावना से गायत्री का अनुष्ठान प्रारम्भ कर दिया। अनुष्ठान समाप्ति के कुछ ही दिन बाद चन्द्रलता ने अपने हाथ से लिख अपने जीवन में अयाचित शाँति आने का प्रसन्न-संवाद दिया और कुछ दिन उपरान्त उन लोगों ने प्रसन्नता पूर्वक उसे यहाँ पहुंचा दिया। उसका स्वस्थ प्रसन्न मुख देखकर मैं भी पुलक से भर उठा। उसने बताया-भगवान की कृपा से मेरे सास का स्वभाव बदल गया। अब वह मारने के स्थान पर मुझे प्यार करती है। मैंने मन ही मन गायत्री माता को धन्यवाद दिया। कृतज्ञता से अन्तर भर रहा था।

इस प्रसाद से मेरे उत्साह और विश्वास बढ़ा। मुझे पुत्र प्राप्ति की तीव्र इच्छा थी। सारा उपाय करके हार गया था। अतः मैंने पुत्र प्राप्ति के लिये भी गायत्री अनुष्ठान करने का निश्चय किया। आश्विन नवरात्रि आते ही विधि-पूर्वक गायत्री अनुष्ठान सम्पन्न किया। ब्रह्मचर्य, सात्विक-मौन धारण सहित भोजन, आसन संयम-नियम, सदाचार सभी को शक्ति भर निवाहा माता का दयालु हृदय द्रवित हो गया और आषाढ़ मास के प्रथम पक्ष में ही मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गयी ऐसी करुणामयी माता की, कहिये कौन अभागा उपासना नहीं करेगा?

वंश रक्षा और पद-बुद्धि (श्री. बिहारीलाल जी दुबे, वैकुण्ठपुर)

गायत्री माता की कृपा पाने का प्रथम और अनिवार्य साधन या द्वार है- गुरु कृपा। यही मेरा अनुभव है। गुरुदेव ने ही मुझे माता का आँचल पकड़ने के लिये प्रेरित किया और माता की कृपा ने प्राइमरी विद्यालय के अध्यापक पद से मुझे सात महीने में ही मिडिल स्कूल के अध्यापक पद पर पहुँचा दिया। मैंने इसके लिये अपनी ओर से विशेष रूप में कोई चेष्टा नहीं की।

मैं टहलने जा रहा था। रास्ते में एक वकील साहब मिले। मैंने शिष्टता के विचार से उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने नमस्कार का उत्तर देने के बाद पूछा- आज कल क्या करते हो ? मैंने कहा- “मैं प्राइमरी स्कूल का शिक्षक हूँ। उन्होंने बताया कि विलासपुर के नॉर्मल स्कूल में एक शिक्षक का स्थान खाली, तुम दरखास्त दो तो मैं तुम्हें वह स्थान दिला दूँ। उनकी बात स्वीकार कर मैंने उस पद के लिये दरखास्त दे दिया और बिना किसी चेष्टा के 15 दिन उपरान्त ही वह पद मुझे मिल गया। मुझे कभी स्वप्न में भी यह कल्पना नहीं आयी थी कि मैं केवल सात महीने ही प्राइमरी विद्यालय में शिक्षण करके मिडिल स्कूल का शिक्षक हो जाऊँगा। सो गायत्री माता की कृपा से प्रसाद रूप में ही मुझे यह प्राप्त हुआ।

बी.ए. की परीक्षा देने के पथ में भी कई एक विघ्न बाधाएं थी, जो माता की कृपा से ही सुविधा पूर्वक हटती गयी और काम पूरा होता गया।

दरखास्त करने वालों में सब से जूनियर मैं ही था, अतः विद्यालय के प्रधान से मुझे परीक्षा के लिये अनुमति मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी, पर माता की कृपा से मुझ जूनियर को ही सर्व प्रथम सम्मति प्राप्त हुई।

अंग्रेजी तो मेरी बेहद कमजोर थी, अतः परीक्षा देने का न तो साहस ही होता था और न हृदय में उत्साह ही था। गुरुदेव का प्रोत्साहन पाकर अन्तिम दिनों में थोड़े से चुने हुये प्रश्नों का उत्तर जहाँ-तहाँ पढ़ गया था और आश्चर्य यही कि मैंने जो पढ़ा, वही प्रश्न भी आया और मैंने उसे यथा सम्भव लिख भी डाला, पर इतने पर भी पास होने की मैं आशा नहीं कर पा रहा था।

माता और गुरु की कृपा से मैं बी.ए. भी पास हो गया और आज उस पद से भी उन्नति प्राप्त कर हाई-स्कूल का शिक्षक बन गया हूँ। क्या माता की अहैतुकी कृपा का इससे भी अधिक कुछ उदाहरण मिल सकता है?

