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Magazine - Year 1961 - February 1961

Media: TEXT
Language: HINDI
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शान्ति की अनन्त शक्ति

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(संत विनोबा के एक प्रवचन का साराँश)

मनुष्य के हृदय में कितनी शक्ति पड़ी है, इसका भान हमें रोज की प्रार्थना से होता है। यह एक बड़ी शक्ति है। अपने खुद पर काबू रखने की शक्ति से बढ़कर दुनियाँ में दूसरी कोई शक्ति नहीं है। दुनियाँ को जीतने वाले बड़े बहादुर कहलाये, लेकिन अपनी इन्द्रिय तथा मन को जीतने वाले, उनको वश में करने वाले वीर नहीं, महावीर कहलाये। आज दुनिया के देशों के बीच परस्पर सम्बन्ध इतना दृढ़ हो गया है कि किसी देश के मनुष्य की अच्छी कृति सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देश देश में फैल जायेगी और अगर हम अपने पर काबू नहीं रख सकेंगे, कुछ गलत काम कर लेंगे तो वह गलती और वह पाप भी सीमित नहीं रहेगा, व्याप्त हो जायेगा ऐसी हालत में इन्द्रिय निग्रह और मनः संयम का महत्व बहुत बढ़ गया है और हरेक देश के नागरिकों और ग्रामीणों पर व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर बड़ी भारी जिम्मेदारी आती है।

जब मैं शाँति की बात कहता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि समाज में इतने दुख होते हुए भी सहन करते चला जाना, गरीबों के प्रति सहानुभूति नहीं रखना, अड़ोसी-पड़ोसी की परवाह नहीं करना और समस्याओं के हल करने का उपाय नहीं ढूँढ़ना।

यह असम्भव वस्तु है कि समाज में अनेक प्रकार के दुख और विषमता मौजूद होते हुये भी उसके लिए कोई प्रयत्न न करें तो भी समाज में शाँति रहेगी। अगर ऐसा संभव हुआ और बुरी हालत में भी समाज शान्त रहा तो मैं उसे तमोगुणी समाज, जड़ समाज, मानवता से गिरा हुआ समाज कहूँगा। सच्चा देहाती वही है जो खुद शाँत रह कर सारे समाज के दुख निवारण के लिए सतत् प्रयत्न करता रहता है। जो सचमुच में आत्मानुभवी पुरुष होता है वह तो निरन्तर कृति करता रहता है “कहा गया है “वसन्तवल्लोकहितं चरन्तः” वह बसंत ऋतु के समान लोकहित के लिए सतत् कर्म करता रहता है। अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता है। सेवा करने में ही समाधान चाहता है। काल की आकांक्षा नहीं रखता है और सब लोगों के दुख निवारण में मातृवत् वात्सल्य से लगा रहता है। ऐसा जो निरंतर सेवक है, वही निवृत्तमार्गी है, देहाती है। आज हिन्दुस्तान में निवृत्ति का जो गलत अर्थ किया जाता है कि ये सारे सुख-दुख मिथ्या हैं, इसलिए उनकी परवाह क्यों करते हो? हमेशा शाँत रहना चाहिए। यह तो आत्मवंचना है या प्रवंचना निवृत्ति मार्ग के शिरोमणि शंकराचार्य हिन्दुस्तान भर घूमते रहे। गाँव-गाँव और घर-घर जाकर लोगों में ज्ञान बाँटते रहे। इस तरह निरन्तर परिश्रम करके बत्तीस साल की उम्र में वे चले गये।

जहाँ समस्यायें मौजूद हैं ओर उन समस्याओं के निवारण के लिए कोशिश की जा रही है, वहीं पर शाँति की कीमत है। अगर शाँति का अर्थ यह हो कि वर्तमान ढाँचे को रखना, आज के जैसे समाज को कायम रखना तो वह शाँति बिलकुल निकम्मी है। हिन्दुस्तान में इतनी समस्यायें, दुख और विषमताएँ मौजूद हैं, तब भी मैं आपको शाँति रखने के लिए कहता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि आप दुख सहन करते रहें बल्कि उसका अर्थ यह है कि आपको वीर पुरुष के समान उसका मुकाबला करना चाहिये। उन समस्याओं का निवारण शान्ति के तरीके से करना चाहिए और यह दिखा देना चाहिये कि शाँति में शक्ति पड़ी है और उससे समस्यायें हल हो सकती हैं। आज तक तो लोगों ने यही मान रखा है कि अगर शाँति है तो समस्यायें जारी रहती हैं। हल नहीं होतीं और अगर उन्हें हल करने की कोशिश होती है तो खून की नदियों बहती हैं। यह मानना बिलकुल गलत है।

