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Magazine - Year 1955 - Version 2

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अरे-इस आसुरी संस्कृति को रोको!!

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हम देखते हैं कि भारतीय संस्कृति तेजी से दुर्बल हो रही है। उसका विकास शोचनीय रूप अवरुद्ध हो रहा है। लोग आत्म शान्ति की, धर्म संचय की कर्तव्य पालन की बात नहीं सोचते, उनके मस्तिष्कों में इस दैवी संस्कृति के लिए बहुत थोड़ा स्थान रह गया है। इन बातों को जीभ के अग्रभाग से, दूसरों की दृष्टि में अपनी महत्ता बढ़ाने के लिए तो लोग कहते हैं पर उनका विचार इन तथ्यों को स्वयं अपनाने का, अपने जीवन में उतारने का नहीं होता। तप, त्याग, संयम, सत्य, प्रेम, न्याय, सेवा, प्रभृति सत प्रवृत्तियों में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने वाले कोई विरले ही दीखते हैं। इस प्रकार लगाता है कि भारतीय संस्कृति दैवी सभ्यता नष्ट होती हुई चली जा रही है।

दूसरी ओर आसुरी संस्कृति का विकास प्रौढ़ अवस्था में पहुंचता जा रहा है। विलासिता, दिखावट, शेखीखोरी, ठाटबाट, ऐंठ, अकड़, अहंकार इन्द्रिय लिप्सा, असंयम, उच्छृंखलता, असहिष्णुता, स्वार्थ परता, अनैतिकता, कृतघ्नता, छल, कपट, विश्वासघात मस्तिष्कों में मजबूती से अपने घोंसले बना रहे हैं। अब लोगों का दृष्टि कोण यह हो रहा है कि उन्हें अधिक से अधिक धन प्राप्त होना चाहिए। विलासिता के अधिकतम साधन उनके पास हों, अहंकार प्रदर्शन की अधिक ऊँची सुविधा उन्हें प्राप्त हो। न्याय अन्याय के झंझट में न पड़कर लोग ‘किसी भी प्रकार’ ज्यादा से ज्यादा पैसा बटोरने की धुन में मस्त हैं- मनोवांछित मात्रा में धनी तो कोई विरला ही वन पाता है पर दौड़ सभी की इसी दिशा में है। नर-नारी के बीच जो पुत्री-भगिनी और माता के पवित्र सम्बन्ध रहने चाहिए सो दीवार तेजी से टूट रही है। एक दूसरे को कामुकता की दृष्टि से देखकर अपनी नीच वृत्तियों को तृप्त करके प्रसन्न होना चाहते हैं। युवा नारियों के अधनंगे चित्र, घर-घर में लटकते दीखते हैं, सिनेमा में यही सब देखने लोग जाते हैं, साधारण जीवन में भी लोगों की आँखें नारी को दूषित दृष्टि से देखने में ही अधिक रस लेती हैं। धन संग्रह के लिए मनुष्य नीच से नीच, घृणित से घृणित, कुकर्म करने में नहीं चूकते। चोरी, छल, लूट, डकैती, हत्या, विश्वासघात, रिश्वत, रस में विष की मिलावट, आदि कोई भी दुष्कर्म ऐसा नहीं जिसे करने में लोग हिचकिचायें। इस प्रकार काम और लोभ का सूक्ष्म साम्राज्य तेजी से बाढ़ के पानी की तरह बढ़ता चला आ रहा है।

क्रोध का कुछ ठिकाना नहीं। उदारता, क्षरा सहिष्णुता समन्वय, धैर्य, प्रतीक्षा, गम खाना के तथ्यों को भुलाया सा जा रहा है। जरा - जरा सी बात पर लोग आग बबूला हो जाते हैं और छोटे से मतभेद को शत्रुता में परिणत करके जान के ग्राहक तक बन जाते हैं नृशंस हत्याओं और रोमाँचकारी आत्म हत्याओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आज जो लोग मित्र बने फिरते हैं, कल ही उनका जानी दुश्मन बन जाना कुछ भी असम्भव नहीं । अपने मन से भिन्न विचार रखने वाले या भिन्न कार्य करने वालों को लोग शत्रु से कम नहीं मानते । अध्यापकों, गुरुजनों, माता-पिताओं, पथ-प्रदर्शकों तक के प्रति उनके त्याग के लिए कृतज्ञता रखने की अपेक्षा अवज्ञा, उच्छृंखलता प्रतिशोध, एवं कृतघ्नता के दुष्ट व्यवहारों का नमूना हर जगह देखा जा सकता है । जन साधारण में उस जरासी बात पर गाली-गलौज , हाथापाई, फौजदारी , खून-खराबी, शत्रुता की प्रवृत्ति का बढ़ना यह बनाता है कि हवा का रुख किधर है। आसुरी सभ्यता में क्रोध का महत्वपूर्ण स्थान है।