उनकी कृपा से पत्नी भी मनोनुकूल मिली, पर उसे एक ऐसा रोग था जिससे वंशावरोध का भय था। इसी रोग के निवारण में हमारे एक शिक्षक-बन्धु को (1200) बारह सौ रुपये खर्च करने पड़े थे। माता की कृपा से 25)रुपये में ही वह रोग नष्ट हो गया और चार महीने उपरान्त एक नवीन कुल-दीपक भी उद्धृत होने जा रहा है।

मनोनुकूल-विवाह (श्री युगेशनन्दन सहाय, पटना)

गायत्री माता की कृपा उपासकों को कब, किस रूप में प्राप्त होता है, यह पहले कदापि पता नहीं लगता। मेरे मित्र अशोक कुमार ने मेरे कथन पर ही गायत्री उपासना प्रारम्भ की थी। महायज्ञ का संरक्षण-जप स्वीकार किया था। इस समय वे पटना के बी.एन. ट्रेनिंग स्कूल में पढ़ते थे। उसी में रंजना देवी भी पढ़ रही थी। वह सुन्दरी और सुसंस्कृत थीं दोनों में प्रेम का बीज अंकुरित हुआ और परस्पर विवाह करने का निश्चय किया, पर अशोक कुमार के पिता बिना तिलक-दहेज लिये शादी करना पसन्द नहीं करते थे, रंजना की पारिवारिक स्थिति साधारण थी। यहाँ से रुपया और सम्पत्ति मिलने की सम्भावना नहीं देख उन्होंने एक धनी परिवार की लड़की से अशोक कुमार के विवाह की बातें तय कर ली और लड़के को धमकाया यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो पढ़ने का खर्च बन्द कर ही दूँगा, साथ ही हमारी संपत्ति से भी तुम हाथ धो बैठोगे।

चिन्ता ने अशोक कुमार को बिछौने पर सुला दिया। ऐसे संकट पर माता की पुकार करना स्वाभाविक होता है। माता ने पुकार सुन ली। अशोक कुमार का हृदय उत्साह से भर उठा, उसने उद्घोषित किया- मैं सब कुछ खोकर भी रंजना से विवाह करूंगा। रंजना के माता-पिता तो चाहते ही थे। छात्र बराती बने और आनन्द उल्लास के बीच रंजना अशोक कुमार की जीवन धारा मिल कर एक सरिता की भाँति उल्लासिता सी चल पड़ी। सास ससुर ने अपनी अनिश्चित पतोहू का मुख देखा और उनका आवेश-उनकी कठोरता पिघल कर वात्सल्य की निर्झरिणी बन गयी। कौशल्या माता के समान सास ने, पतोहू को आँचल के नीचे ढाप लिया और आंखों में प्यार छलछलाने लगे।

प्रारम्भ में गायत्री-उपासना करने में मेरे मन जरा भी नहीं लगता था, पर गुरुदेव के आदेशानुसार करते ही रहने से आज ऐसा हो गया है, कि यदि मुझे केवल वही काम रहे, तो मैं करता ही रहूँ, कभी न थकूँ। पता नहीं इसमें किधर से अद्भुत रस उत्पन्न होता है।

गायत्री उपासना के पहले पढ़ने में मेरा मन भार सा बोध करता था, पर अब उसमें भी रुचि बढ़ गयी है। और कुछ भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ, जो मुझे हुए हैं, उसे में उल्लेख करना नहीं चाहता।

मेरे जीवन के चार क्षण (श्री रामपाल सिंह, राठौर)

उपासना सभी करते हैं, पर गुरु कृपा से इसमें जितनी जल्दी सफलता मिलती है, उतनी शीघ्रता से सफलता देने वाला शायद ही कोई साधन हो। मेरा तो अपने अनुभव के आधार पर यही विश्वास है।

मैंने गुरुदेव के चरणों में अपने को सौंपते हुए, उनकी बताई सारी विधियों का ठीक-ठीक पालन करते हुए इसी ऋषि पंचमी से गायत्री-उपासना प्रारम्भ की। उस दिन अंग्रेजी ता. 21.09.55 था। मैं ब्राह्मी मुहूर्त से ही साधना में संलग्न हो जाता था। दूसरे दिन 22.09.55 को मैं जप कर रहा था। आंखें खुली थी। सहसा ही मेरे आगे एक त्रिमुखी देवी प्रगट हुई। उनके अंगों से सुनहले रंग का प्रकाश निकलकर टार्च के प्रकाश की भाँति मेरे अंगों को पवित्र कर रहे थे। आनन्द के आधिक्य से मेरे रोम-रोम प्रफुल्लित हो उठे। मैं अनुपम शाँति से ओतप्रोत था। आंखों से प्रेम के आँसू भर रहे थे।

पांचवें ही क्षण वह सारा दृश्य न जाने कैसे छिप गया। मुझे बराबर उस ‘चार-क्षण’ की याद आती है, और उसे फिर से पाने के लिये मेरा अन्तर विह्वल होने लगता है। गुरुदेव ! अनन्त मातृ-स्नेह से भरे मेरे प्रभो ! एक बार पुनः वह पावन दर्शन देकर सदा के लिये मुझे अपना लो।

मेरे पवित्र अनुभव (श्री सुमन्त कुमार मिश्र बी. ए.)