समस्या निवारण के साथ शांति होनी चाहिये, शांति के तरीकों से समस्याओं का हम कहेंगे कि शांति आक्रमण कारी होनी चाहिये। यानी वह शांति किसी एक ह्र्दय के अन्दर छिपी हुई नहीं रहना चाहिए। मेरे नजदिक बैठे हुए किसी मनुष्य को बिच्छू ने काटा और मैं वैसे ही बैठे रहा, मुझे कुछ करने की प्रेरणा नहीं हुई तो वह कोई शांति नही है। यह तो करूणा का अभाव है, निष्ठुरता है, जरा सोचने पर कहेंगे कि यह स्वार्थ है, आलस्य है और आगे बढ़कर मैं कहूँगा कि यह दम्भ है। मुझे दुखियों की सेवा में में दौडज्ञा चाहिए और दौड़ते हुए भी मन में शांति रखनी चाहिए। यही सच्ची शांति होगी।

शांति के तरिके से दुख निवारण की कोशिश करेंगे, समस्यायें हल करेंगे तो हम शांति की शक्ति को प्रकट करेंगे, तप शांति नही है-ऐसी बात नहीं, परन्तु शांति स्वामिनी नहीं है, वह दासी है। आज की समाज रचना में भी कुछ सेवा का काम चलता है, लेकिन बिलकुल गौण रूप से चलता है। इधर लडा़-इर्था चलती है और उधर सेवा शुश्रषा करने वाला दल भी जाता है। उसमेझं दया है, सेवा है लिकिन उस पया में शक्ति नहीं है। यह दया युद्ध-निवारण नहीं कर सकती। वह तो युद्ध का अंग ही है। इस तरह दासी के तौर पर आज भी शांति का, दया का, सेवा का कुछ-काम चलता है। परन्तु हम चाहते है कि शांति, सेवा और दया स्वामिनी के सदृश काम करें, उनका राज्य हो।

बुद्ध भगवान की चालीस उपवास के बाद दर्शन हुआ और उन्होनें देखा कि आसमान में परमेश्वर की करूण फैली हुई है। यह आसमान चुप नहीं बैठता। दिखता तो है बडा़ शांत, लेकिन हमारे लिए पानी बरसाता है, सूरज की किरणें भेऊता है, हवा को इधर से उधर दौडा़ता है। अगर वह यह सब नहीं करता तो हमारी क्या हालत होती? इसलिए इस आकाश को हम परमात्मा का चिन्ह समझेंगे क्योंकि वहों पर अत्यन्त व्यापक करूण फैली है। बुद्ध भगवान को यह दर्शन हुआ। वे निकल पदे़ गाँव-गाँव जाकर वे लोगों की सेवा करते थे, उन्हे उपदेश देते थे।

समाज की समस्यायें अगर शांति से हल होती है तो समाज ऊपर उठता है। समाज को ब्रह्म-दर्शन होता है। फिर समाज में चोरियों और अनेक प्रकार के दुराचार नहीं होते। चोरी और पाप को दूर करने के लिये उपदेश की किताबों कि जरूरत है कि हम अपने को समाज का अंश समझे और अपने में सारे समाज को देखें। जिनकी बुद्धि आत्म विचार में स्थिर हो गैइ है और शरीर निरन्तर सेवा का कार्य करता रहता है, ऐसे व्यक्तियों के कार्य के परिणाम स्वरूप शांति में शक्ति आवेगी और उस शांति से समाज की समस्यायें हल होगी। तो फिर हमें भी मुक्ति मिलेगी और समाज को भी मिक्ति प्राप्त होगी। दुनियाँ में-दूसरे देशों में, अशांति की शक्तियाँ, बढ़ रहि है। एट्म ओर हाइड्रोजनबम धन रहे है लिकिन अशांति की शक्ति, एक दूसरे को अशांत ही बनाती है। दोनों आग जलायें तो दोनों की आग से पानी नही पैदा होता, बल्कि आग बढ़ती है। इसलिए अब दुनियाँ के उन लोगों के मन में भी शङ्का पैदा हो रही है, जो कि अशांति में विश्वास रखते थे। अब वे कहने लगे है कि शन्त्र छोडज्ञे चहिए, शांति की जरूरत है। परन्तु दोनों कहते है कि सामने वाला छोडे़गा तो हम छोडे़गें। अब तक वे ऐसी बाते भी नहीं बोलते थे, लिकिन अब कम से कम आमने-सामने बैठकर बातें तो करते जा रहे हैं, फिर भी हम उन्हें दोष नहीं देते।

आज हम बहुत कमजोर है। फिर भी हम देखते है कि हमारी प्रार्थनायें हररोज सब लोग पाँच मिनट मौन रखते है। यही हमारे देश की शक्ति है, जिसको हम विकसित करना चाहते है, प्रकाशित करना चाहते, उसे बाहर कार्य रूप में लाना चाहते हैं|

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