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Magazine - Year 1959 - October 1959

Media: TEXT
Language: HINDI
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एक साथ चलो, आगे बढ़ो

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(श्री गिरिजा सहाय व्यास)

अश्वमन्वती रीयते संरभघ्वमुत्तिष्ठत प्रतरता सखायः। अत्राजहीमोऽशिवा ये असच्छिवान्वयमुत्तरेमाभिवाजान्

यजु. 35। 10

‘दुख स्वरूप पत्थरों वाले (यह संसार नदी) बह रही है। हे मनुष्यों? परस्पर एक मत होकर एक साथ प्रयत्न करो। उठो? सावधान होकर अच्छी तरह पार करो। जो अमंगलकारी हैं उन्हें यहाँ ही छोड़ दें। (और) कल्याणकारी बातों को, पदार्थों को (ज्ञान को) अपना लक्ष्य बनाकर भली प्रकार उसे तर जाओ।’

उक्त वेद मंत्र में संसार रूपी नदी की विषमता कठिनाई आदि का वर्णन करते हुए मानव को संगठनबद्ध होकर उसे पार करने की प्रेरणा दी गई है। साथ ही विपरीत एवं दूषित तत्वों को छोड़कर कल्याणकारी एवं हितकर तत्वों को अपना कर आगे बढ़ने का आदेश दिया गया है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि यह संसार एक नदी की तरह बह रहा है। जिसमें कठिनाईयाँ, दुख परिस्थितियाँ कुयोग आदि भी पत्थर रूप में बह रहे हैं। जो भी प्राणी इस संसार रूपी नदी में उतरेगा उसे उक्त पत्थरों का सामना करना पड़ेगा। इन कठिनाइयों, दुखों, परेशानियों आदि पत्थरों के प्रवाह का सामना सभी को करना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य को जीवन के प्रारंभ से अंत तक इनके थपेड़े खाने ही पड़ते हैं। मालूम करने पर पता चलेगा कि अधिकाँश व्यक्ति अपने दुखों, कठिनाईयों परेशानियों आदि की शिकायत करते हुए मिलेंगे।

बहुत कम ऐसे होते हैं जो इन्हें सहन करके संसारनद के तीव्र प्रवाह में अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों की संख्या बहुत ही कम होती है। बहुसंख्यक लोग वही होते हैं जो अपना जीवन उक्त पत्थरों के प्रवाह में छोड़ देते हैं अपने जीवन को रोते झींकते और भार ढोने की तरह ही व्यतीत करते हैं इन लोगों का एकाकी प्रयत्न इतना सबल और ठोस नहीं होता कि ये इस संसार रूपी नदी को पार कर सकें। इसी समस्या का समाधान करते हुए वेद भगवान आज्ञा देते हैं कि ‘हे मनुष्यों? एकमत होकर एक साथ उद्योग करो, उठो, सम्हलो और इस नदी को अच्छी तरह पार करो। इस संसार रूपी नदी को पार करने के लिए संगठन की शक्ति निश्चय ही महत्वपूर्ण है। संगठन के लिए सर्वप्रथम हमारा एक मत एवं एक विचारधारा आवश्यक है। जहाँ परस्पर विरोधी विचार होंगे वहाँ संगठन होना असम्भव है। इसीलिए वेद भगवान पहले एक विचार वाले बनने पर जोर दे रहे हैं।

जब एक विचार एक मत स्थिर हो जावें तब संसार नदी में बहते हुए कठिनाई दुख परेशानी, आपत्तियों आदि पत्थरों के प्रवाह से बचने के लिए सामूहिक प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार संगठनात्मक प्रयत्न से दुर्बल, दीन, शक्तिशाली, सभी तरह के व्यक्तियों की हित होता है। संगठन में महान शक्ति होती है।