यज्ञोपवीत संस्कार के समय मेरे पुरोहित जी ने बेगार की भाँति गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी। आज की भौतिकवादी विचार धारा का व्यक्ति भला उसका क्या प्रभाव ग्रहण करता ? मैं सब भूल-भाल गया।

एक दिन मेरे परम मित्र श्री जीवनभर दीवानजी ने (जिनका मैं चिरकृतज्ञ हूँ और रहूँगा) मुझे गायत्री उपासना की चर्चा के संग श्रीराम शर्मा आचार्य और “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका की चर्चा सुनाई और उसी रात में मैंने स्वप्न देखा कि गायत्री मन्त्र के पवित्र उच्चारण सहित मैं महायज्ञ में आहुति दे रहा हूँ। उस समय मुझे अनिर्वचनीय आनन्द मिल रहा था। जागने पर भी मेरे अंगों में उस आनन्द का संचरण होता रहा। मैं भाव-मुग्ध हो रहा । उसी दिन अपने स्वप्न की चर्चा सहित सारी बातें लिख भेजी। उनका उत्तर जो कुछ मिला- वही मेरे आध्यात्म-जीवन के प्रवेश की अमूल्य और श्रेष्ठ थाती है। मेरी आत्मा को उद्बोधन मिला और मैं गायत्री उपासना मैं संलग्न हो गया।

मेरा छोटा भाई बीमार था। उस दिन उसे बहुत कष्ट था। नीन्द नहीं- केवल छटपटी। घर वाले भी उसकी यह बेचैनी देख बेचैन हो रहे थे। मैं उसके सिरहाने बैठकर उसके ललाट पर हाथ फेरने लगा। तन्मय दशा में स्वतः ही गायत्री मन्त्र उच्चरित हो रहा था। धीरे-धीरे उसकी बेचैनी कम होने लगी और नीन्द आ गयी। मेरी आँखों में कृतज्ञता के आँसू उमड़ रहे थे।

जब कभी मेरे जीवन में कष्ट और संकट उपस्थित होते हैं, तो मैं माता का आह्वान करता हूँ और देखते ही देखते वे कष्ट और संकट विलुप्त होने लगते हैं और मुझे उनसे छुटकारा मिल जाता है। आने वाली शुभाशुभ घटनाओं की छाया मेरे मानस-पटल पर पहले ही अंकित हो जाती है। अपनी बुद्धि में प्रकाश और मनोबल नित्य बढ़ता हुआ अनुभव करता हूँ।

पिछले वर्ष बी.ए. की परीक्षा में मैं कुछ भी नहीं पढ़ सका था। मेरे दो छोटे भाई की मृत्यु के कारण व्यथा से भी भर रहा था, भला पढ़ना कैसे सुहाता ? मैंने आचार्य जी को लिखा। मुझे आश्वासन मिला। फिर तो मैंने माता के नाम पर गलत-सही पर्चे लिख ही दिया। जहाँ अपने ज्ञान के अनुसार मुझे अनुत्तीर्ण होने की सम्भावना थी, वहाँ आश्चर्य के साथ मैं द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया। सभी मुझे बधाई दे रहे थे, पर मैं ही जानता था कि इस बधाई का वास्तविक पात्र कौन है ?

आज तो भौतिक विज्ञान ने भी शब्दों के सत्वर ताल-मात्रा युक्त उच्चारण करने की क्रियात्मक शक्ति को मान लिया है, फिर उसमें श्रद्धा-विश्वास के संयोग से वह क्यों न और भी महान शक्ति धारण करने में समर्थ हो जाये? लाखों वर्षों से करोड़ों व्यक्तियों ने गायत्री मन्त्र के शब्दों में अपने आत्मविश्वास की अनन्त शक्तियों को भरपूर कर दिया है। प्रत्येक कल्याण कामी को इस मन्त्र से लाभ उठाना चाहिये।

द्वेष करने वाले का ही स्थानान्तर हो गया श्री दतात्रेय पुरुषोत्तम हरदास, ए.एम.आई.टी. (इटारसी)

उपनयन संस्कार के थोड़े ही दिन बाद मैंने उपासना को व्यर्थ की भावुकता तथा अनर्थक-पुरुषार्थ समझकर त्याग दिया कुछ दिन उपरान्त मैंने “प्राचीन भरत में शिक्षा की प्रणाली” एक अँग्रेजी पुस्तक पढ़ी और उसने मुझे गायत्री उपासना में प्रवृत्त कर दिया। फिर प॰ आचार्य राम शर्मा लिखित गायत्री विज्ञानादि ग्रन्थ पढ़ कर तो मैं इसका अनुरक्त बन गया। ज्यों-ज्यों उपासना करता, त्यों-त्यों बोध करता, मेरी बुद्धि रही है, उस का प्रकाश बढ़ता जा रहा है। साथ ही समाज में भी स्वतः मेरा सम्मान बढ़ता जा रहा था। यह देख मेरे निकटस्थ साथियों को ही मुझसे ईर्ष्या होने लगी।

