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Magazine - Year 1959 - October 1959

Media: TEXT
Language: HINDI
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देवत्व की ओर बढ़ने का साधन-सतोगुण

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(डॉ चमनलाल गौतम)

धर्मशास्त्रों में सृष्टि के विकास का जो विवरण दिया है, उसमें बतलाया गया है कि संसार में सर्वप्रथम खनिज द्रव्य, पत्थर आदि का प्रादुर्भाव हुआ, उसके बाद वनस्पति, पेड़ पौधे आदि उत्पन्न हुए, फिर पशु-वर्ग और अंत में मनुष्यों का आविर्भाव हुआ। विचारकों का मत है कि अभी मनुष्य में मनुष्यत्व के गुणों का विकास थोड़ी ही मात्रा में हुआ है, जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा उसकी मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियां बढ़ती जायेंगी। इसका परिणाम यह होगा कि कुछ हजार वर्ष बाद पृथ्वी पर जो मनुष्य पाये जायेंगे वे आजकल के मुकाबले में ‘देव कहलाने योग्य होंगे। संसार के विकास क्रम में वैसे सैकड़ों सीढ़ियाँ हैं, पर उसके मुख्य विभाग में पाँच ही समझनी चाहिए।

सृष्टि का एक नियम यह भी है कि कोई पदार्थ या प्राणी किसी भी श्रेणी अथवा अवस्था में क्यों न दिखलाई पड़े, पर उसमें अन्य सब श्रेणियों के गुण और विशेषताएं बीज रूप में निहित रहती हैं। यही कारण कि सच्चे आत्मदर्शी व्यक्तियों की दृष्टि में एक छोटे-छोटे कीड़े में भी परमात्मा का अस्तित्व स्पष्ट दिखलाई पड़ता है और वे नीच से नीच चांडाल को पवित्र से पवित्र ब्राह्मण के तुल्य मानते हैं। यही कारण है वेदान्त सिद्धाँत के अनुसार इस संसार में सिवाय ब्रह्म के और कोई तत्व नहीं है। इसका एक-एक अणु परमात्मा का ही अंश है और अंत में उसी में जाकर लय होगा। बीच की अवस्था में जितना भी अंतर दिखलाई पड़ता है वह प्रकृति का विकार है।

ऊपर जीव तत्व के विकास के संबंध में जिन पाँच श्रेणियों का जिक्र किया गया है उनके संबंध में भी यही नियम लागू है, अर्थात् प्रत्येक श्रेणी में अन्य श्रेणियों के भी गुण रहते हैं। इतना ही नहीं प्रत्येक श्रेणी में कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें अपनी से भिन्न श्रेणी की विशेषताएं ही अधिक दिखलाई पड़ती हैं। यह बात मनुष्य पर विशेष लागू होती हैं क्योंकि इसमें चेतना शक्ति का विकास ऐसे ढंग से हुआ है कि वह अपने में इच्छानुसार अनेक प्रकार के भले अथवा बुरे परिवर्तन कर सकता है। इसी तथ्य को दृष्टि गोचर रख कर एक विद्वान ने मनुष्य को पाँच श्रेणियों में बाँट कर उनकी पहिचान और विशेषताओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। साराँश रूप में उन पाँचों का परिचय इस प्रकार है।

(1) प्रथम श्रेणी में वे बहुत अल्प विकास वाले व्यक्ति आते हैं जिनका दायरा केवल अपने स्थूल शरीर तक ही सीमित रहता है। इन लोगों को केवल अपने खाने, पीने आदि का ख्याल रहता है। अपने सिवाय वे संसार में किसी की आवश्यकता को नहीं समझते, चाहे वह उनका निजी से निजी संबंधी ही क्यों न हो। इन पेट-पालू लोगों को खनिज श्रेणी में समझना चाहिए। संसार के अनेकों जंगली, बज्रमूर्ख, पागल और परम स्वार्थी व्यक्ति तो इस श्रेणी में आते ही हैं, पर हम बड़े-बड़े धनकुबेरों, विद्वान पंडितों और साधु महात्माओं को भी इस श्रेणी में रख सकते हैं। यदि वे संसार में दूसरों के भले का ख्याल न करके केवल अपने ही स्वार्थ की पूर्ति में लगे रहते हैं। ऐसे लोग अपने शरीर में अत्यन्त आसक्ति रखते हैं और शरीर के सिवाय उनकी दृष्टि में मनुष्यता, धर्म, आत्मा, परमात्मा का तनिक भी स्थान नहीं होता। इसके परिणामस्वरूप वे संसार के अन्य सब लोगों को विरक्तता और तिरस्कार के भाव से देखते हैं और दूसरे भी उनके प्रति ऐसे ही भाव रखते हैं।

