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Magazine - Year 1961 - February 1961

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Language: HINDI
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प्राचीन भारत का महान् वैज्ञानिक-सिद्ध नागार्जुन

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(श्री भारतीय योगी)

पतंजलि योग दर्शन में बतलाया गया है कि योग कि दिव्य विभूतियों को प्राप्त करने के कई मार्ग हैं। जिस प्रकार षट्चक्रों का बेध करने से, पंचकोशों की साधना करके चेतना के उच्च स्तर पर आरुढ होने से ज्ञानयोग का अभ्यास करके अपने को परमात्मा-स्वरूप अनुभव कर लेने से मनुष्य योग की चमत्कारी सिद्धियों का स्वामी बन सकता है, उसी प्रकार शक्तिशाली जड़ी-बूटियों और औषधियों का प्रयोग करके भी इस कार्य में सफलता प्राप्त की जा सकती है।

भारत के “प्राचीन रस वैद्यों ने पारद के सम्बन्ध में बड़ी खोजबीन की थी। जिस प्रकार आजकल के वैज्ञानिकों ने ‘यूरेनियम’ धातु के प्रयोग से उस ‘अणु शक्ति’ को प्राप्त कर लिया है, जिससे आप चाहे तो संसार की प्रलय कर दें और चाहे इस पृथ्वी को सुवर्ण मंडित बनाकर मनुष्यों को देवताओं के समान अजर-अमर बना दें, उसी प्रकार प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों ने भी पारद के ऊपर प्रयोग करके ऐसी विधियाँ निकाली थीं, जिससे ताँबे का सोना बनाना तो संभव था ही साथ ही मनुष्य अपने भौतिक शरीर को पूर्णतः नहीं तो अधिकाँश में अमर भी बना सकता था। “सत्य हरिश्चन्द्र” नाटक में तंत्र-विद्या के साधक कापालिक ने महाराज हरिश्चन्द्र को “पारद गुटिका” का प्रयोग करने की सम्मति देते हुये कहा था -

याही के पराभव सी, अमर देव सम होय।
योगीराज विहरें सदा, मेरु शिखर भय खोय।।

सिद्ध नागार्जुन भारत वर्ष का इसी श्रेणी का एक महान वैज्ञानिक था। वैसे वह सन् 1055 में सौराष्ट्रार्न्तगत “ढाक” नामक समृद्धिशाली नगर का अधिपति था, पर उसकी रुचि राज्य-शासन की अपेक्षा ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन और खोज की तरफ विशेष रूप से की थी। उसने संसार की कायापलट कर देने के लिए “अमृत” ओर “पारस” की खोज करने का निश्चय किया और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक बड़ी प्रयोगशाला बनाकर जड़ी-बूटियों द्वारा पारद-सम्बन्धी परीक्षण आरम्भ किये। साथ ही देश के विख्यात “रस वैज्ञानिकों” और साधकों को बुलाकर उनका सहयोग भी इस कार्य में प्राप्त किया। अपनी आँतरिक लगन और कठोर साधना के कारण उसे शीघ्र ही आश्चर्यजनक सफलता मिली और किसी घटिया धातु को सोने के रूप में बदल देना उसके लिए साधारण सी बात हो गई। मानवीय देह को अमर बनाने के प्रयत्न में भी वह बहुत कुछ सफल हुआ। उसकी इन महान् वैज्ञानिक खोजों का प्रमाण उसके बनाये “रसोद्वार तन्त्र” नामक ग्रन्थ में मिलता है, जिसे आज भी आयुर्वेद जगत् में अद्वितीय माना जाता है। पर परिस्थितियों वश नागार्जुन को अपने कार्य को पूर्ण करने का अवसर नहीं मिल सका और दस वर्ष तक ढाँक का राज्याधिकारी रहने के बाद ही उसका अंत हो गया।

ऊपर कहा जा चुका है कि नागार्जुन ने अपनी समस्त शक्ति और समय ‘अमृत’ की खोज में लगा दिया था। इस कारण वह राज्य-कार्य की उपेक्षा करने लगा और देश में अव्यवस्था उत्पन्न होने लगी। यह देखकर राज्य के हितैषी मन्त्रियों ने सामूहिक रूप से उसके पास जाकर प्रार्थना की कि उसकी विज्ञान रुचि के कारण राज्य की क्षति हो रही है, प्रादेशिक सामन्त स्वेच्छाचारी बनकर कर देना बन्द कर रहे हैं, उपद्रवी तत्त्व बढ़ने लगे हैं और विदेशियों के आक्रमण का पूरा भय उत्पन्न हो गया है।