मैं सरकारी कर्मचारी हूँ। मेरे इन ईर्ष्यालु-साथियों ने मुझे स्थान-च्युत या स्थानान्तरित करने के लिये षडयन्त्र रचा। हमारे उच्चाधिकारियों के पास मेरी झूठ-मूठ की बनी-बनायी अनेकों शिकायतें लिख भेजी। उसी समय मेरी पारिवारिक स्थिति भी संकट पूर्ण हो गयी। वारिस के दिन के। बच्चे सभी मोतीझरा से आक्रान्त थे। मुझे जरा भी चैन नहीं था। चिन्ता से जर्जर हो रहा था। एक दिन अत्यन्त पीड़ित होकर माता से विनय किया- माँ ! मुझे इन संकटों से अब उबार ले। उसी रात स्वप्न में एक दिव्य स्त्री के रूप में माता का दर्शन हुआ, मुझे कहा- “तुम्हारा स्थानान्तर रुक जायेगा, चिंता छोड़ दो।”

आश्विन-नवरात्रि का अवसर आया। मैं अनुष्ठान में संलग्न हो गया। उसी बीच सहसा उच्च अधिकारी का आदेश पत्र मिला- जिसमें मेरा स्थानान्तर लिखा था, मैं हतप्रभ हो गया। सोचने लगा- ‘क्या वे स्वप्न मेरी कल्पना थी ?

पुनः उसी रात में दिव्य तेजोमयी माता ने स्वप्न में आश्वासन दिया घबराओ नहीं, बदली तुम्हारी नहीं, तेरे विद्वेषियों की ही होगी।

एक सप्ताह के बाद ही मेरे सारे ईर्ष्यालु मित्र, वहाँ से स्थानान्तरित कर दिये गये और मैं आज भी उसी स्थान पर काम करता हुआ दिनानुदिन प्रकाश और आनन्द का बढ़ता हुआ स्वरूप अपने में पा रहा हूँ। इसे किसी को कहने की मेरी इच्छा नहीं होती।

बिना विशेष अध्ययन के ही पास हो गया। (श्री दिवाकर राव चिपड़े, विलासपुर)

इस वर्ष बिना किसी विशेष तैयारी के ही बी.ए. की परीक्षा देने के आग्रह को टाल न सका। इस समय पढ़ना भी सम्भव नहीं था इसीलिए, अध्ययन के बदले गायत्री-उपासना ही करता। परीक्षा दी। किसी तरह-परचे पूरे कर दिये। मुझे तो अपने किये परचे के आधार पर उत्तीर्ण होने की कोई भी आशा न थी। केवल मन ही मन माता की रट लगाये रहता। गंगा दशहरा में भी यही रट लेकर लघु अनुष्ठान किया। अन्तिम दिन लगातार उपासना करता रहा। घी के दीप जल रहे थे।

पूजा समाप्त कर ज्यों ही नीचे आया कि हमारी शाला के दो शिक्षक आये, कहा- ‘बधाई’ आपको। आप बी.ए. पास हो गये। मैंने उसे उपहास समझा और संकोच से झुक गया। मेरे मनोभाव को देखकर फिर दृढ़-गंभीरता से उन्होंने विश्वास दिलाया विश्वास होते ही मेरा रोम-रोम प्रसन्नता से उत्फुल्ल हो उठा। शिक्षक का सम्मान कर उन्हें विदाई दी और उपासना गृह में आ कर माता के निकट घंटों रोता रहा। यह रुदन माता की करुणा के प्रति श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता का उद्रेक था।

माता की इस प्रत्यक्ष कृपा ने हमारी सारे परिवार का हृदय मुग्ध कर दिया। आज हमारे परिवार में सभी गायत्री उपासक हो गये।

आगे तो परिवार की सारी आवश्यकता जैसे अनायास पूरी होती दिख रही है। मेरी छोटी बहिन का विवाह एक सम्पन्न परिवार में एक सुन्दर, तरुण बी.ए. पास के साथ हो गया। उन लोगों ने विवाह में एक पैसा भी रीति-रिवाज, तिलक-दहेज का नहीं लिया।

मेरे एक मित्र बिहारी लाल जी का भी इसी वर्ष बी.ए का पेपर एक दम बिगड़ गया था। उसने अपने को अनुत्तीर्ण मान लिया था, फिर भी माता का भरोसा लेकर वे गायत्री तपोभूमि मथुरा गये और लघु अधिष्ठान किया। माता की कृपा से अनुष्ठान समाप्त होते ही उन्हें भी अपनी आश्चर्यकारी सफलता की सूचना तपोभूमि में ही मिल गयी।