(2) दूसरी तरह के मनुष्य वे होते हैं जिनके विचारों का दायरा पहली श्रेणी वालों से तनिक बड़ा होता है और वे अपने समस्त कार्यों का उद्देश्य अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करना समझते हैं। ये लोग वनस्पति-वर्ग के कहे जा सकते हैं। जिस प्रकार पेड़ अपनी शाखाओं और पत्रों को पोषण पहुँचाता है, उसी प्रकार थे अपने बाल बच्चों का ध्यान रखते हैं, पर अन्य किसी से कोई सरोकार नहीं रखते । अगर अपने परिवार के लाभ के लिए दूसरों को हानि भी पहुँचानी पड़े तो उसमें भी उनका कोई संकोच नहीं होता। जहाँ तक हमारा अनुमान है प्रथम श्रेणी के लोग पाषाणवत् तो संसार में बहुत अधिक नहीं पाये जाते, पर इस दूसरी श्रेणी वालों की संख्या संभवतः सबसे अधिक है। खासकर हमारे देश में ऐसे लोगों की बहुतायत दिखलाई पड़ती है जो अपने ‘बाल-बच्चों’ के सिवाय और किसी के लिए चिंता करना बेकार समझते हैं। ऐसे लोग अपने परिवार के धन, मान, प्रतिष्ठा, उच्चता, कुलीनता आदि का बहुत घमण्ड रखते हैं और अपने संकुचित विचारों के कारण समाज के लिए सर्वथा निरुपयोगी सिद्ध होते हैं।

(3) इससे आगे पशु-वर्ग के लोगों का नंबर आता है जिस प्रकार बंदर, हाथी, हिरण, चींटियाँ, मधुमक्खियाँ समूह बनाकर रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर समूह की रक्षा के लिए मरने कटने को तैयार हो जाते हैं, उसी प्रकार इस तीसरे श्रेणी के व्यक्तियों का विकास इतना हो जाता है कि अपनी जाति या समाज का ख्याल रखते हैं। पर दूसरी जाति या समाज वालों को वे प्रायः विरोधी की दृष्टि से देखते हैं, और उनकी निन्दा, बुराई का एक भी अवसर नहीं जाने देते। इन लोगों को पेट-पालू और कुटुम्ब-पालन लोगों से अधिक विकास वाला समझा जा सकता है, पर जब हमारे साथ में और भी अनेकों जातियों के लोग रहते हैं और जिनसे हमारा बराबर काम पड़ता है। वहाँ केवल अपनी जाति के हित और स्वार्थ पर ही दृष्टि रखना प्रशंसनीय बात नहीं समझी जा सकती।

(4) चौथी श्रेणी में वे लोग आते हैं जिनको हम मनुष्य कहते हैं। वे समझते हैं कि हमने जिस स्थान में जन्म ले लिया है और जहाँ के अन्न-जल से हम जीवन धारण कर रहे हैं वहाँ के सभी निवासी हमारे भाई या साथी हैं और उनका हानि लाभ हमारा ही हानि-लाभ है। वे लोग अपना क्षेत्र समस्त देश को समझते हैं, पर अन्य देश वाले उनकी दृष्टि में ‘विदेशी’ होते हैं। उनके साथ धोखे, चालाकी या शत्रुता का व्यवहार करना वे बुरा नहीं समझते और आवश्यकता हो तो युद्ध करके उनका नाश कर डालना भी अपना कर्तव्य मानते हैं। फिर भी जहाँ पहली तीन श्रेणी वाले केवल अपने को या थोड़े से लोगों को ही अपना मानते हैं, ये करोड़ों देशवासियों को अपना संबंधी या साथी मानते हैं और उनके हित का ख्याल रखते हैं। इस श्रेणी के व्यक्ति राष्ट्रों के नेता, संचालक और रक्षक माने जाते हैं। वर्तमान समय में अधिकाँश लोगों की दृष्टि में मनुष्य का सबसे ऊँचा सम्माननीय दर्जा यही है।