मन्त्रियों की बात सुनकर नागार्जुन ने कहा - “मित्रो! तुम्हारा यह कहना ठीक है कि मैं अमृत की खोज में लगा हुआ हूँ और इससे राज्य कार्य की उपेक्षा हो रही है पर जिन दो विपत्तियों का भय तुमने प्रदशित किया, उनकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। अगर सामन्तों से कर मिलना बन्द हो जाय तब भी मेरा खजाना सुवर्ण से भरा रह सकता है और यदि कोई विदेशी मेरे राज्य पर आक्रमण करने का साहस करेगा, तो मैं सेना के बजाय थोडी़-सी औषधि से ही उसको नष्ट करने की सामर्थ रखना हूँ। याद रखो कि अमृत की खोज 'मृत्यु' की खोज स्वयं होती चली जाती है। वैसे मेरा उद्देश्य किसी का वनाश करना नहीं है, वरन मैं तो मनुष्य मात्र को अर्थाभाव और मृत्यु के भय के भय से से मुक्त करने के लिए ही इस साधनों में प्रवृत्त हुआ हूँ।

पर जब मन्त्रियों ने विशेष आग्रह किया और आंतरिक उपद्रवों का भय बतलाया तो नागार्जुन ने कहा- "राष्ट्र के हितेच्छु मन्त्रियो! अगर राज्य को सँभालने का आपका ऐसा ही आग्रह है तो युवराज को बुलाओ और मैं आज ही अपना राज मुकुट उसके शिक्षा देकर राज्य-संचालन की उचित व्यवस्था करे। मैं तो जब तक अमृत की खोज में पूर्ण सफलता प्राप्त न करलूँ तब तक अन्य किसी बात पर ध्यान नहीं दे सकता।"

मन्त्रीगण महाराज नागार्जुन की धून और दृढ़ निश्चय को जानते थे। उन्होंने उसी दिन एक बडी़ सभा करके उक्त निर्णय उसमें प्रकट किया और युवराज को गद्दी पर बैठाकर सर्वत्र पूर्ण रूप से करादी। नागार्जुन भी निश्चिन्त होकर पूर्ण रूप से अपने परिक्षणों में दत्तचित्त हुआ।

नागार्जुन ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए दूर-दूर देशों और पर्वतों से तरह-तरह को नई जडी़-बुटियाँ इकट्ठी करनी आरम्भ की और अपनी प्रयोगशाला में उनके द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रयोग करने लगा। सुवर्ण बनाने के लिये तो औषधियों का प्रयोग तांवा आदि धातुओं पर किया जाता था, पर अब अमृत की खोज करने के लिये तो उनका प्रयाग मानव देह पर ही किया जाना आवश्यक था। पर अज्ञात जडी़-बूटियों का सेवन करके उनके प्रभाव की जाँच करना खतरे से खाली न था और कोई व्यक्ति इसके लिए अपने प्राण संकट में डालने के लिए प्रस्तुत नहीं हो सकता था। इस लिए नागार्जुन उनका प्रयोग अपनी ही देह पर करने लगा। इस कारण अनेक बार उसे कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था, पर जिस प्रकार कोई तपस्वी अभिष्ट कार्य की सिद्धि के लिये तप आरम्भ करने पर प्राणों के मोह को सर्वथा त्याग देता है और अपनी समस्त शक्तियों तथा भावनाओं को एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित कर देता है, उसी प्रकार नागार्जुन अमृत की खोज के कार्य में एक सच्चे साधक के समान संलग्न हो गया। उसे न सुख-दुःख की चिंता थी; न खाने-पीने की फिकर थी और न परिश्रम, बाधाओं और विघ्नों से भयभीत था। अब वह एक राजा के बचाय एक कठोर व्रतधारी योगी या त्यागी का जीवन व्यतीत कर रहा था।

धीरे-धीरे नागार्जुन को अपने कार्य में सफलता प्राप्त होने लगी। अमृत की प्राप्ति के पहले ही उसने अपने शरीर को साधना द्वारा इस योग्य बना लिया कि वह सब प्रकार के परिक्षणों के भले-बुरे प्रभाव को निःशंक होकर सहन कर सके। उसने अपनी दैहिक स्थिति को इतना सुदृढ़ बना लिया कि न तो उस पर किसी प्रकार शस्त्र आदि का प्रभाव पड़ सकता था और न किसी प्रकार के विष आदि से उसको हानि पहुँचाई जा सकती थी। उसकी सहनशक्ति चरम सीमा तक पहुँच गई थी और वह निरन्तर अपने मक्ष्य की तरफ अग्रसर होता जाता था।