हमें तो विश्वास है कि गायत्री माता शीघ्र ही द्रवित होती हैं और अपने शरणागतों का सदा ही संरक्षण करती रहती हैं।

माता ने प्राण रक्षा की। (श्री कृष्णलाल ‘आनन्द’ एम.ए. दिल्ली)

पाकिस्तान बनने के दिनों हिंदू, मुसलिम दंगों की क्रिया का नंगा नृत्य हो रहा था। 11 अगस्त 1947 ईसवी। मैं कराची में था और मेरा आतंकित परिवार लाहौर छावनी अस्त-व्यस्त था। पाकिस्तान बनने की घोषणा हो चुकी थी। सीमा पर गुण्डों की दुष्टता, क्रूरता का कोई पारावार न था।

गायत्री माता को हृदय और मन में धारण कर कराची से चल पड़ा। भीतर काँप रहा था। लाहौर छावनी स्टेशन आया। वहाँ गाड़ी तीन घण्टे तक रुकी रही। पूछने पर ज्ञात हुआ कि आगे लाहौर स्टेशन पर पहुँचने के पूर्व ही गुण्डे, हिन्दुओं को चुन-चुन कर गाड़ी से बाहर निकाल कर मनमानी अनाचार और अत्याचार करते हैं। छुरे और गोलियों से शरीर को छलनी बना देते हैं। इन समाचारों को जान कर मेरे प्राण भयाकुल हो उठे, पर क्या परिवार को उस प्रलयंकर आतंकों के बीच ही छोड़ दूँ ? फिर माता को तीव्रता से धारण किया । और अपनी सारी शक्ति और वेग से गायत्री जपते हुये चल पड़ा। मुझे यह भी खबर मिल चुकी थी, कि जिस छावनी में मेरे परिवार ने आश्रय लिया था, उसे लोगों-गुण्डों ने जला दिया। अन्तर में वेदना और दर्द से त्राहि-त्राहि मच रही थी और मैं जा रहा था। कुछ दूर ही गाड़ी आयी थी कि ईंट, पत्थरों की वर्षा से उसका स्वागत करना प्रारम्भ हो गया। ज्यों-ज्यों गाड़ी आगे बढ़ती, हमारे सामने मृत्यु और नृशंस हत्या की भयंकरता सम्मुख आती। अधिक स्पष्ट दिखती जाती थी। झुण्ड के झुण्ड खड़ी भीड़ पैशाचिक नारे लगा रही थी, पर माता की कृपा सिग्नल की अवहेलना करती हुई गाड़ी ने स्टेशन पर जाकर ही विराम लिया।

स्टेशन पर सभी आंखें भय कातर हो चारों ओर निहार रही थी। हम लोग उतरे। सभी डर से मृतक-शाँति धारण किये हुये थे। विश्राम गृह पठानों से भरा था। मैं अपना सामान चौकीदार के हवाले कर के स्टेशन से बाहर, शरणार्थी-कैम्प पहुँचा। वहाँ हिंदू सेवा समिति वाले यथाशक्य शरणार्थियों को सुरक्षित स्थान में पहुँचाने का प्रयत्न कर रहे थे, पर राक्षसी शक्ति को उद्दंडता इतनी बढ़ रही थी कि वे लोग भी सुरक्षा की निश्चिन्तता देने में असमर्थ थे।

ज्यों-त्यों प्रातः हुआ। शौच-स्नान से निपट कर माता की उपासना की। अर्चना में पुष्प के बदले आंखों ने मोती-बूंदों की वर्षा की। इस के उपरान्त “मींयामीर छावनी” जहाँ हमारा परिवार विवश और निःसहाय पड़ा था, जाने की सोचने लगा। स्टेशन से बाहर गया। वहाँ सहसा ही एक मुसलमान ताँगे वाले ने आकर कहा- मैं तुम्हें उस छावनी में पहुँचा सकता हूँ। उस समय वहाँ तक पहुँचाने का ताँगा का भाड़ा 20) बीस रुपये साधारण सी बात थी। मैंने पूछ लिया- कितने रुपये लोगे ? उसने बड़े प्रेम से कहा- ढाई रुपये। मैंने माता का स्मरण किया और सामान लेकर ताँगे पर चढ़ गया। कुछ ही दूर आगे देखा गुण्डों का एक दल छुरा, तलवार और लाठी लिये खड़ा है। उसे देखते ही मैंने समझ लिया, माता को इन्हीं दुष्टों के हाथों मुझे मरवाना था। मृत्यु को प्रत्यक्ष सामने देखकर मैं स्तब्ध हो रहा। ज्यों-ज्यों ताँगा गुंडों के निकट पहुँचाने जा रहा था, ज्यों-ज्यों मृत्यु की विभीषिका मेरे सामने स्पष्ट से स्पष्ट होती जा रही थी, पर आश्चर्य! महाआश्चर्य!! निकट पहुँचने ही उन गुण्डों ने बिना कुछ पूछे- जाँचे ही ताँगे रास्ता छोड़ दिया। कैसा चमत्कार! अब तो सारे भयों को बिसार कर मेरा अन्तर-हृदय, माता की करुणा के मद से प्रमत्त हो रहा था। पथ में उसी भाँति दो तीन और भी गुण्डों के दल मिले, पर सभी ने ताँगा देखते ही रास्ता खाली कर दिया और मैं सुरक्षा और प्रसन्नता सहित अपने आतंकित-निःसहाय परिवार से जा मिला।