अहंकार या क्या ठिकाना है? बुद्धि में, योग्यता में, हर आदमी अपने आपको दूसरों से असंख्य गुना बढ़कर मानता है नम्रता है। नम्रता, शिष्टाचार, विनय, उदारता, स्नेह-सौजन्य, सौहाद्रादि भरा व्यवहार दूसरों से करके उनका हृदय जीतने को कौन तैयार होता है । ऐंठ, अकड़, उपेक्षा, अनुदारता का अपने बड़े आदमी होने का अपने वैभव, अधिकार बल पद आदि का प्रदर्शन करके अपने बड़प्पन का आतंक एक दूसरों पर जमाना चाहते हैं । सरकारी अफसरों, अमीरों, स्वाधीशों, विद्वानों, अभिचारियों एवं तथा कथित बड़े आदमियों में यह अहंकारी की प्रवृत्ति कहीं भी आसानी से देखी जा सकती है। दूसरों के मुकाबले अपनी हेठी कराने को कोई तैयार नहीं, हर आदमी गुणों में नहीं, अहंकारों में दूसरों से बढ़कर रहना चाहता है। इस प्रकार अहंकार की प्रवृत्ति भी किसी से पीछे नहीं हैं। इस प्रवृत्ति के पोषण के लिए लोग विवाह-शादियों में मृत-भोजों में तथा ऐसे ही अन्य प्रदर्शनात्मक अवसरों पर, शेखीखोरी भरा अपव्यय करके पीछे दुख पाते देखे जाते हैं। अहंकार के बाद मोह का नम्बर हैं। मेरे पन का, ममता का, संकीर्ण और स्वार्थ पूर्ण भाव, लोगों में दिन-दिन बढ़ता जाता है। प्राचीन काल में अपने परिवार की सेवा एवं जिम्मेदारी से निवृत्त होकर लोग संसार-सेवा के लिए थे। आज बुड्ढा-घर में गालियाँ खाता है हुआ भी नाता-पोतों के मोह में ऐसा जकड़ा रहता है जैसे खजाने की रखवाली के लिए सर्प कुण्डली भर कर बैठता है। अपने पास आवश्यकता से अधिक वस्तु है तो उसे अधिक उपयोगी कार्यों के लिए देने की कोई इच्छा नहीं करता, वरन् अपने अधिकार की स्वामित्व की चीतों को दिन-दिन बढ़ाने की ही इच्छा करता रहता है। यदि किसी व्यक्ति को सन्तान नहीं है तो वह अपने बाद अपनी सम्पत्ति को किसी लोकहित के कार्य में लगा देने की बात नहीं सोचता वरन् अपने धन दौलत के अतिरिक्त एक मुफ्त का लड़का और गोद घर कर अपने जायदाद में एक लड़के की वृद्धि करना चाहता है मोह जनित तृष्णाओं का कोई वारापार नहीं लोगों की बहुमूल्य शक्तियाँ, योग्यताएं और संपदाएं-इस मोह ममता के जेल खाने में पड़ी-पड़ी सड़ती रहती हैं उनका लाभ न वे स्वयं उठा पाते हैं और न दूसरों का उठाने देते हैं मोह का जाल ऐसा ही विकट है।

काम , क्रोध, मोह , लोभ, मद, मत्सर प्रभूति आसुरी सम्पत्तियाँ संसार में जब बढ़ती है ता उसके फलस्वरूप अशान्ति-क्लेश, कलह, संघर्ष, ईर्ष्या, द्वेष रोग, शोक अभाव, कष्ट, चिन्ता भय आदि नाना प्रकार के कष्टों का प्रादुर्भाव होता है। जिस प्रकार सर्दी से पानी जमकर बर्फ हो जाता है और गर्मी से गरम होकर खौलने लगता है उसी प्रकार दैवी संस्कृति बढ़ने से संसार की समस्त परिस्थितियाँ सुख-शान्ति मय, आनन्द और उल्लास भरी, सम्पत्ति और समृद्धि से परिपूर्ण बन जाती है और आसुरी सभ्यता बढ़ते ही संसार का सारा वातावरण विक्षुब्ध होकर सभी के लिए घोर कष्ट कारक बन जाता है। हमारे सामूहिक दुष्कर्म वर्षा, बाढ़, युद्ध भूकम्प, महामारी आदि दैवी प्रकोपों के रूप में सर्वत्र देखे जा सकते हैं। लोग कुछ धन, विलास साधन, अधिकार एवं वाहवाही प्राप्त तो कर लेते हैं पर उससे लाभ तनिक भी नहीं उठा पाते, उलटे यह प्राप्त हुई वस्तुएं ही उनके लिए एक जंजाल बन जाती है। मिट्टी के तेल के बर्तन में दूध दुहने पर वह दूध पीने लायक नहीं रहता, इसी प्रकार बुरे साधनों से प्राप्त की हुई सुख सामग्री देखने दिखाने तक के लिए ही आनंद दायक होती है, उसका स्वामी वस्तुतः उससे सच्चा सुख कदापि प्राप्त नहीं कर सकता। कहीं से भगाई हुई स्त्री को जबरदस्ती कर में डाल कर दुराचारी उससे काम सेवन कर सकता है पर विवाहित धर्मपत्नी के समान दाम्पत्य सुख की प्राप्ति उससे नहीं हो सकती। यही बात अनीति उपार्जित सुख-साधनों के सम्बन्ध में हैं।