सामूहिक प्रयत्न भी यदि सुस्ती या आलस्यपूर्ण हों तो सफलता मिलना तो दूर उल्टी अधिक हानि हो जाती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को सावधान होकर, सम्हलकर सचेत होकर विपरीत तत्वों से संरक्षण प्राप्त करने एवं उनकी हानि से बचने के लिए संगठनबद्ध होकर प्रयत्न करना चाहिए। परस्पर सहयोग, सहायता, सहिष्णुता, उपकार की भावनायें, आत्मीयता आदि एक दूसरे को दुखों कठिनाईयों एवं परेशानियों से बचाने के लिए आवश्यक हैं। इसी का निर्देशन उक्त वेद मंत्र में किया गया है। इस प्रकार के प्रयत्नों से परस्पर एक दूसरे को संसार नदी में जीवन पथ पर अग्रसर करने में सहायक हो सकते हैं।

एक मत हो, संगठन हो और सावधानी से आगे बढ़ने के प्रयत्न हों किन्तु यदि विवेक का अवलम्बन न किया जाय अर्थात् अच्छे बुरे की पहचान कर तदनुकूल व्यवहार न हो तो भी मनुष्य को इस संसार नदी में उक्त प्रस्तरों के थपेड़े खाने पड़ते हैं, दुख कठिनाई एवं परेशानियों का शिकार होना ही पड़ता है। इसलिए वेद भगवान आज्ञा देते हैं कि ‘जो अमंगलकारी हैं उनको यहाँ ही छोड़ दें और कल्याणकारी तत्वों को आधार बनाकर उत्तमता से तर जाएं।’

अक्सर विवेक के अभाव में मनुष्य की व्यक्तिगत अथवा सामूहिक शक्ति अनावश्यक एवं अमंगलकारी कार्यों में नष्ट हो जाती है। और परिणाम में दुख कठिनाईयों आदि का सामना करना पड़ता है। अविवेक साँसारिक विषय, भोग, वासनाएं, संग्रह की इच्छा, स्वार्थ आदि को प्रधानता देता है। जिनका परिणाम दुख और कठिनाईयाँ ही है। अतः इनको विवेक की कसौटी पर कसना चाहिए और जो दुखदाई हों, अमंगलकारी हो उन्हें छोड़ देना चाहिए। कल्याणकारी, हितकारी एवं शुभ बातों को अपनाना चाहिए। यही विवेकशीलता है। कुवासनाओं, बुरी भावनाओं, एवं कुकर्मों को त्याग कर महान कल्याणकारी एवं उच्च लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।

उक्त तथ्यों के अनुसार इस संसार में दुखों कठिनाईयों, परेशानियों भय आदि से बचकर सुख शाँति, कल्याणकारी, पवित्र जीवन बिताकर आत्मलक्ष्य प्राप्त करने के लिए संगठित एक विचार सावधान और सचेत होकर एक साथ उद्योग, अमंगलकारी दुखदायी तत्वों को छोड़कर कल्याणकारी पथ को अपना लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना चाहिए। यही वेद भगवान की मानव मात्र के लिए आज्ञा है। यही ईश्वरीय आदेश है जिसका पालन करना प्रत्येक मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है।

जब समाज में इन तत्वों की वृद्धि होती है तभी विकास, उन्नति आदि संभव होते हैं। अतः यदि हमें अपने कदम उन्नति प्रगति एवं उत्थान की ओर बढ़ाने और अपने प्राचीन महान गौरव एवं विशिष्टता को प्राप्त करने के लिए अग्रसर होना है तो उक्त ईश्वरीय आदेश का पालन करना होगा। हम सबको एक विचार, संगठन, सामूहिक प्रयत्न तथा दूषित तत्वों से दूर होकर एक ही राष्ट्रीय भावनाओं के अनुसार अग्रसर होना आज की महान आवश्यकता है। इस पथ को अपनाएं बिना भौतिकता एवं विनाश के प्रवाह में बहते हुए इस विश्व में अपना अस्तित्व कायम रखना असम्भव है। इस पर गंभीरता से विचार कर प्रत्येक भारतीय को तदनुकूल आचरण करना सच्चा धर्म पालन है, ईश्वरीय आदेश एवं वेदाज्ञा का आदर है।

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October 1959
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