माता ने मुझे मृत्यु के द्वार से बाहर निकाल लाया है। उनको करुणा की यह सुरभि दिग्दिगन्त में व्याप्त हो उठे, इसलिये मैंने उन्हीं की ‘करुणा-गाथा’ अपने हाथों लिख डाली है।

आत्म बल की प्राप्ति (श्री जयमंगल जी हजारी बाग)

गायत्री-उपासना करने के बाद से मैं अपना आत्मबल पर्याप्त बढ़ा हुआ अनुभव करता हूँ। कैसी भी चिन्ता भरी परिस्थिति में, मेरे चित्त जरा भी क्षुब्ध और उद्विग्न नहीं होता। भयानक से भयानक परिस्थितियाँ जीवन में उपस्थित होकर अनायास ही उसका शमन भी हो जाता है।

मन और शरीर में स्फूर्ति, बढ़ती हुई अनुभव करता हूँ।

परीक्षा में उत्तीर्ण होता गया। (श्री सुदर्शन गुप्त, कोटा)

मैंने जब से गायत्री माता का आँचल पकड़ा, तब से बराबर ही मुझे संकट के अवसर पर सहायता मिलती गयी है। बुद्धि भी पहले की अपेक्षा अधिक तीव्र हो गयी हैं। मेरे कुविचार क्रमशः दूर होकर विनष्ट हो गये है। जब नहीं कक्षा में अनुत्तीर्ण होकर घर में सभी की उपेक्षा का पात्र बना तो मेरा उत्साह टूट गया। आगे पढ़ने की हिम्मत नहीं होती थी, पर गायत्री-उपासना करते ही मुझ में उत्साह की बाढ़ आ गयी और पढ़कर परीक्षा दी। अच्छे नंबरों से पास हुआ परीक्षा के प्रथम मैं विशेष रूप से उपासना में संलग्न रहा था। इसी भाँति माता की कृपा के बल से दसवीं-ग्यारहवीं कक्षा भी पास कर आज बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा हूँ। प्रत्येक बार अच्छी तरह पास होते रहने के कारण अब घर में भी मेरा सम्मान बढ़ गया है। माता की कृपा से पढ़ना भी मेरे लिये सुन्दर और सरस हो गया है। चारों ओर मुझे माता की सहायता के हाथ दिखाई देते हैं।

माता का साक्षात् दर्शन (श्री चन्द्रपाल सिंह, अलीगढ़)

करुणामयी माता। उपासना को छोड़ते ही प्रेतों के उपद्रव खड़े हो गये। आधा भाद्रपद तक मेरी पत्नी को पर्याप्त कष्ट पहुँचाया गया। बन्धु दलवीर सिंह जी की प्रेरणा से पुनः गायत्री- उपासना प्रारम्भ किया। दो तीन दिन के उपरान्त ही आश्चर्य पूर्ण दृश्य देखा। मैं जिस छत पर सोता था, उस पर रात में कभी-कभी मनुष्य की साक्षात् मूर्ति मुझे दिखाई देती। मैं उसे बुलाता तो उत्तर में वह कहता- अब में नहीं आ सकता।

एक दिन रात में मैं अपनी पत्नी को छत पर अकेली सोयी छोड़कर किसी कार्यवश नीचे उतरा, मुझे वापस आने में कुछ देरी हुई। इतने में उसने स्पष्ट सुना, देखो, तुम्हें अकेली छोड़कर चला गया है। उसने आंखें खोली तो देखा- सिरहाने की ओर एक दिव्य मातृ मूर्ति-खड़ी है। उसके एक हाथ में शंख है और दूसरे में कमण्डल उज्ज्वल गौर अंग से जैसे ज्योति निकल रही हो। प्रेत की कल्पना से वह भयाकुल हो उठी। उसी समय माता ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा- बेटी ! कोई भय नहीं, अब तो मैं तुम्हारी रक्षिका हूँ। कोई तुम्हें अब नहीं सता सकता। उसी समय मैं आ रहा था। माँ तिरोहित हो गयी। अब मेरी पत्नी भी मुग्धभाव से नित्य पंचाक्षरी गायत्री का जप करती है। भूत प्रेत कभी नहीं दिख पड़ता है। हम दंपत्ति नित्य माता के चरणों में फूलों से पूजा करते हैं।