आज चारों ओर “उन्नति” की घुड़-दौड़ लगी हुई है। धन में, विज्ञान में, वैभव में, शिक्षा में, विस्तार में, कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। यह “उन्नति” हो भी रही है पर इससे सुख शान्ति में रत्ती भर भी वृद्धि नहीं हो रही है। वरन् इस भौतिक सुख साधनों की उन्नति के साथ-साथ उसी मात्रा में क्लेश, कलह, रोग, शोक, भय, चिन्ता, द्वेप आदि की वृद्धि भी हो रही है। प्राचीन काल में आज की अपेक्षा लोग गरीब थे, पर वे अब के लोगों की अपेक्षा बहुत अधिक सुखी थे। कारण यह है कि सुख शान्ति का केवल भौतिक सामग्री से जितना सम्बन्ध है, उसकी अपेक्षा कहीं अधिक संबंध मानसिक स्थिति से हैं। जिसका मन, पाप, द्वेष, दुर्भाव, दुर्गुण, दुःस्वभाव, दुर्भावना का शिकार हो रहा है उसे बड़ी से बड़ी सम्पदा भी सुखी नहीं बना सकती-वह सदा दुःखी ही रहेगा, इसके विपरीत जिसकी मानसिक पृष्ठभूमि सद्गुणों, सद्भावों, सद्विचारों, सत्कार्यों में निमग्न रहती है वह गरीब रहते हुए भी आनन्दमय जीवन व्यतीत कर सकता है।

सुख शान्ति के मूल स्रोत को हमारे दूरदर्शी पूर्वजों ने बड़ी खोज करके प्राप्त किया था उन महान वैज्ञानिकों ने पता लगा था कि मन की स्थिति ही मानव जीवन की सुख शांति का मूल आधार है। इसलिए उन्होंने सबसे अधिक इस बात पर ध्यान किया कि जीवन यापन की एक ऐसी पद्धति बनाई जाय जिसके साँचे में ढल कर इंसान-सच्चा इंसान बन सके। पग पग पर ऐसे नियम, विधान, कार्यक्रम , आयोजन, प्रतिबन्ध, उत्सव, कर्मकाण्ड, विचार, दृष्टिकोण, प्रदर्शन, प्रण, व्रत, पर्व, उपस्थित किये, जिन की प्रेरणा बार-बार मनुष्य को मिलती रहे और वह मनोभूमि को दिव्यता की ओर झुकाये रह सके। यही भारतीय संस्कृति है। भारतीय संस्कृति के आचार, विचार, दर्शन, दृष्टिकोण, शास्त्र, व्रत, उत्सव, पर्व, त्यौहार, रीति, रिवाज, यज्ञोपवीत, विवाह आदि सोलह संस्कार, पूजा, पाठ, तीर्थ, कथा, कीर्तन, कर्म-काण्ड, आहार, विहार, वेष-भूषा, भाव, रहन, सहन सब कुछ इसी तथ्य के पोषण के लिए हैं कि-‘मनुष्य अपने तईं कठोर और दूसरों के तईं उदार बने। सुख की खोज विलासिता में नहीं वरन् आन्तरिक महानता में करें।”

इन थोड़ी पंक्तियों में तो सम्भव नहीं है पर अगले अंकों में हम पाठकों को यह बतायेंगे कि हिन्दू धर्म के इतने विशाल ढाँचे की एक एक ईंट से रचना किस उद्देश्य से किस प्रकार, किस योजना के आधार पर की गई है। भारतीय संस्कृति-विशुद्ध रूप से दैवी संस्कृति आदर्श ऐसा है जिससे प्रभावित जन-समाज विश्व मानवता का एक श्रेष्ठ नागरिक ही सिद्ध हो सकता है। एक एक त्यौहार में एक एक संस्कार में, एक एक रीति रिवाज में, एक एक कर्म काण्ड में मनोविज्ञान, पदार्थ विज्ञान, समाज विज्ञान के अत्यन्त ही महत्व पूर्ण सिद्धान्तों का समावेश हुआ है और उन्हें इसीलिये बनाया गया है कि मनुष्य सच्चा मनुष्य बनकर व्यक्तिगत और सार्वजनिक सुख शाँति की रक्षा तथा वृद्धि करे।