(5) पांचवीं श्रेणी वह है जिसका विकास अभी हुआ नहीं है और जो देश काल की सीमा को त्याग कर मनुष्य मात्रा को अपना समझते हैं और सबके हित का समान रूप से ध्यान रखते हैं। वैसे आदर्श के रूप में पहले अनेकों भारतीय ऋषि मुनि इस श्रेणी के हो चुके हैं और अब भी टॉलस्टाय, गाँधी, रस्किन आदि महानुभाव ऐसे ही विश्व हितैषी हुए हैं। पर इन लोगों की संख्या बहुत ही कम है और सर्वसाधारण उनकी इस विशेषता को भली प्रकार अनुभव भी नहीं करता। इसीलिए हमारा यह कहना कि इस श्रेणी का विकास अभी भविष्य में होना है जब इन विचारों के मनुष्य पर्याप्त संख्या में पायेंगे और उनको आश्चर्य की निगाह से न देखकर वास्तविक मनुष्य ही समझा जायेगा।

यह विचार करना ठीक नहीं कि इनमें किसी भी श्रेणी के व्यक्ति में शतप्रतिशत एक ही प्रकार का विचार पाया जाता है और अन्य सब गुणों से वह सर्वथा होता रहता है। जैसा हम कह चुके हैं यह बात सृष्टि-नियम के विरुद्ध है। इस संबंध में एक विचारक का कथन है कि ‘खनिज वर्ग के लोगों में तमोगुण (जड़ता) की अधिकता रहती है और सतोगुण बहुत ही कम अंश में होता है। ऊपर की श्रेणियों में ज्यों-ज्यों आत्म विकास बढ़ता जाता है उसी के अनुसार उत्तरोत्तर सतोगुण बढ़ता है और तमोगुण कम होता जाता है। परंतु किसी भी गुण का सर्वथा अभाव किसी भी दशा में किसी व्यक्ति में नहीं होता। फलतः निम्न श्रेणी के लोगों में भी तारतम्य से कुछ न कुछ भाव ऊपर की श्रेणियों के अवश्य रहते हैं। इसी प्रकार ऊपर की श्रेणी वालों में भी तारतम्य से निम्न श्रेणियों के भाव रहते हैं। यद्यपि खनिज-वर्ग के देह वालों में विश्व-प्रेम तक के भाव मौजूद तो रहते हैं परंतु वे इतने सत्य और अविकसित होते हैं कि प्रत्यक्ष में प्रतीत नहीं हो सकते। इसी तरह देव वर्ग के महापुरुष भी अपने शरीरों से प्रेम रखते हैं, परंतु उनमें सतोगुण इतना अधिक बढ़ा हुआ रहता है कि किसी शरीर विशेष ही में उनकी आसक्ति नहीं होती। तमोगुण जड़ात्मक है, रजोगुण रागात्मक और क्रियात्मक एवं सतोगुण सुख और ज्ञानात्मक है। सतोगुण से मनुष्य उन्नति करता है और तमोगुण से गिरता है।” गीताकार ने कहा है-

ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्य गुण वृत्तिस्था अधो गच्छन्ति ताम साः॥

अर्थात् सतोगुण का सेवन करने वाले ऊपर को उठते हैं, रजोगुणी बीच में ठहरते हैं और कनिष्ठ तमोगुण का सेवन करने वाले नीचे गिरते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को सात्विक आचरणों से अपने में सतोगुण का विकास करते रहना चाहिए यही अधर्म श्रेणी से निकलकर उच्च श्रेणी में पहुँचने का उपाय है।

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October 1959
Type: TEXT
Language: HINDI
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Version 1
Type: SCAN
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