शारीरिक आर्थिक एवं आत्मिक लाभ (श्री होतीलाल शर्मा, अलीगढ़)

आज माता की कृपा का बखान करने की इच्छा से, मेरे सामने जीवन के वे सारे शारीरिक आर्थिक एवं मानसिक कष्टों के अतीत-दारुण चित्र सामने में प्रत्यक्षवत् प्रतीत हो रहे हैं। मेरे जीवन के विकास काल में ही मुझे प्यार करने वाले ताऊजी एवं पिताजी की एक-एक कर मृत्यु हो गयी। मेरा एक छोटा भाई था, वह भी काल कवलित हो गया। केवल मैं एक छोटा भाई और मेरी माता अनाथ बनकर दुख भोगने के लिये रह गयी। सबों ने स्वर से कहा- इसका सुन्दर परिवार एकबारगी ही नष्ट हो गया।

यज्ञोपवीत संस्कार के समय ही मेरे ताऊजी ने कहा था “गायत्री माता की शरण लेने के मनुष्य साँसारिक जीवन को सुख पूर्वक बिताकर अन्त में भी शाँति प्राप्त करते हैं।” यह पुनीत वाणी शैशव के कोमल-हृदय में अमर भाव से बस गयी थी, और तभी से मैं गायत्री उपासना करने लगा था। पिता-ताऊ एवं भाई की मृत्यु की सूचना मुझे पूर्व ही माता ने खड़ी होकर मुझे सुना दी थी, साथ ही कष्ट दूर होने का आश्वासन भी दिया था। इसके उपरान्त छोटे भाई की मृत्यु हो गयी। जीविका की कोई सुस्थिर-अवस्था नहीं रहने के लिये भोजन भी भार स्वरूप हो गया। शरीर भी शीर्ण हो गया, पर उपासना करते ही रहा। आज माता के प्रसाद से अनायास ही हम सभी भाँति सुखी-स्वस्थ, और प्रसन्न है।

गायत्री उपासना से बेकारी दूर हुई (श्री महावीर प्रसाद शर्मा, पिड़ावा, झालावाड़)

मैं मैट्रिक में प्रथम तथा इण्टर में द्वितीय श्रेणी में पास हुआ, पर गायत्री मन्त्र का शुद्ध उच्चारण करने में असमर्थ रहा। विद्यालय के वातावरण में रह कर मैं नास्तिक बन रहा था, शायद इसी पाप से मेरी ऐसी दशा थी। इंटर के आगे पढ़ने की आर्थिक स्थिति नहीं थी, अतः विवशता पूर्वक पढ़ना छोड़ दिया। चार पाँच महीने तक बेकार बन कर भटकता सा रहा। माता की कृपा से ही इस बीच मुझे एक ऐसे साथी मिले, जो गायत्री उपासक थे। उनके सत्संग के प्रभाव से न जाने कब मेरा नास्तिकपना दूर हो गया और मैं भी गायत्री माता की उपासना करने लगा। झालावाड़ में अध्यापक पद के लिये “इन्टरव्यू” हुआ। मैं भी गया। कुछ दिन उपरान्त उसका परिणाम निकला ! सभी मिडिल पास वालों को अध्यापकपद की नियुक्ति के पत्र आ गये और मुझ इंटर पास वाले का कहीं पता नहीं। इसी बीच कुवार की नवरात्रि का अवसर आया और मैंने अनुष्ठान व्रत लिया। भक्तिपूर्वक लघु-अनुष्ठान पूर्ण किया। इसके कुछ ही दिन बाद, मेरा मनचाहा मैट्रिक ग्रेड तथा पिड़ावा मिडिल स्कूल का अध्यापक होने का नियुक्ति पत्र आ गया।

मेरे प्रारम्भ के संकट काल अभी शेष नहीं हुए थे। सहसा ही मुझे ऐसे पत्र अधिकारियों की ओर से मिले, जिसमें मेरी नौकरी समाप्त होने की सूचना थी। ग्रीष्मावकाश सामने था। मैं निराशा सहित घर आया और अवकाशोपरान्त धड़कते दिल से पुनः विद्यालय आकर पढ़ाना प्रारम्भ किया। सिवाय गायत्री माता के और किसी से प्रार्थना नहीं की और आश्चर्य कि स्वभावतः ही सरकार ने मेरी नौकरी भी सुस्थिर कर दी और ग्रीष्मावकाश का वेतन भी भेज दिया। ऐसी ममता सिवाय माता के और कौन कर सकती है?