इस प्रकार की लेख माला अखण्ड ज्योति में आरम्भ की जायगी और भारतीय संस्कृति की महानता का रहस्य उपस्थित किया जायगा।

जब संसार में भारतीय संस्कृति-दैवी सभ्यता-फैली हुई थी तब विश्व में सर्वत्र सुख शांति का साम्राज्य था। संसार भर में उसे बड़े आदर पूर्वक अपनाया गया था ओर इस संस्कृति के आविष्कार में हमारे पूर्वजों को चक्रवर्ती शासक जगत गुरु तैंतीस कोटि देवों के रूप में स्वीकार किया था। उस महान् संस्कृति की उद्गम भूमि को देव भूमि कहा गया था। सचमुच में हमारा यह देश स्वर्गलोक बना हुआ था, यहाँ के तैंतीस कोटि निवास देवता ही माने जाते थे और उनकी सर्वत्र पूजा होती थी। आज उस संस्कृति का परित्याग कर देने पर, हम देवता नहीं रहे। तैंतीस कोटि से बढ़कर जन संख्या तो छत्तीस सैंतीस करोड़ हो गई है तैंतीस कोटि देवताओं की चिन्ह पूजा भी होती है, पर वस्तुतः देवत्व गायब हो गया। अब तो आसुरी संस्कृति की मदिरा को पीकर मदोन्मत्त असुर ही चारों ओर नाचते दीखते हैं।

दैवी सम्पत्ति को परास्त करके आसुरी सम्पत्ति तेजी से बढ़ती चली आ रही हैं। उसकी साम्राज्य ध्वजाएं बढ़ती आ रही हैं, विजय दुन्दुभी बज रही है। फल स्वरूप, घर घर में, मन मन में, महाभारत की सी स्थिति उत्पन्न हो रही है। अमेरिका और रूस जिन दाव पेंचों से लड़ रहे हैं, छोटे छोटे रूप में भाई भाई में, पड़ौसी पड़ौसी में, घर घर में वे ही दाव-पेंच चल रहे हैं और सर्वत्र भय आशंका अविश्वास, द्वेष और तृष्णा का दावानल जल रहा है। यह दावानल यदि इसी रूप में बढ़ता रहा तो मनुष्य को सिंह, भेड़िया, सर्प, बिच्छू आदि की श्रेणी में जा खड़ा करेगा और 56 कोटि यादवों की भाँति आपस में ही लड़ मर सब नष्ट हे जायेंगे। सामूहिक आत्मघात के लिये जो उद्विजन बम बन रहें हैं उनका प्रयोग होकर ही रहेगा यदि यह आसुरी संस्कृति इसी प्रकार पनपती रही तो होकर ही रहेगा।

खतरा बढ़ रहा है। संकट की घड़ी दूर नहीं है। मानव सभ्यता का दीवारें गिरना ही चाहती यदि यह क्रम चलता रहा तो नैतिकता के आदर्श नष्ट हो जायेंगे और मनुष्य एक दूसरे को फाड़ खाने वाले भेड़िये मात्र रह जायेंगे। जिन्हें देवतत्व के प्रति मानवीय सहायता के प्रति कुछ आस्था, श्रद्धा और ममता है उनके लिए अब परीक्षा की निर्णायक घड़ी आ पहुँची है। वे निरपेक्ष दर्शक की तरह एक किनारे पर खड़े दैवी संस्कृति का अधः पतन और आसुरी संस्कृति का विजय-घोष देख सुन न सकेंगे। उन्हें कुछ करना होगा। ईश्वर ने उपयुक्त अवसरों पर उपयोग करने के लिए हमें जो बल, साहस, विवेक और पुरुषार्थ दिया है उसका सर्वोत्तम उपयोग करने का यही समय है। राजा की दी हुई बन्दूक को जो सिपाही ठीक अवसर पर नहीं चलाता वह कर्तव्य घात का अपराधी होता है। नैतिक पुनरुत्थान की नींव को मजबूत करने के लिए, मानवता के आदर्शों की हिलती हुई दीवारों को पुनः जमा देने के लिए हम में से अनेकों को ईंट चूना बनना पड़ेगा। ऋषियों की आत्माएं स्वर्ग लोक से निहार रही हैं और देख रही है कि उनकी लाखों वर्षों की कमाई की रक्षा करने के लिए उसकी सन्तान में कुछ दम रह गया है या नहीं! सत्यानाशी आसुरी संस्कृति को रोकने के चट्टान की तरह हम अड़ जावें, मुरझाती हुई दैवी संस्कृति को सींचने के लिए हम अपना पसीना ही रस रक्त भी निचोड़ दें यह समय की, सभ्यता की प्रकार है-आइये इस चुनौती को स्वीकार करें।

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