एक दिन युवराज महाराज नागार्जुन की प्रयोगशाला में उनके दर्शनार्थ आया। महाराज ने पुत्र को आशीर्वाद देकर अपनी प्रयोगशाला के विभिन्न को दिखलाया और कहा- "बेटा, अब मैं थोडे़ दिन में ही संसार से मृत्यु के भय को हटाने में समर्थ हो जाऊँगा। भगवान धन्वन्तरि की कृपा से अमर बनाने वाली समस्त औषधियाँ मिल गैइ हैं और अब केवल उचित मात्रा में विधिपूर्वक उनका योग करना ही शेष रह गया है। जो कार्य प्राचीन समय में अश्विनीकुमार, लंकेश्वर रावण और आयुर्वेद के जनक चरकाचार्य से पूर्ण नहीं हो सका था, उसकी विधि मेरी समझ में आ गैइ है। भगवान ने चाहा तो संसार में शीघ्र ही ऐसे युग का भाविर्भाव होगा जब कि दरिद्रता अय्र मृत्यु के भय से लोग मुक्त हो जायेंगे और पृथ्वी पर स्वर्ग का दृश्य दिखलाई पडज्ञे लगेगा।"

अपने पिता की महान सफलता को देख कर युवराज बडा़ प्रभावित हुआ, साथ ही उसे यह भय भी हुआ कि कहीं इस कार्य की समाप्ति हो जाने पर नागार्जुन फिर राज्य-सत्ता को लेने का विचार न करे। पर उस समय वह बिना कुछ कहे-सुने अपने महलों को लौट गया।

* * *

कहते हैं कि इसके बाद राजकुमार ने जब अपने इस भय की चर्चा अपने घनिष्ट इष्ट-मित्रों से की तो उनमें कुछ ने, जो गुप्त रूप से नागार्जुन के विरोधी थे, उसे इस 'भय' से छूटकारा पाने की सलाह दी। उन्होंने राजकुमार को इस सम्बन्ध में बहुत भड़काया और वहकाया। अन्त में सबने पड़यन्त्र रचकर ऐसी योजना बनाई जिससे छलपूर्वक नागार्जुन अपनी प्रयोगशाला सहित विनष्ट हो गया।

* * *

इस प्रकार यद्यपि नागार्जुन का 'अमृत' बनाने का स्वप्न साकार न हो सका, पर उसके प्रयत्नों ने पारद-विज्ञान और रसशास्त्र की इतनी अधिक उन्नति करदी कि उसके द्वारा भारतीय चिकित्सा-शास्त्र की बडी़ प्रगति हुई। विभिन्न धातुओं की भस्मों द्वारा कठिन से कठिन रोग पूर्बापेक्षा अधिक शीघ्रता से दूर किवे जाने लगे। जो लोग पारद की भस्म बनाने में सफल हुये, वे उसके प्रयोग से अमर नही तो दीर्घ-जीवन की प्राप्ति में समर्थ हो सके। उसने जो साधारण धातुओं को सुवर्ण में परिवर्तित करने की विधि निकाली उसके भी कुछ चिह वर्तमान समय के कीमियागरों में पाये जाते है। आजकल भी कुछ विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा रासायनिक सुवर्ण बनाने के समाचार सुनने और पढ़ने में आठे रहते हैं, चाहे उनका बनाया सुवर्ण कुछ हलकी जाठि का ही क्यों न हो।

इस प्रकार नागार्जुन अपने आविष्कारों द्वारा लोक-कल्याण का एक ऐसा मार्ग खोल गया जिस पर चल कर ज्ञान-विज्ञान के अभ्यासी उल्लेखनीय सफलतायें प्राप्त कर सकते हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि 'पारस' और 'अमृत' अति प्राचिन काल से अत्यन्त आकर्षक विषय रहे हैं भारतवर्ष ही नहीं अन्य देशों में भी अनगिनती लोग कीमियामरी के पीछे पागल होकर घूमते रहे हैं। योरोप के कितने ही देशों में तो प्राचीन काल में कीमियागरों की प्राणदण्ड देने का नियम बना दिया गया था, क्योंकि ऐसे काम को वहाँ 'जादू' समझ जाता था और यह ईसाई धर्म के सिद्धान्तों के विरूद्ध था। पर कुछ भी हो इन्ही कीमियगरों के उल्टे सीधे परीक्षणों के फलस्वरूप रसायन-विज्ञान की बहुत बातें मालूम हो गई जिनकी नीव पर ही आधुनिक रसायन-विज्ञान का भवन खडा़ किया गया है। उन प्राचीन कीमियागरों के लिए यह बात भी कम गौरवास्पद नहीं है कि आज उन्ही के उत्तराधिकारी वैज्ञानिकों के प्रयत्न स्वरूप सोना बना सकना कोई असम्भव बात नहीं रह गैइ है। वैज्ञानिक लोग अपनी प्रयोगशालाओं में सीसे के छोटे कणों को सोने में परिवर्तित करने में सफल हो चुके हैं, यह बात दूसरी है कि अभी उसमें बहुत अधिक व्यय करना पड़ता है। पर वह दिन अधिक दूर नहीं है कि यदि विज्ञान की वर्तमान प्रगति कायम रही तो सोना संसार में एक साधारण वस्तु हो जायगा।

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