ब्रजधाम निवास की प्राप्ति (श्री नगीनदास ठाकुरदास शाह बुरहानपुर)

मेरे मन में बहुत दिनों से लालसा थी, कि जिस भूमि को भगवान ने अपनी साक्षात् उपस्थिति से, अपनी पावन लीला से पवित्र किया है, उसका दर्शन करूं और सौभाग्य हो तो वहाँ कुछ दिन निवास भी करूं, पर इसकी पूर्ति का हमारे पास कोई भी उपाय नहीं था।

अचानक एक दिन गुजराती भाषा में डॉ. गणपति सिंह जी लिखित ‘गायत्री महिमा’ नामक पुस्तक पढ़ी। फिर इस मंत्र की अधिक महिमा जानने के लिये व्यग्रता हुई और “अखण्ड-ज्योति” मथुरा का पता लगा। वहाँ से पत्रिका मंगायी-पुनः गायत्री साहित्य मंगाकर अध्ययन किया। इससे गायत्री उपासना पर मेरी श्रद्धा दृढ़ हो गयी और नित्य गायत्री जप करने लगा।

सहसा ही गायत्री माता की कृपा से मेरे जीवन में ऐसा अवसर उपस्थित हुआ, मुझे मथुरा आना पड़ा। मैं प्रसन्नता से फूला नहीं समाता था। मथुरा स्टेशन पर उतरा और गायत्री तपोभूमि आकर मातृ मूर्ति एवं गुरुदेव का दर्शन किया। दो दिन तक वहीं निवास किया। प्रातः ही यमुना जी में स्नान कर उसी पवित्र किनारे पर जप कर लिया करता। फिर गुरुदेव के आदेशानुसार वृंदावन आया और सभी मन्दिरों में घूम-घूम कर पावन प्रतिमा का दर्शन किया। फिर वहीं एक धनी सेठ के यहाँ अनायास मुझे नौकरी भी लग गयी, फिर छः महीने तक वृंदावन-धाम में रह कर, नित्य यमुना स्नान कर माधूरी-मूर्ति की उपासना करता रहा।

आषाढ़ मास की पूर्णिमा में गोवर्द्धन परिक्रमा की। इसी भाँति ब्रजधाम की सारी लीला-शोभा देखी। फिर गायत्री-तपोभूमि आकर दो दिन ठहरा सारी ब्रजभूमि को भली भाँति देख भाल कर गुरु देव के आदेश से घर चला आया। आज घर में रह कर ही गायत्री-उपासना करता हूँ और जीवन में चारों ओर सुख-शाँति ही मुझे नजर आती है।

असाध्य सूजन तीन घन्टे में आराम (ठा. महेन्द्रसिंह सरवन)

मेरी पुत्री चि. चितरंजन कुमारी अहीमा गाँव के राजकुमार से ब्याही है। उसके एक दो साल का पुत्र है। एक दिन अकस्मात ही उस बालक के सारे शरीर में फोड़े निकल आये। वे निकलते तथा कुछ समय बाद पानी के बुलबुले की भाँति क्षण में फूट जाते, ऐसी स्थिति प्रायः 15 दिन रही और एक दिन अचानक एक पाँव खूब सूज गया। सूजन धीरे-2 पेट की ओर बढ़ने लगा। विशेष शोध तथा कमजोरी के कारण, ज्वर भी पराकाष्ठा को पहुँच चुका था।

वर्षा ऋतु थी। पानी खूब पड़ रहा था। गाँव में वैद्य या डाक्टर का कोई प्रबन्धन होने से गाँव के कुछ अनुभवी व्यक्तियों का बताया हुआ उपचार किया गया, किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। पुत्री की सास ने तो साफ कह दिया कि यह “रतवा” है- असाध्य रोग है। बच्चा किसी भी भाँति बच नहीं सकता। उनके भी दो बच्चे इसी रोग से मर चुके है। यानी कहने का अभिप्रायः यह था कि उपचार करना वृथा है, अब केवल भगवान के भरोसे रहना ठीक है। पुत्री ने पहले तो मुझे बुलाने को सोच लिया था, किन्तु अपनी सास के शब्दों से, मेरा विचार छोड़, माँ गायत्री की शरण ली। अनेकों प्रकार से प्रार्थना आरम्भ कर दी, साथ ही साथ गायत्री मंत्र का जप करती गई और उस शोथ वाले हिस्से पर हाथ ऊपर से नीचे की ओर फिराती रही। भला, ऐसी आर्त्त-पुकार पर ‘माँ-गायत्री’ कैसे विद्रवित न होती? शीघ्र आ पहुँची और अपने बृहद् द्वारा केवल दो तीन घन्टे में सारी सूजन उतार दी। बुखार, कमजोरी, पाँव का कंपन तथा असह्य दर्द उसी क्षण दूर हो गया। आँखों में प्रेमाश्रु भरे जो पत्र मुझे पुत्री ने लिखा था, उसमें गायत्री माता की करुणा के सागर में, कृतज्ञता की अनन्त उर्म्मियाँ लहरा रही थी।

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